पुतिन की नफ़रत, एलेना का देशप्रेम

इस साल डाक्यूमेंट्री ‘20 डेज़ इन मारियुपोल’ को ऑस्कर दिया गया है। इसी बहाने रूसी पत्रकार एलेना कोस्त्युचेंको की किताब ‘आई लव रशिया : रिपोर्टिंग फ्रॉम अ लॉस्ट कंट्री’ पर यह लेख लिखा है जाने माने कलाकार-लेखक रवींद्र व्यास ने। आप भी पढ़ सकते हैं-

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सत्ता में बने रहने की षड़्यंत्रकारी व्यवस्था के कर्ताधर्ता देशों की आबोहवा कुछ ऐसी बना देते है कि वह ज़हर उगलने लगती है। आज पूरे विश्व में देशप्रेम का उफ़ान जिस गति और जिस ख़ौफ़नाक ढंग से ऊंचा उठ रहा है, वह किसी भी देश को आशंकाग्रस्त भविष्य से नत्थी कर देता है। इसी देशप्रेम के गर्भ से निकलता राष्ट्रोन्माद अपने ही देश और दूसरे देशों को कैसे बर्बाद कर सकता है,  इसका जघन्यतम उदाहरण यूक्रेन पर रूस का थोपा गया युद्ध है। इस युद्ध को इस फरवरी में दो साल पूरे हो गए। यह अब भी जारी है और इसका आकलन अभी बाक़ी है कि इस युद्ध ने

इस साल जिस डॉक्युमेंट्री ( 20 डेज़ इन मारियुपोल) को ऑस्कर अवॉर्ड दिया गया है, वह रूस की बर्बरता का रक्तरंजित कोलाज है। यदि यह डॉक्युमेंट्री रूस की क्रूरता का गतिशील दृश्यात्मक दस्तावेज है तो रूसी पत्रकार एलेना कोस्त्युचेंको की किताब ‘आई लव रशिया : रिपोर्टिंग फ्रॉम अ लॉस्ट कंट्री’ साहसिक, मार्मिक और विश्लेषणपरक एक काला कोलाज है। इसमें देशप्रेम को एक तीखी आलोचनात्मक दृष्टि से देखने की अथक कोशिश है। मुक्तिबोध की कविता पर विचार करते हुए कवि कुंवर नारायण ने यह लिखा था (और यह बात मैं अपनी स्मृति के आधार पर कह रहा हूं) कि मुक्तिबोध की लंबी कविताओं के अलग-अलग अंश अपने में जितने अर्थवान हैं, एक वृहत्तर संयोजन में मिलकर व्यापक स्तर पर अर्थवान हो उठते हैं। कहने दीजिए, एलेना की इस किताब के अलग-अलग अध्याय जटिल यथार्थ को मार्मिकता से अभिव्यक्त करते हैं लेकिन इन्हें जोड़कर देखा जाए तो ये एक ऐसा संपूर्ण जटिल यथार्थ अभिव्यक्त करते हैं जिसमें पुतिन के रूस और यूक्रेन पर युद्ध के हाहाकारी परिदृश्य से रूबरू हुआ जा सकता है। इसमें एलेना के जीवन के प्रतिबिम्ब की झलक भी देखी जा सकती है।

14 की उम्र में वे अपने ही देश रूस की जुझारू पत्रकार आना पोलित्कोवस्क्या के लेख और रिपोर्टिंग पढ़ती हैं तो पाती हैं कि उसने ख़यालों में अपने देश की जो ताक़तवर और ख़ूबसूरत तस्वीर बना रखी है, असल में वह इससे ठीक उलट है। हक़ीकत कुछ और ही है और यह जानकर वे दंग रह जाती हैं। यहीं से उनके मन में अपने देश की हक़ीक़त को गहराई से जानने-समझने की तड़प पैदा होती है। वे नियमित लाइब्रेरी जाना शुरू करती हैं ताकि आना पोलित्कोवस्क्या के तमाम लेख और  रिपोर्टिंग पढ़ सकें। ये लेख और रिपोर्टिंग पोलित्कोवस्क्या ने रूस के एक आज़ाद अख़बार ‘नोवाया गज़ेटा’ के लिए लिखे थे। पोलित्कोवस्क्या ने इन रिपोर्टिंग और खोजपरक पत्रकारिता के जरिए ‘पुतिन के रूस’ में तमाम अन्यायों और अत्याचारों, बर्बर और क्रूर राजनीति पर खोजी रिपोर्टिंग की थी। ख़ासतौर पर 1999 के बाद की उनकी चेचेन युद्ध पर रिपोर्टिंग इतनी तथ्यपरक, प्रामाणिक, यथार्थपरक और तीखी आलोचना से संपन्न थीं कि वे सत्ता की आंख की किरकिरी बन गईं। जब वे अपने अपार्टमेंट की लिफ्ट से नीचे आ रही थी, उनकी हत्या कर दी गई। (उनकी हत्या पुतिन के 54 वें जन्मदिन 7 अक्टूबर 2006 को की गई थी!)। पोलित्कोवस्क्या तब 54 साल की थीं।

इसी साहसी और निर्भीक पत्रकार की  रिपोर्टिंग को पढ़कर एलेना कोस्त्युचेंको पर इतना गहरा असर होता है कि वे पत्रकार बनने का ठान लेती हैं। यह सब जानते हुए कि लिखने की कितनी भारी कीमत चुकाना पड़ सकती है, एलेना 17 साल की उम्र में ‘नोवाया गज़ेटा’ में बतौर प्रशिक्षु काम करना शुरू कर देती हैं। उसी अख़बार में जिसके छह पत्रकारों (पोलित्कोवस्क्या सहित) की हत्या कर उनके फोटो इसी अख़बार के एडिटोरियल मीटिंग रूम में टांग दिए गए थे। लेकिन अपने देश की भयावह हक़ीक़त जानकर ही एलेना कोस्त्युचेंको में अपने देश और देशवासियों के प्रति गहरा प्रेम पनपने लगता है। इसी अथाह, सच्चे और अथक प्रेम के कारण वे रूस के दूरदराज इलाकों में जाकर खोजी रिपोर्टिंग करती हैं, यूक्रेन युद्ध में रूस की बर्बरता के तमाम ख़ौफनाक मंजर देखती हैं, हाशिए पर धकेल दिए गए साधारण लोगों के जीवन में पसरती असमानता, आदिवासियों और एलजीबीटीक्यू पर अत्याचार अन्य कारणों से बर्बाद होते जीवन का हाल दर्ज करती हैं। इसी प्रेम के कारण वे अपनी वह किताब लिख पाती हैं, जिसके कारण आज पूरी दुनिया उन्हें जानती है। यह किताब है- ‘आई लव रशिया : रिपोर्टिंग फ्रॉम अ लॉस्ट कंट्री’। 17 अक्टूबर 2023 को यह किताब अंग्रेजी में प्रकाशित की गई और दुनियाभर में पढ़ी जा रही है। एलेना के साक्षात्कर लिए जा रहे हैं और किताब की समीक्षाएं प्रकाशित हो रही हैं लेकिन रूसी में यह किताब प्रकाशित होना अब भी बाक़ी है।

निर्भीक पत्रकारिता करने की उनकी आदर्श पोलित्कोवस्क्या ने जीन देकर जो कीमत चुकाई थी, वैसी ही कीमत एलेना को  चुकानी पड़ी है। उन्हें अपना देश, अपना घर और अपने लोगों को हमेशा के लिए छोड़ना पड़ा। आज वे यूरोप में विस्थापित जीवन बिता रही हैं। और भयानक तो यह है कि उन्हें ज़हर देकर मारने की कोशिश की गई थी। जब वे ट्रेन से अपनी मां के साथ बर्लिन रवाना हो रही थीं, उन्हें अजीब महसूस होना शुरू हुआ। उन्हें भयानक सिरदर्द, पेटदर्द, पसीना आने लगा। उन्होंने महसूस किया उनकी सांसों में सड़े फल की गंध आ रही है। वे बीमार महसूस कर रही थीं। उन्होंने ग़ौर  किया, उनकी अंगुलियों पर सूजन आ रही है। वे पूरी तरह थका महसूस कर रही थीं। बर्लिन पहुंचकर जब उन्होंने डॉक्टर को दिखाया तो डॉक्टरों ने शुरुआती जांच में पाया कि उन्हें कोविड और हैपेटाइटिस बी है। लेकिन बाद में डॉक्टर्स एक बिलकुल अलग और भयानक निष्कर्ष पर पहुंचे कि उन्हें किसी ने ज़हर दिया है। इस मामले में जर्मन पुलिस ने तहकीक़ात शुरू की। पता लगा कि यूरोप में किसी ने ज़हर देकर उनकी हत्या करने की कोशिश की थी। और इसका अंदाज़ा लगना कतई मुश्किल नहीं था कि इसका दोषी कौन है? इसका दोष रूस और इसकी जासूसी एजेंसियों को जाता है। रूस में सत्ता विरोधियों को ज़हर देकर मारना सत्ताधारियों का पसंदीदा तरीक़ा है। हाल  ही पुतिन के विरोधी नवलनी को भी मार दिया गया और कहा जा रहा है कि उन्हें भी ज़हर दिया गया था।

एलेना कोस्त्युचेंको अपनी किताब में लिखती हैं कि ‘यदि सुरक्षति रहना है तो अपने चेहरे पर मुस्कराहट रखो। वे इस वाक्य के जरिए रूस में डिसेबल्ड के लिए बनाए गए सायकोन्यूरोलॉजिकल इंस्टिट्यूशन (पीएनआई) की दारुण स्थितियों के संदर्भ में यथार्थ को अभिव्यक्त करती हैं। लेकिन  इस  वाक्य के जरिए यह बात पूरे रूस पर लागू होती है। रूसी व्यवस्था के ख़िलाफ लगातार लिखने के कारण एलेना कोस्त्युचेंको पर हमले किए गए, बार-बार गिरफ्तार किया गया। इन दो दशकों में उन्होंने रूस में अल्पसंख्यकों की दारुण स्थितियों पर लिखा। 2022 के उत्तरार्ध में उन्हें चेतावनी दी गई कि वे यूक्रेन में युद्ध की ग्राउंड रिपोर्टिंग को बंद करें क्योंकि रूसी सरकार ने आदेश दिया है कि उनकी हत्या कर दी जाए। इसके बाद ही एलेना को अपना देश छोड़कर जर्मनी जाना पड़ा और वे वहां बीमार पड़ गईं।

‘आई लव रशिया : रिपोर्टिंग फ्रॉम अ लॉस्ट कंट्री’ में उन्होंने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के कारनामों को सिलसिलेवार ढंग से दर्ज किया है। एलेना एक साक्षात्कार में कहती हैं : ‘हमारे देश के गर्भ में फासिज़्म पनप रहा है। यह धीरे-धीरे बढ़ रहा है लेकिन अब युद्ध के साथ यह तेज़ी से फैल चुका है। मैंने फ़ासिज़्म के तेज़ी से बढ़ने को समझाने की कोशिश की है। मैंने उन दीवारों की ईंटों को बताने की कोशिश की है जिसके जरिए ये दीवारें अब ऊंची और ऊंची होती चली जा रही है। यह सब तेज़ी से घटिन नहीं हुआ, यह तो धीरे-धीरे, बहुत सुनयोजित ढंग से हो रहा है। कदम-दर-कदम। और हम इन बदलती परिस्थतियों में रह रहे हैं और ज़्यादातर रूसी अपने परिवार की साज-संभाल और चिंता करने जैसे साधारण कामों में जुटे हैं। हम जैसे पत्रकार भी अपना काम करते हुए यही सब कर रहे हैं। देश में फ़ासिज़्म की प्रक्रिया को तो बता रहे हैं कि यह कैसे बढ़ रहा है लेकिन हम ऐसा कोई असरकारी काम नहीं कर पा रहे जिससे इसे रोका जा सके। वैश्विक स्तर पर जो अधिनायकवाद का मोड़ आया है, इसे समझने की ज़रूरत है। खासतौर यह कि फ़ासिज़्म हर तरह की मिट्‌टी में पनप सकता है, और किसी में प्रतिरक्षा की ताक़त नहीं। यह लंबे समय से सहनीय माना चला जा रहा है और लोग सोचते हैं कि इसके साथ जीवित रह सकते हैं। और लोग यह तब तक मानते रहेंगे जब तक कि यह आपकी सहनशक्ति से बाहर ना हो जाए।

एलेना कहती हैं ‘रूसी सोचते हैं कि पुतिन उनकी हर तरह से रक्षा कर सकते हैं और इसीलिए वे सत्ता में तेज़ी से उभरे। पुतिन उन्हें युवा दिखाई देते हैं और उन्हें लगता है कि वे सही बातें करते हैं। जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों की बातें और यह भी कि हम अपने देश को एकबार फिर महान बना देंगे। यह वही समय है जब रूस में आतंकवादी हमले हुए और लोगों को भयभीत किया गया लेकिन इन आतंकी हमलों की कभी गहन तहक़ीक़ात नहीं की गई। और इसके साक्ष्य मिले हैं कि ये आतंकी हमले रूसी सुरक्षा एजेंसियों ने ही करवाए थे। लोग सचमुच भयाक्रांत थे और पुतिन के लिए यह समय एक मौका था कि वे तमाम आतंकवादियों (?) को खत्म कर दें! इसीलिए दूसरा चेचेन युद्ध शुरू किया गया। रूसी लोग चाहते थे कि वे उनकी सुरक्षा करने वाले किसी नेता के इर्दगिर्द इकट्‌ठा हो जाएं। वे सोचते थे कि यह नेता उन्हें बचा लेगा। तब लोग एकदूसरे के साथ आना चाहते थे और इसीलिए पुतिन चुन लिए गए। जब-जब पुतिन की छवि ख़राब होने लगती, रूस को एक और युद्ध में झोंक दिया जाता। यह दाव पुतिन के हित में काम कर जाता।

फ़ासिज़्म के लक्षणों को जानना हर किसी के लिए ज़रूरी हो गया है। एलेना कहती हैं कि शुरुआत में लोग उच्च सत्ता में यक़ीन करते हैं जैसा कि वे पहले से ही राजनीतिक नेताओं में विश्वास करते है। फिर आय और जीवन के रोज़मर्रा के खर्च में भयंकर खाई पैदा होती है। लोगों में आई असमानता का सत्ता राजनीतिक  इस्तेमाल लेती है और यह सचमुच एक ख़तरनाक स्थिति है। लोगों के सामने कोई एक कॉमन रियलिटी नहीं होती है और तब वे फिर अपने आप को असहाय पाते हैं। फिर लोग सोचते हैं कि कुछ भी बदला नहीं जा सकता। परिस्थितियों का लाभ उठाकर सत्ताधारियों द्वारा संस्कृति का एकीकरण किया जाता है। इतिहास को बदलना, स्वतंत्र पत्रकारों और एक्टिविस्ट की हत्याएं, अपंग और बुजर्गों  के लिए ‘कॉन्सन्ट्रेशन कैम्प्स’ और फिर बड़ा युद्ध। ये सब फ़ासिज़्म के लक्षणों का क्रमिक विकास है।

इसी फ़ासिज़्म का एक उदाहरण है- रूसी सरकार का ‘नोवाया गज़ेटा’ अख़बार पर प्रतिबंध लगाना, उसे और उसकी वेबसाइट बंद कर देना क्योंकि अख़बार लंबे समय से पुतिन विरोधी रूख अपनाए हुए था। एलेना कोस्त्युचेंको ने इस पर ख़ूब लिखा लेकिन रूसी सरकार अख़बार पर सेंससशिप के मामले में भी बेहतर ढंग से प्रशिक्षित है और इसमें उसे महारत हासिल है। एलेना कहती हैं : ‘मैं अपनी इस किताब को रूसियों के लिए रूसी भाषा में छापना चाहती हूं। रूस में सभी प्रमुख प्रकाशकों को मैं इसकी प्रतियां भेज चुकी हूं। वे कहते हैं- हमने इसे पढ़ा और हम चाहते हैं, यह किताब छपे लेकिन हम छाप नहीं सकते। रूस में आपकी किताब छापना एक अपराध है। और यदि हमने इस किताब को छाप दिया तो इस अपराध के लिए हमें दोषी माना जाएगा। हम जेल नहीं जाना चाहते। अब एक न्यूज़ ऑर्गनाइज़ेशन मेदुज़ा ने प्रकाशन गृह स्थापित किया है। अब मेरी यह किताब उनके प्रकाशन से छपने वाली पहली किताब होगी। प्रकाशक जानते हैं कि रूस में किस तरह से डिज़िटल कॉपियां रूसी इंटरनेट के जरिए पाठकों तक पहुंचाई जा सकती हैं लेकिन प्रकाशित किताब कैसे भेजी जाए, यह हम नहीं जानते क्योंकि यदि इसकी वितरण शृंखला में शामिल किसी व्यक्ति को धर लिया जाएगा तो उसे जेल हो जाएगी।

एलेना पूरी दुनिया में फ़ासिज्म को लेकर चिंतित हैं। वे कहती हैं –‘जब रूस से लेकर अमेरिका में फ़ासिज़्म विस्तार पा रहा है तब मैं निश्चित ही कुछ अलग ढंग से काम करना चाहूंगी। सब कहते हैं और सलाह देते हैं कि राजनीति के पचड़े में मत फंसो। इसमें शामिल मत होओ, नहीं तो आप अपनी ऑब्जेक्टिविटी खो देंगे। हम पत्रकारों को ऑब्जेक्टिव और प्रोफेशनल होना चाहिए और फलाना-ढिमका…। सत्ता में बैठे लोगों ने सत्ता में निरंतर बने रहने के लिए यह सिद्धांत गढ़ा है कि- ‘इस पचड़े में मत फंसो’ और वे चाहते हैं कि मीडिया राजनीतिक रूप से सक्रिय ना हो। मैं मानती हूं कि इसका प्रतिरोध करने के लिए व्यावसायिक कर्तव्य निभाना होंगे लेकिन यही पर्याप्त नहीं होगा। हमारी सिर्फ़ व्यावसायिक ही नहीं बल्कि नागरिक जिम्मेदारी भी है और इसे व्यावसायिक जिम्मेदारी से बिलकुल अलग नहीं किया जा सकता। बतौर पत्रकार आपको यह जानना ज़रूरी है कि आपका देश ग़लत दिशा में जा रहा है और इसके प्रति बाक़ी लोगों को जगाना आपका काम है। कई शिक्षित रूसी बहुत ख़ुश हैं कि प्रोपेगंडा उन पर ज़रा असर नहीं डालेगा, कि कुछ मूर्ख लोगों पर ही इसका असर पड़ेगा लेकिन हम हक़ीक़त जानते हैं कि लोग पहले से ही प्रोपेगंडा के गहरे असर में हैं। एक पत्रकार और एक्टिविस्ट होने के नाते मैंने कभी शर्म महसूस नहीं की। और ऐसे समय में जब लगे कि देश में चीजें नर्क की ओर धकेली जा रही हैं तो लोग भी नर्क की ओर धकेले जा रहे हैं, तब मुझे ख़ुद को भी और बाक़ी लोगों को भी इसके प्रति चेतना होगा।

एक ऐसे समय में जब देशप्रेम नेताओं का एक ताक़तवर और ख़तरनाक हथियार बन चुका है तब इस ‘आई लव रशिया’ देशप्रेम है लेकिन यह किसी से नफ़रत नहीं करता बल्कि सही परिप्रेक्ष्य में चीजों को देखने की साहसी कोशिश करता है। एलेना कहती हैं : ‘मेरा इस बात में यक़ीन है कि अपने देश के प्रति प्रेम को राजनीतिक नेता अपने हित में इस्तेमाल करते हैं और वे कहते हैं कि यह करो और यह नहीं। पुतिन कहते हैं : यदि आप रूस से प्रेम करते हैं तो जाओ, यूक्रेनियों की हत्या कर दो! यदि आप रूस से प्रेम करते हैं, तो चुप रहो, यदि आप रूस से प्रेम करते हैं तो आदेश मानो! लेकिन सचाई यह है कि प्रेम यह कभी नहीं चाहता। प्रेम मौत, चुप्पी या झूठ कभी नहीं चाहता। वह तो ज़िंदगी और सचाई चाहता है, और आप में यह तमीज़ पैदा करता है कि आप जिससे प्रेम करते हैं, उसे सही ढंग से देखने की कोशिश करें।

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