21वीं सदी में तकनीक और नैतिकता: सर सैयद का दृष्टिकोण

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय द्वारा प्रतिवर्ष सर सैयद डे के उपलक्ष्य पर हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी भाषा में अखिल भारतीय निबंध प्रतियोगिता का आजोयन किया जाता है। एक महीने पूर्व इसकी घोषणा की जाती है। जो स्नातक, स्नातकोत्तर और शोधार्थी के लिए होता है। जिसमें 3000 शब्दों में निर्धारित विषय पर निबंध टाइप करके भेजना होता है। निबंध में कहीं भी लेखक का नाम नहीं होता है। ब्लाइंड निबंध की पीडीएफ़ दिए गए मेल पर भेजना होता है। चयनित निबंधों को क्रमशः प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कार से प्रतिवर्ष 17 अक्टूबर को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति व गणमान्य द्वारा पुरस्कृत किया जाता है। हिन्दी निबंध प्रतियोगिता का पुरस्कार इस साल युवा लेखक और शोधार्थी मुशर्रफ परवेज़ को दिया गया। प्रस्तुत है पुरस्कृत निबंध- मॉडरेटर 

====================================

भूमिका 

21वीं सदी मूलतः विज्ञान और प्रौद्योगिकी की सदी है। हमारे जीवन के तमाम क्षेत्रों पर तकनीक का बेहद गहरा प्रभाव है। दूसरे शब्दों में, ये कहा जा सकता है कि तकनीक के बग़ैर जीवन व्यतीत करना एक दुष्कर कार्य है। आज का मनुष्य प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से तकनीक पर आश्रित है। तकनीक रहित जीवन की कल्पना करना असंभव बन चुका है। 

‘तकनीक’ का अंग्रेज़ी पर्याय ‘Techonology’ और ‘नैतिकता’ का ‘Ethics’ होता है। ‘तकनीक’ से तात्पर्य एक ऐसे माध्यम से है जिससे समस्याओं को विज्ञान द्वारा हल किया जाता है वहीं ‘नैतिकता’ अर्थात वे नियम जिसके दायरे में रहकर किसी समस्या का समाधान करना है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तकनीक का प्रयोग करते समय नैतिकता का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। यदि नैतिकता को अनदेखा किया जाता है, तो कई अनैतिक समस्याएं स्वतः ही उत्पन्न हो जाती हैं। इन दोनों शब्दों का हमारे जीवन में विशेष महत्व है।

                         चूंकि विषय में सर सैयद के दृष्टिकोण पर बात रखनी है, इसलिए उनका संक्षिप्त परिचय देना महत्वपूर्ण हो जाता है। भारतवर्ष महापुरुषों की तपस्थली है। यहाँ समय-समय पर महानुभावों का जन्म होता आया है। 19वीं सदी में जितने शिक्षाविद् व समाजसुधारक हुए, उनमें एक नाम सर सैयद का भी आता है। उनकी गणना भारतवर्ष के उन प्रमुख शिक्षाविदों, समाज सुधारकों और लेखकों में किया जाता है। जिन्होंने भारतवर्ष के भविष्य को सँवारने का अद्वितीय कार्य किया।

सर सैयद अहमद खां का जन्म 17 अक्टूबर, 1817 को हुआ था। वे जीवनपर्यंत आधुनिक एवं वैज्ञानिक शिक्षा हेतु कार्य करते रहे। वे धार्मिक ज्ञान के साथ-साथ समाज को वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण बनाने में बल देते थे। उनकी मुख्य चिंता थी कि कैसे भारतवर्ष को तर्कपूर्ण, चिंतनशील और आधुनिक दृष्टिकोण से जोड़ा जाए? यही कारण है कि उनके दृष्टिकोण का तार 21वीं सदी से जुड़ता दिखाई देता है। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनपर मां-सरस्वती की असीम कृपा थी। यही कारण है कि उनके कई व्यक्तित्व एक साथ हमारे समक्ष प्रस्तुत होते हैं। चाहे उन्हें सिविल सेवक कहें, पत्रकार कहें, शिक्षाविद् कहें, समाज सुधारक कहें या इतिहासकार कहें, ये सारी बातें उनके व्यक्तित्व पर फिट बैठता है। 

                         सन् 1857 के विद्रोह के कारणों को देखते हुए उन्होंने ‘द कॉजेज ऑफ द इंडियन रिवॉल्ट’ नामक पुस्तक लिखी। जिसमें उन्होंने बड़ी तार्किकता के साथ उन सभी कारणों का उल्लेख किया। जिससे वो विद्रोह हुआ था। वे सामाजिक सुधार को लेकर बराबर चिंतित रहते थे। उनका मानना था कि हम लोकतांत्रिक मूल्यों को तभी स्थापित कर पाएंगे, जब हम समाज में आमूलचूल परिवर्तन करेंगे। वे पर्दा-प्रथा, बहु-विवाह, सती प्रथा जैसी कुरीतियों के कट्टर विरोधी थे।

वे दूरदर्शी थे। उन्हें पता था कि जब तक ये सारी कुरीतियाँ रहेंगी, तब तक समाज के लोगों की मानसिकता जड़ बनी रहेंगी। इसलिए आवश्यक है कि ये सारी कुरीतियाँ समाज से ख़त्म हों और तर्कपूर्ण समाज की स्थापना हो सके।

अलीगढ़ आंदोलन की प्रासंगिकता 

जब  हमें सर सैयद के दृष्टिकोण की चर्चा करनी हो, तो उससे पूर्व ‘अलीगढ़ आंदोलन’ पर प्रकाश डालना महत्वपूर्ण हो जाता है। क्योंकि उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण की नींव इसी आंदोलन ने रखी थी। 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में यह आंदोलन आधुनिक शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामाजिक सुधार को बढ़ावा देने वाला एक महत्वपूर्ण आंदोलन। रहा। आंदोलन का मुख्य सरोकार था अंग्रेज़ी और पश्चिमी विज्ञान के अध्ययन को प्रोत्साहित करते हुए, धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक ज्ञान का समन्वय करना।

                         आंदोलन के प्रभाव में सन् 1864 में ‘साइंटिफिक सोसाइटी’ की स्थापना हुई। जिसका उद्देश्य पश्चिमी विज्ञान एवं आधुनिक ज्ञान की पुस्तकों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद करना था। ताकि भारत के कोने-कोने तक आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की लौ पहुंचे। इसी कड़ी में ‘तहज़ीब-उल-अख़लाक़’ पत्रिका का प्रकाशन भी महत्वपूर्ण है। जिसके ज़रिए सामाजिक सुधार और आधुनिक तर्कशील विचारों को प्रसारित किया गया। इस आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव आता है साल 1877 में, जब सर सैयद द्वारा ‘ऑक्सफोर्ड एवं कैम्ब्रिज विश्वविद्यालयों’ की तर्ज़ पर ‘मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज’ की स्थापना की जाती है। यही कॉलेज बाद ‘अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय’ के रूप में विकसित हुआ। इसका प्रभाव सिर्फ अलीगढ़ में नहीं पड़ा अपितु समूचे देश में पड़ा। आगरा, मथुरा, हाथरस आदि स्थानों के शिक्षा, तकनीक, तर्क व समाज आदि में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

                         21वीं  सदी विज्ञान, तकनीक, वैश्वीकरण और तीव्र सामाजिक परिवर्तन की सदी है। आज मनुष्य के जीवन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंटरनेट, सोशल मीडिया, जैव-प्रौद्योगिकी और डिजिटल संचार का प्रभाव निरंतर बढ़ता चला जा रहा है। जिन उपलब्धियों ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन साथ ही सत्य-असत्य की पहचान, निजता, सामाजिक उत्तरदायित्व, सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों से जुड़े अनेक प्रश्न भी उत्पन्न किए हैं। ऐसे समय में 19वीं सदी के महान समाज-सुधारक और शिक्षाविद् सर सैयद के नैतिक एवं सामाजिक विचारों को नए संदर्भ में समझना उपयोगी है। उनका चिंतन शिक्षा, विवेक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक सुधार और मानवीय सद्भाव पर आधारित था।

19वीं और 21वीं सदी की तकनीकों की तुलना

मानव सभ्यता के विकास में तकनीक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। तकनीक ने मनुष्य के जीवन को सरल एवं सुगम बनाने के साथ-साथ उसके सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक जीवन को भी प्रभावित किया है। 19वीं सदी और 21वीं सदी तकनीकी विकास के दो अलग-अलग महत्वपूर्ण चरण हैं। 19वीं सदी में औद्योगिक क्रांति ने मशीनों, भाप-शक्ति, रेल और संचार के नए साधनों को जन्म दिया, जबकि 21वीं सदी डिजिटल तकनीक, इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स और जैव-प्रौद्योगिकी आदि के तीव्र विकास की सदी है।

                           19वीं सदी की तकनीक मुख्यतः यांत्रिक शक्ति और औद्योगीकरण पर आधारित थी। भाप इंजन इस दौर की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक था। रेलगाड़ियों और भाप के जहाजों ने परिवहन के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन किया। टेलीग्राफ ने लंबी दूरी तक संदेश भेजने की गति को बढ़ाया। मुद्रण तकनीक के विकास से पुस्तकों और समाचार-पत्रों का व्यापक प्रसार संभव हुआ। इस प्रकार 19वीं सदी की तकनीक ने मनुष्य की भौतिक शक्ति और उत्पादन क्षमता को बढ़ाने में बेहद ही महत्वपूर्ण योगदान दिया।

                         ठीक इसके विपरीत 21वीं सदी की तकनीक मुख्यतः डिजिटल और सूचना-आधारित है। कंप्यूटर, इंटरनेट और स्मार्टफोन ने संचार तथा सूचना के क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन किए हैं। आज व्यक्ति कुछ सेकंड में दुनिया के किसी भी हिस्से में संदेश, चित्र या वीडियो भेज सकता है। ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल बैंकिंग, ई-कॉमर्स और सोशल मीडिया ने दैनिक जीवन के अनेक कार्यों को बदल दिया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने तकनीक को एक नए स्तर पर पहुँचा दिया है, जहाँ मशीनें भाषा समझने, जानकारी का विश्लेषण करने और विभिन्न प्रकार के कार्यों में सहायता करने में सक्षम हैं।

दोनों सदियों की तकनीकों में एक महत्वपूर्ण अंतर गति और विस्तार का है। 19वीं सदी में तकनीकी परिवर्तन अपेक्षाकृत धीमी गति से समाज तक पहुँचा। नई तकनीक के प्रसार में वर्षों या दशकों का समय लग सकता था। 21वीं सदी में किसी तकनीकी आविष्कार या डिजिटल सेवा का विस्तार बहुत तेजी से हो सकता है। इंटरनेट ने दुनिया को एक-दूसरे से तत्काल जोड़ दिया है।

तकनीक पर सर सैयद का दृष्टिकोण 

वर्तमान समय का प्रत्येक व्यक्ति तकनीक से जुड़ा हुआ है। तकनीक का हम सबके जीवन में अहम योगदान है। शहर से लेकर सुदूर देहात तक के लोग तकनीकों का प्रयोग कर रहे हैं। मसलन, किसी को दिन भर के समाचार को पढ़ना होता है, तो वो इंटरनेट से समाचार पढ़ लेता है। किसी विषय पर त्वरित जानकारी की आवश्यकता होती है, तो गूगल व अन्य माध्यम से जानकारियाँ एकत्रित कर लेता है। तकनीक ने एक क्लिक में बड़े से बड़े और छोटे से छोटे कामों को आसान बना दिया है। एक समय ऐसा था, जब एक राज्य अथवा देश से दूसरे राज्यों अथवा देशों में रह रहे लोगों से बात करना असंभव था। लेकिन तकनीकी विकास ने टेलीफोन के माध्यम से बात-चीत को बड़ा आसान बना दिया है। प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) जून, 2025 के आंकड़े के अनुसार, मार्च 2014 में भारत में कुल 93.3 करोड़ टेलीफोन कनेक्शन था। जबकि अप्रैल 2025 आते-आते इसकी संख्या 120 करोड़ से अधिक हो गई। ये आंकड़ा तकनीक की व्यापकता को स्पष्ट करता है। अब यहाँ से बिन्दुवार ढंग से सर सैयद के दृष्टिकोण से जो सकारात्मक प्रभाव तकनीक पर पड़ रहा है, उसको रेखांकित करने का प्रयास मात्र किया जाएगा।

(क). तकनीक प्रगति का साधन 

जैसा पीछे कह आए हैं कि सर सैयद आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान के पक्षधर थे। वे तथ्यों और आँकड़ों की वकालत किया करते थे। वे किसी भी ज्ञान को बिना तर्क़ के कतई स्वीकार नहीं करते थे। वे मानते थे कि समाज उन्नति की राह तभी तय कर पाएगा, जब आधुनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाएगा।

                         भारत में इंटरनेट का आगमन 15 अगस्त, 1995 को ‘विदेश संचार निगम लिमिटेड’ द्वारा हुआ। जिसने देश को ‘डिजिटल युग’ में प्रवेश कराने का अभूतपूर्ण कार्य किया। वर्तमान में तकरीबन 958 मिलियन सक्रिय उपभोक्ता इंटरनेट का प्रयोग कर रहे हैं। जिनमें से लगभग 57% उपभोक्ता भारत के ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं। इंटरनेट के वैश्विक बाज़ार में भारत इतना आगे बढ़ चुका है। आज के समय में सर सैयद का दृष्टिकोण डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव प्रौद्योगिकी और अन्य वैज्ञानिक उपलब्धियों पर लागू किया जा सकता है। जिससे नैतिकता बनी रहे।

(ख). तकनीकों के साथ तर्कशील दृष्टि 

सर सैयद सदैव अंधविश्वास के स्थान पर तर्क, विवेक और प्रमाण को महत्व देते थे। आज दुनिया भर की तमाम सूचनाएँ बड़ी मात्रा में उपलब्ध हैं। इसके बरक्स फ़र्ज़ी सूचनाओं का भी विशाल भंडार है। ‘साइबर अपराध समन्वय केन्द्र’ के जनवरी 2026 के आंकड़ों के अनुसार पिछले 6 वर्षों में भारतीयों ने ऑनलाइन स्कैम, निवेश, फ्रॉड और डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों में लगभग 52,976 करोड़ रुपए गँवाए हैं। ये आंकड़ा बहुत बड़ा है। कहने का तात्पर्य ये है कि किसी भी सूचना को बिना जांचे स्वीकार नहीं करना चाहिए। उसको विभिन्न माध्यमों से जाँच-परख लेना चाहिए, ताकि साइबर फ्रॉड का शिकार होने से बचा जा सके। यही कारण है कि वर्तमान में उनका दृष्टिकोण प्रासंगिक है।

(ग). तकनीक केवल साधन है, साध्य नहीं

21 वीं सदी में तकनीक मानव कल्याण का साधन मात्र है। ये मनुष्य एवं समाज के विकास में सहायक की भूमिका निभाता है। तकनीक ने शिक्षा समेत अन्य चीजों को आसान, रोचक और उपयोगी बनाया है। इसने शिक्षा की पहुँच को आभाषीय पटल पर लाकर सभी के लिये उपलब्ध करा दिया। जैसे- वीडियो कांफ्रेसिंग, ऑनलाइन क्लासेज़, ई-बुक, वेबिनार आदि। इसका उदारहण हम सबनें कोविड के दौरान देखा है। कितने सुचारू रूप से स्कूल, कॉलेज, दफ़्तर, अस्पताल आदि तकनीक के माध्यम से संचालित हो रहे थे।

                         तकनीकी विकास का एक पहलू है कि ये तभी सार्थक होता है, जब वह शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक विकास और जीवन की गुणवत्ता को पहले से बेहतर बनाए। यदि ये सारे कार्य तकनीक के जरिए सुगम नहीं हो रहे हैं, तो इसका कोई मतलब नहीं। ‘अलीगढ़ आंदोलन’ का मुख्य सरोकार भी यही था कि समाज व राष्ट्र के विकास में तर्कशील होकर योगदान देना। ऐसी शिक्षा का प्रसार करना, जिसमें तकनीकी पुट हो। 

(घ). शिक्षा और तकनीक 

आज का दौर शिक्षित लोगों का है। शिक्षा के बिना समाज में हमारा कोई औचित्य नहीं होता। समाज में उन्हीं लोगों को आदर व सम्मान से देखा जाता है, जो पढ़े-लिखे और तार्किक होते हैं। यही वज़ह रही कि सर सैयद ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन हेतु एक ‘टूल’ बनाकर प्रयोग किया। भारत सरकार का ऑनलाइन शिक्षा मंच, स्वयं, कोर्सेरा, यूडेमी, एडएक्स आदि पूरे देश के छात्रों को घर बैठे-बैठे शिक्षा प्राप्त करने में मदद कर रहा है। उनके दृष्टिकोण को ‘डिजिटल शिक्षा’ और ‘डिजिटल समानता’ से जोड़कर देखा जा सकता है। सुदूर से सुदूर देहातों में बैठे विद्यार्थी भी वे सारे शिक्षण सामग्रियों का प्रयोग कर रहे हैं, जो मेट्रोपोलिटन शहरों के विद्यार्थी कर रहे हैं।

(ड़). तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता 

‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ को अंग्रेज़ी में ‘Artificial Intelligence’ कहते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता उस सोच को कहते हैं, जिसे मशीनों और तकनीकों द्वारा संचालित किया जाता है। सर्वप्रथम सन् 1956 में इस शब्द का प्रयोग ‘डार्टमाउथ कॉलेज’ के एक कॉन्फ्रेंस में किया गया था। हालाँकि इसका जनक जॉन मैकार्थी को माना जाता है।

                         हम सबके जीवन में इसका महत्व बढ़ता जा रहा है। मोबाइल, चैटबोट्स, गूगल मैप्स, डिजाइनिंग आदि में ये हमारी मदद करता है। ‘ग्लोबल ऑनलाइन सेफ्टी सर्वे’ का एक डाटा बताता है कि लगभग 65% भारतीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रयोग करते हैं। साल 2023 की तुलना में 2024 में लगभग 26% इसके उपभोक्ता बढ़े हैं। जबकि सर सैयद कहते थे कि हमें नई तकनीकों से मुँह नहीं मोड़ना चाहिए। समय के साथ स्वयं को अपडेट करते रहना चाहिए। उनके मत को जोड़कर देखने से मालूम पड़ता है कि ज्ञान प्राप्ति और तमाम प्रकार के कार्यों के लिए ये साधन एक बेहतर विकल्प है। उदाहरण के रूप में, ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बड़े पुस्तकालयों की कमी है। वहां के छात्रों की शिक्षण सामग्रियों तक सीमित पहुंच है। ऐसी स्थिति में तकनीक बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के आ जाने से दूर-दराज़ के इलाकों में बैठे छात्रों की समस्याओं का निदान हो रहा है। ये ठीक बात है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता हर बार सटीक जानकारियां नहीं देता है। हालाँकि उन आंकड़ों के निकट अवश्य पहुंचा देता है, जिसकी हमें आवश्यकता होती है।

                         सर सैयद द्वारा स्थापित ‘साइंटिफिक सोसाइटी’ उन दिनों आधुनिक ज्ञान और विज्ञान की पुस्तकों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद करके लोगों तक पहुंचा रहा था। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी किसी भी भाषा के सामग्री को अन्य भाषाओं में अनुवाद कर हमारे कामों को आसान बना रहा है।

नैतिकता का महत्व 

हम सभी से अपेक्षा की जाती है कि हम अपने कामों के प्रति नैतिक रहें। परिवार, समाज, राष्ट्र व अन्य स्थानों पर नैतिकता को बनाए रखें। तकनीकों के प्रयोग के संदर्भ में भी यही नियम लागू होता है। सर सैयद का चिंतन ‘सुधारवाद’ का था। उनका मानना था कि आधुनिक ज्ञान, विज्ञान और तकनीकों का प्रयोग सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ होना चाहिए। उनका मत आज भी प्रासंगिक है क्योंकि आज सोशल मीडिया में गोपनीयता, सत्यता, न्याय, समानता और मानवीय गरिमा का प्रश्न तेज़ी से उठ रहा है। मसलन, आज जितने भी शोध कार्य पूर्ण हो गए हैं, उनका ब्यौरा विभिन्न पोर्टलों पर उपलब्ध है। जब कोई किसी अन्य व्यक्ति का डाटा, उसको श्रेय दिए बिना अपना बनाकर प्रयोग कर लेता है। वैसी स्थिति में नैतिकता का प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है। किसी का आंकड़ा या डाटा लेना ग़लत नहीं है, पर श्रेय नहीं देना हमारी अनैतिकता को दिखाता है। यही वजह है कि आज ‘साहित्यिक चोरी’ का मामला बढ़ता जा रहा है।

                         जब हम तकनीक का सहारा लेकर तथ्यों का प्रयोग करें। लेकिन उसको रेखांकित करते हुए उसका नाम अवश्य दें, जिन्होंने उसको ढूंढा है। आए दिन कहीं न कहीं से ‘डिजिटल अरेस्ट’ और फर्जी अधिकारी बनकर पैसा उड़ाने की सूचना मिलती ही रहती है। क्योंकि तकनीकों के प्रयोग में अनैतिकता बढ़ती जा रही है। ऐसे लोग तकनीक का नकारात्मक प्रयोग करते हैं, जबकि ठीक इनके विपरीत कुछ लोग इसका सकारात्मक प्रयोग कर देश व दुनिया की ख़बरों और खोजों से  स्वयं को लाभांवित करते रहते हैं। सर सैयद का व्यापक दृष्टिकोण भी इसी नैतिकता की वकालत करता है।

                         सर सैयद के लिए समाज की उन्नति केवल व्यक्तिगत सफलता से संभव नहीं थी। उन्होंने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का आधार माना। उनका मानना था कि अशिक्षा, रूढ़िवाद और सामाजिक जड़ता से समाज की प्रगति बाधित होती है। उन्होंने शिक्षा के प्रसार के लिए विद्यालयों और संस्थाओं की स्थापना की तथा अलीगढ़ आंदोलन के माध्यम से आधुनिक शिक्षा को व्यापक सामाजिक परिवर्तन से जोड़ा।

21वीं सदी में नैतिकता का अर्थ सामाजिक उत्तरदायित्व से भी है। पर्यावरण संरक्षण, लैंगिक सम्मान, समानता, डिजिटल शिष्टाचार, कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता और सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी जैसे प्रश्न आधुनिक नैतिकता का हिस्सा हैं। सर सैयद की सामाजिक सुधार की दृष्टि हमें यह समझने में सहायता करती है कि शिक्षा का अंतिम उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक का निर्माण करना भी है।

                         सर सैयद के चिंतन का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक और सांस्कृतिक सह-अस्तित्व था। आधुनिक भारत में विविध धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों के बीच संवाद तथा परस्पर सम्मान सामाजिक नैतिकता के आवश्यक तत्व हैं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना से जुड़े उनके शैक्षिक दृष्टिकोण में विभिन्न समुदायों के लोगों के लिए शिक्षा के अवसर और आधुनिक ज्ञान के प्रसार की भावना दिखाई देती है।

21वीं सदी में जब सोशल मीडिया और राजनीतिक-सामाजिक बहसें कभी-कभी सामाजिक विभाजन को बढ़ा सकती हैं, तब संवाद, सहिष्णुता और दूसरे के विचारों का सम्मान नैतिक जीवन की महत्वपूर्ण आवश्यकता बन जाते हैं।

निष्कर्ष 

21वीं सदी में तकनीक और नैतिकता पर सर सैयद का दृष्टिकोण कारगर सिद्ध होता है। जो वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति को तर्क़, शिक्षा, मानवीय मूल्यों और नैतिक जिम्मेदारी से जोड़ता है। तकनीक मूल रूप से मनुष्य की क्षमता को बढ़ाने का माध्यम मात्र है। जिसका उचित उपयोग केवल विवेक और नैतिकता पर निर्भर करता है।

                         इसमें कोई दो मत नहीं कि आज तकनीक ने शिक्षा, संचार, स्वास्थ्य, रोजगार आदि क्षेत्रों को व्यापक रूप से प्रभावित किया है। हालाँकि इसके साथ गोपनीयता, भ्रामक सूचना, साइबर अपराध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दुरुपयोग और मानवीय मूल्यों के क्षरण जैसी चुनौतियां भी मुँह खोले खड़ी हैं। ऐसे समय में सर सैयद की तर्कशीलता हमें ये समझने में मदद करती है कि तकनीक का प्रयोग विवेक और सामाजिक हितों को मद्देनजर रखकर करना चाहिए।

                         अतः आज के तकनीकी युग में सर सैयद की वैज्ञानिक चेतना और आधुनिक शिक्षा संबंधी विचार जीवन के तमाम क्षेत्रों में प्रासंगिक होते दिखाई देते हैं।

More From Author

भाखै अकथ कथा बिरतांत-3- मृणाल पाण्डे की आत्मकहानी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

जानकी पुल को सहयोग करें

Jankipul : A Bridge of World's Literature एक नयी शुरुआत! मेरा कॉलम #Jankipul के लिए " जनहित में जारी सब पर भारी" आपकी टिप्पणी की अपेक्षा रहेगी