चेतना पारीक होने का बोझ

देवेश पथ सारिया युवा कवि हैं। ताइवान के एक विश्वविद्यालय में शोध छात्र हैं। उनका यह गद्यांश पढ़िए जो लेखक के रूप में सफलताओं-असफलताओं, युवा जीवन के सपनों को लेकर है। आप भी पढ़ सकते हैं-

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29 दिसंबर 2020

शिन चू, ताइवान

सुबह के 6:00 बजे हैं। यह मेरा उठ जाने का समय नहीं है। रात दो बजे ही तो सोने गया था। ऐसा नहीं कि नींद कभी आई ही नहीं थी। वह एक सपने से खुल गई थी।

नींद खुलने पर एक ईमेल इनबॉक्स में पड़ा था। एक पत्रिका जिसने बहुत पहले कवितायेँ स्वीकृत करते हुए जनवरी में छापने का वादा किया था, उसी का ईमेल है। इस बार वे लिखते हैं, बोल्ड अक्षरों में – “इन कविताओं का हम प्रयोग नहीं कर सकते”।  जब स्वीकार की थीं तब संपादक की निजी ईमेल आईडी से मेल आया था, इस बार पत्रिका की मेल आईडी से। इससे पहले दिल्ली की एक छमाही पत्रिका के संपादक ने कविताएँ स्वीकृत करते हुए साल भर इंतज़ार करने को कहा था और साल भर बाद कहते हैं कि

हमारी तरफ से ऐसा कोई वादा था क्या? मैंने जब ईमेल का स्कीनशॉट भेजा तो बोलते हैं कि अंतिम निर्णय सारी टीम मिलकर लेती है। भई, फ़िर सारी टीम से सहमति लेकर ही मुझे स्वीकृति का मेल करते। पंद्रह महीने मेरी कविताएँ तो ब्लॉक होकर रह गयी न ? इन दोनों क़िस्सों का हासिल यह है कि हिंदी के कुछ संपादक (सभी नहीं क्योंकि ईमानदार और प्रतिबद्ध संपादक भी बहुत हैं) अपने वादे से पलटने के लिए टीम का सहारा लेते हैं , जैसे हालिया पत्रिका ने रिजेक्शन का ईमेल पत्रिका की ईमेल आईडी से किया जबकि स्वीकृति व्यक्तिगत ईमेल आईडी से दी थी। रिजेक्शन झेलना एक रचनाकार के जीवन का हिस्सा है। उसी से तो लेखक भीतर झाँककर देखता है। अस्वीकृत हम रिसर्च में भी होते हैं। पर यदि कोई आपको बोल्ड लैटर्स में लिखकर बताए कि आप उनके मंच के लायक नहीं तो वह एक धक्के जैसा लगता है। जैसे बाउंड्री से भागकर तेज़ गेंदबाज़ बाल लहराता हुआ आया हो, अपनी सबसे तेज़ गेंद फेंकी हो और बल्लेबाज़ ने डिफेंसिव शॉट खेलते हुए बस ‘टुक’ किया और गेंद बल्लेबाज़ के क़दमों के पास ठिठककर रूक गयी। अस्वीकृति का कारण कविताओं की सूची में शामिल वह दूसरी कविता हो सकती है जो उस देश की लड़की के प्रति हमदर्दी जताती है जिसका प्रमुख इन दिनों अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में किसी की सहानुभूति का पात्र नहीं। पर यह इस कविता वाली लड़की की वजह से नहीं था कि मेरी नींद खुल गयी थी, यह उस दूसरी लड़की की वजह से था जो मुझे सपने में दिखाई दी थी। बारह साल पहले मेरी क्लासमेट। वह मुझसे शिकायत कर रही थी तुम्हें मेरा नाम याद नहीं है।

सपने में मैं किसी संगीत कार्यक्रम के लिए जमा हुई भीड़ में था। मेरा सपना था, संगीत से सम्बद्ध था, ज़ाहिर है कि मेरे फ़ेवरेट सिंगर को भी होना ही था। एक और बात जो इसे मेरा दिमाग द्वारा चालित सपना घोषित करती थी, वह यह कि तमाम गायकों में से केवल लकी अली के लिए दर्शकों ने ‘वंस मोर’  की मांग रखी। यहां तक हर बात पर मेरे सबकॉन्शस का अख़्तियार था पर वह हमेशा मन के अनुकूल चीज़ें करने लगे तो बुरे सपने क्यों आएं ? लकी अली के गाने के बाद मैं एक कोठरी की तरफ गया और वहां मेरे एमएससी के कई क्लासमेट थे। सभी नहीं पर ज्यादातर। उनमें से एक लड़के ने सिक्स पैक बना लिए थे । मैं एक लड़की को ढूंढ रहा था क्योंकि कई साल पहले वह मुझसे रूठ गयी थी। मुझे लगता था कि उसे घमंड हो गया है, और उसका भी मेरे बारे में यही सोचना था। मैंने कई बार बात ठीक करने की कोशिश की पर उसने नहीं बात की। सपने में एक नहीं, उसके दो रूप मौजूद थे । वे दोनों ही मुझसे सचमुच वाली दुनिया की तरह नाराज़ थीं।

इस बीच कोठरी के अंदर से चाय बना रही एक लड़की बाहर आई। मैं उसकी शक़्ल जानता था, पर नाम नहीं। वह एमएससी के दूसरे साल में हमारे साथ थी। पहला साल उसने हमारे सीनियर बैच के साथ किया था और फ़िर बीएड करने चली गयी थी। वह बोलना शुरू हुई और उसके पास कई शिकायतें थीं। वह कह रही थी, “तुम लोग मुझे सीनियर समझते रहे और मेरे पुराने क्लासमेट्स अब मुझसे एक साल आगे थे, मैं उनके साथ दोस्तों की तरह नहीं पेश आ सकती थी। मैं कितनी अकेली पड़ गयी थी।” ओह, वह दरअसल अकेली थी। और वह दो ही लड़कों से बात करती थी। मुझसे और एक और लड़के से जिसे मैं ख़ास पसंद नहीं करता था। उसमें उस बेचारे की कोई ग़लती नहीं थी, वह मुझे किसी जगह की याद दिलाता था जहां मैं लौटना नहीं चाहता था। लड़की के कॉलेज आने के कुछ दिन बाद लड़की और दूसरा लड़का एक साइकिल पर नज़र आने लगे तो मैंने उससे किनारा कर लिया था। मेरे क्लासमेट्स उनका नाम आपस में जोड़ चुके थे। पर जब उन दोनों की भी लड़ाई हो गयी, तो वह बिलकुल ही अकेली हो गयी थी।

अंतिम बार मेरी उससे बात प्रैक्टिकल एग्जाम के दौरान हुई थी। इसे समझने के लिए यह जान लेना होगा कि साल भर हमारे कॉलेज में एमएससी के प्रैक्टिकल किस तरह होते थे। हर स्टूडेंट को सत्र की शुरूआत में एक प्रैक्टिकल अलॉट होता और वह उस पर दो-तीन महीने बिताता। उसके बारे में सब कुछ पढ़ डालता, जान लेता। फ़िर बाक़ी के एक-डेढ़ महीने में बाक़ी सब प्रेक्टिकल उन विशेषज्ञ बन चुके स्टूडेंट्स की निगरानी में सारी क्लास करती। मुझे एमएससी सेकंड ईयर में जो प्रेक्टिकल शुरूआत में करने को अलॉट हुआ, जिसका मैं कभी विशेषज्ञ था, बारह साल बाद अब मैं उसका नाम भी भूल गया हूँ। पानी से भरी ट्यूब में कुछ मापक्रम देखना होता था और वहाँ स्केल पर कुछ पढ़ा ही न जा सकता था। उसकी सही रीडिंग कभी आ ही नहीं सकती थी। कॉलेज के एक फिजिक्स लेक्चरर ने एक दिन आइडिया दिया कि पानी में एक बूँद स्याही डाल दो, कुछ दिखेगा तो सही। वैसे ही कौनसा सही मान आना था, अब स्याही डाल देने से जो प्रॉपर्टी पानी की निकाली जानी थी, वह स्याही मिले पानी की निकाली जा रही थी। उस प्रेक्टिकल में परिणाम तक पहुँचने के लिए कैलकुलेशन सबसे ज़्यादा करनी पड़ती थी और कुल मिलाकर अंत में एक ग्राफ आता था, जिसका एक विशेष आकृति का होना प्रैक्टिकल के सही होने का प्रमाण था। सब कुछ पढ़ लिया पर रीडिंग तो दिखनी थी नहीं, नहीं दिखी। ज़माने से सीनियरों की फ़ाइल वाली रीडिंग्स ही साल-दर-साल कॉपी होती चली आ रही थीं, वही हमने भी कॉपी कर दीं।

प्रेक्टिकल एक्ज़ाम में हमारे इंटरनल एक्ज़ामिनार बड़े सिध्दांतवादी थे। नक़ल का फर्रा पकड़ लिए जाने पर वे फेल भी कर सकते थे। सबसे ख़ौफ़नाक बात यह थी कि वे एक्ज़ाम की कॉपी में मिलान करते थे कि फ़ाइल की राडिंग ही तो नहीं लिख दी गयी हैं। कुल मिलाकर जिसके हिस्से मेरा वाला प्रैक्टिकल आता, वह न घर का रहता ना घाट का क्योंकि फ़ाइल वाली रीडिंग के अलावा और कोई रीडिंग किसी के पास नहीं थीं। परीक्षा में किसे कौनसा प्रेक्टिकल मिलेगा, इसका फैसला लाटरी से होता था। उस लड़की के हिस्से वही प्रैक्टिकल आ गया था, जिसे कोई नहीं लेना चाहता और मेरे हिस्से एक आसान सा प्रैक्टिकल आया था। वह रो रही थी और तरस खाकर इंटरनल ने इतना कह दिया कि यदि कोई अपना प्रैक्टिकल उससे बदलने को तैयार है तो ठीक है। सब यह देखकर आश्चर्यचकितथे कि मैंने उससे प्रैक्टिकल बदल लिया था और उसे वह आसान प्रैक्टिकल दे दिया था। हालांकि मैं उस प्रैक्टिकल पर आ गया था जिस पर मैंने दो-तीन महीने बिताए थे पर उसमें रीडिंग आ ही नहीं सकती थी। फ़ाइल की रीडिंग कॉपी नहीं कर सकता था। मैंने रफ़ कॉपी में वांछित ग्राफ की शेप के हिसाब से रिवर्स कैलक्युलेशन की पर वह इतनी लम्बी और जटिल थी कि मैं खो गया। फ़िर भी एक हल्का सा आइडिया लग गया था। मैंने पानी का जो तल थोड़ा बहुत दिख रहा था, उस हिसाब से पहली रीडिंग ली ताकि एग्ज़ामिनार चेक करे तो मुझे सही पाए। उसके बाद अपने अंदाज़ से रीडिंग लिख दीं। फ़िर घंटे भर उन कठिन कैल्कुलेशन्स करने में लगा रहा। अंत में जो ग्राफ आया, उसकी शेप प्रैक्टिकल फ़ाइल से भी बढ़िया थी। एकदम आदर्श। जैसा उसे होना चाहिए था। कोई नक़ल मैं लेकर नहीं गया था, पर वह दूसरा लड़का, वह नक़ल के साथ पकड़ा गया और उसे बड़ी मिन्नतें करने के बाद 200 में से 117 नंबर मिले।  मुझे 200 में से 165 मिले और इन नम्बरों के सहारे मेरी कुल परसेंटेज संभल गयी। सबको लगा कि मैंने उस लड़की पर एहसान किया था पर सच यह है कि जो एक प्रैक्टिकल मैंने कक्षाओं के दौरान बिल्कुल नहीं किया था, बस दूर से देखा था, मुझे वह अलॉट हुआ था । भले ही वह आसान था, पर मुझे उसके लिए किसी और से मदद मांगनी पड़ती। तो सच्चाई यह भी है कि मदद मेरी भी की थी उस लड़की ने, अपना कठिन वाला प्रैक्टिकल मुझे देकर, जिसे मैंने तिकड़म लगाकर सही से कर दिया।

अब वह सपने में मुझसे शिकायत कर रही थी कि मुझे उसका नाम याद नहीं। सच में मुझे बाक़ी सारे क्लासमेट्स के नाम याद थे, सिवाय उसके। कवि होते हुए मैं बार-बार अपने जीवन में आयी लड़कियों के लिए ज्ञानेन्द्रपति जी की इन पंक्तियों पर लौटता हूँ – “तुम्हें मेरी याद न होगी / पर मुझे तुम नहीं भूली हो”। अब वही पंक्ति कोई लड़की मेरे लिए बोल गयी थी, सपने में ही सही और यह मेरे भीतर का कवि था जो चेतना पारीक होने का बोझ नहीं झेल पा रहा था और जाग रहा था।

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