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कला की शमशीर पर विशुद्ध चेतना की धार

आज वरिष्ठ पेंटर-लेखक अखिलेश का जन्मदिन है। अभी हाल में ही सेतु प्रकाशन से किताब आई है ‘इस प्रकार: चित्रकार अखिलेश से संवाद’। इसी पुस्तक के बहाने पढ़िए वरिष्ठ लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ की यह टिप्पणी-

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वैसे मैं अच्छी किताबों और अच्छी चॉकलेट्स को लेकर अधीर बच्चे सी हूँ जो तुरंत रैपर खोल कर आराम से स्वाद लेकर चुभलाने की जगह तुरंत चबा लेता है। अकसर मुझे टोका जाता है कि स्वाद लेकर आराम से…. ‘इस प्रकार’ जैसी कला संवाद और कला वैचारिकी की पुस्तकें मुझे यह धैर्य सिखा देती हैं। एक अध्याय पढ़कर देर तक सोचना, मार्कर से किताब रच देना। फिर सरहाने से उठाना और डूब कर पढ़कर फिर उबर आना और सोचना…

हालांकि इस किताब की पाण्डुलिपि पढ़ी थी मैंने और छोटा-सा पुस्तक परिचय भी लिखा था लेकिन सेतु प्रकाशन से प्रकाशित इस कला-संवाद की अनूठी किताब को बस एक बार पढ़ा जा सकता है क्या? अखिलेश के विचार तो असंख्य ध्वनियों में रेजोनेट होते हैं जब वे कहते हैं – ‘कला किसी के खिलाफ़ नहीं है अगर उसे किसी के खिलाफ होना है तो वह अपने ही खिलाफ़ हो सकती है। कला अपनी छाया व काया खुद है।‘

हम हिंदी के लेखक पुस्तकों को खोज कर नहीं पढ़ते, एक कलामर्मज्ञ की कलाकार से संवाद की किताब को पढ़ने से बेहतरीन अनुभव क्या हो सकता है। कलाओं के संदर्भ में आज का हिंदी लेखक कूपमंडूक है, कुछ हैं जो थियेटर के संसार पर निगाह रखते हैं, कुछ सिनेमा पर, विरले नृत्य पर। चित्रकला और साहित्य का एक समय सुनहरा सम्बंध था, निर्मल और स्वामी, अशोक वाजपेयी और रज़ा साहब, निर्मल-रामकुमार, अशोक वाजपेयी और कृष्ण खन्ना के पत्राचार….अतीत का यह अध्याय अब बस नॉस्टेल्जिया देता है। कलाओं से लेखक की बढ़ती दूरी के दिनों में संप्रेषित होने वाली और रोचक किताब हिंदी के हर पाठक और लेखकों को पढ़नी चाहिए।

इस किताब की शुरुआत अखिलेश जी के कोराना काल के अद्भुत रेखांकनों से सज्जित है। जो एक नया रूपक रचती है उस काल की मार्मिकता का।

इस पुस्तक में संवाद आरंभ होता है ‘देखना’ विषय से…। यह नवेले कला प्रेमियों के लिए मानो ‘एप्रीसिएशन’ कोर्स जैसा है। मैं बहुत सौभाग्यशाली मानती हूँ खुद को कि उनसे हुई  मुलाकातों में मेरा चित्रकला को समझना समृद्धतर होता चला गया। उनकी लेखनी की सशक्तता और उनकी सुंदर कलेवर की मेरे पास रखी आठ किताबों ने मेरे चक्षु खोले, यह नौवीं किताब है मेरे संकलन की। इस अध्याय में अखिलेश, राजशेखर त्रिवेदी के प्रश्न “किसी एक से दूसरी कृति में जाना आपके लिए क्या किसी तरह की बढ़त है या चित्र के विस्तार का कोई विचार” के उत्तर में अनीश कपूर का जिक्र लाते हैं। मुझे याद है मैं तब दिल्ली में थी और उनका फोन आया, दिल्ली हो तो आज ही ‘नेशनल गैलेरी ऑफ मॉडर्न आर्ट’ जाओ। अनीश कपूर का दुर्लभ शो है…।  यह सिखाना था। मेरे अंदर के लेखक को एक नये आयाम से जोड़ना था।

इस अध्याय में वे कहते हैं  –  वास्तव में एक चित्र किसी दर्शक के देखे जाने पर ही पूर्ण होता है। आगे वे John Burger की किताब ways of seeing का हवाला देकर कहते हैं –  “कृति की चाहत नहीं होती, उसका आग्रह भी नहीं है कि उसे जाए। वो वहाँ बिना किसी तकाज़े के है। दृष्टि विशेष नहीं बस दर्शक बिना पूर्वाग्रह के देखे तो उसके सामने संसार खुलत जाने को उत्सुक है। देखना महत्त्वपूर्ण है और ईश्वर ने सबको रूप से देखने का वरदान दिया है, उस पर भरोसा करना चाहिए। देखना जाग्रत करना चाहिए।“

हम हिंदी वालों की विडंबना देखिए न, हम एक विलक्षण चित्रकार को अपने आस-पास देखते हैं, भारत भवन में कविता पाठ सुनते, रज़ा फाउंडेशन के ट्रस्ट-मेम्बर के तौर पर ढेरों कार्यक्रमों में, आई आई सी में…कितने उनकी कला और कला वैचारिकी की पुस्तक से वाकिफ़ हैं? जबकि वे साहित्य पर जब भी कोई अच्छी किताब या कविता पढ़ते हैं अपने विचार रखते हैं।

बौद्धिक और मानवीय उदारता का पर्याय हैं अखिलेश….किसी भी वरिष्ठ को लेकर उनकी युवतर पीढ़ी जब यह बात महसूस करें तो इस बात को कोई नकार ही नहीं सकता। लेकिन अखिलेश जी तो वरिष्ठों, समकालीनों के भी उतने ही प्रिय। अपने पिता से विरासत में कला और अध्ययन और शानदार मेज़बानी का जीनपूल लेकर जन्मे अखिलेश इंदौर स्कूल ऑफ आर्ट के अध्यापकों के प्रिय रहे। फिर स्वामी, हुसैन, रज़ा के सान्निध्य में रहे, बावा के साथ घंटों बतियाए ….भारत भवन को अपना श्रम दिया। अपने वरिष्ठों पर अनवरत लिखा। वे अपने समकालीनों को साथ लिए चले, उनका घर उनके मित्रों का दूसरा घर रहा करता था। उनकी मित्रमंडली महज चित्रकला तक कभी महदूद नहीं रही। साहित्यिक, रंगमंच, संगीत की बिरादरी का भी वहां हक़ से आना-जाना रहा। चित्रकारों की अपनी अगली पीढ़ी को उन्होंने उदारता से दोस्ती की और सिखाने और चित्रप्रदर्शनी लगवाने तक हरसंभव साथ दिया। नये लेखकों और कवियों को उदारता से सुना। अपने साथियों-युवाओं को सपोर्ट करते हुए वे मानो एक नेपथ्य में रहते हैं कि उसे पता नहीं न चले कि जो मजबूत हाथ उसे थामे है वह है किसका….आत्मकेंद्रित होते जा रहे संसार में अखिलेश विरले कलाकार हैं।

वे निस्पृह भाव से साहित्य जगत को कला वैचारिकी से, विश्व के अनूठे कलाकारों पर लेखनी चला कर हिंदी जगत को अपना देय देते हैं। हुसैन पर वे दो किताबें लिख चुके, स्वामी की जीवनी पर लिख रहे हैं। अपार नाम, सफ़लता चित्रकला ने उन्हें दे दी है मगर हिंदी में अनवरत लिखना वे ज़रूरी मानते हैं। संगीत सभाओं में हमेशा उपस्थित, नाटकों में दर्शक दीर्घा में बैठे मिलेंगे, भारत भवन की साहित्यिक गोष्ठियों में भी वे सुनने आते हैं। अभी मैं ने जाना वे अस्ताद देबू की नृत्य मंडली के साथ एक बार प्रस्तुति दे चुके हैं।

भाषा और उसकी अभिव्यक्ति के अहंकार पर वे बहुत बढ़िया बात इस संवाद में कहते हैं – संकेत और प्रतीकों से अलग एक मिथ कथाएँ गढ़ती हैं। यह मनुष्य की मजबूरी है या सीमा कि हम हर अनुभव को भाषा में जानने को ‘समझना’ कहते हैं। मनुष्य अपनी प्राकृतिक शक्तियों को खो चुका है या लगातार खोता जा रहा है। वह अपनी पाँच इन्द्रियों के सीमित इस्तेमाल की स्थिति में आ चुका है। अब उसे ‘आर्टिफिशियल इण्टेलिजेंस’ का सहारा लेना पड़ रहा है। चित्र का यथार्थ संसार का यथार्थ नहीं है, वह कल्पना का यथार्थ है। उस कल्पना के यथार्थ में अनुभव का अंश भी है। यह सांकेतिक प्रकटन, दरअसल, एक व्यक्ति द्वारा किये गये अनुभव का आलोड़न मात्र है। यह यथार्थ उस कलाकृति का है-समाज का नहीं। दर्शक का अपना यथार्थ है जो समाज का नहीं है। अनीश कपूर ने कहीं कहा है, ‘कलाकार मिथक गढ़ता है।’ यह भी यथार्थ का ही रूप है। माइथॉलॉजी हर पीढ़ी के लिए कोई नयी बात नहीं है, बल्कि उसका पुनर्लेखन है। एक नया अर्थ जो समकालीन है। मेरे ख़याल से कलाकृति हर समय नयी होती है। मोनालिसा का अर्थ लिओनार्दो के समय जो होगा वो अब नहीं है। मुझे नहीं लगता कि यह किसी भाषा को गढ़ने का प्रयास है। वह निरन्तरता का उत्सव है जिसमें भाषा की गढ़न उसका ‘बाइ प्रोडक्ट’ है। एक भाषा का इस्तेमाल कई लोगों के द्वारा किया जाता है, चित्रकला में उसकी गढ़ी भाषा उसके अलावा कोई और इस्तेमाल नहीं करेगा। यदि कोई करता है तो वह नक़ल कहलाएगी। वह अपनी पसन्द, सीमा और क्षमता से जो कुछ कर रहा है उसे एक भाषा की तरह देखना भाषा का अहंकार है ।

हम भाषा से खेलने वाले अपने लेखन में जीवंतता लाने के लिए रंगों के महत्व को जानते हैं। मैं समझती रंगों को लेकर उनसे अधिक और किस से सीखा जा सकता है? वे कहीं और लिखते हैं – “ अब रंग मुझे सांत्वना नहीं देते, मुझमें हिम्मत नहीं देते. मुझे दिलासा नहीं देते. उनका होना अब ऎसे अजनबी  की उपस्थिति है जिसे मैं ‘ रंग ‘  के नाम से जानता हूँ, किंतु उसके किसी प्रभाव को नहीं पहचानता. रंग का होना अब मेरे लिए उतना आसान नहीं रह गया जितना मैं दावा कर सकता था. रंग अब ज़्यादा रंगीन हो गए हैं. इस रंगीन परिप्रेक्ष्य में रंग – खोज अब शुरु हुई है और रंग समानता ही इसकी प्रेरक है. अब रंगों के भेद पर मेरे चित्र नहीं टिके हैं, वे संवाद को उत्सुक रहते हैं . “

उनकी एक बेहद रोचक कहानी है, मुझे वह कहानी लगती है ‘ वह धूसर में प्रकट होती है’ जिसे उन्होंने अवधेश की चित्र- श्रृंखला पर लिखा था।

“रंग की कोई व्याख्या नहीं होती, रंग के रूढ अर्थों से पड़े जाना मेरे लिए अहम है।“

इस किताब को पढ़ने की सिफारिश मैं हिंदी के नवेले लेखकों और सुधी पाठकों से जरूर करूंगी। अखिलेश जी ऐसे चित्रकारों में हैं जिनसे संवाद कभी इकहरा और आत्मकेंद्रित हो ही नहीं सकता। वे सजग चित्रकार हैं, वे चित्रों में भी समष्टि से बतियाते हैं, परोक्षत: उनसे उनके रचनाकर्म की बात करो तो भी वे विविध संदर्भों को साथ लिए चलते हैं। अन्य चित्रकला के मास्टर्स, प्रकृति-परिवेश, कविता और मनुष्य के अस्तित्व के बीज और संकट तक।

‘इस प्रकार’ इस अनूठी किताब में अखिलेश से संवादरत हैं, कला-मर्मज्ञ राजेश्वर त्रिवेदी। इस अनवरत लंबी बात-चीत में कविताई की लय है को कहानी जैसी रोचकता है। कहीं अखिलेश जी के कृतित्व के बहाने उनका उदात्त व्यक्तित्व उभर कर आता है तो कहीं व्यक्तित्व ही कृतित्व को  गहराई से रेखांकित करता है। राजेश्वर त्रिवेदी की बतौर पत्रकार व कला समीक्षक कला के विभिन्न माध्यमों में अनवरत आवाजाही करते रहे हैं, मूर्धन्य चित्रकार अंबादास, रंगकर्मी हबीब तनवीर व रामगोपाल बजाज , शास्त्रीय गायिका कलापिनी कोमकली, पर्यावरणविद अनुपम मिश्र, लोकगायक प्रहलाद टिपाणियां पर भी गहरे कला-सरोकारों के साथ लिख चुके हैं।

राजेश्वर त्रिवेदी के प्रश्नों की प्रखरता में उनका अध्ययन और दखल झलकता है, इन्हीं सटीक प्रश्नों के चलते अखिलेश के ऊष्मा भरे उत्तर इस पुस्तक में कई ऐसे झरोखे खोलते हैं कि कला – जगत से अनभिज्ञ मगर उत्सुक पाठक की भी रुचि जाग जाए।

इस किताब से कुछ कोटेबल कोट्स – “किसी भी कला की परिभाषा असंभव है। आप कला को परिभाषित करने की कोशिश करें वह उससे पड़े जाकर खड़ी हो जाती है।“

“कला कर्म आपसे कई तरह के बलिदान चाहता है। और उसमें यह भी पेंच है कि आप बेहतर मनुष्य की तरह उभरें, कंधों पर जो जिम्मेदारी आ गई है उसे बेहतर ढंग से निभाएं।“

“समाज एक अमूर्त अवधारणा है। यह समाज किधर होता है इसे जानना मुश्किल है। मैं समाज को प्रभावित करने के लिए कुछ नहीं करता। मुझे नहीं पता समाज किन बातों से प्रभावित होता है।

“ कलाकृति की व्याख्या व्यक्ति सापेक्ष है। वह सबके लिए एक हो जरूरी नहीं।“

जो लोग अखिलेश जी के चित्रों और उनकी यात्रा से थोड़ा भी परिचित हैं, वे सहज ही जान लेंगे इन शब्दों का मर्म. बल्कि सहज ही जान लेंगे ‘ हाँ यही अखिलेश हैं अपनी बात सरलता की सीधी रेखा में कहते हुए. जो केवल अखिलेश जी और उनके चित्रों से सतह से परिचित हैं उन्हें ये बातें उत्सुक करती खूबसूरत कविता लग सकती हैं. बात अंतत: कला से होकर कला तक पहुँचेगी. अतिवादिता और अतिरेक उनके यहाँ है ही नहीं

अखिलेश पहले दर्ज़े के कलाकार हैं, कलाकाराना फक्कड़ी में डूबे दरवेश से – जिनकी कला की शमशीर पर विशुद्ध चेतना की धार चमकती है. कला ही उनकी शान, ज्ञान और मर्म है. वे खरी – खरी बात कहते हैं लेकिन मन में अपने विरोधियों के लिए भी अतिशय उदारता लिए. वे त्रिआयामी हैं, उनका चौथा कोण उनकी लेखनी है, जो विकट पाठक होने के नाते मुझे बहुत पसंद है. निष्कपट, मौलिक, गहन भाषिक-तात्विक ज्ञान और विविध अनुभवों से सम्पन्न. उनके लिए कबीर की एक पंक्ति पर्याप्त है

– ह्स्ती चढ़िए ज्ञान की, सहज दुलीचा डार

आज अखिलेश जी का जन्मदिन है। जानकीपुल और उसके असंख्य पाठकों की ओर से शुभकामनाएं।

मनीषा कुलश्रेष्ठ

पुस्तक शीर्षक :  इस प्रकार

लेखक-संवादकर्ता : राजेश्वर त्रिवेदी

पृष्ठ संख्या – 206

मूल्य : 349

प्रकाशक – सेतु प्रकाशन

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