हर बशर वीरां सफर ले जाएगा

वीकेंड कविता में आज प्रस्तुत है मनु गौतम की गज़लें. फिल्म इंस्टीट्यूट के ग्रेजुएट मनु ‘देवदास’ में संजय लीला भंसाली के सहायक थे, फिल्म ‘चौसर’ के गाने लिखे, अनेक टीवी धारावाहिकों का लेखन-निर्देशन किया. सबसे बढ़कर वे मूलतः संवेदनशील कवि हैं. यहाँ प्रस्तुत हैं उनकी कुछ गज़लें- जानकी पुल.

1.  

कौन किसको लूट  कर ले जाएगा
हर बशर  वीरां सफर  ले  जाएगा
रात की थाली में सिक्का रख कोई
रौशनी नीलाम  कर  ले   जाएगा
दर्ज करता है  जो गुजरे  काफिले
वक्त इक दिन वो शज़र ले जाएगा
सारे  बच्चों को  बिठा कर  सामने
फिर  तसव्वुर के  शहर ले जाएगा
किस की आँखों में बची है रौशनी
देखिए किसकी नज़र ले जाएगा
२
अब खुद को देखने की वो वहशत नहीं रही
आईना  रू-ब-रू  है  हिम्मत  नहीं   रही

ख्वाबों के फूलदान हमें  अब भी हैं  अज़ीज़
लेकिन  उन्हें सजाने की  फुर्सत नहीं  रही

जबसे  मकामे-इश्क पे  पहुंचे हैं  कामयाब
वैसी  जुनूने-इश्क की  शिद्दत नहीं  रही

आशिक भी हैं  महबूब भी  रातें भी  चाँदनी
बस अब वो बूढ़े मकबरे की  छत नहीं रही

जीने पे फिर से दौड़ के चढ़ जाए वो गुलाब
शायद  मेरी दुआ में वो ताकत नहीं  रही

चुप्पी की   सरहदों के परे वो निकल  गया
मुझ को भी बात करने की आदत नहीं रही

लौटा हूं अबके कौनसी मंजिल को छू के मैं
आवारगी  जो अब  मेरी  फ़ितरत नहीं रही
३
मैं तुझ से दूर भी जाऊँ तो मुझको राह नहीं
तेरी तपिश  में जला  हूँ  कहीं पनाह  नहीं

कहा बस इतना ही उसने उरूज पे ले जा कर
यहां पे  ला के  गिराना  कोई गुनाह  नहीं

धड़क उट्ठेगा अभी देखना ये दिल कमबख्त 
हजार टुकड़ों में  टूटा है पर तबाह  नहीं

वो शख्स जिसपे हमने दिल ओ जान वार दिए
वो हम-खयाल तो है पर  मेरा हमराह नहीं

अब तो बस मैं हूँ, तू है और माजी के फ़राज़
अब तमन्ना के सराबों की दिल को चाह नहीं

 ४

फानूस  के   ढलते  हुए   रंगों की  ज़बानी
सुनता  हूं   तेरे  महल  की  रंगीन  कहानी

जब  शाम ढलेगी  तो  मैं सूरज-सा  ढलूँगा
लाऊँ  कहाँ  से  माँग  के  ता-उम्र  जवानी

जब मौत मुयय्यन है यहाँ सब की  किसी दिन
फिर क़त्ल, खुदकु़शी या शहादत के क्या मानी

हमने भी बस बढ़ा ही दी जज्बात की दूकान
यारों ने  जब से बेच दिया  आँख  का पानी

गाफ़िल  को  क़यामत की फिक्र है न इंतजार
उसके  लिए  तो  चीज क़यामत  है  पुरानी



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