पौड़ी के पहाड़ प्यारे

सत्यानन्द निरूपम ऐसे संपादक हैं जो मुझसे कुछ भी लिखवा लेते हैं, अनुवाद करवा लेते हैं. अब सरिता के यात्रा विशेषांक के लिए लिखे गए इस यात्रा वृत्तान्त को ही लीजिए. मैं घूमता तो बरसों से रहा हूं, लेकिन कभी किसी यात्रा पर लिखा नहीं. पहली बात यात्रा-वृत्तान्त लिखा तो पौड़ी की यात्रा का. आप भी पढकर बताइयेगा, कैसा लगा- प्रभात रंजन. 
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पहले तय किया था कहीं नहीं जायेंगे. 2008 की बात है. दशहरे की छुट्टियों में कहीं जाने का प्लान नहीं था. दिल्ली के आसपास मसूरी, शिमला में तो होटल मिलना मुश्किल हो जाता है. रानीखेत, कसौली में भी होटलवाले इन छुट्टियों में सीधे मुँह बात नहीं करते. पिछले ही साल रात भर का सफर करके सुबह-सुबह हम कसौली पहुंचे. दो घंटे तक एक-एक होटल का दरवाज़ा खटखटाया. शनिवार का दिन था. कहीं कमरा नहीं मिला. साल में कई-कई बार कसौली जाने वाले मित्र संजय गौतम ने बताया था कि वीकेंड में कभी कसौली नहीं जाना. वीकेंड में तो ‘ज्ञान होटल’ में भी कमरा नहीं मिलता. नहीं, ज्ञान कोई खराब होटल नहीं है. सस्ते होटलों में सबसे साफ़-सुथरा होटल है. खाना भी बेहद लजीज. जब कहीं कमरा नहीं मिला तो थक-हार कर हम वापस ‘ज्ञानी दा ढाबा’ के लिए मशहूर धर्मपुर की ओर आये वहां किसी तरह एक होटल में कमरा मिला था. उसके बाद हमने कान पकड़े थे वीकेंड में कसौली नहीं, बिना एडवांस बुकिंग के तो बिलकुल नहीं.

वैसे भी पहले दो बार जा चुके थे. बार-बार उन्हीं जगहों पर जाना, वही-वही देखना… बोरियत होती है. देखने को आखिर इतना कुछ है. पत्नी ने पहले ही कह दिया था नैनीताल तो बिलकुल नहीं. अब जाने का मन नहीं करता, कितनी बार तो जा चुके हैं. वही माल रोड, वही झील, वही बोटिंग, सदर बाजार में शेरे-पंजाब होटल का वही खाना… मैं जानता था अपने प्रिय हिल स्टेशन जाने से पहले वह हर बार यही कहती थी. चाहते भी तो कौन-सा जा पाते. रात में चलने वाली इकलौती रानीखेत एक्सप्रेस में टिकट तो महीनों पहले से बुक रहती है. और फिर दशहरा तो ‘बंगाली सीजन’ होता है. हर चीज़ के भाव आसमान पर होते हैं.

निश्चिन्त था कहीं नहीं जाना है. लेकिन दशहरे से एक सप्ताह पहले पत्नी की एम्बेसी ने एक दिन की छुट्टी की घोषणा और कर दी. सप्तमी की. अब हमारे पास चार दिन हो गए. पत्नी ने समस्या उठाई कि चार दिन घर में रहकर क्या करेंगे? फिर उसने बताना शुरु किया कि उसके ऑफिस में किसने इन छुट्टियों में कहां जाने की प्लानिंग की थी- मनाली, गोवा, कौसानी. लेकिन इतनी जल्दी बुकिंग कहां की मिलेगी? ढाई साल की बेटी को लेकर कहीं भी, कैसे भी नहीं जा सकते. यानी मनाली के लिए बस में लंबी यात्रा पॉसिबल नहीं. लेकिन ट्रेन में कहां का टिकट इतनी जल्दी मिल सकता था, मिल सकता है.

तब मुझे लैंसडाउन का ध्यान आया. बरसों पहले अपने एक पुराने ऑफिस के दोस्त अविनाश ने लैंसडाउन का यात्रा वृत्तान्त सुनाया था. किस तरह जंगल के पास उसका गेस्ट हाउस था, रात भर जानवरों की आवाज़ सुनाई देती थी. दूर-दूर तक जंगल के बीच सुनसान रास्ता, पत्तों की खडखडाहट, देर-देर तक कोई दिखाई तक नहीं देता था. छोटा-सा बाज़ार, कैंटोनमेंट का साफ़-सुथरा इलाका, वीरान चर्च. मन में बस गया था. उसकी निर्जनता मन को भा गई थी. आखिर निर्जनता का भी अपना सौंदर्य होता है. लेकिन जाना नहीं हो पाया. हर बार कहीं और कहीं और जाता रहा. भीड़-भाड़ में लैंसडाउन की निर्जनता को याद करता रहा. उस निर्जनता को जो मन में बसी हुई थी.
याद आया दिल्ली से कोटद्वार ट्रेन जाती है. रेलवे की साईट पर देखा तो ट्रेन भी थी और उसमें जगह भी. नेट पर पढा सुबह-सुबह कोटद्वार पहुँच जाती है ट्रेन, वहां से 40 किलोमीटर की टैक्सी यात्रा. बस पहुँच गए लैंसडाउन. ट्रेन का टिकट तो फटाफट बुक किया. नेट पर उपलब्ध होटलों के नंबर निकाल के फोन करने शुरु किए. सब फुल. मैंने पाया है इस तरह की छुट्टियों में जो सुविधाएँ नेट पर उपलब्ध होती हैं सबसे पहले भर जाती हैं, जिन स्थानों के बारे में नेट पर लिखा मिल जाता है, टूरिस्ट वहां अधिक जाने लगते हैं. इसी के कारण न जाने कितने छोटे-छोटे गांव हिल स्टेशन बन गए. गाड़ी में सामान भरा, लद-फद के लॉन्ग ड्राइव पर निकल पड़े. मसूरी के पास धनोल्टी, हरियाणा के पास मोरनी, हिमाचल का बाड़ोग देखते-देखते होटलों के आसपास खड़ी गाड़ियों, खाली प्लास्टिक के पैकेटों से भरने लगे. बहरहाल, लैंसडाउन के होटल सैलानियों ने बुक करा रखे थे. चिंता की बात थी. क्योंकि वह इतना बड़ा हिल स्टेशन नहीं है पास के मसूरी की तरह कि कहीं न कहीं कोई न कोई होटल मिल ही जायेगा. लेकिन ट्रेन में एसी का टिकट बुक हो गया था. एक बर्थ नीचे का मिल गया था. सुकून की बात थी.

ट्रेन में अच्छी नींद आई.
सुबह-सुबह कोटद्वार पहुँच गए. छोटा-सा स्टेशन. बाहर निकले तो टैक्सी वालों ने घेर लिया. 500 में लैंसडाउन. नेट पर तो लिखा था 300-350 में टैक्सी वाले लैंसडाउन ले जाते हैं. नेट पर लिखी हर बात सच हो, जरूरी नहीं. होटल को लेकर वहां भी पूछताछ की तो यही अंदाज़ लगा कि मिल सकता है लेकिन… हम इस लेकिन से निकलने की राह ढूंड रहे थे. देखा, कई गाडियां खड़ी थीं- 50 रुपए सवारी पौड़ी. वैन वाले से पूछा तो पता चला तीन घंटे में गाड़ी पौड़ी पहुँच जायेगी. पौड़ी के बारे में किसी से सुना नहीं था, नेट पर लैंसडाउन के बारे में ढूंढते ढूंढते पौड़ी के बारे में पढ़ा था. तस्वीरों में भरा-पूरा शहर लगा था. सामने हिमालय की बर्फीली चोटियाँ. सब तस्वीरों में देखा था.  
वैन वालों से पूछा- होटल. सबने कहा, पौड़ी में बहुत होटल हैं और उतने सैलानी भी नहीं आते, मिल जायेगा. बस उन देखी हुई तस्वीरों के सहारे और वैन वाले के कौल पर भरोसा करके हम एक गाड़ी में सवार हो गए. पैकेज टूर, इंटरनेट बुकिंग के इस दौर में भी जब कभी-कभी सफर में, यात्रा में कुछ अप्रत्याशित हो जाता है तो यात्रा का रोमांच बढ़ जाता है. घर से निकले थे लैंसडाउन के लिए जा रहे थे पौड़ी.

याद आया कहीं पढ़ा था- पहाड़ के कवि चन्द्रकुंवर बर्त्वाल ने यहीं रहते हुए कविता लेखन की शुरुआत की थी. ‘जिन पर मेघ के नयन गिरे, वे सब के सब हो गए हरे’, उनकी पंक्तियाँ याद आ रही थी. मन रोमांचित हो रहा था, धुकधुकी भी लगी थी. कैसा होगा? होटल मिलेगा तो कैसा होगा? मेरी छोटी बेटी के खाने-पीने लायक सामान मिल पायेगा? पत्नी ने धीरे से कहा था, लैंसडाउन ही चलते? वहां होटल नहीं मिलता तो घूमकर कोटद्वार आ जाते रात को वहीं ठहर जाते, दिन में लैंसडाउन घूम आते. मैंने कुछ जवाब नहीं दिया. सामने ऊंचे-ऊंचे पहाड़ सवाल की तरह खड़े थे. उनके ऊपर पेड़ों का कोई निशान तक नहीं. पता चला इधर भू-स्खलन बहुत होता है. जैसे-जैसे हम पौड़ी की ओर बढ़ रहे थे, रास्ता दुर्गम होता जा रहा था. पता चला भयानक भू-स्खलन ने इधर रास्तों को बर्बाद कर दिया है. वैसे निर्माण कार्य तेजी से चल रहा था. प्रकृति विध्वंस करती है, मनुष्य निर्माण. सदियों से मनुष्य प्रकृति को जीतने की कोशिश कर रहा है, प्रकृति एक बार रौद्र रूप दिखाती है मनुष्यों की सारी योजनाएं धरी की धरी रह जाती हैं.

तीन नहीं पांच घंटे में पौड़ी पहुंचे. कुछ तो रास्ता दुर्गम था, कुछ थोड़ी-थोड़ी दूर पर चढ़ते-उतरते यात्री. शायद गाड़ी जब बिना रुके चलती हो तब तीन घंटे में कोटद्वार से पौड़ी पहुँचती हो. गाड़ी ने हमें माल रोड पर उतारा था. एक संकरी सी सड़क, दोनों तरफ से आती गाडियां, जिनसे बचने के लिए हम सामान के साथ सड़क के बिलकुल किनारे पर खड़े थे, नीचे घाटी थी. समझने में कुछ समय लगा, माल रोड ऐसा भी होता है. नैनीताल, मसूरी, शिमला के माल रोड तो रौनक के बाज़ार हैं. माल रोड ऐसा भी होता है. कुछ दुकानें, जहां काम भर के सामान मिलते हैं, कुछ दफ्तर, पोस्ट ऑफिस, दो-एक मंदिर. यह कैसा माल रोड? पत्नी ने आँखों-आँखों में पूछा. मैं क्या बोलता! इधर-उधर देख रहा था.

अब आ तो गए ही थे पौड़ी.

हम माल रोड देखने थोड़े आये हैं, वह देखो- मैंने उंगलियों से इशारा किया. घाटी के उस पार पहाड़ों की श्रृंखला, पीछे से झांकती बर्फीली चोटियाँ. लग रहा था थोड़ा आगे बढ़े कि वहां पहुँच जायेंगे. इतने पास अपने उससे पहले हमने हिमालय नहीं देखा था. मेरी बेटी भोली की वह पहली ही यात्रा थी, अपने चिर यात्री माता-पिता के साथ. वह उन चोटियों की ओर हाथ से इशारा करके कुछ कह रही थी, अस्फुट स्वर में. लग रहा था जैसे यात्रा की सारी थकान उन बर्फीली चोटियों को देखते ही दूर हो गई हों उसकी. महसूस हुआ शायद इसी तरह प्रकृति के समीप कवियों की कविता फूटती होगी- अमल धवल गिरि के शिखरों पर बादल को घिरते देखा है- याद आ गए नागार्जुन.
सफर की थकान, शहर का उनींदापन प्रकृति का आनंद नहीं लेने दे पा रहा था. तलाश थी एक साफ़-सुथरे कमरे की जिसमें लेटकर कुछ देर कमर सीधी कर लें, फोन पर ऑर्डर देकर चाय मंगवाएं और चाय पीते हुए हिमालय दर्शन किया जाए. तलाश होटल की शुरु हुई. वैन वाले ने बताया था, वहां बहुत होटल हैं. लेकिन यह नहीं बताया था कैसे होटल हैं. पता चला वहां का सबसे अच्छा मतलब साफ़-सुथरा होटल गढवाल मंडल विकास निगम का है, जो हर मौसम में लगभग फुल रहता है. ऑनलाइन बुकिंग की वजह से.

छोटा-सा विस्तार माल रोड का. थोड़ी-थोड़ी दूर पर कुछ होटलनुमा बोर्ड टंगे थे. एक बोर्ड को पढ़ा ‘होटल मधुबन’, मधुबन मेरे गाँव का नाम है, सोचा यहीं ठहरा जाए. लेकिन अंदर जाते ही सारा रुमान जाता रहा. कमरों में सीलन, गंदे बिस्तर. करीब आधे घंटे तक यही चलता रहा. जितनी तेजी से होटल के अंदर घुसता उससे भी तेजी से बाहर. उम्मीद टूटने लगी थी. सोच रहा था कि अगर यहां होटल नहीं मिला तो कहां जाऊंगा, यहां तो आवागमन की उतनी सवारियां भी नहीं मिलती. टैक्सी के नाम पर जीप चलते हैं, चारों तरफ धुआं उड़ाते. किसी ने बताया बस स्टैंड के पास उमेश होटल है. यहां का सबसे बढ़िया. जल्दी से सामन उठाया. तय कर लिया था जैसा भी हो वहीं रुक जायेंगे, अच्छा नहीं लगा तो कल लैंसडाउन चले जायेंगे. होटल पहुंचा तो होटल वाले ने नीचे रिसेप्शन पर ही पूछा, बढ़िया व्यू वाला कमरा 1000 में मिलेगा. वहां के हिसाब से, होटल के अपने स्टैण्डर्ड से कुछ अधिक लगा, लेकिन कोई और ऑप्शन भी तो नहीं था.

कमरे में पंहुचा तो जैसे सारी थकान जाती रही, अच्छे होटल न मिलने का सारा मलाल भी. कमरे में दो तरफ खिड़कियाँ थीं, और सामने वही बर्फीली चोटियाँ, लग रहा था जैसे कुछ और पास आ गई हों. खिड़की खोलने पर कमरे में हिमालय का अहसास होता था. वैसे होटल अटेंडेंट ने पहले ही आगाह कर दिया. खिड़की बंद ही रखें तो अच्छा है, परदे हटाकर व्यू लीजिए. खिड़की खुली रहने पर कभी-कभी बन्दर आ जाते हैं. दिल्ली के इतने पास किसी शहर में  हिमालय के व्यू वाला ऐसा कमरा मिलेगा, हमने कब सोचा था? पौड़ी आयेंगे, कब सोचा था? पौड़ी ऐसा होगा, कब सोचा था? ठंढी हवाएं खिड़की से आ रही थी. पहाड़ की ठंढी हवाओं से सारी थकान मिट जाती है, मिट गई. भोली जो कुछ देर पहले भूख और माल रोड पर भारी डीजल की गंध से परेशान होकर चिल्लाने लगी थी, अब उस बड़े से कमरे में किलकारियां मारती दौड़ रही थी. हमने हिमालय को देखते-देखते जल्दी-ज़ल्दी चाय पी.

ज़ल्दी-ज़ल्दी तैयार होकर बाहर हिमालय को देखने निकल गए. छोटा-सा क़स्बा. छोटा-सा बाजार, जहाँ हम शहराती लोगों के मतलब का कुछ नहीं मिलता. बाजारों में गढवाल के गाँव से आये लोग दिखाई दे रहे थे. सुबह की बस में चढकर पौड़ी आये, जरूरत का सामान खरीदा, शाम की बस से वापस. लेकिन हम तो घूमने आये थे. बाजार में घूम रहे थे. जिधर जाते वहीं हिमालय की चोटियाँ दिख जातीं. यही खासियत है पौड़ी की, आप को हिमालय का व्यू लेने के लिए किसी खास स्थान पर नहीं जाना होता, जहाँ दूरबीन से कोई आपको दिखाता है- वो देखिये नंदा देवी, अक्सर आपको बादलों के सिवा कुछ नहीं दिखता. यहां आपको कहीं नहीं जाना होता, बर्फीली चोटियाँ आपके आगे-पीछे चलती रहती हैं. हिमालय आपके साथ-साथ चलता है- जब ज़रा गर्दन घुमाई देख ली.

भूख लग आई थी. भूख ने फिर से एक नई समस्या खड़ी की. सारा बाजार घूम लिया कहीं किसी ठीक-ठाक रेस्तरां के दर्शन नहीं हुए. फिर खाना? क्या अपने उमेश होटल में? रात का खाना तो वहीं खाना है, दिन का कहीं और खाना चाहते थे. किसी ने बताया बस स्टैंड के पास ही रावत होटल है, वहां का खाना खाके देखिये. होटल क्या था जैसे ढाबा होता है. किसी तरह मन मारकर वहां बैठे. हम जब घूमने जाते हैं तो अच्छा खाना अच्छी जगह पर बैठकर खाने भी तो जाते हैं. लेकिन यहां? खैर रावत होटल में चिकन-रोटी का स्वाद जुबान पर ऐसा चढ़ा कि अगले दो दिनों तक एक बार हमने वहीं खाया. ठेठ गढवाली खाना, गढवाली रायते के साथ. गढवाल में दही बहुत खट्टी खाई जाती है, जुबान का खट्टापन दूर करने के लिए नमक के साथ हरी मिर्च चबाई जाती है. बिटिया के लिए वहां चाउमिन भी बढ़िया सुस्वादु मिल जाता था. उत्तराखंड में कुमाऊं और गढवाल तो क्षेत्र हैं. कुमाऊं के खाने में नफासत अधिक होती है, गढवाल के खाने में सादगी. यह फर्क गढवाल के मसूरी जैसे मशहूर हिल स्टेशन में नहीं समझ में आता, पौड़ी में समझ में आया- नमक-मिर्च चबाते, मूली के पत्ते की भुजिया खाते.

पौड़ी के एक तरफ घने जंगल हैं दूसरी ओर हिमालय की चोटियाँ. अगले दिन हम ऊपर जंगल की तरफ गए. डीजल वाली जीप में बैठकर. ऊपर एक पुराना मंदिर है किंकालेश्वर महादेव का. घने जंगल के बीच निर्जन मंदिर. मन हरा हो गया था. बिटिया रानी ऐसे दौड़ रही थीं जैसे दौड़ने के कम्पीटिशन में दौड़ रही हों. चीड़-देवदार के पेड़ों की घनी कतारें. वहीं एक बंद इमारत दिखी. पास गया तो लिखा था संस्कृत विद्यालय. उन्नीसवीं शताब्दी की एक तारीख पड़ी थी. नीचे पोस्ट ऑफिस पर भी 1913 लिखा था. पौड़ी की बसावट पुरानी है.

पहले से पता नहीं था कि पौड़ी में दशहरे की भी पुरानी परंपरा है. होटल के कमरे में रात-रात भर पास चलती रामलीला की आवाजें आती. नवमी के दिन बाजार में जुलूस भी निकला. राम-सीता के स्वरूप सिंहासन पर बैठे हुए थे, भक्त हनुमान उनके सामने नीचे. लोग दौड़-दौड़ के उपने पैर छू रहे थे, चढावे चढ़ा रहे थे. बिटिया ने पापा के कंधे पर बैठकर यह नजारा देखा. हनुमान जी को लेकर उसकी खास जिज्ञासा थी- आखिर ऐसा इंसान क्यों, बन्दर की तरह? मुझे याद आया पेरू देश के राजनयिक-लेखक इरिगोवन ने कहा था कि उनको महादेवी वर्मा के ‘मेरा परिवार’ पुस्तक में भारतीय परंपरा की झलक मिलती है. भारत में पशु-पक्षी-वनस्पतियों सबको परिवार की तरह देखा जाता रहा है. पश्चिम के प्रभाव में हम प्रकृति से दूर होते गए, विजेता की तरह उसे काटने-मिटाने लगे. हनुमान उसी भारतीयता का प्रतीक है.

बड़े-बड़े पहाड़ी हिल स्टेशन हमने खूब देखे थे. नैनीताल के नैनी झील में खूब बोटिंग की, शिमला में दिसंबर में स्नोफॉल देखा. मसूरी में बादलों की लुकाछिपी देखी, डलहौजी के पास खजियार में घास के बड़े मैदान में लेट-लेट कर दोपहरें काटीं. लेकिन असली पहाड़ी जीवन बस पौड़ी में देखा. जहाँ आज भी मनुष्य प्रकृति के साथ रहता है. साक्षी हैं हिमालय की बर्फीली चोटियाँ. न जाने कब से. चन्द्रकुंवर बर्त्वाल ने शायद यहीं के लिए लिखा था-
प्यारे समुद्र मैदान जिन्हें
नित रहे उन्हें वही प्यारे ।
मुझको तो हिम से भरे हुए
अपने पहाड़ ही प्यारे हैं ।।

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