अभी हाल ही में डॉ.तनाया नगेंद्र ( डॉ. क्यूटरस के नाम से प्रसिद्ध) की किताब आई है ‘tanaya ‘। पेंग्विन से प्रकाशित इस किताब में मुख्यत: स्त्री-पुरुषों के प्रजनन संबंधी अंगों से जुड़ी नई व्याख्या प्रस्तुत की गई है। इसके साथ ही इन सब से जुड़ कई मिथों को तोड़ने का भी काम करती है, हमारे शरीर संबंधित, प्रजनन संबंधी, गरभनिरोध संबंधित बहुत से ऐतिहासिक संदर्भों को भी यह किताब सामने लाती है। इनके अलावा स्त्री-पुरुष यौनिकता से जुड़े पहलुओं पर भी हमारा ध्यान खींचती है, साथ ही वैसे बहुत से सवालों के जवाब देती है जिन्हें लेकर हम सबके मन में दुविधा रहती है, जिनके बारे में हम खुल कर कभी बात नहीं करते, सही स्रोतों तक नहीं पहुँचते हैं, भटकते रहते हैं। इस किताब की बेहतरीन समीक्षा लिखी है अनु रंजनी ने। आप भी पढ़ सकते हैं———
पेंगुइन से हाल में ही एक किताब आई है ‘एव्रीथिंग नोबडी टेल्स यू अबाउट योर बॉडी’ (EVERYTHING NOBODY TELLS YOU ABOUT YOUR BODY)। लेखिका हैं डॉ तनाया नरेंद्र, जिनकी पहचान डॉ. क्यूटरस के रूप में भी है। डॉ क्यूटरस कई मायनों में तारीफ़ की हक़दार हैं, जिनमें से एक सबसे प्रमुख कारण तो है किताब का विषय। एक स्त्री यह किताब लिख रही, यह भारतीय समाज के लिए बहुत बड़ी बात होगी। जिन्होंने इस किताब के बारे में नहीं सुना, नहीं पढ़ा, उनका यह सवाल हो सकता है कि आखिर ऐसा क्या है इसमें? दरअसल यह किताब कई स्तरों पर खुलती है। इस किताब का अध्यायीकरण ही देखें तो अंदाज़ मिल जाएगा कि यह मानव शरीर के किन-किन अंगों से जुड़ी बातों को सामने लाती है। यह स्त्री-पुरुष, दोनों के प्रजनन संबंधी ( आंतरिक, बाह्य , दोनों) के बारे में बात करने के साथ-साथ ऐसे मुद्दे पर भी विचार करने का रास्ता खोलती है जिनपर प्रायः हम बात करना नहीं चाहते, या अगर बात करते भी हैं तो वह बहुत सी अधूरी, गलत जानकारियों तथा पूर्वग्रह से भरी होती है, मसलन – सीमन, पीरीअड्स, मास्टर्बेशन, गर्भनिरोध का इतिहास, गर्भनिरोधक, इत्यादि।
लेखिका एक दोस्त की तरह अपने पाठकों को सम्बोधन करते हुए कहती हैं कि ऐसा मानिए कि कोई आपकी बहिर्मुखी दोस्त अपने अन्य दोस्तों से आपका परिचय करा रही हो और फिर वे आपके भी दोस्त बन जाते हैं।
हम सभी को स्कूल में ‘रिप्रोडक्शन’ संबंधी अध्याय पढ़ना होता है और संभवतः वहीं से इस विषय के प्रति, ‘सेक्स’ के प्रति तरह-तरह के ख्याल बनने लगते हैं। कारण, शिक्षक/शिक्षिका का उस अध्याय को इस तरह बरतना जैसे सबकुछ कितना असहज है! और यहीं पर हमारा शिक्षण संस्थान भी नाकाम होता दिखता है। क्योंकि यह चैप्टर पढ़ाने में क्या समस्या आती है? सबसे अधिक यही कि ‘अरे! इसे कैसे पढ़ाया जा सकता है?’ जाहिर सी बात है जिस समाज में कोई ‘सेक्स’ शब्द को सार्वजनिक रूप से कह नहीं सकता है, कह देने पर उसे घटिया मान लिया जाता हो, इसका प्रभाव विद्यालय में भी निश्चित रूप से जाएगा क्योंकि शिक्षक, विद्यार्थी सब इसी समाज का हिस्सा हैं। अतः न कोई शिक्षक-शिक्षिका इस अध्याय को खुल कर पढ़ाते हैं और न कोई विद्यार्थी झिझक के कारण कोई सवाल पूछ पाते हैं। अतः जो मान्यताऐं, ‘टैबू’ विद्यालय के बाहर प्रचलित हैं उसे भी लोग विद्यालय के अंदर लेकर चले गए। डॉ. क्यूटरस इन सभी विषयों को बहुत ही स्पष्ट और रोचक तरीके से बताती हैं जैसे कि गर्भाशय को ‘जगतमाता’ के रूप में घोषित करना। चूँकि हम में से हर कोई सबसे पहले गर्भाशय में ही बनता/बनती है इसलिए वे कहती हैं कि गर्भाशय हम सबकी सबसे पहली माँ है।
प्रायः लोग यह समझते हैं कि स्त्री का निचला हिस्सा, जांघों के बीच का, वह सब कुछ योनि ही कहलाता है, लेकिन लेखिका वहाँ के विभिन्न अंगों का हमसे परिचय कराती हैं। यह विडंबना ही है कि लड़कियाँ अपने ही अंगों के बारे में पूर्ण रूप से नहीं जानती । कहीं न कहीं यह दिमाग में बिठा दिया जाता है कि वह ‘गंदी चीज़’ है। यहाँ अनुपम सिंह की कविता ‘कैसी रहस्य गुफा’ सहज ही ध्यान हो आती हैं जिसकी शुरुआत वे यहीं से करती हैं कि –
“ कभी -कभी गुसलखाने में ले जाती हूँ
एक छोटा आईना
आईने में देखती हूँ गुलाबी गुफा-सी
अपनी योनि, गीली खुरदुरी जैसे कि जीभ
मैं देखना चाहती थी कि
कहाँ से आती हैं रक्त की बूँदें
रक्त का थक्का
काटता मेरी जाँघों को
जैसे नदी की धारा करार को काटती है
मैं बहुत सालों तक डरती रही देखने से अपनी ही देह
देह के भीतर कैसी रहस्यमयी
अँधेरे में डूबी लेकिन गुलाबी गुफा है यह!
जिसे देखने से डरती हैं औरतें
जिसे देखने से डरती थी मैं
तब की जवान होती लड़की”
‘हर लड़का पहले लड़की था’। यह सुनने में कैसा लगता है? रोचक? आश्चर्यजनक? बकवास या इनसे भी इतर? रोचक और आश्चर्यजनक लगने की संभवना अधिक है। हाँ, यह एक नया तथ्य इस किताब से ही मालूम होता है। ‘क्लिटॉरिस’ अध्याय में वे बताती हैं कि जब हम सब अपनी माँ के गर्भ में बहुत ही छोटे होते हैं, उन शुरुआती कुछ हफ्तों में हम सबका शरीर एक तरह से ही विकसित होता है – ‘फीमेल’ के रूप में। फिर यह ‘क्रोमोज़ोम्स’ पर निर्भर करता है कि किस तरह के निर्देश उसे आगे के लिए मिलते हैं। अगर आप XX हैं तो यह सामान्य है, आप उसी तरह से विकसित होते रहेंगे लेकिन यदि आप XY हैं, तब नौवें सप्ताह में यह संकेत मिलता है कि आपको अब ‘टेस्टोस्टेरॉन’ बनाना है। अतः जो पहले ‘ओवरी’ बन रहा था वह ‘टेस्टिकल’ बन जाता है, ‘वल्वा’ ‘बॉल सैक’ बन जाते हैं, जिनमें ‘टेस्टिकल’ रहता है और जो ‘क्लिटॉरिस’ था वह ‘पीनस’ बन जाता है।
इसी अध्याय के शुरुआत में स्त्री-यौनिकता से जुड़ी अफवाहों, नासमझियों पर भी विचार किया गया है, जहाँ यह स्पष्टतः लिखा गया है कि “ The only organ that has no other reason for existing other than for giving you pleasure.” यानी कि एकमात्र ऐसा अंग जिसका अस्तित्व आपको ‘प्लेज़र’ देने के अलावा कुछ नहीं है। जहाँ सदियों से अधिकांश आबादी यह मानती हो कि स्त्रियों को चरम-सुख नहीं होता है, यह उनके लिए है ही नहीं, वहाँ यह कहना कि स्त्रियों के शरीर में एक खास अंग सिर्फ और सिर्फ चरम-सुख की अनुभूति के लिए है यह लोगों को पुनः अचंभित कर सकता है। यह बात बिल्कुल सही है कि स्त्रियों को भी ‘ऑर्गैज़म’ की अनुभूति हो सकती है, होती है अगर इसके बारे में, स्त्री-शरीर के बारे में सही जानकारी हो तो। स्त्री के चरमसुख को लेकर कामशास्त्रीय ग्रंथों में भी विचार किया गया है जहाँ एक संदर्भ यह आता है कि चरमसुख का सीधा संबंध वीर्य-स्खलन से है, जो कि लिंग से ही सम्भव है और लिंग तो केवल पुरुषों को होता है, इसलिए वीर्य-स्खलन भी पुरुषों का होता है, फलतः चरमसुख भी पुरुषों को ही होता है। रही बात स्त्रियों की, तो स्त्रियों के लिंग तो होते ही नहीं हैं, तो वीर्य-स्खलन का तो सवाल ही नहीं उठता, अतः यह प्रमाणित होता है कि स्त्रियों को चरमसुख की प्राप्ति नहीं होती।
‘हाइमन’, यह भी एक ऐसा शब्द है जिसे हम सार्वजनिक रूप से नहीं कहते, या कहने में झिझकते हैं। लेकिन इसी हाइमन के आधार पर हम किसी भी लड़की का चरित्र तय कर लेते हैं। यह ‘परीक्षण’ होता है लड़की की शादी के बाद, जब पहली बार उसका पति शारीरिक संबंध बनाने आता है तो इस ख्याल से आता है कि लड़की ‘वर्जिन’ निकले, और ‘वर्जिनिटी’ तय करने का एकमात्र पैमाना है लड़की की योनि के द्वार पर हाइमन का होना, जो कि प्रथम संभोग के वक्त टूट जाता है और उससे खून आता है। यदि लड़की की योनि-द्वार से अपने पति के साथ प्रथम संभोग के दौरान खून नहीं आया तो यह तत्क्षण मान लिया जाता है कि उसका पहले किसी से संबंध बन चुका है, यानी वो ‘वर्जिन’ नहीं है, यानी वो चरित्रहीन है। इस संबंध में तनाया बताती हैं कि इसके टूटने पर केवल थोड़ा सा ही खून आता है तथा लगभग 40-60 % महिलाएँ अपने पहले सेक्स के दौरान ‘ब्लीड’ नहीं करती हैं। वे बहुत ही सूक्ष्मता से इस ओर भी संकेत करती है कि शादी के बाद पहली रात, ‘सुहागरात’ को लड़की का सेक्स के लिए मानसिक-शारीरिक रूप से तैयार न होने के बावजूद संबंध बनाए जाते रहे होंगे। वे लड़कियों को संबोधित करते हुए लिखती हैं कि जब आप यौन रूप से उत्तेजित होती हैं तो स्वभावतः आपकी योनि लिंग के प्रवेश के लिए फैल जाती है, साथ ही हाइमन भी इसके प्रवेश के लिए फैलता है। इसके साथ ही लिंग-प्रवेश को आसान और दर्दमुक्त बनाने के लिए खुद ही ‘नेचुरल ल्यूबरिकेशन’ भी करता है । लेकिन यदि कोई किसी चीज़ को ‘अनल्यूब्रिकेटेड’ जगह पर ज़ोर लगाए तो निश्चित ही उसे क्षति पहुँचेगी। यही स्थिति हाइमन के साथ भी होती है। इसलिए यह बहुत संभावित है कि सुहागरात पर लड़की सहज न हो पाई हो, जिस कारण वह सेक्स के लिए राजी न हो लेकिन अपने साथी का मन रखने के लिए उसमें शामिल हो जाती हो, आखिरकार यह सीख तो ससुराल आने से पहले लड़कियों को मिलती ही है कि पति जो चाहे उसे करने देना।
अब तक यह बातें होने लगी थीं कि हाइमन टूटने के पीछे कई कारण हो सकते हैं, मसलन खूब भाग-दौड़, व्यायाम, साइकिल चलाना, इत्यादि। इसमें एक नई और रोचक बात लेखिका यह जोड़ती हैं कि कुछ अध्ययनों के आधार पर यह सामने आया है कि कुछ महिलाओं के हाइमन बच्चे को जन्म देते क समय भी मौजूद रहे हैं।
डॉक्टर भी अपनी सुविधा क लिए झूठ-फरेब का सहारा लेते हैं इसका एक उदाहरण यह भी इस किताब में है कि डॉक्टर बकायदा हाइमन को देख कर ‘वर्जिनिटी टेस्ट’ करते हैं जबकि डॉ. तनाया का कहना है कि मेडिकल की पूरी पढ़ाई में कभी भी उन्हें इस तरह का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है।
न सिर्फ स्त्रियों के प्रजनन अंगों संबंधी झूठी बातें हमारे आस-पास व्याप्त है बल्कि पुरुषों के संबंध में भी यही स्थिति जारी है।( किसके बारे में कम, ज़्यादा, इसे अलग से खोजा जा सकता है)। इस तरह के ज्ञान खूब सुनने में आते हैं अमुक दिन संभोग करने से पुत्र-प्राप्ति होती है तो अमुक दिन करने से पुत्री-प्राप्ति। ऐसी बातें कुछ कामशास्त्रीय-ग्रथों (जैसे कि ज्योतिरिश्वर के पंचसायक ) में भी मिलती हैं जहाँ पुत्र प्राप्ति के विभिन्न उपाय बताए गए हैं। इसी से संबंधित एक मिथ का जिक्र इस पुस्तक में है, जिसे महान विचारक अरस्तू भी मानते थे कि दायाँ ‘टेस्टिकल’ ‘गर्ल-स्पर्म’ बनाता है तथा बाँयाँ ‘टेस्टिकल’ ‘बॉय-स्पर्म’ बनाता है।
पुरुषों के लिंग की लंबाई को लेकर भी जिस तरह की बातें प्रचारित की हैं कि लिङ्ग का अधिक लंबा होने का तात्पर्य है कि उसमें अधिक पौरुष है यह भी भ्रामक है (इस भ्रम को फैलाने में पॉर्न की भूमिका भी शामिल है।) यहाँ फिर से हमें कामशास्त्रीय-ग्रंथों को देखना चाहिए। उन ग्रंथों में नियमतः लिंग की लंबाई के आधार पर नायकों के विभिन्न भेद बताए गए हैं और (साथ ही योनि की गहराई के आधार पर नायिका-भेद भी किया गया है।) लिङ्ग की लंबाई को इतना महत्त्व देने का कारण क्या है? प्रायः इसे स्त्री की यौन-संतुष्टि से जोड़ कर देखा जाता है, वह ऐसे कि लोग यह मानते हैं कि लिङ्ग की अधिक लंबाई होने पर स्त्री को अधिक संतुष्टि मिलेगी। पर यहाँ लेखिका बहुत ही ‘स्ट्रॉनगली’ लिखती हैं कि SIZE DOES NOT MATTER, क्योंकि पेनिट्रेशन से ऑर्गैज़म का कोई लेना-देना नहीं है । योनि या गुदा के भीतर कोई ‘जादुई बटन’ नहीं है जो आपके साथी को तत्क्षण चरमसुख दे दे।
इन के अतिरिक्त पीरीअड्स होने के कारणों की सरलतम व्याख्या सहित इस दौरान लड़कियों के साथ होने वाले बुरे व्यवहारों की भी यह किताब बात करती है। इसके साथ ही बहुत से पीरीअड प्रोडक्ट्स से हमारा परिचय होता है। माना कि पीरीअड एक प्राकृतिक प्रक्रिया है लेकिन वह उतना ही दर्द देने वाला और असहज करने वाला अनुभव भी है। ऐसे में विभिन्न उत्पादों का परिचय अच्छा है लेकिन यह कुछ खास वर्ग तक ही सीमित रह जाने वाला है। देश का एक बड़ा हिस्सा है जिसे न्यूनतम आवश्यकता की चीजों की पूर्ति नहीं हो पाती। ऐसे में लड़कियों के लिए पीरीअड संबंधी उत्पाद कितने जुटाए जा सकते हैं ? जहाँ अब तक ‘पैड’ की पहुँच भी सब तक नहीं हो पाई है? इसके साथ ही एक और अध्याय ‘सेक्सी शॉपिंग’ है, यह भी कुछ ही खास वर्गों के लिए उपयोगी हो सकता है।
मीडिया आज हर क्षेत्र में हमें प्रभावित करती है, इससे हमारे जननांग भी नहीं बच सके हैं । खासकर तब जब बात आती है जननांग के बालों की ,‘प्यूबिक हेयर’। आए दिन हम तरह-तरह के विज्ञापन देखते हैं जिसमें उन बालों को हटाने के तरीके बताए जाते, (जाहिर है अपनी कंपनी के उत्पादों से ही) क्योंकि वे प्रचारित करते हैं कि वे गंदे हैं, उनसे आपका शरीर गंदा दिखता है । जबकि जननांगों पर बाल यह बिल्कुल ही प्राकृतिक है।
इन तमाम बातों के अलावा कुछ और रोचक (या अजीबोगरीब भी कह सकते हैं) को यह किताब हमारे समक्ष लाती है। जैसे कि यह जानना कि जिस लाइज़ोल का इस्तेमाल आज लोग अपने घरों को साफ़-सुथरा रखने के लिए करते हैं उसका इस्तेमाल पहले स्त्रियाँ अपनी योनि को साफ़ करने के लिए करती थीं, इसके पीछे भी विज्ञापन की ही भूमिका थी। अखबार में उस विज्ञापन की एक तस्वीर भी है इसमें।
एक अध्याय गर्भनिरोध के इतिहास पर भी है। यह अध्याय हम सबको झटका देता है जब हम 3500 साल पहले के मिस्र के एक प्रेमी-युगल से संबंधित एक छोटी-सी कल्पना से रूबरू होते हैं कि स्त्री, ‘फ्लॉई इजिप्टियन ड्रेस’ पहन कर, अपने पुरुष से ‘प्राचीन इजिप्टियन सेल फोन’ पर ‘सेक्सटिंग’ करते हुए कहे कि वह आज रात को पिरामिड के पीछे सेक्स करना चाहती है, यह सुन पुरुष भी उत्साहित हो जाता है, स्त्री भी उत्साहित है, वह अच्छे से स्नान करती है, अपने केशों को धोती है, उनमें फूल लगाती है, अपने पैरों के बालों को शेव करती है और फिर अपनी योनि को मगरमच्छ के गोबर से भरती है । जी हाँ, यह प्राचीन मिस्र में गर्भनिरोध का एक तरीका था। ऐसे और भी अजीबोगरीब तरीके के बारे में तथा गर्भनिरोध लिंग-भेद द्वारा प्रभावित भी किया जाता है, इसे भी भी यह अध्याय विस्तार से बताता है।
पुनः यह कहना आवश्यक लगता है कि तमाम वैसे विषयों पर (जिसपर हम बात करने से बचते हैं) एक स्त्री का लिखना बहुत ही गर्व करने वाला समय है, जहाँ लेखिका बेहद ही सरलता, रोचकता, वैज्ञानिकता और ऐतिहासिक संदर्भों को शामिल करते हुए हमारा परिचय हमारे ही शरीर से, बिल्कुल ही नए और अलग तरह से करवाती हैं।

