एक देशभक्त की कथा: हरिशंकर परसाई

आज महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की जयंती है। आज से उनकी जन्मशताब्दी की भी शुरुआत हो रही है। इस अवसर पर पढ़िए उनका एक व्यंग्य जो ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ से लिया है। यह किताब राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है-

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चीनी डॉक्टर भागा

[एक देशभक्त की कथा]

शहर के मसखरे कहते थे कि भैया सा’ब की सभा में अनिद्रा रोग के मरीज ही जाते हैं और उनका भाषण सुनते-सुनते सो जाते हैं। मगर उस शाम तिलक मैदान में बड़ी भीड़ थी। इसका कारण था। दिन में सभा की घोषणा करता जो ताँगा घूमा था, उसने कहा था कि भैया सा’ब चीनियों के एक नए षड्यंत्र का भंडाफोड़ करेंगे, जिसकी जानकारी देश में किसी दूसरे को नहीं है।

बात 1962 की है। तब भारत-चीन युद्ध कुछ दिन हो चुका था।

शहर में दिन-भर चर्चाएँ होती रहीं—”चीनी लोग कई मील अपनी सीमा में घुस आए हैं। … बड़ी कट्टर कौम है। …बड़े धोखेबाज हैं…कोई भी षड्यंत्र कर सकते हैं…भैया सा’ब को कहाँ से मालूम हुआ?…आदमी तिकड़मी है, कहीं से दूर की कौड़ी लाया है…सुनना चाहिए।”

वर्षों से श्रोताओं से वंचित भैया सा’ब को उस शाम भीड़ देखकर ऐसी खुशी हुई, जैसे सुरसा को हनुमान को देखकर हुई थी—आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा।

भैया सा’ब ने भाषण आरम्भ किया—

”भाइयो, आज देश पर संकट के बादल छाए हैं। प्राचीन ऋषियों की लीला-भूमि में दुष्ट चीनी घुस आए हैं। भाइयो, यह सरकार निकम्मी है। यह शत्रु के प्रति भी शान्ति की नीति बरतती है, यह अहिंसा में विश्वास करती है। हम यह नीति नहीं मानते। हम उन वीर परशुराम की सन्तानें हैं, जिन्होंने क्षत्रियों का नाश करके ब्राह्मणों का राज स्थापित किया था। हमारी नाडिय़ों में आर्यों का पवित्र रक्त बहता है। हमारा धर्म संसार में सर्वश्रेष्ठ है। हमारी जाति संसार की सिरमौर है। पर आज हमारी पवित्र भूमि के हजारों मील के टुकड़े में चीनी घुए आए हैं और सरकार सो रही है। इसे नहीं मालूम कि देश में कैसे-कैसे षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। मैंने हाल ही में चीनियों के एक बड़े षड्यंत्र का पता लगाया है।

”आप जानते हैं, देश-भर में चीनी दाँत के डॉक्टर फैले हुए हैं। ये हमारे बीच में, हमारे बनकर कितने ही वर्षों से रह रहे हैं। ये इसी पवित्र भूमि का अन्न खाते हैं, इसी का जल पीते हैं। पर ये लोग इसी भूमि से गद्दारी करते हैं। मैं बिना प्रमाण के झूठा आरोप नहीं लगाता। मैं व्यक्तिगत अनुभव की बात बताता हूँ। हमारे शहर में भी एक चीनी डॉक्टर येन-चेन है। वह पचासों सालों से यहाँ है और सब उसका विश्वास करते हैं। दूसरा कोई अच्छा दाँत का डॉक्टर है नहीं, इसलिए उसकी आमदनी भी बहुत है। कल दोपहर को मैं उसके पास अपना दुखता हुआ दाँत दिखाने लगा। उसने मुझे कुर्सी पर बिठाया और न जाने कैसा इंजेक्शन दिया कि मैं बेहोश होने लगा। उसने औजार उठाया और मेरी दाढ़ उखाडऩे लगा। जरा इस शैतानी को देखो—दर्द दाँत में है और वह मेरी पक्की दाढ़ उखाड़ता है। पलक मारते मैं उसकी चाल समझ गया। मैंने उसे एक धक्का दिया और बाहर आ गया। भाइयो, येन-चेन मुझे या तो मार डालना चाहता था या मेरी दाढ़ उखाड़ लेना चाहता था। यह दाढ़ मामूली दाढ़ नहीं है—यह मेरी अक्ल की दाढ़ है। एक तो यह बड़ी देर करके उगी है और अब यह बदमाश चीनी उसे उखाडऩा चाहता है। भाइयो, यदि उस क्षण मुझे ईश्वरीय प्रेरणा न मिलती तो या तो देश मुझ जैसे कर्मठ देशभक्त को खो देता या मेरी अक्ल की दाढ़ चली जाती और मैं किसी काम का न रहता। भाइयो, मुझे इन चीनियों के सारे षड्यंत्र का पता लग गया है, इनके पास चाऊ-एन-लाई की एक गुप्त गश्ती चिट्ठी आई है, जिसमें इन्हें आदेश दिया गया है कि अपने-अपने शहर के राष्ट्र-भक्त नेताओं की अक्ल की दाढ़ उखाड़ लो। भाइयो, अगर हम लोगों की अक्ल की दाढ़ उखड़ गई तो देश नेतृत्व-विहीन हो जाएगा और चीनी हमें परास्त कर देंगे। भाइयो, यह चीनी डॉक्टर येन-चेन हमारे देश का दुश्मन है। यह हमारे शत्रुओं से मिला है। इसे हम बर्दाश्त नहीं कर सकते। हम आस्तीन में साँप नहीं पालेंगे…”

सभा में कानाफूसी हुई। कुछ खुसफुस हुई। दो-चार आदमी कुछ पूछने को उठे। एक ने कहा, ”भैया सा’ब, कल तो आप शहर में थे ही नहीं। आप बाहर से सुबह ही लौटे हैं। आपकी बात सही नहीं मालूम होती।”

भैया सा’ब गरज उठे, ”देख लो, इन गद्दारों को। ये चीनी का पक्ष लेते हैं। ये मुझे झूठा कहते हैं। इन्हीं लोगों ने देश को गिराया है। एक समय था जब इस पवित्र भूमि में दूध-दही की नदियाँ बहती थीं। फिर देश में पापी पैदा हुए तो नदियों में मठा बहने लगा और अब इन गद्दारों के पापों का परिणाम आप आँखों से देख रहे हैं—हाय,आज हमारी नदियों में पानी बहता है। भाइयो, अच्छी तरह पहचान लो, इन गद्दारों को जो चीनी डॉक्टर का पक्ष लेते हैं।”

सभा में सन्नाटा छा गया।

भैया सा’ब का जोश दुगुना हो गया। वे दहाड़े, ”हम देश के लिए प्राणों की बलि चढ़ा देंगे। हम देश के दुश्मनों के दाँत तोड़ देंगे। भाइयो, यह चीनी डॉक्टर हमारे लिए बड़ा ही खतरा है। हमारा धर्म है कि हम इसे शहर से बाहर निकालें। हमें आन्दोलन करना है। भाइयो, कमर कस लो। देश आज पुन: बलिदान माँगता है। हम सत्याग्रह करेंगे। कल सुबह आठ बजे यहाँ से एक जुलूस नगर के प्रधान मार्गों से होता हुआ चीनी डॉक्टर के घर जाएगा और उससे शहर छोडऩे की माँग करेगा। यदि वह राजी नहीं हुआ, तो उसी समय उसके दरवाजे पर पिकेटिंग शुरू हो जाएगी। मैं देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ा हूँ। मैंने सीने पर एक नहीं, सैकड़ों गोलियाँ खाई हैं। मैंने देश के लिए सैकड़ों बार प्राण दिए हैं। मैं चीनी डॉक्टर को निकालने के लिए आमरण अनशन कर दूँगा। बोलो : देश के दुश्मन—मुर्दाबाद। चीनी डॉक्टर—निकल जाओ। भारतमाता की—जय।”

सुबह भैया सा’ब फूलमालाएँ पहने जुलूस में आ गए थे। अपने घर के सामने पहुँचे, तो स्त्रियों ने तिलक लगाया, आरती उतारी और नारियल हाथ में दिया।

नारे लग रहे थे।

देश के दुश्मन—मुर्दाबाद!

चीनी डॉक्टर—निकल जाओ।

डॉक्टर येन-चेन परेशान था। हाथ जोड़कर बाहर आया और समझाने लगा कि मुझे चीन से कोई मतलब नहीं, मैं भारतीय नागरिक हूँ और चाउ-एन-लाई की कोई गश्ती चिट्ठी मेरे पास नहीं आई। मैं ईमान से कहता हूँ, भैया सा’ब मेरे पास आए ही नहीं।

भीड़ को प्रभावित होते देख भैया सा’ब चिल्ला पड़े, ”झूठ बोलता है। देश के दुश्मन—मुर्दाबाद। चीनी डॉक्टर—निकल जाओ।”

नारों में तर्क डूब गए।

‘सत्याग्रह’ की शक्ति के सामने चीनी डॉक्टर टिक नहीं पाया। पिकेटिंग और अनशन की मार से ढीला हो गया।

चौथे दिन उसने अपने दवाखाने का सामान बेचा। एक कोई डॉक्टर त्रिवेदी न जाने कहाँ से आए और उसे मिट्टी के मोल खरीद लिया। चीनी डॉक्टर अपने बहनोई की जूतों की दुकान में काम करने कलकत्ता चला गया।

शाम तक वहाँ नया बोर्ड लग गया : डॉक्टर गोविन्द प्रसाद त्रिवेदी एल.डी.एस. दाँत के डॉक्टर।

डॉक्टर त्रिवेदी के पास शाम को पहला मरीज आया। दाँत साफ करवाकर उसने कहा, ”डॉक्टर साहब, आप पहली बार ही आज दिखे। पहले कहाँ थे?”

डॉक्टर ने कहा, ”मैं बरेली में था जी। पिछले साल ही लखनऊ से डॉक्टरी पास की। किसी अच्छी जगह दवाखाना खोलने का इरादा था। यह शहर अच्छा है। यहाँ एक ही अच्छा था, सो चला गया। जगह अच्छी मिल गई और औजार भी बड़े सस्ते मिले।” मरीज ने कहा, ”लेकिन आप आज ही अनायास बोर्ड वगैरह सब तैयार लेकर आए और दो घंटे में काम चालू कर दिया। क्या आपको पहले से मालूम था कि ऐसा होगा?”

डॉक्टर त्रिवेदी ने जवाब दिया, ”बात यह है कि आपके यहाँ जो भैया सा’ब हैं, उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का ऐसा अच्छा ज्ञान है कि उन्होंने मुझसे हफ्ते-भर पहले ही कह दिया था कि तुम तैयार रहो। यहाँ का चीनी डॉक्टर भागेगा। मैं तो परसों से बोर्ड वगैरह तैयार किए बैठा हूँ।”

मरीज ने पूछा, ”भैया सा’ब को आप कैसे जानते हैं?”

डॉक्टर ने कहा, ”जानते हैं? अरे साहब, वे मेरे सगे चाचा होते हैं।”

मरीज ने कहा, ”तभी।”

डॉक्टर ने पूछा, ”तभी क्या?”

मरीज ने कहा, ”कुछ नहीं। तभी…देशभक्ति जागी थी।”

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पुस्तक -विकलांग श्रद्धा का दौर

लेखक -हरिशंकर परसाई

प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन

हरिशंकर परसाई

22 अगस्त, 1924 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के जमानी गाँव में जन्मे हरिशंकर पारसाई का आरंभिक जीवन कठिन संघर्ष का रहा । पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया और फिर ‘डिप्लोमा इन टीचिंग’ का कोर्स भी ।

आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैं — हँसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे (कहानी-संग्रह); रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज (उपन्यास); तब की बात और थी, भूत के पाँव पीछे, बेईमानी की परत, वैष्णव की फिसलन, पगडंडियों का ज़माना, शिकायत मुझे भी है, सदाचार का ताबीज, विकलांग श्रद्धा का दौर, तुलसीदास चंदन घिसैं, हम इक उम्र से वाकिफ  हैं, जाने -पहचाने लोग, कहत कबीर, ठिठुरता हुआ गणतंत्र (व्यंग्य निबंध-संग्रह); पूछो परसाई से (साक्षात्कार)।

‘परसाई रचनावली’ शीर्षक से छह खंडों में आपकी सभी रचनाएँ संकलित हैं ।

आपकी रचनाओं के अनुवाद लगभग सभी भारतीय भाषाओँ और अंग्रेजी में हुए हैं ।

आपको केन्द्रीय साहित्य अकादेमी पुरस्कार, मध्य प्रदेश के शिखर सम्मान आदि अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया ।

निधन : 10 अगस्त, 1995

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