अनुपम त्रिपाठी की तीन कविताएँ

आज पढ़िए युवा कवि अनुपम त्रिपाठी की कविताएँ। बहुत साधारण प्रसंगों में गहरे संकेत छोड़ने वाली इन कविताओं को पढ़िए। एक अलग तरह की आत्मीयता दिखाई देगी-
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1

लकड़ी के तिपहिए को डगराने से पहले की स्मृति में जो हाथ याद आता है
मिट्टी की जमीन पर पड़ी हथेलियां थीं
आज वह मिट्टी से बहुत दूर हैं और समर्थ (?)

मैं हमेशा पिता की साइकिल पर आगे बैठा
वहां एक छोटी सी गद्दी थी
मेरा हाथ घंटी पर था, जिसे मैं रास्ते भर बजाते जाता
अब भी कोई साइकिल देखने पर उसकी घंटी बजाना चाहता हूं।
स्कूल ले जाते हुए पिता का हाथ
या दीदी का हाथ
दोनों की अलग यादें हैं मैं उन्हें मिला देना चाहता हूं।

हाथ मेरी यात्रा से आगे रहे
ज्योतिषों को कभी उनमें कोई उज्ज्वल भविष्य नहीं दिखा
भागना नियति थी मेरी लेकिन उसमें मेरा हाथ नहीं था।

बूढ़े होते हाथों को देखता हूं
तो इनसे किए गए काम याद आते हैं

अपनी देह को ही छूना कभी याद नहीं आया
कि कब नाक छुआ, पेट पर तृप्ति के हाथ फेरे
या कब भीगी आँख…

हाथ से कितने काम किए लेकिन भूलता रहा
सोचता हूं हाथ को लेकर कितना कृतघ्न रहा हूं।
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2

यदि किसी व्यक्ति का कोई परिजन उससे बिछड़ गया है तो…

वह सुबह उठता है और पहला काम उसे ध्यान आता है कि चाय बना ली जाए
ठीक इसी वक्त अलार्म बजता है
जबसे उसने सुबह उठने के लिए अलार्म लगाया है
वह हमेशा अलार्म के बजने से पहले उठा, और बजते अलार्म को बंद किया, सोचता इसका तुक?

सवाल पूछते हुए कि दूध कितना, चीनी पत्ती कितनी और पानी कितना; वह चाय बनाता
उसे कोई जवाब नहीं मिलता।

उसे दफ्तर के लिए ‘तैयार’ होना कभी नहीं आया। आइना देखे उसे अरसा हुआ

कई बार ऐसा भी हुआ कि ब्रश करते पेस्ट खत्म हो गया और उसे एहसास हुआ कि बिना पेस्ट के मंजन करते हुए आज तीसरा दिन है…
खुद को कहता है कि आज मार्केट चलेंगे…

कपड़े पहिनते हुए वह पूछता है आज क्या पहनूं?
और चार जोड़ी पैंट-शर्ट से कोई भी एक सेट निकालकर पहिन लेता

घर में ताला लगाते हुए कहता कि
आता हूं…

जनवरी की एक सुबह
वह यमुना बैंक मेट्रो स्टेशन पर बैठा धूप सेंकता रहा
लोग आते और पूछते:
वैशाली के लिए किधर?
द्वारका के लिए नीचे से जाएं? — उसने सबको रास्ता बताया
और देर तक जब कोई कुछ भी पूछने नहीं आया,
धूप चली गई, उसे ठंड का एहसास हुआ
और उसने सवाल किया, हम किधर जाएं…

एक्सलेटर चढ़ते हुए उसे सुनाई पड़ता है :
बच्चों का हाथ पकड़ कर रखें
वह हाथ बढ़ाता है और कोई नन्हा हाथ उसका हाथ नहीं पकड़ता

उसे यह भी सुनाई पड़ता है
कि यदि किसी व्यक्ति का कोई परिजन उससे बिछड़ गया है तो कृपया ग्राहक सेवा केंद्र पर संपर्क करें…

वह हंसता है।

मेट्रो में उसे कभी सीट नहीं मिली।
यह उसने आजमा रक्खा है कि जब भी वह बैठा, उसके सामने कोई बुजुर्ग, महिला या जरूरतमंद आ खड़ा हुआ और उसे सीट छोड़नी पड़ी…
इसलिए अब वह सीट पर बैठने की इच्छा से मुक्त है।

वहां उसे कई दृश्य भी देखने को मिलते हैं…
उसे रेस्त्रां में खाते हुए परिवार दिखाई पड़ते हैं,
घूमने जाते हुए एक दूसरे की बाहों में घुले हुए युगल
एक छोटी बच्ची जिसने रो रो कर शोर मचा दिया है
जिसे चुप कराने के लिए जब भी वह आगे बढ़ता है
बच्ची और रोने लगती है…

उस भीड़ से निकलकर वह दफ्तर पहुंचता है
दिनभर लैपटॉप पर खिट खिट करता है
बॉस को खुश करने की इच्छा भी उसकी जाती रही…
काम करते हुए वह अक्सर एक लंबी छुट्टी के लिए आवेदन पत्र लिखे जाने के बारे में सोचता है
पूछता है, लिख दूं?
उसे कोई जवाब नहीं मिलता।

और तब तो और कि जब कोई कलीग उससे पूछे कि कैसे हो?
इस सवाल का जवाब में वह हमेशा मुस्करा देता।
हालांकि सवाल पूछने वाला बिना जवाब देखे ही आगे बढ़ चुका होता है।

दफ्तर से आते हुए व्हिस्की लेना कभी नहीं भूलता।
पैग बनाते हुए वह सवाल करता है, पानी कितना…?

खाना बनाते हुए पूछता है कि क्या खाएं आज? नमक कितना? मसाला कितना?
उसे इसका भी जवाब नहीं मिलता। न मिला कभी।

और एक समय के बाद
उसने देखा कि उसे किसी भी विकल्प में कोई लगाव नहीं रहा
पैग में पानी कितना रहे न रहे
दाल में नमक ज्यादा हो या कम
चाय में दूध हो या न हो
उसे कोई फर्क नहीं पड़ता…

और जब उसने ध्यान दिया कि उसके द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब उसे कभी नहीं मिले
तब उसने सोचा कि
अकेलापन कान के दरवाजे से आता है
जब आप बोलते हैं, कुछ पूछते हैं या किसी को आवाज लगाते हैं
और सिवाय अपनी आवाज के आपको कुछ नहीं सुनाई पड़ता…
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3

वे उससे सब छीन लेंगे, बन्धुओ!

जी, वे वही…
वे जो हमेशा उसका हित सोचते रहे। उसे प्यार देते रहे। उसका साथ निभाते रहे। वे जो साहिब लोग हैं। जो ‘परफेक्ट’ हैं। जो गणित के गुणा भाग की तरह जीवन की उलझनों को खट से सुलझा देते हैं और कहते हैं —
देखा! जीवन ऐसे सुलझता है।
वे जो हल्की हंसी लिए घूमते फिरते रहते हैं इर्द गिर्द उसके। जिन्हें उसकी चिन्ता बहुत होती है।
अरे! वही व्हाइट कॉलर लोग।
जो जानने में सब कुछ जान गए हैं। सारे शास्त्र। सारे पुराण। ज्ञान विज्ञान। जो किसी भी विषय पर धारा प्रवाह बोल सकते हैं।
हां, वही लोग
उससे सबकुछ छीन लेंगे।
वो फूल देखेगा तो कहेंगे क्या घास फूस देखते हो!
उन्हें उसका फूल देखना अच्छा नहीं लगेगा
फूल छीन लेंगे।
गुनगुनाएगा कोई गीत…
वे उसे अनप्रोफेशनल कहकर उसका गाना बंद करा देंगे
उसे एक फाइल पकड़ा देंगे।

जिसकी उंगलियों को छूना था झीलों का पानी
वह हिसाब देखते देखते बूढ़ा हो जाएगा।

यदि उसने भूलवश कभी चांद देख लिया
वे उसका आसमान छीन लेंगे, तारे चुरा लेंगे, रात जैसा कोई शब्द तक नहीं छोड़ेंगे!

जो बात बात पर हंसाते थे, वे उसका हंसना छीन ले जाएंगे
जिन्होंने उससे वायदा किया था साथ रहने का
वही उसे एक मरघट में अकेला छोड़ जायेंगे

परफेक्ट लोग
ले जायेंगे उसका सारा परफेक्शन

सबसे दुखद बात जानते हैं क्या बन्धुओ!
जो उससे प्यार करते थे
बहुत बहुत ज्यादा प्यार
वह धीरे-धीरे उसकी जिन्दगी से सारा प्यार छीन लेंगे।

वे उससे सब छीन लेंगे, बन्धुओ!
वे वही व्हाइट कॉलर…

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