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  • मेरी कथा कसौटी: रत्नेश्वर

    हिंदी में साइंस फ़िक्शन की विधा को लोकप्रिय बनाने वाले लेखक रत्नेश्वर ने अपने लेखन की कसौटी, रचना प्रक्रिया के बारे में लिखा है। आप भी पढ़ सकते हैं-

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    एक उपन्यासकार-कथाकार के रूप में मैंने स्वयं के लिए कुछ कसौटी तय कर रखी है. स्वलेखन में मैं कथा को परखने के लिए त्रिनेत्र का इस्तेमाल करता हूँ. पहला नेत्र कथाकार का होता है. दूसरा नेत्र पाठक का होता है और तीसरा नेत्र आलोचक का होता है. स्टोरी लाइन तैयार करते समय मैं एक कथाकार की दृष्टि रखता हूँ. उपन्यास लिखते समय एक पाठक की दृष्टि शामिल हो जाती है और सम्पादित करते समय एक आलोचक की दृष्टि भी साथ-साथ चलने लगती है.

    मेरी कथा-कसौटी के विविध पहलू हैं. ‘वितक’ ये तीन प्रथम कसौटी-त्रयी हैं- विषय, तथ्य-सामग्री और कथातत्त्व. सबसे पहले मैं ऐसा विषय-बिंदु ढूंढता हूँ, जिसपर लेखकों का ध्यान नहीं गया है या भारतीय-वैश्विक साहित्य में नहीं के बराबर लेखन हुआ है. इसके बाद उस विषय पर केन्द्रित तथ्य और वैश्विक सामग्री जुटाता हूँ. हजारों पृष्ठों की सामग्री, जिसके लिए मुझे कई वर्ष लग जाते हैं. इसमें विषय की कोई सीमा नहीं होती है. विज्ञान, अध्यात्म, वैदिक साहित्य, पौराणिक साहित्य, इतिहास, पुरातत्त्व, पर्यावरण, ब्रम्हांड, खगोल, आदिकाल, मानवीय एवं जीव विकास, वर्तमान समय का परिवेश, विविध चुनौतियाँ, भविष्य की संभावनाएँ और भविष्य के सपने जैसे विविध विषयों के अध्ययन-शोध के अलावा स्वज्ञान के विविध प्रयास भी करता हूँ. जंगल में एकांत भ्रमण, अध्यापन, आयोजन नेतृत्त्व, मेडिटेशन, विद्यार्थी केन्द्रित लेखन आदि के स्वज्ञान के साथ सामग्री ढूंढते हुए यह देखता चलता हूँ कि इसमें विज्ञानी तर्क हैं या नहीं. इसके बाद मैं उनमें कथा-तत्त्व ढूंढता हूँ. आवश्यकता पड़ने पर स्थितप्रज्ञ अवस्था में आत्मज्ञान की राह पर चल पड़ता हूँ. ऐसे किस्से या किस्सों की कड़ियों की तलाश करता हूँ, जो अपनी लयात्मकता के साथ ताजा होने का बोध कराता हो! किस्से में परम्परा और वर्तमान समय-संवेदना का बोध तो हो, पर नव निर्माण का नाद करते हुए वह नई परंपरा का सृजन करता हो! संभव है कि बीज-कोंपल की खोज में सत्तर-अस्सी प्रतिशत से भी अधिक सामग्री मेरे इस्तेमाल में नहीं आए, पर यह करना मेरे लिए आवश्यक इसलिए है कि मैं साहित्यिक-दुहराव से बचना चाहता हूँ. यह दुहराव भाषा, विषय, शैली, कथ्य और नव-कहन में किसी भी स्तर पर होने की संभावना से बचने का प्रयास है.

    ‘भाशक’ भाषा, शैली और कथ्य- ये द्वितीय कसौटी-त्रयी हैं मेरे लिए. चलिए अब थोड़ा ‘भाशक’ के विस्तार में चलते हैं. सबसे पहले मैं भाषा में काल-परिवेश का ध्यान रखता हूँ. मेरा मानना है कि भाषा किसी पात्र की नहीं होती है, वह लेखक के काल-परिवेश के अनुरूप होती है. जैसे रामायण विविध भाषाओं में तीन सौ से भी अधिक लिखा गया है. वाल्मीकि ने संस्कृत में रामायण लिखा. तमिल में कंबन ने रामावतारम लिखा और अवधी में तुलसीदास ने रामचरित मानस लिखा. ये तीनों महाग्रंथ अलग-अलग भाषा-परिवेश में लिखे गए. कवि ने पात्रों को अपने शब्द-परिवेश दिए. मतलब साफ़ है. हरेक कालजयी कवि की रचना पढ़ते हुए उसके काल-परिवेश का ज्ञान होता है. यह विज्ञानी तौर पर कोई नहीं कह सका है कि श्रीराम की भाषा सच में कौन सी थी, जिसमें वे बात करते थे. इसलिए जब मैं आज किसी भी विषय पर उपन्यास लिखता हूँ, तो स्व के काल-परिवेश का पूरा ध्यान रखता हूँ. हाँ, यदि विषय प्राचीन या वैदिक या ऐतिहासिक है, तो पाठकों को कथा के काल-बोध के लिए उसकी छौंक देता चलता हूँ, जिससे कथा के मूल काल-भूमि का आभास भी हो और लेखक की काल-भूमि का भान भी हो. इसके बाद मैं भाषा के विषय के अनुरूप रखने का प्रयास करता हूँ. जैसे पर्यावरण हिन्दी का विषय पहले नहीं रहा है, तो उसके लिए शब्दावली भी नई ढूंढनी पड़ी या गढ़नी पड़ी. पुरातत्त्व, और विज्ञान मेरे लेखन में प्रभावी और केंद्र में है, तो मुझे वहां भी शब्द गढ़ने पड़े. इसके बावजूद मैंने काल-परिवेश को पूरी तरह अपनी भाषा में जागृत रखा, जिससे पठनियता पर कोई संकट न आ जाय. मेरे लेखन में अध्यात्म और स्त्री नेतृत्त्व का स्वर भी साथ–साथ चलता रहता है. इन दोनों में खिच्चा और प्रायोगिक भाषा का प्रयोग चुनौतीपूर्ण था. इसके बावजूद मैंने भाषिक प्रयोग किये. भाषा में तीसरी बात भविष्य का रखता हूँ. भविष्य में आने वाले पाठक मेरी कथा की तरलता और उसके संगीत को ग्रहण कर सकें. रचना वर्तमान में कितनी पढ़ी जा रही है, इससे अधिक मेरा ध्यान भविष्य में कितनी पढ़ी जाएगी, इसपर होता है. इसके लिए भविष्य की भाषा की कल्पना मेरे लिए उस अँधेरे तक पहुँचने जैसा है, जहाँ रवि भी नहीं पहुँच पाता है. तो मूलतः भाषा पर मैं इन तीन नजरिये से काम करता हूँ और कथा का निर्माण करता हूँ.

    शिल्प या शैली किसी भी कथा-साहित्य के लिए सबसे जरूरी अवयव है. यह कथा की पूरी बनावट को तय करता है. आज के युवाओं के जीवन का अध्ययन करता हूँ, तो पाता हूँ कि उनकी सोच विज्ञानी है. हो भी क्यों न! आज उनके हाथ में इंटरनेट और मोबाईल है. वह पलभर में विश्व को हरेक स्तर पर देख-समझ सकता है. ऐसे में उसकी दृष्टि इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक से भी बहुत आगे निकल गई है, जबकि सामान्यतः लेखकों की लेखनी पिछली सदी या नई सदी के प्रारंभिक काल में घूमती रहती है. अर्थात आज के युवा भविष्य की ओर देख रहे हैं. चाँद की सतह पर पानी और जीवन खोज रहे हैं और हम उन्हें अपने पुराने किस्से परोसने में लगे रहते हैं. जिन पर पहले से ही अनेक महान रचनाएँ रची जा चुकी हैं. खैर, आज के युवा हरेक प्रसंग पर तर्क करते हैं. धर्म, संप्रदाय से लेकर जीवन की संस्कृति तक पर. ऐसे में मुझे तर्क-शैली अपनाना समयानुकूल लगा. आज के युवा हरेक बात को विज्ञान की कसौटी पर कसने का प्रयास करते हैं. मैंने अपने लेखन में विज्ञानी दृष्टि का सहारा लिया. इस वजह से मेरे लेखन की शैली आज के युवाओं से कनेक्ट करने लगी. इस वजह से मैंने अपनी शैली को एक अलग स्तर पर रख पाया, जहाँ से आप मेरी पंक्तियों को पढ़ते हुए मेरी पहचान बिल्कुल भिन्न तरीके से कर सकें. इसकी तैयारी मैंने लम्बे समय तक की है. मैंने पूरी तैयारी के साथ कुछ मीडिया लाइव, जीत का जादू और सफल हिन्दी निबंध जैसी किताबें लिखीं. इन विज्ञानी नॉनफिक्शन किताबों में मैंने विषय को कथात्मक तरीके से प्रस्तुत करने का प्रयोग किया. मीडिया लाईव पत्रकारिता पर विद्यार्थियों के लिए लिखी गई किताब है, जो नेशनल बुक ट्रस्ट से छपी. इस टेक्स्टबुक को मैंने कथा शैली में प्रस्तुत की. इसकी यह शैली पाठकों को प्रभावित कर गई. किताब को जबर्दस्त सफलता मिली. इसके कई-कई संस्करण आ गए और किताब बेस्टसेलर हो गई. लगातार नॉनफिक्शन किताबों की सफलता के बाद, जब मेरी तैयारी मुकम्मल हो गई, तब मैंने रेखना मेरी जान उपन्यास लिखना शुरू किया. इसकी तथ्य-सामग्री तो मैं 2002 से ही जुटानी शुरू कर दी थी. उपन्यास पूरा हुआ और इसकी विज्ञानी शैली के प्रयोग ने जबरदस्त चर्चा पाई. किताब के अनेक संस्करण आए और यह बेस्टसेलर बन गई. यह बताना जरूरी है कि इस बीच मैं लेफ्टिनेंट हडसन और निर्मनु कहानी में यह प्रयोग पहले ही कर चुका था. दोनों कहानियाँ वैश्विक चर्चा पाई थीं.

    अब कथ्य पर कुछ बातें. कथ्य मेरे लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है. कथ्य की तलाश मैं किसी योगी, विज्ञानी या पुराविद की तरह करता हूँ. मैं निरंतर ऐसे कथ्य की तलाश में रहता हूँ, जिसे पहले नहीं कहा गया है. सामान्य ढंग से यह सुनने में हास्यास्पद लग सकता है क्योंकि हरेक लेखक यही प्रयास करते हैं. मैं कहना यह चाहता हूँ कि अपने आसपास के देखे-सुने-भोगे कथ्य से थोड़ा भिन्न. ऐसे कथ्य की तलाश, सामान्यतः हमारी नजरों से ओझल रहती हैं. भविष्य की विज्ञानी-कल्पना की राह मुझे वैसे कथ्य तक पहुँचने में सहायक साबित होती है या फिर इतिहास की खोई हुई पृष्ठभूमि से भविष्य के सपने की राह मुझे नए कथ्य की ओर ले जाती हैं.

    रचना-कर्म की पूरी प्रक्रिया में चमक-बिंदु अर्थात ‘कहा क्या’ की तलाश करता हूँ. मतलब ‘नव-कहन’. मैं अपनी कथा में उन बिंदुओं की खोज करता हूँ कि कथा कहते हुए मैं कुछ नया कह पाया या नहीं! वह कौन सा केंद्र होगा, जो हीरे की तरह चमक उठेगा और पारस की तरह मेरी कथा को एक नए और भिन्न स्वर्ण-स्तर पर खड़ा कर देगा. इससे हमारे लेखन का औचित्य भी स्पष्ट होगा. केवल लेखक कहलाने के लिए या लेखक बने रहने के लिए लेखन करने का औचित्य नहीं है. जबतक मैं उस ‘नव–कहन’ तक न पहुँच जाऊं, जहाँ मेरा लेखन निरर्थक और दुहराव से बच सके, तबतक तलाश जारी रहती है. यह बड़ी वजह है, मेरे लेखन की प्रक्रिया में अनेक वर्ष का लग जाना. यदि वह चमक बिंदु न खोज पाया तो, उस लेखन का मेरे लिए औचित्य ही नहीं है.

    रत्नेश्वर कुमार सिंह

    जनक भवन, रोड नंबर- 1/2 डी,

    राजेन्द्र नगर, पटना- 800016

    दूरबात- 9431047662

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