समवाय : कलात्मक एवं वैचारिक प्रतिबद्धताओं का कोलाज 

21-22 जुलाई को मण्डला में रजा न्यास की ओर से ‘समवाय’ का आयोजन किया गया था। उसकी विस्तृत रपट लिखी है कवयित्री स्मिता सिन्हा ने-

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मम्मी, आपको देर हो गई ना आने में। हमारे परफॉर्मेंस पर लोगों ने खूब तालियां बजाईं। बहुत सराहा गया हमें।’ बारिश के बूंदा-बांदी में मां एक हाथ में छाता और दूसरे हाथ में छोटे से बच्चे को टांगे अपनी बिटिया को सुन रही थी और अफसोस जाहिर कर रही थी की रात का खाना बनाते-बनाते देर हो गई। ‘कोई नहीं घर जाकर मम्मी को नृत्य दिखलाना और उन्हें सिखाना भी। सप्ताह भर से पहले मम्मी को बिल्कुल नहीं छोड़ना।’  मेरे बोलते ही दोनों ठठाकर हंस पड़ी। एक छोटी सी घटना मण्डला के कला-विथिका की, जहां छोटी-छोटी बच्चियों के कत्थक नृत्य ने वहाँ मौजूद सभी लोगों का मन मोह लिया।  भारी बारिश में, रात के धुंधलके में, लाइट की आवा-जाही के बीच भी स्थानीय लोगों की भीड़ लगातार बनी रही। बना रहा बच्चों के बीच उत्साह। उनकी आंखों की चमक और होठों की सहज मुस्कान हमें आज भी आनंदित करती है। वह क्या था जो उन्हें आकर्षित कर रहा था, लुभा रहा था! वह था दुनिया भर के शोर व भागमभाग से दूर इस शांत और माँ नर्मदे की लहरों से आड़ोलित मण्डला में लय-ताल-सुर की आहट। मंच पर सबके सामने भी कुछ सधे पैर थिरक रहे था और थोड़ा हटकर दरवाजे पर भी कुछ नन्हे पैर  उनकी थिरकन पर थिरक रहे थे। हमारी नज़रों में उन सभी पैरों की थिरकन थी, जो हमारे हृदय को आज भी स्पंदित करती है। वह अनुभव अलौकिक था, वह एक सुख की तृप्ति थी।

जब आपके पास बहुत सी बातें होती हैं कहने को, ठीक उसी वक्त आप सबसे कम कहते हैं। मेरे लिए दृश्य में बने रहने से कहीं ज्यादा जरूरी है दृश्यों से दूर रहकर भी दिनों-महीनो तक उन दृश्यों की अर्थवत्ता की छटा में खुद को महसूस करना। ‘ समवाय’ उन्हें परिदृश्यों का एक कोलाज है। समवाय चेतन -अवचेतन में बसे उन्हें उपक्रम का नाम है। समवाय यानी की समूह मनुष्यवत उपादानों का। समूह वैचारिक प्रतिबद्धताओं का। यह समवाय ऐसे वक्त में हो रहा था जब राष्ट्रीय मानचित्र पर गहमागहमी का माहौल था और जिसकी आँच से सोशल प्लेटफॉर्म भी वंचित नहीं रहा था। ऐसी स्थिति में रज़ा साहब के पुण्य -स्मरण में और रज़ा फाउंडेशन के तत्वावधान में होने वाले ‘समवाय ‘ को तीखी आलोचना व विरोध का सामना करना पड़ा। लोगों के मन में एक ही प्रश्न था कि मणिपुर में घटित जघन्य कृत्य के लिए जिस आक्रोश, जिस संवेदना की जरूरत है, क्या समवाय उसके साथ न्याय कर पाएगा?

हबीब जालिब साहब ने बड़ा खूब कहा है, “हुजूम देख के रस्ता नहीं बदलते हम, किसी के डर से तकाज़ा नहीं बदलते हम… हज़ार ज़ेर-ए-कदम रास्ता हो ख़ारों का, जो चल पड़े तो इरादा नहीं बदलते हम।” हां तो ‘समवाय’ का अपनी निर्धारित तिथि 21-22 जुलाई को सतपुड़ा की पहाड़ियों से घिरी नर्मदा के सौंदर्य से भरपूर मण्डला में ही संपन्न होना तय रहा। तकरीबन 20 शहरों से 47 कवि और 6 आलोचक इकट्ठे हुए मण्डला में।

प्रिया वर्मा के काव्य-संग्रह ‘स्वप्न के बाहर पाँव’, पहचान सीरिज की पुस्तकों ‘कहाँ किधर सें’ एवं ‘इस संसार में’ और कुमार गन्धर्व पर एकाग्र ‘स्वरमुद्रा’ के दोनों जिल्दों के विमोचन के साथ ही कार्यक्रम का शुरुआत हुई। विषद मुहावरे और भाषा-शिल्प विन्यस्त वहाँ उपस्थित सभी कवि पाँच पीढ़ियों में विभक्त थे और अपनी अपनी पीढ़ियों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। हर सत्र में पांच कवि थे और हर दिन पाँच सत्र होने थे। इस तरह स्वाभाविक ही था कि कविताएँ अपने वितान में तमाम मन-मिज़ाज़ और भाव को लेकर आने वाली थीं। जावेद आलम खान की कविताओं को सुनते ही लगा कि किस तरह एक कविता की निजता राष्ट्रीय सामाजिक सरोकारों की पैरोकार बन सकती है। जावेद सिर्फ अपने शब्दों में नहीं बोल रहे थे। उनकी आंखें, उनकी भंगिमाएं, उनकी मुद्राएं बोल रही थी। और वह बोलना भी सिर्फ बोलना नहीं था। वह था गुस्सा, आक्रोश, क्षोभ और निराशा का एक प्रस्फुटन। “तराज़ू के एक पाले में खंज़र है/ एक में मुद्रा/ जिसे धवल हाथों में उठाए देवी मुस्कुरा रही है/अपने ही घर में खुद को ढूंढते हैं हम / वक्त के संजय की उंगली पड़े / लाशों की भीड़ में भटक रहे हैं…” और फिर एक सन्नाटा, एक चुप्प सी ख़ामोशी… और फिर वह ध्रुव शुक्ल जी का धीरे से अशोक जी को कहना की धूमिल की याद आ गई… एक कवि के लिए प्रशस्ति है।

यही इसी मंच पर एक और आवाज थी सान्द्र और बहुत ही तरल, किंतु अपनी वैचारिकी को लेकर बेहद स्पष्ट। “ए भाई ! तुम क्यों मेरा रास्ता रोकते / तुम्हारा ही भाई हूं / जंगल से गुजरते हुए / बाघ से सामना होने पर / किसी ने ऐसा कहा / फिर बाघ ने उसका रास्ता कभी नहीं रोका / उस दिन से बाघ और मनुष्य एक कुल के हुए।” बेहतरीन कविता, बेहतरीन कविता-आवृत्ति, आदिवासी मिट्टी से उपजी एक बेहतरीन कवि पार्वती तिर्की।

किसने सोचा था इस दो दिवसीय कार्यक्रम में संपन्न होने वाले दस सत्रों के इतने सारे कवियों को इतनी एकाग्रता और शालीनता सी न सिर्फ सुना जाएगा, वरन दिल खोलकर सराहा भी जाएगा! विवेक निराला जी की कविता उद्भव शतक पूरे दर्शक दीर्घा को ओज में भर देगी। विष्णु नागर जी, अष्टभुजा शुक्ल जी और कृष्ण मोहन झा की कविताएं अभिधा व व्यंजना के बीच के बारीक फ़र्क के बीच अपने श्रोताओं को हठात छोड़ जाएंगी। दलित व अल्पसंख्यक विमर्श को समय का तकाज़ा बताते हुए विहाग वैभव यूं ही थोड़े कहते हैं, ” काश आज तुम मुझे सुन लेती/ हत्यारों में किया गया हूं शामिल / आताताइयों का दोस्त बताकर / किया गया है अट्टहास / पीठ पर बढ़ते जाते हैं / अभिव्यक्तियों के घाव / मैं वहां हूं जहां से किसान का दायां हाथ / अपने ही बाएं हाथ को / पहचानने से इनकार कर देता है।।। ” पर अफसोस जिन कानों तक की आवाज पहुंचनी चाहिए, उन्होंने दोनों हाथों से अपने कानों को कस कर ढँक रखा है । समवाय कान पर धरे उन्हीं हाथों को हटाने की कवायद थी । एक कवायद ऐसी भी जहां अनुराधा सिंह कहती हैं, “ईश्वर ने समंदर को लहरों से ढँका / पृथ्वी को आकाश से / रात को नींद से / और अंत में हर दिखाई देती चीज़ को हवा से ढँक दिया / स्त्री ने भूख को रोटी से / और वासना को प्रेम से ढँका” और शिरोमणि महतो कहते हैं, ” वे रोजी कमाते हैं / रोटी पकाते हैं / और चूल्हे में रोटी सेंकते भी हैं / लेकिन वे नहीं जानते / आग से दूर रहकर रोटी सेंकने की कला”

तमाम मिज़ाज़ों की अलग-अलग कविताएं और ऐसे में मौजूद आलोचकों के बिल्कुल अलग मिज़ाज़। दोनों में कहीं कोई तारतम्य नहीं दिखा। भाषा-शैली, मूर्तन-अमूर्तन, राग-लय, प्रेम-प्रतिरोध-पर्यावरण की आड़ में लगभग सारे आलोचकों द्वारा वहां मौजूद तमाम कवियों को खारिज करने की जैसे होड़ थी। उनके वक्तव्यों में कवियों के लिए कहीं भी कुछ ऐसा नहीं था जिन्हें ग्राह्य किया जा सकता। जो एक बेहतर कविता के परिप्रेक्ष्य में प्रेरक बन सकती। आलोचकों ने मंच पर पढ़ी गयी कविताओं के खण्डन और हो सकने वाली एक उम्दा कविता के महिमामंडल में ही अपनी सारी ऊर्जा खर्च कर दी।

अब सोचने वाली बात यह भी है कि सारे आलोचक एक ही लहजे में दरअसल कहना क्या चाहते थे ! कहीं उनका इशारा इस ओर तो नहीं था कि वाह-वाह के दौर में कच्ची कविताएं रची जा रहीं है। कविता का पकना क्या होता आज की पीढ़ी नहीं जानती। पर हमारे साथ तो हमारे वरिष्ठ भी थे। क्या कविता के इन मानकों के अंतर्गत उनकी कविताओं को रखना सही था! प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष रुप में देखें तो आलोचकों ने जो कुछ कहा और हमने जो कुछ सुना, उसके बीच एक समझ की एक गहरी खाई रह गयी, जिसे उस वक़्त पाटा नहीं जा सका और कई मतभेद बने रह गये। पूर्वग्रह से ग्रसित और लगभग पहले की गई एक तैयारी के तहत उनका मंच पर होना थोड़ा अखर सा गया। यह काम आलोचकों का ही बनता था कि उनके अनुसार बेकार व बुरी कविताओं के बरअक्स कम से कम एक-दो अच्छी कविताएं रखी जाती। हमें भी भाषा -शिल्प और शैली में अपनी कमतर कविताओं का बोध कायदे से होता। खैर सुकून की बात यह रही कि प्रयाग शुक्ल जी, अष्टभुजा शुक्ल जी , ऋतुराज जी, सविता जी, निलेश जी, ध्रुव शुक्ल जी जैसे हमारे दिग्गजों ने तमाम कवियों को बड़े प्यार से सुना और सराहा।

 ‘समवाय’ के मंच पर जो कुछ रचा जा रहा था वह उस समय का सच था।  सच था कविता का स्वर। सच था कला-विथिका में रंगों में सराबोर हाथ और मुस्काते चेहरे।  सच थे घुंघरू में बंधे थिरकते वे नन्हे पाँव। और सच था वह एक घंटा जब आसाम की अन्वेषा महंतो के शास्त्रीय नृत्य में सब मन्त्रमुग्ध होकर खो गये। सच था मण्डला में बिताया हर एक पल, जिसने समझाया कला के प्रति त्याग और समर्पण क्या होता है! सच जिसके निहितार्थ आलोचकों के कुछ अपने मापदंड थे, कवियों की अपनी सृजनशीलता थी और था कवि-कर्म के प्रति अशोक वाजपेयी जी का एक विनत व विनम्र, किंतु गंभीर आग्रह, जिसकी अनुगूंज लंबे समय तक हमारे जेहन में रहेगी।

-स्मिता सिन्हा

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