कल यानी 18 सितंबर की शाम श्रीकान्त वर्मा शिखर सम्मान का आयोजन दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब में हुआ, जिसमें हिन्दी के शिखर लेखक अशोक वाजपेयी को सम्मान प्रदान किया गया। इस अवसर पर अशोक वाजपेयी ने जो स्वीकृति वक्तव्य दिया वह यहाँ अविकल प्रस्तुत है- मॉडरेटर
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कविता, आलोचना, कलाओं, संस्कृति, संस्था-निर्माण आदि क्षेत्रों में मैंने जो कुछ थोड़ा-बहुत किया है उसकी सामाजिक मान्यता के रूप में मैं विनयपूर्वक श्रीकान्त वर्मा शिखर सम्मान स्वीकार करता हूँ। श्रीकान्त वर्मा ट्रस्ट का बहुत आभार कि उसने मुझे इस सम्मान के लिए चुना।
श्रीकान्त वर्मा ने अपनी कविता में अपने समय और अपना नक़्शा खींचते हुए हमारा और हमारे समय के नक़्शे का भी मानों एक प्रारूप बना दिया था। यहाँ-वहाँ से चुनी हुई उनकी कविता-पंक्तियाँ हैं : ‘रोज़ एक कविता-विहीन दिवस/फेंक चला जाता है/नग्नता छिपाने को/अन्धकार’, ‘मैं अपनी करतूतों का दरोग़ा हूँ/नहीं एक रोज़नामचा हूँ’, ‘टकरा रहे हैं और गले मिल रहे हैं एक-दूसरे से/एक-दूसरे के अन्धकार में’, ‘मैं क्या करूँ? क्या मैं जीने की कोशिश में/किसी और दुनिया में/जा मरूँ।’, ‘मैं जानता हूँ/हरेक की नियति यही है/कि कोई और उसे ख़र्च करे/एक आदमी दूसरे का और दूसरा तीसरे का/दहेज है’, ‘कोई नहीं मरता अपने पाप से’, ‘मैं क्या कर रहा था/जब सब जयकार कर रहे थे? मैं भी जयकार कर रहा था–‘, ‘चाहता तो बच सकता था/मगर कैसे बच सकता था/जो बचेगा कैसे रचेगा’, ‘कोसल मेरी कल्पना में गणराज्य है’, ‘कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता/कोसल में विचारों की कमी है’, ‘कभी-कभी मगध को न जाने क्या हो जाता है/सब कुछ सामान्य होने के बावजूद/न कोई बोलता है/न मुँह खोलता है… मित्रो, जो सोचेगा सिहरेगा’ और ‘मित्रो, तीसरा रास्ता भी है मगर वह मगध, अवन्ती/कोसल या विदर्भ होकर/नहीं जाता।’
कविता से लगभग 75 वर्ष जुड़े होने के अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि कविता अभिव्यक्ति होने के साथ-साथ कई बार कर्म, नागरिकता, अन्तःकरण, स्मृति, कल्पना और संसार होती है। अकसर समाज में उसे इन रूपों में पहचाना-समझा नहीं जाता। हमारे समाज में, ख़ासकर हिन्दी समाज में, कविता हाशिये पर है और उसकी आवाज़ अनसुनी और उसका सत्व अनदेखा जाते हैं। हमारे ज़माने में शोरगुल इस क़दर बढ़ गया है कि कविता की आवाज़ सुनायी नहीं पड़ती। कविता की समझ और संवेदना में बहुत गिरावट और कमी आयी है। गद्य के बढ़ते भूगोल और लोकप्रियता ने भी इस सन्दर्भ में कुछ भूमिका निभायी है।
यों तो आजकल धर्म ही अपना धर्म नहीं निभा रहे हैं। कविता का धर्म है सच बोलना, सच को दर्ज़ करना, सच को शिथिल या धूमिल होने से बचाना। झूठों के भयावह घटाटोप में कविता कोशिश करती है कि सच अक्षत और अदम्य रहे। वह झूठ बोलने, झूठ बोलने और उस पर यक़ीन करनेवालों की बढ़ती जमात और माध्यमों में शामिल होने से इनकार करती है। कविता घृणा करने, हिंसा करने या उकसाने, किसी विचारधारा में विश्वास करने के कारण मनमानी करने से इनकार करती है। अपने को जोखिम में डालकर भी कविता कुछ सच्चा, कुछ ईमानदार, कुछ मानवीय, कुछ गरिमामय बचाने की कोशिश करती है।
हमारे समय में बढ़ती निराशा के बरक़्स कविता उम्मीद की, सपनों और कल्पना की, साहस और अन्तःकरण की विधा है। आज जब धर्म अपने ही अध्यात्म से विरत-रिक्त-शून्य हो चुके हैं, कविता अध्यात्म का नया घर-ठिकाना हो सकती है। ऐसी जगह जहाँ हम फिर विराट् सचाई, आत्म और पर की एकात्मता, उदात्तता और पारस्परिकता में, गरिमा से, स्पन्दित हो सकते हैं।
हमारा समय डरावना है: हमें तरह-तरह से डराने वाली शक्तियाँ और उपकरण बहुत बढ़ और सक्षम-तत्पर हो गये हैं। हमारे लोकतंत्र की यह अजब विडम्बना है कि संवैधानिक संस्थाएँ तक हमें डराने लगी हैं। ऐसे में कविता निर्भयता का परिसर है: कविता की यह ज़िम्मेदारी है कि वह स्वयं निर्भय हो और हमें निर्भय बनाये। जब विस्मृति का सुनियोजित अभियान चल रहा हो तो कविता हमें याद दिलाती है, याद रखती है, याद को बचाती है।
हमारे सार्वजनिक जीवन में, हमारे घर-पड़ोस में, हमारे दिमाग़ों में बहुत कचरा भर गया है- हम बहुत सारी नैतिक-राजनैतिक-वैचारिक और सांस्कृतिक गन्दगी के बीच रह रहे हैं। कविता इस विपर्यास और दुर्गन्ध से बच नहीं सकती- वह कोई स्वच्छता अभियान नहीं चला सकती। वह अपने पाँयचे ऊपर कर कीचड़ और दलदल से पाक-साफ़ नहीं निकल सकती। वह हमेशा मटमैली है, हमेशा मटमैली रहेगी। लेकिन वह हमारे पतन की गवाह होती है, हो सकती है- हिस्सेदार गवाह।
कविता भाषा में लिखी जाती है और भाषा पर आज कई संकट हैं। हिन्दी सार्वजनिक मंचों पर इस समय झगड़े-झाँसों, झूठ-नफ़रत, गाली-गलौज़, हिंसा की लगभग राजभाषा बनायी जा रही है। व्यापक परिदृश्य पर तीन तरह की भाषाएँ सार्वजनिक कर्म और अभिव्यक्ति के क्षेत्र में सक्रिय और मुखर हैं। पहली त्रयी है झूठ-नफ़रत-हिंसा, दूसरी माबलिंचिंग-हेट स्पीच-बुलडोजि़ंग और तीसरी साहस, सहानुभूति और समरसता। कविता की यह जैविक और नैतिक बाध्यता है कि वह साहस, सचाई, सहानुभूति और समरसता की भाषा ही चुने। उसका काम है कि वह भाषा की मानवीयता, ऊष्मा और आभा, साझापन और संग-साथ को, साहस और कल्पनाशीलता के साथ, निडर रहकर बचाये रखे और सघन-सक्रिय करे। भारतीय समाज में इस समय नेता-अभिनेता-खिलाड़ी-अपराधी ही नायक छबियाँ हैं। इन छबियों के बरक़्स कवि की छवि अनायक की ही हो सकती है, है। कवि के लिए यह समय नायक बनने का नहीं मनुष्य बने रहने का है। जो कुछ हो रहा है उसके लिए हम सब ज़िम्मेदार हैं, कवि भी: कवि अपनी ज़िम्मेदारी, अपनी हिस्सेदारी और नैतिक वेध्यता से इनकार नहीं कर सकता। यह भी स्पष्ट है, कम से कम कवि के नज़दीक, कि समाज के अधिकांश का काम कविता के बिना बखूबी चल जाता है। लेकिन कविता का काम समाज के बिना नहीं चलता। फिर भी, ऐसा कोई समाज संसार में शायद ही हो जिसमें किसी न किसी रूप में कविता मौजूद न हो।
इन दिनों की सबसे व्यापक क्रियाएँ हैं: तोड़ना-ढहाना, गिरना-टूटना, मारना-पीटना। कविता की प्रति-क्रियाएँ हैं: जोड़ना, रोकना, थामना, बचाना। जहाँ तक हो सके वहाँ तक। सब कुछ कविता के बस में नहीं होता। पर वह दुस्साहस करने से न चूकती है, न घबराती है।
जब स्वतंत्रता, समता, न्याय और भाईचारा की अवमानना और अतिक्रमण हो रहा हो, जैसा कि इस समय हो रहा है, तो कविता चुपचाप नहीं बैठ सकती, न ही बेहतर परिस्थिति की प्रतीक्षा में निष्क्रिय रह सकती है। वह बेधड़क आवाज़ उठा रही है। वह बड़बोली नहीं है जैसी कि राजनीति या धर्म या मीडिया या बाज़ार। पर उसमें आत्मा और अन्तःकरण की आर्त पुकार है।
आज राजनीति की नीति से, धर्म का अध्यात्म से, मीडिया का सचाई और निष्पक्षता से, बाज़ार का जि़म्मेदारी से, न्यायालय का अपने संवैधानिक विवेक से, समाज का अन्त:करण से ओर साधारण लोगों को अपने ज़रूरी एकान्त से सम्बन्ध या तो टूट या कमज़ोर पड़ गया है। कविता इस विच्छिन्नता को दर्ज़ कर रही है।
हम जिस विकट परिस्थिति में फँसे हैं उसमें से निकलने का एक ही रास्ता है कि कविता असहयोग हो, सत्याग्रह करे और सविनय अवज्ञा ज़ाहिर करे। कविता अपने परिसर में गांधी जी की अवधारणाओं का पुनराविष्कार कर सकती है।
कविता और साहित्य विचार की विधा भी हैं। उनमें संसार, सचाई, समाज, समय, आत्म, व्यक्ति, सम्भावना आदि पर विचार होता है। यह निरा विचार नहीं, संवेदनात्मक विचार होता है, रागसिक्त विचार। कविता संसार का गुणगान करती है और उनका प्रश्नांकन भी। उसमें मानवीय प्रयत्न की सम्भावना, आकांक्षा और सीमाओं का एहतराम होता है । अपने अनेक सम्भव अर्थों और आशयों में कविता संसार का रूपक होती है, उसके अनेक अर्थों और बहुलता का रूपक। रिल्के ने कवि को ‘अदृश्य का मधुसंचयी’, बोरिस पास्तनाक ने कवि को ‘अनन्त का राजदूत/जिसे समय ने बन्धक बना रखा है’, मुक्तिबोध ने ‘आत्मा का गुप्तचर’ और हमारी परम्परा में ‘अप्रत्याशित की रमणीयता’ का रचयिता कहा है। श्रीकान्त वर्मा ने अपने को याने कवि को ‘अपनी विफलताओं का प्रणेता’ बताया है।
कवि यह भी जानता-समझता है कि जीवन के सामने कविता हमेशा अपर्याप्त होती है। जीवन हमेशा कविता से बड़ा, अधिक विपुल, अधिक व्यापक, अधिक जटिल, अधिक सूक्ष्म होता है। सारा साहित्य, सारी कलाएँ जीवन को कभी निश्शेष नहीं कर सकतीं। जीवन की यह असमाप्य विराटता और विपुलता कवि और कविता को विनम्र बनाने के लिए काफ़ी है। इसीलिए कविता नैतिकरूप से सजग और पक्षधर होते हुए भी फ़ैसला नहीं देती। वह हमें सचाई का अहसास कराती है, उसके अनदेखे या उपेक्षित पक्षों को हमारे सामने उजागर करती है और फिर हमें स्वतंत्र छोड़ देती है कि हम उससे कैसे प्रतिकृत होते और उसके बारे में क्या सोचते-करते हैं।
कविता किसी परम सत्य में न तो भरोसा करती है, न ही उसकी खोज। उसके लिए सभी सच अन्तरिम होते हैं। कविता का सच हमेशा अधूरा सच है जो तभी पूरा होता है जब पाठक-रसिक उसमें अपना सच मिलाते हैं। कवि यह नहीं मानता या मान सकता कि सारा सच उसकी मुट्ठी में है। वह सच की अनिवार्य बहुलता में विश्वास करता है।
कविता अपवित्र समय में पवित्रता के पुनर्वास के लिए प्रार्थना, अभद्र समय में भद्रता का आग्रह, हिंसक समय में अहिंसक पुकार, क्रूर समय में करूणा की गुहार, कायर चुप्पी के विरूद्ध अन्तःकरण की चीख़, सब कुछ सार्वजनिक करने की मुहीम के दौरान हमाराज़रूरी एकान्त हो सकती है। हम बेवज़ह भाग-दौड़ में फँसे लोग हैं। हम हर दूसरे-तीसरे क़तार में खड़े लोग हैं। हम जीने की झंझट में इस क़दर मुब्तिला हैं कि हमें ठिठककर, कुछ रूक-थम कर, सोचने-समझने की फुरसत ही नहीं मिल पा रही है। कविता, फिलमुक़ाम, हमें ठिठकने, सोचने-समझने, अपनी असली हालत से दो-चार होने का अवसर देती है। सार्वजनिक जीवन से बाहर जो प्रकृति-घर-परिवार, साहित्य-संस्कृति-कलाओं में फैला अपार जीवन है उससे कविता हमें फिर जोड़ सकती है।
आज कविता हमें फिर से आश्वस्त कर सकती है कि ‘आदमी को मयस्सर है इन्साँ होना।’ वह हमें सिखा सकती है कि कोई दूसरे नहीं हैं- ‘हम’ ही ‘वे’ हैं, ‘वे’ ही ‘हम’ हैं। वह हमें बता सकती है कि कठिन से कठिन समय में हम मनुष्य बने रह सकते हैं। हम लौकिक में ही अलौकिक, साधारण में अध्यात्मिक खोज-पा सकते हैं। हमारी कविता हमारा आदमीनामा है।
लगभग सत्तर वर्ष पहले मुक्तिबोध ने पहचाना था कि हम ‘अँधेरे में’ हैं। श्रीकान्त वर्मा ने अपनी कविता में बीसवीं शताब्दी और सत्ता के अँधेरों की शिनाख़्त की थी। हम कविगण आज जिस गाढ़े अँधेरे से घिरे हैं, उसे भेदने और समझने की दरकार है। हम लिखकर ही इस अँधेरे को जान सकते और लिखकर ही सारी नाउम्मीदी के रहते उम्मीद की एक दरार खोज सकते हैं। इस अभागे समय में कविता को अन्ततः उम्मीद की विधा भी होना है, साहस-निर्भयता-अन्तःकरण की विधा होने के साथ-साथ।
मेरा सौभाग्य था कि मुझे अपने कवि-जीवन के आरम्भ में ही लक्ष्मीधर आचार्य जैसे स्कूली अध्यापक और हरिशंकर परसाई, श्रीकान्त वर्मा, रघुवीर सहाय, अज्ञेय, मुक्तिबोध और शमशेर बहादुर सिंह जैसे प्रेरक मिले। मेरा यह भी सौभाग्य था कि मैं साहित्य-संस्कृति-कलाओं के आधुनिक समवाय का हिस्सा बना और मुझे जगदीश स्वामीनाथन, कुमार गन्धर्व, सैयद हैदर रज़ा, ब व कारन्त, निर्मल वर्मा, कृष्ण बलदेव वैद, कृष्णा सोबती आदि का साहचर्य और आशीर्छाया मिले। कविता ने ही जितना मनुष्य मैं हो पाया उतना मनुष्य बनाया और मैंने जो कुछ किया वह कविता या कविता का विस्तार है। आप मेरी इस हेकड़ी को माफ़ करें कि मैंने कोशिश की कि मैं समय का प्रतिरोध करूँ, उसके सामने निहत्था और लाचार होने के इनकार करती कविता लिखने की कोशिश करूँ। आजकल राजनीति, धर्म, बाज़ार, मीडिया आदि सभी बड़े-बड़े दावे करते रहते हैं। मेरा कविता के लिए कुछ दावे करना इसलिए बेज़ा और असामयिक नहीं है।


