एक छोटी कहानी ‘शॉर्ट फिल्म’

मैं मूलतः कथाकार हूँ। भूलतः कुछ और हूँ। इसी बात की याद दिलाने के लिए कभी-कभी आपको अपनी कहानियाँ पढ़वाता रहता हूँ। यह छोटी सी कहानी आई है आउटलुक के नए अंक में- प्रभात रंजन 
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15 अक्टूबर को मेरी शॉर्ट फिल्म ‘उजाला’ का शो है सीरी फोर्ट में शाम 6:30 बजे. समय हो तो आना. अच्छा लगेगा- सुतपा. छोटा सा ईमेल. विश्वास नहीं हो रहा था. नहीं इस बात पर नहीं कि सुतपा को मेरा ईमेल पता कहाँ से मिला? यह तो आजकल आसानी से मिल जाता है.

इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा था कि उसे याद रहा.
सुतपा- नाम ने उसे 20 साल पीछे पहुंचा दिया. बड़ी-बड़ी चमकती आँखों वाली सुतपा. आत्मविश्वास से भरी-पूरी. ऐसा लगता जैसे उसके कदम बढाने भर की देर थी, कामयाबी उसकी राह देख रही थी.
कॉलेज में मेरे साथ पढ़ती थी. साथ नहीं एक साल जूनियर थी.

क्या सिर्फ यही थी? अब इतने सालों बाद ‘कुछ और’ को याद करने का कोई मतलब नहीं रह गया था.

उसकी स्मृतियों में हमेशा वही सुतपा बनी रही. आँखों से हँसने वाली. तपाक से मिलने वाली. अच्छा है स्मृतियाँ कभी बूढी नहीं होती! जब जो जी चाहा देख लिया.

एम. ए. के बाद पीएचडी करने अमेरिका के येल यूनिवर्सिटी चली गई थी. फेलोशिप मिल गई थी ‘भारतीय राजनीति में जाति’ के ऊपर शोध के लिए.

पांच साल का साथ एक झटके में ख़त्म हो गया. पता भी नहीं चला.

इंटरनेट, मोबाइल फोन का ज़माना नहीं आया था.

‘देखना एक दिन अख़बारों के पहले पेज पर फोटो छपेगी. तब अपने बच्चों को दिखाकर बताना इसके साथ मेरा…. कितना एक्साइटिंग लगेगा न.’ वह गले मिलकर एयरपोर्ट के अन्दर चली गई थी. मैं इसका कुछ मतलब समझ नहीं पाया था.

शुरू में हमने एक-दूसरे को खूब चिट्ठियां लिखी. फिर सिलसिला कम होता गया.

मैं ऑब्जर्वर फाउंडेशन में रिसर्चर की नौकरी करने लगा था. रोज-रोज भारत की चुनावी राजनीति पर आंकड़े जुटाना, उनसे निष्कर्ष निकालना. बस.

जीवन में सब कुछ था लेकिन कुछ ख़ास नहीं था.

दूर हो जाने पर यह समझ में आ गया था की हमारे बीच फासला बहुत था. क्या हुआ कि हमने कहने को प्यार किया, रहने को साथ रहे. लेकिन…

वह एक बड़े कैरियर की तरफ बढ़ रही थी. मैं देश में नए-नए आये आर्थिक उदारवाद की धारा में अपने लिए किसी तरह कोई किनारा तलाशने में लग गया.

मेरे पास प्रयोग करने के लिए अधिक समय नहीं था, साधन नहीं थे. चाहता तो मैं भी था पीएचडी करूँ, किसी यूनिवर्सिटी में पढ़ाऊँ. लेकिन फेलोशिप नहीं मिली, और तो और यूजीसी की नेट परीक्षा भी पास नहीं कर सका. घर की कंडीशन ऐसी नहीं थी कि उसके ऊपर अपनी पढ़ाई का बोझ और डाला जा सके.
 
चारा क्या था. जो मिल रहा था उसे ही पकड़ लेने में भलाई थी. अच्छे पैसे मिल रहे थे.

सुतपा की चिट्ठियां आनी कम हुई फिर बंद. चिट्ठियों में हमने यह जान लिया था कि हम दोनों अलग-अलग दुनियाओं में रह रहे थे, जिन्हें एक करने की कोई सूरत नहीं बची थी. समय के साथ वह दूरी और बढती जा रही थी. वह अमेरिका के बारे में, वहां के यूनिवर्सिटी सिस्टम के बारे में लिखती और मुझे दिल्ली के बारे में लिखते हुए शर्म आती. मुझे ऐसा लगने लगता जैसे वह मुझे गाँव में छोड़कर शहर चली गई हो.

साल-साल बीतते गए. एक दिन सचमुच अखबारों में उसकी फोटो छपी थी. उसके बारे में खबर भी. लिखा था एक उच्च राजनयिक पर उसकी पत्नी सुतपा ने घरेलू हिंसा का केस कर दिया था. ‘मॉर्निंग एको’ में खबर बड़े विस्तार से छपी थी कि किस तरह अमेरिका में एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में पीएचडी करने के दौरान उसकी भेंट अरूप चौहान नामक उस स्मार्ट राजनयिक से हुई और साल भर के अन्दर उसने अपनी पढ़ाई छोड़ आर उससे शादी कर ली. महज चार साल के अन्दर उसने अपने पति पर यह केस कर दिया था. लिखा था कि उसका पति अक्सर शराब पीकर उसे मारता-पीटता था. और अभी न्यू ईयर इव की पार्टी में उसने जर्मनी के बॉन शहर में इतना मारा कि उसका गर्भपात हो गया. जान बचाने के लिए एक अन्य राजनयिक के घर में शरण लेनी पड़ी थी. उसके पति का बयान भी छपा था कि उसके सम्बन्ध किसी और पुरुष से थे.

उसी साल की बात है जब मेरी बड़ी बेटी पिंटी का जन्म हुआ था.

मैंने जब पढ़ा तो मुझे ऐसा लगा जैसे उसके चमकते जीवन को अँधेरे में फेंक दिया गया हो.

कई दिनों तक उसके बारे में अखबारों में छपता रहा. फिर गायब. लगता था जैसे वह उन्हों अंधेरों में खो गई हो.

कुछ साल बाद अचानक एक सहपाठिनी शिल्पा से गोवा के एयरपोर्ट पर मुलाक़ात हो गई और उस भूली कहानी के बारे में बात चल पड़ी. कॉफ़ी के घूँट भरते-भरते उसने जो बताया उस बात ने मुझे चौंका दिया और दुखी भी कर दिया.

अपने पति अरूप चौहान के साथ उसका आउट ऑफ़ कोर्ट सेटलमेंट हो गया था. उसके बाद वह मुंबई में रह रही थी. वहां के अखबारों में कुछ दिनों पहले एक खबर छपी थी, खूब चर्चा थी. अधिक मात्रा में नींद की गोलियां खा लेने के कारण एक दिन देर रात सुतपा सिंह को अस्पताल में भर्ती करवाया गया था. उसे एक प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक के घर से लाया गया था. कहा जा रहा था कि उसके साथ लिव इन में थी. पिछले कुछ दिनों से संबंधों में तनाव चल रहा था. तनाव उस फिल्म की कहानी को लेकर था जिसकी शूटिंग हाल में ही पूरी हुई थी. कहते हैं कि उसकी कहानी सुतपा ने लिखी थी जिसे उसके निर्देशक मित्र ने अपनी लिखी कहानी के रूप में प्रचारित किया था. सिनेमा के परदे पर भी वह उसका क्रेडिट अपने नाम ही रखना चाहता था. शायद इसी बात को लेकर झगडा हुआ हो. उसने बताया कि उसके दोस्त का चक्कर किसी और के साथ चलने लगा था, शायद इसलिए उसने नींद की गोलियां खाई हों. कुछ दिन तक गॉसिप वौसिप चला, फिर लोग भूल गए.
जब जब उसने रौशनी में आने की कोशिश की अँधेरा आगे आ जाता.
शिल्पा ने उसका इमेल आईडी भी दिया था. कहा था कि मेरे बारे में पूछ रही थी. एक दिन शिल्पा से पूछा था कि अनमोल के बारे में कुछ पता है?

सुनकर मैं रोमांचित हो गया था. घर आकर भी मन नहीं लग रहा था. बार-बार आँखों के सामने उसकी हंसती हुई बड़ी-बड़ी आँखें कौंध जाती थी. पत्नी ने पूछा- क्या हुआ?

‘कुछ नहीं. गोवा में मछली ज्यादा खा ली थी. लगता है अपच हो गया है.’

‘उम्र हो गई है. खान-पान का ध्यान नहीं रखोगे तो यही होगा’, कहते हुए पत्नी पिंटी का होमवर्क करवाने में लग गई थी.

यह रोमांच कई दिनों तक रहा. कई बार मन हुआ कि ऑफिस से शिल्पा द्वारा दिए गए मेल आईडी पर मेल करके देखूं. एक बार खुद से पूछ कर तो देखूं कैसी है?

जीवन इतना एकरस हो चला था कि कोई भी रोमांच अधिक दिन तक नहीं टिकता. सुबह से शाम दफ्तर, शाम में घर, चाय-नाश्ता, बेटी का होमवर्क, फिर सो जाना. अगले दिन फिर वही रूटीन.

पिछले दिनों एक कविता पढ़ी थी- मैं जो काम करता हूँ उसके लिए मुझे वेतन मिलता है/ मैं अपना अवैतनिक जीवन भूलता जा रहा हूँ…’

जल्दी ही एक बार फिर अपने अवैतनिक जीवन को भूल गया.

बीच-बीच में कभी-कभी उसका ध्यान आ जाता. मैं जानता था वह किसी न किसी काम में लगी होगी. रुक जाना, ठहर कर बैठ जाना उसके स्वभाव में ही नहीं था.  धोखे, संबंधों की असफलता उसे तोड़ नहीं सकती थी. यह मैं जानता था. लेकिन वह कर क्या रही होगी? एक बार फिर वह इन अंधेरों से निकलेगी जरूर.

पिछले दिनों फेसबुक पर सक्रियता बढ़ी तो मेरा ध्यान सुतपा की तरफ गया. मैंने उसे खोज लिया था. सुतपा सिंह फेसबुक की आभासी दुनिया में मौजूद थी. मैं एक बार फिर रोमांचित हो गया. किसी तरह से खुद को रोका फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजने से. लेकिन इतना जरूर हुआ था कि जुदाई के बीस साल बाद मुझे उसके जीवन से जुड़ी हरेक सार्वजनिक खबर के बारे में पता चल जाता था. मैं इतने सालों बाद एक बार फिर खुद को उसके जीवन के बेहद करीब महसूस कर रहा था. बस एक क्लिक दूर. उसकी नई नई तस्वीरें, उसके जीवन के पल-छिन, उसके खयालात…

तस्वीरों ने उसके मन की अल्हड सुतपा को एकदम से जैसे बड़ा कर दिया था. उसने ध्यान दिया था कि लगभग हर तस्वीर में सन गोगल्स लगाये रहती थी. शायद अपनी आँखों के नीचे के काले धब्बे को छिपाने के लिए. काले धब्बे तो पहले भी थे लेकिन अब बढ़ गए थे. उसने महसूस किया. शायद उम्र, शायद संबंधों की कड़वाहटों का कलुष…. शायद जीवन में बार-बार छा जाने वाला अँधेरा…

वहीँ एक दिन उसने पढ़ा कि उसने दो साल रिसर्च करके ऐसी महिलाओं के ऊपर एक फिल्म बनाई थी जिनके एनआरआई पतियों ने उनको धोखा दिया, उन्हें इन्तजार के अँधेरों में छोड़कर जो गायब हो गए. उसने उसके फेसबुक पेज पर पढ़ा कि कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में उसकी फिल्म का प्रदर्शन हुआ था, उसकी सराहना हो रही थी. वह उन अखबारों के कटिंग्स अपने फेसबुक पेज पर लगाती थी जिनमें उसकी फिल्मों के बारे में छपता था.

मैं रोज पढता और सुतपा के बारे में सोचता. क्या यही वह मंजिल थी जिसे वह पाना चाहती थी. जिसके लिए उसने मुझे पीछे छोड़ दिया था. मुझे लगा जैसे उसने जीवन का उजाला पा लिया था और इस बार उसके सामने अँधेरा नहीं छाने वाला था.
मैं सोच रहा था पांच साल से उसके पास उसका ईमेल आईडी भी है तब भी मैंने ही उसने कहाँ कुछ पूछा? नहीं कुछ तो हेलो तो लिख ही सकता था. मैंने महसूस किया कि मेरे अन्दर हीन भावना थी जो मुझे उससे संपर्क करने से रोकती थी. उसे हमेशा लगता रहा कि वह उसके सामने कुछ भी नहीं बन पाया. मैं यह मानता हूँ कि अपनी तमाम पढ़ाई-लिखाई के बावजूद मैं इस बात को झेल नहीं सकता था कि मेरी स्त्री मुझसे ज्यादा सफल हो. वह सफल होती गई और मुझसे दूर होती गई.

एक निजी संस्था में रिसर्च को ऑर्डिनेटर की क्या बिसात? मैं एक लीक पर चलता रहा. वह देश-विदेश में कामयाबी के अनुभव जुटाती रही. मैं उसके जीवन के अंधेरों के बारे में पढता-सुनता और सच कहूँ तो कहीं न कहीं मन में यह संतोष होता कि सब कुछ तो है फिर भी उसके जीवन में कुछ कमी है.

खुद को दिलासा देते हुए मैंने मन ही मन सोचा- शायद वह जो पाना चाहती थी वह नहीं पा सकी थी इसलिए मुझसे कभी संपर्क न किया हो. थोड़ी सी रौशनी आई और उसने मुझे याद किया. शुक्र है.

शुक्रिया- मैंने ईमेल का संक्षिप्त जवाब दिया.

15 अक्टूबर- अभी 15 दिन बचे थे.

पिंटी को भी फिल्म दिखाने ले जाऊँगा और सुतपा को दिखाकर कहूँगा यही है….
उसकी हंसी छूट गई. हडबडाकर उसने इधर-उधर देखा, इस तरह अकेले में हँसते हुए किसी ने देख तो नहीं लिया.

कोई नहीं था.

मेज पर उड़ीसा में हाल में ही संपन्न हुए विधानसभा चुनाव के विस्तृत परिणाम थे. उसको देखकर नोट्स बनाने में लग गया. कल शाम चुनाव के ट्रेंड्स को लेकर मीटिंग थी.

फिलहाल मैं सुतपा, उसकी फिल्म ‘उजाला’ से अपना ध्यान एकदम हटा लेना चाहता हूँ.

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