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अमित गुप्ता का व्यंग्य ‘दाढ़ी क्यों बढ़ा रहे हो?’

आज पढ़िए युवा लेखक-कवि अमित गुप्ता का व्यंग्य, जो बढ़ती महंगाई पर है-

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 घड़ी के अलार्म ने सुबह-सुबह ऐसा हल्ला मचाया कि जैसे वो मेज से अभी-अभी उछलकर अपनी छूटती हुई ट्रेन को पकड़ने के लिए दौड़ पड़ेगा। माधव भकुआया हुआ उठा और जैसे-तैसे कर अलार्म बंद किया, सोचा थोड़ी देर और सोया जाए। नींद फिर से आयी ही थी, कि कमबख़्त अलार्म दस मिनट बाद फिर से बज पड़ा। अब कहाँ नींद आएगी, माधव ने सोचा और आँखें मलते हुए अपनी घड़ी की ओर देखा – आठ बजकर दस मिनट। माधव की हर सुबह ऐसे ही आँखें खोला करती थी – हर रात वो देर तक अपने पहले उपन्यास पर काम करता या फिर कविताएँ लिखता और सुबह भकुआया हुआ उठता।

पता नहीं क्यों वो आठ बजे का अलार्म लगाता था, ना उसे कॉलेज जाना होता था और ना ही दफ़्तर, और ना ही उसके घर के आगे उसकी एक झलक पाने के लिए उसके फ़ैन्स की कोई लाइन ही लगती थी। वो एक लेखक था, और समाज के अनुसार एक ‘बेकार आदमी’, जो कोई काम-काज नहीं करता था।

माधव अपने चार-बाई-चार की फ़ोल्डिंग खाट से अपनी जंगल जैसी दाढ़ी खुजाता हुआ उठा और सामने मेज पर रक्खे हुए रेडीओ को ऑन किया। प्यासा फ़िल्म का गीत ‘यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है’ ऑल इंडिया रेडीओ के चैनल पर बज रहा था। साहिर साब ने ठीक ही कहा था, क्या बदल जाएगा अगर यह दुनिया मिल भी जाए तो।

माधव ने अपने माचिस जैसे कमरे के परदे खोल दिए, बाहर धूप खिली हुई थी; चारों ओर फैली हुई थी आशा की एक उज्ज्वल किरण, अंदर से एक आवाज़ फूटी और फिर उसके इस छोटे से कमरे में साँस ना पाकर, दम तोड़ गयी। बरामदे का दरवाज़ा खोल वो बाथरूम की ओर चला – गोविंदपुरी के एक कमरे के घरों की यह ख़ासियत होती है, बाथरूम बरामदे में होता है। टूथब्रश में मँजन लगाते वक्त उसकी नज़र आईने पर पड़ी, धूल में सना हुआ, नीले रंग के प्लास्टिक फ़्रेम में जड़ा उसका वो आईना – उसी की ही तरह, फटीचर हाल में था। मन-मन में इग्नोरेंस इज़ ब्लिस का जाप करते हुए, वो अपने दाँत माँजने लगा।

तभी नीचे से, पड़ोस में रहने वाले असीम बाबू, जो एक बैंक में कर्मचारी थे, ने माधव को आवाज़ दी, “अरे भई, दाढ़ी क्यों बढ़ा रहे हो?”

अब इंसान मुँह में टूथब्रश लिए कैसे जवाब दे? माधव ने उन्हें इशारे से कहा, कि नीचे आकर जवाब देता हूँ आपको।

माधव मुँह में टूथब्रश लिए हुए ही नीचे की तरफ़ चला, पहले माले से उतरकर वो पास के चाय की टपरी पर, जहाँ असीम बाबू चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे, पहुँचा।

पहुँचते ही उसने चाय वाले से कहा, “आतिफ़ चाचा एक मग पानी देना, कुल्ला कर लें ज़रा।”

चाचा ने एक मग पानी माधव की ओर बढ़ा दिया। पास ही नाली थी, माधव ने वहाँ कुल्ला किया और मुँह धोकर, जवाब देने के लिए तैयार हो गया।

माधव के कंधे पर जो गमछा लटका हुआ था, उससे अपना मुँह पोछते हुए उसने कहा, “आतिफ़ चाचा, एक चाय बना दीजिए और साथ में एक बन-मस्का भी लगा दीजिए।”

ऐसा लग रहा था कि माधव असीम बाबू को जवाब देने की पूरी तैयारी में था, मुँह धो लिया, चाय और बन-मस्का भी बोल दिया अब बस जवाब देना बाक़ी रह गया था।

“अरे भई, अब बताओ भी, दाढ़ी क्यों बढ़ा रहे हो?” असीम बाबू ने सवाल दोहराकर अपने संयम का परिचय दिया।

“अजी क्या बताएँ साहब, ब्लेड ख़रीदने के पैसे नहीं हैं, साथ में फ़ोम और ना ही फिटकिरी ख़रीदने के पैसे हैं, और नाई आजकल इतने पैसे माँगते हैं कि हिम्मत नहीं होती दाढ़ी बनवाने की। दाम क्या सिर्फ़ सरसों तेल, आटे, दाल, आलू और प्याज़ इत्यादि जैसी चीजों के ही बढ़े हैं, हज्जाम बनाने से लेकर बाल कटवाने तक के रेट बढ़ गए हैं, यानी के दर।”

असीम बाबू बड़े ध्यान से माधव की बात सुन रहे थे, जैसे कॉलेज के पहले दिन छात्र पूरा ध्यान लगाकर लेक्चर सुनते हैं।

माधव की चाय और बन-मस्का तैयार हो चुका था । बन-मस्का खाते हुए, माधव ने कहा, “ऊपर से जिस हज्जाम के यहाँ मैं जाता था, उसके यहाँ जाने के लिए मुझे अपनी मोटर-साइकल लेकर जाना होता है, और पेट्रोल की क़ीमत तो आप जानते ही हैं, पूरे सौ रुपए लीटर है। अब इतना महंगा पेट्रोल फूंककर नाई के यहाँ जाने में तो अपने तंग जेब की ही हजामत हो जाएगी।

“तो ऑटो में चले जाओ। देश की प्रगति के लिए इतना भी नहीं कर सकते?” असीम बाबू ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा।

“ठीक कहा आपने, हमारी दुर्गति में ही देश की प्रगति है।”

असीम बाबू को जैसे साँप सूंघ गया। वो बिना कुछ कहे, अपनी चाय सुड़क-सुड़ककर पीने लगे और सोचने लगे, चुपचाप अपने दफ़्तर ही चला जाता तो ठीक रहता।

माधव ने अपनी बात आगे बढ़ाई, “पहले मैं जहाँ रहता था, वहाँ से नाई की दुकान पाँच मिनट की दूरी पर थी, तो आने-जाने का कोई ख़र्चा नहीं लगता था।”

बन-मस्का ख़त्म करके माधव ने फिर चाय की एक चुस्की लेते हुए कहा, “लेकिन क्या करूँ, मेरे मकान मालिक ने अचानक ही मेरे कमरे का किराया यह कहकर बढ़ा दिया, कि महंगाई बहुत बढ़ गयी है और इतने कम पैसों में मैं कमरा किराए पर नहीं दे पाउँगा। मुझे इस कमरे के दूगने पैसे मिल रहे हैं, रहना है तो दो-गुना किराया लगेगा, वरना दो दिन में कमरा खाली कर दो।”

मेरे मकान मालिक के दिल्ली में कुल मिलाकर पचास कमरे हैं, और कमाई बेहिसाब। अब इनको कौन से खाने के लाले पड़ रहे थे, गोया मेरा किराया नहीं बढ़ाया तो जैसे यह तो भूखों मर जाएँगे। बड़े आए।

चाचा एक और चाय देना, यह कहकर, माधव दोबारा असीम बाबू के प्रश्न पर वापस लौटा, “हाँ, तो फिर क्या था, कमरा खाली करना पड़ा। इधर नया घर लेने में दलाल को एक महीने का किराया दलाली में देना पड़ा, वो अलग। अब महंगाई बढ़ रही है, तो दलाल भी आधे महीने के किराए में कहाँ मानने वाला था, वैसे तो कोई-कोई दलाल किरायदार पर दया करके, आधे महीने की दलाली में मान जाता है, पर यह दलाल तो बिलकुल भी नहीं माना। कहना लगा, “साहब, महंगाई बहुत बढ़ गयी है, बेटी को स्कूल में दाख़िला करवाना है, और स्कूल वालों ने डोनेशन की रक़म अचानक ही दूगनी कर दी है, पहले एक लाख रुपए डोनेशन माँगा था, जिसका मैंने किसी तरह इंतज़ाम कर लिया था, पर अब वो दो लाख रुपए माँग रहे हैं। कहते हैं, महंगाई बहुत बढ़ गयी है और इतने कम फ़ीस में स्कूल का मेंट्नेन्स पूरा नहीं हो पा रहा है, और अगर प्रॉपर मेंट्नेन्स नहीं हुआ, यानी के उचित रख-रख़ाव, तो बच्चे साफ़-सफ़ाई ना होने के कारण बीमार पड़ सकते हैं, और आप यह बिलकुल नहीं चाहेंगे। चाहेंगे क्या?”

फिर कुछ रुककर उस दलाल ने अपनी आँखें ज़मीन पर गड़ाए रखकर अपनी बात पूरी की, “अब मैं ठहरा एक मामूली दलाल, इतनी भारी डोनेशन मैं कहाँ से लाता, मैं तो बस अपनी बेटी को एक अच्छे स्कूल में पढ़ाना चाहता था। दो लाख रुपए देने हैं, दोस्तों से उधार लेकर किसी तरह मैंने नब्बे हज़ार और जमा कर लिए हैं, और अब बस दस हज़ार रुपए की और ज़रूरत है। कल तक बंदोबस्त नहीं किया, तो मेरी बेटी का भविष्य ख़राब हो जाएगा। इस कमबख़्त महंगाई ने तो जान ले रक्खि है।”

उसकी बेटी के बारे में सोचकर मुझे उस पर दया आ गयी और मैंने उसे पूरे एक महीने का किराया दलाली के रूप में दे दिया। कहने को तो मैं एक माचिस की डिब्बी के साइज़ के कमरे में रहता हूँ, पर दस हज़ार रुपए किराया है, आप समझ सकते हैं, महंगाई कितनी बढ़ गयी है।

असीम बाबू, चाय वाले चाचा और आस-पास जो भी चाय पी रहे थे, सब मंत्रमुग्ध होकर माधव की बातें सुन रहे थे, ना तो कोई अपनी जगह से हिल रहा था और ना ही कोई आपस में बात कर रहा था, ऐसा लग रहा था कि कोई सस्पेन्स थ्रिलर चल रहा है परदे पर। माधव ने चारों ओर जब अपनी नज़र दौड़ाई, तो पाया, कि भक्ति-संघ वाले भी जमा हो गए थे। नहीं-नहीं ये लोग कोई भजन मंडली से नहीं थे जो राधा-कृष्ण के गीत गाते हों, इन लोगों का भक्ति-रस तो इनके नए भगवान के लिए था। अब इनके प्रभु का नाम मैं क्या लूँ, आप खुद ही समझ जाइए, वैसे भी समझदार को इशारा काफ़ी होता है।

बड़ी हैरानी की बात है, जब मैं दफ़्तर की कैंटीन या अंग्रेज़ी में कहूँ तो पैंट्री में बैठा यह क़िस्सा लिख रहा था, तब एक सहकर्मी ने, जो एक दूसरे सहकर्मी की धर्मपत्नी थीं, मुझसे पूछ बैठीं, “यह दाढ़ी बढ़ाकर देवदास क्यों बन रहे हो?”

साल 1917 में शरत चंद्र का उपन्यास ‘देवदास’ प्रकाशित हुआ था। उपन्यास के हीरो देवदास की दाढ़ी नहीं थी, हाँ, हाथ में चारों पहर शराब की बोतल और ज़ुबान पर पारो का नाम ज़रूर रहता था। उनकी किताब पर जब बिमल रॉय ने सन 1955 में दिलीप कुमार साब को लेकर ‘देवदास’ बनायी, उसमें दिलीप साब ने भी दाढ़ी नहीं रक्खि थी। सन 1979 में बंगला फ़िल्म जगत के महा-नायक उत्तम कुमार ने ‘देवदास’ की भूमिका अदा की, उसमें भी उन्होंने दाढ़ी नहीं रक्खि थी, चेहरा उनका एक दम साफ़ था, यानी कि क्लीन-शेव्ड। यहाँ तक कि सन 2002 में जब संजय लीला भंसाली ने शाहरुख़ खान को लेकर ‘देवदास’ बनायी, शाहरुख़ खान भी उसमें क्लीन-शेव्ड ही थे।

उपन्यास में और इन तीनों फ़िल्मों में देवदास की दाढ़ी नहीं थी, बस थी तो हाथों में शराब की बोतल और ज़ुबान पर पारो का नाम। नजाने क्यों लोग दाढ़ी बढ़ाने को देवदास बनना क्यों कहते हैं!

   देवदास तो ज़मींदार घराने से था, उसको भला पैसे की कौन सी कमी थी कि वो हज्जाम ना बनवा पाए, उसके पास तो इतने पैसे थे कि दस-बारह नाई घर पर नौकर रख ले। देवदास से याद आया, शराब और सिगरेट की क़ीमतें भी आए दिन बढ़ती रहती हैं; अब नशे की वस्तु है, सरकार भली-भाँति जानती है, चाहे जितनी भी महंगी क्यों ना हो जाए लोग तो सेवन करेंगे ही। जो पहले जॉनी-वॉकर ब्लैक लेबल पिया करते थे वो अब जॉनी-वॉकर रेड लेबल पीने लगे हैं, जो रेड लेबल पिया करते थे वो अब टीचर्ज़ पीने लगे हैं, जो टीचर्ज़ पीते थे वो अब ब्लेंडर्ज़ प्राइड पीने लगे हैं, जो ब्लेंडर्ज़-प्राइड पीते थे वो अब रॉयल स्टैग या फिर रॉयल चैलेंज पर आ गए हैं और, और जो रॉयल स्टैग पीते थे वो अब देसी ठर्रे पर आ गए हैं – महंगाई बढ़ी ज़रूर है पर किसी ने पीना नहीं छोड़ा। अब तो पीने वाले इस ग़म में पीते हैं की महंगाई आसमान छू रही है।

ख़ैर, मैंने अपनी सहकर्मी से हँसते हुए कहा, “देवदास के हाथ में तो हमेशा शराब की बोतल होती थी, महंगाई की वजह से ना तो मैं हज्जाम बना पा रहा हूँ और ना ही शराब ही पी पा रहा हूँ। ऐसे में भला कोई कैसे देवदास बने।”

उनको शायद मेरी बात पसंद नहीं आयी, और वो मुझे मुँह बिचकाके वहाँ से चली गयीं।

ख़ैर कहानी में वापस लौटते हैं। माधव अब तक तीन चाय पी चुका था, और दो बन-मस्का खा चुका था। उसने आतिफ़ चाचा से कहा, “चाचा, आज का मेरे चाय और बन-मस्का का सारा ख़र्चा, असीम बाबू के खाते में लिख दीजिएगा। अब मुफ़्त में कहानी थोड़े ही सुनाता फिरूँगा मैं लोगों को।”

माधव की इस बात पर, असीम बाबू को देखकर ऐसा लग रहा था कि अभी वो चाय का एक ग्लास अपने सर पर फोड़ लेंगे और कहेंगे, मेरी मति मारी गयी थी कि मैंने सुबह-सुबह इस बेकार आदमी से यह प्रश्न पूछ डाला। दफ़्तर के लिए भी देर हो रही है और ऊपर से चाय और बन-मस्का के पैसे गए, वो अलग। आज तो बैंक मैनेजर की डाँट पक्का मेरे टेबुल पर मेरा इंतज़ार कर रही होगी।

अब मैं ठहरा एक लेखक, समाज की नज़रों में एक ‘बेकार’ जो दिन भर झोला लटकाए घूमता रहता है और रात को उल्लू की तरह जागकर लिखता रहता है। अब मेरे जैसे आदमी की दाढ़ी बढ़ी हो, कपड़े फ़टे हों या खाने के लाले पड़े हो, भला किसे फ़र्क़ पड़ता है।

माधव ने आतिफ़ चाचा को अपनी खाली चाय का ग्लास देते हुए कहा, “वैसे असीम बाबू, मैं आपका और आप जैसों का बहुत शुक्रगुज़ार हूँ कि आप लोग हमेशा हम जैसो से पूछते रहते हैं – बाल क्यों बढ़ा रक्खे हैं? बाल सफ़ेद क्यों हो रहे हैं? इतने थके हुए क्यों नज़र आ रहे हो, रात सोए नहीं? दाढ़ी क्यों बढ़ा रहे हो? ज़िंदगी में आगे क्या करने का सोचा है? इत्यादि-इत्यादि। आप लोग हम जैसों की इतनी चिंता करते हैं, यह हमें बहुत अच्छा लगता है। लेकिन हाँ, हमारे पास और भी काम है, आपके प्रश्नों के उत्तर देने के अलावा। कभी फ़ुरसत मिले प्रश्न पूछने से तो इस बात पर ज़रूर ग़ौर कीजिएगा।”

“वैसे सच बताऊँ तो कभी-कभी मन करता है कि हजामत बनवा ही लूँ, फिर लगता है, आप कहीं फिर यह ना पूछ दें, अरे भई, दाढ़ी क्यों कटवा ली? दाढ़ी में पर्सनालिटी एकदम डैशिंग लग रही थी, यानी के रौबदार व्यक्तित्व। क्यों कटवा दी?”

फिर मुझे आपको एक और सच से सामना कराना होगा, “साहब, दाढ़ी के वजह से चेहरे पर बहुत खुजली हो रही थी, और खुजलाने की वजह से कुछ बाल टूट गए और चेहरे पर कई घाव हो गए। डाक्टर के पास जाना पड़ा। डाक्टर के यहाँ जाने के लिए अपने मोटर-साइकल की ठनठनाती टंकी में एक लीटर पेट्रोल डलवाना पड़ा, वो अलग। जेब में कुल पाँच-सौ रुपए लेकर चला था, महीने के आख़िर में इतने पैसे होना बहुत भाग्य की बात है। सौ रुपए पेट्रोल में चले गए, दो सौ डाक्टर की फ़ीस। बाक़ी बचे दो सौ में दवा और महीने के आख़िर दो दिन का खर्चा चलाना था।

  ख़ैर, डॉक्टर ने देखा, और देखकर कहा, “गरमी की वजह से दाढ़ी के अंदर पसीना जम जाता है, जिससे खुजलाहट होती है, और अगर आप खजुआ बन जाएँ तो वाजिब है कि घाव तो होंगे ही।”

उन्होंने जो दवा लिखी, वो तीन-सौ रुपए की थी, और उतने पैसे मेरे पास थे नहीं। मैंने उनसे कहा कि मेरे पास इतने पैसे तो है नहीं, कोई और उपाय हो तो बताएँ। उन्होंने कहा, “दाढ़ी बनवा लीजिए, कुछ दिन नीम का लेप लगाइए, अपने आप ठीक हो जाएगा। फिर और क्या करता, कटानी पड़ी, अब क्या करें, महंगाई इतनी बढ़ गयी है कि दवाइयों की क़ीमतें भी आसमान छू रही हैं।”

और जैसे ही घाव ठीक हुए, मैंने फिर से दाढ़ी बढ़ा ली – इस तरह दवाइयों के पैसे भी बच गए और हर हफ़्ते हजामत बनाने के पैसे भी। अब जब महंगाई इतनी बढ़ गयी है, तो आदमी को सम्भलकर खर्चना ही होगा, ख़ासकर मुझ जैसे ‘बेकार आदमी’ को। क्यों?

अब दुबारा कभी मुझसे मत पूछिएगा, “दाढ़ी क्यों बढ़ा रहे हो?”

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