अब वापस कुछ साहित्योत्सव की बात

आज जयपुर साहित्योत्सव पर जनसत्ता संपादक ओम थानवी ने बहुत संतुलित ढंग से लिखा और बेहद विस्तार से उसके प्रभावों, उसकी सीमाओं का आकलन भी किया है. विवादों के घटाटोप के पीछे उसके सार्थक हस्तक्षेप की चर्चा दब कर रह गई, उसके कुछ पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों की चर्चा पीछे रह गई. सब इस लेख में मुझे मिला. मैंने सोचा ‘जनसत्ता’ से साभार जानकी पुल पर भी लगा लूं- प्रभात रंजन 
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जिस रोज जयपुर साहित्योत्सव (जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल) के लिए दिल्ली से निकला, कृष्णा सोबती जी ने कृपापूर्वक अपना सद्यप्रकाशित यात्रा-वृत्तांत ‘बुद्ध का कमण्डल लद्दाख’ (राजकमल प्रकाशन) भिजवाया था। रंग-बिरंगे चित्रों से सुसज्जित अपूर्व कृति पर अपनी चित्रात्मक लिखावट में, सूफियाना अंदाज में उन्होंने ‘प्यार से’ लिखा: ‘‘खयालों में ही खारटूलांग पर खड़े होकर ओम थानवी साहिब को…’’।
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मुझ ‘साहिब’ ने पूरी कृतज्ञता के साथ वह कृति पढ़ने के लिए साथ रख ली। रास्ते में सोचता रहा कि जयपुर उत्सव इस दफा जब बौद्ध दर्शन पर ही केंद्रित है, तो उसमें कृष्णा जी क्यों नहीं?  क्या बुलाया गया और उम्रदराजी में उन्होंने इनकार कर दिया?  कृष्णा जी न सही, इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण किताब पर चर्चा क्यों नहीं? मेले में किताबों के पंडाल में फेरा दिया तब फिर मन में सवाल कि ‘लद्दाख’ यहां क्यों नहीं?

पत्रकार का दिमाग खुराफात में करवट लेता है। उलटा नहीं तो वक्रता में जरूर सोचने लगता है। सवाल पैदा करने के शौक में मुख्य रास्ता छोड़ आता है- संगीत में जिसे बहलावा लेना कहते हैं; एक राग को छोड़ दूसरे में टहल आना! 

पर तजुर्बा इस दौर में साथ देने लगता है। मैं जल्दी ही बहलावे से निकल आया। वैसे भी रिपोर्टिंग करने तो गया नहीं था; कविता और ग्रामीण संसार पर बोलने गया था। समझ में आता था कि कृष्णा जी का कमण्डल इस बार न सही, साक्षात दलाई लामा वहां थे। बौद्ध दर्शन पर चर्चा करने को कुनजांग छोदेन, सादिक वाहिद, चंद्रहास चौधुरी, विक्टर चान, नदीम असलम, रंजिनी ओबेसीकरी आदि भीमौजूद थे। कवयित्री और मानसरोवर यात्री गगन गिल भी। साथ में बौद्ध मंत्रोच्चार, भूटान का संगीत,  तिब्बत की कलाकृतियां, किताबें।

सब लेखक एक मेले में एक साथ तो जमा नहीं हो सकते। फिर भी कोई तीन सौ लेखक वहां पहुंचे थे। पौने दो सौ सत्र थे। एक-एक घंटे के छह सत्र अलग-अलग तंबुओं-मैदानों में एक साथ। भिन्न-भिन्न विषय। जिसमें रुचि हो, बैठ जाइए। शाम को संगीत, खान-पान। पिछले साल लेखकों और पाठकों-श्रोताओं की तादाद एक लाख बीस हजार थी। इस दफा की गिनती अभी साफ नहीं, पर अनुमान है कि पहले से ज्यादा ही रही होगी। बंदोबस्त भी पहले से चौबंद था।

आयोजक कैसे इस सब का बंदोबस्त करते होंगे, पता नहीं। लेकिन इस बात से शायद ही कोई इनकार करे कि पिछले छह वर्षों में जयपुर उत्सव वर्षारंभ में शहर की बड़ी घटना बन गया है। गेरुए शहर की चटक पहचान- जिसे अंगरेजी में गेरुए से ‘पिंक’ कर उलटे रास्ते वापस लाते हुए ‘गुलाबी’ कर दिया गया है, जबकि वह गुलाबी कभी था ही नहीं। जैसे लोग हवामहल या आमेर का प्रासाद देखने आते हैं, वैसे ही लेखक अब इस उत्सव के लिए आते हैं।

लेकिन इस ‘घटना’ पर मीडिया का रवैया क्या था? जैसा शुरू में मेरा दिमाग चला, अखबारों में ढेर सवाल उठे थे कि फलां लेखक मेले में क्यों नहीं थे, या फलां-फलां क्यों थे! या फलां गतिविधि का साहित्य से भला क्या संबंध बनता है। कुछ सवाल जायज भी थे। मेरे अपने सवाल की तरह। अपने लद्दाख को लेकर कृष्णा जी वहां होतीं, तो समारोह की शान बढ़ती ही न! लेकिन किसी विद्वान लेखक ने कहा है कि जो है उसकी बात करो; जो नहीं है उसकी नहीं। साहित्योत्सव को तवज्जोह देने में- हमेशा की तरह- मीडिया में कसर न थी। बड़ी संख्या में छापे के पत्रकार तो वहां थे ही, बहुत-से टीवी पत्रकार भी मौजूद थे। राजदीप सरदेसाई, संजीव श्रीवास्तव, रवीश कुमार, आशुतोष, राहुल कंवल, अनंत विजय आदि मुझे दिखाई पड़े। अनेक खुद कार्यक्रमों में शिरकत कर रहे थे। स्थानीय अखबारों में रोज पहले पन्ने का कवरेज, कहीं-कहीं तो दो-दो पन्ने लेखक मेले पर केंद्रित थे! मेरे एक जयपुरवासी मित्र ने बताया कि अखबारों में इतनी जगह हाल में आयोजित कांग्रेसी जमावड़े को भी नहीं मिली थी, जहां देश के दिग्गज नेता और केंद्र व अनेक प्रदेशों के प्रमुख सत्ताधारी मौजूद थे।

स्थानीय अखबारों में ‘लिट-फेस्ट’ यानी साहित्योत्सव का कवरेज अनुपात में बहुत था, पर रचना या लेखन की समझ के नजरिए से दयनीय। अंग्रेजी अखबारों का ध्यान हिंदी गोष्ठियों पर लगभग नगण्य था। हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं के अखबारों में ग्लैमर और सनसनी की खोज की जैसे होड़ थी। शर्मिला टैगोर, शबाना आजमी, राहुल द्रविड़ या जावेद अख्तर के सामने बड़े से बड़ा साहित्यकार नहीं टिकता था। हर साल आने वाले गुलजार इस दफा नहीं आए। पर एक अखबार ने, पता नहीं कैसे, दर्शकों में उनकी उपस्थिति भी ढूंढ़ निकाली! जयपुर में हमेशा गणतंत्र दिवस पर अखबारों के दफ्तर बंद रहते हैं। पर उस रोज आशीष नंदी के विवादास्पद वक्तव्य पर बावेला मचा तो एक अखबार ने छुट्टी रद्द कर ‘विशेष संस्करण’ भी निकाल दिया।

मेरा खयाल है, मीडिया में जैसे राजनीति, कूटनीति, खेल और व्यापार आदि के लिए विषय की समझ रखने वाले पत्रकार लिए जाते हैं, साहित्य और बौद्धिक विमर्श के लिए इनका अध्ययन और संवेदनशील नजरिया रखने वाले पत्रकार भीहोने चाहिए। ऐसा होता तो महाश्वेता देवी का उद्घाटन भाषण विवादग्रस्त न होता, क्योंकि नक्सलियों के हक में वे पहली बार नहीं बोल रही थीं। इसी तरह, आशीष नंदी प्रकरण में भीबात का बतंगड़ न बनता।

प्रो. आशीष नंदी ने अपनी टिप्पणी विनोदी स्वर में की थी। उससे पहले उन्होंने खुद ही कहा कि टिप्पणी अभद्र और अश्लील होगी। पूरे वाक्य की संरचना गंभीर संदर्भ के बावजूद हल्के अंदाज में थी। यानी दुराव की बू उसमें नहीं थी। इसी तरह उनकी पश्चिम बंगाल संबंधी दलील थी। हो सकता है उनकी टिप्पणी अनुचित हो। हो सकता है तथ्यहीन भी हो। पर उन्हें उसे कहने का हक नहीं था, यह बात मेरे गले नहीं उतरती। वे यह टिप्पणी करते या न करते, यह उन पर था। क्या लोकतंत्र में एक लेखक और विचारक को इतनी आजादी भी नहीं? लेकिन अपनी बात रखने के उनके अधिकार का बचाव मीडिया ने नहीं किया, इस बात पर मुझे अफसोस अनुभव होता है। जबकि मीडिया खुद अभिव्यक्ति पर कुठाराघात का शिकार कम नहीं होता। मीडिया में थोड़े लोग होंगे जिन्हें प्रो. नंदी के बौद्धिक कद और भारतीय मनीषा में उनके योगदान का पता होगा। उनकी किसी किताब का नाम लेखक सम्मेलन कवर कर रहे पत्रकारों को पता होगा तो बड़ी बात होगी।

पर हम मीडिया को क्या दोष दें, जब खुद लेखक समुदाय अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर सजग नहीं दिखाई पड़ा। आशीष नंदी के पक्ष में एक महत्त्वपूर्ण वक्तव्य जारी हुआ, जिस पर दस्तखत करने (या सहमति जताने) वालों में शिक्षक, विचारक, इतिहासकार,

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4 thoughts on “अब वापस कुछ साहित्योत्सव की बात”

  1. बहुत आभार ओम जी का …हम वहां तक न पहुच पाने वालों की उत्सुकता को एक चित्र तो मिला ..

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