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अनुकृति उपाध्याय की कहानी ‘धानी’

अनुकृति उपाध्याय आजकल अपने अंग्रेज़ी उपन्यास kintsugi के कारण चर्चा में हैं। हम हिंदी वाले उनको ‘जापानी सराय’ की लेखिका के रूप में जानते हैं। बहुत अलग कहानियाँ लिखती हैं। ‘धानी’ उनकी नई कहानी है जो कुछ समय पहले हंस पत्रिका के पीडीएफ़ अंक में प्रकाशित हुई थी। आप भी पढ़िए-

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लड़की ने सर उठाया और मुस्कुराई।  उसके दोनों नासपुट छिदे  थे और उनमें  छोटी छोटी चाँदी  की नथनियाँ  चमक रही थीं। वह धातु की बैंचनुमा सीट पर एक ओर  सरक  गई।  ‘बहुत भीड़ है यहाँ आज, नहीं?’

वह ठीक कह रही थी. बड़ी भीड़ थी।  लेकिन यह आज की बात नहीं थी, इस रेस्त्रां में सब दिन ऐसी ही भीड़ रहती है। मैं बंबई -पूना हाईवे के दोनों ओर  के रेस्त्रां और चायघरों से लेकर लकड़ी के बक्सों और ठेलों में लगी दुकानों तक से परिचित हूँ।  परिचित होना लाज़मी है,  बम्बई -पूना का रास्ता मैं  हर सप्ताहांत तय करता हूँ।  लेकिन मैं अपनी बात नहीं करना चाहता।  मैं उस दो नथनियों वाली लड़की की बात करना चाहता हूँ जो गर्दन बाँकी किए मेरी और देख रही थी और जिसकी चमकीली आँखों के सामने मानसून  का बदलाया, सांवला दिन और भी मद्धम लग रहा था। हालांकि बैठने की और कोई जगह दिखाई नहीं पड़ रही थी फिर भी मैं हिचकिचाया।  हिचकिचाने का कारण था, वह लड़की मेरे लिए नितांत अपरिचित थी। यहाँ तक कि रेस्त्रां में घुसते समय या काउंटर पर खाना ऑर्डर करते समय भी मैंने उसे नहीं देखा था। मेरा सिद्धांत है कि मैं अजनबियों से बच कर रहता हूँ।  यों  मैं परिचितों से भी बच कर रहने की कोशिश करता हूँ।  मेरे पास ऐसा करने के ठोस कारण हैं लेकिन जैसा कि मैंने कहा, मैं अपनी बात नहीं करना चाहता।  ‘बैठ जाओ !’ उसने आँखें नचाईं।

मैंने उसका निमंत्रण स्वीकारने का निर्णय किया, सिर्फ़ इसलिए नहीं कि वह एक खुली लेकिन अबूझ, चमकीली मुस्कान मुस्कुरा रही थी। मेरे पास इसके तीन ठोस कारण थे –  पहला यह कि मैं जल्दी से खा-पी कर पूना की राह लेना चाहता था। यों मुझे पुणे में कोई ज़रूरी काम नहीं था जो देर से पहुँचने से हर्ज़ होता, लेकिन रास्ता पार करने के लिए होता है, यहाँ-वहाँ रुकने के लिए नहीं । दूसरा, कटोरी से छलके सांबर से इडली सराबोर हो कर क्षण -क्षण  नरम पड़ रही  थी और तीसरा, सामने वाली सीट कोई भारी भरकम हेलमेट और बस्ते रख कर छेक चुका था।   मैंने डोसे-इडली से लदी -फँदी स्टील की ट्रे मेज़ पर रख दी। ‘अगर तुम्हें इससे कोई असुविधा न हो तो… ‘

‘असुविधा क्यों होगी?  मैं यहाँ मानसून-भर रहने का नहीं सोच रही!’

मुझे मुस्कुराना पड़ा।  प्लास्टिक के नैपकिनदान से नैपकिन निकाल कर काँटा और चम्मच पौंछते हुए मैंने कहा, ‘न ही मैं,’ और उसकी की ओर कनखियों से देखा।  चोर निगाह नहीं , लेकिन बग़ल मैं बैठ कर किसी की ओर सीधे देखना कहाँ संभव है ? जिन्हें यक़ीन नहीं, वे कोशिश कर के देख सकते हैं।  वह सीधी सतर बैठी थी और रेस्तराँ की भीड़ में उसकी आँखें खो गईं थीं।  बाल उसके बेहद छोटे कटे थे और उसके कुछ बड़े, शंखाकार कान साफ़ नज़र आ रहे  थे।  उसके कान खूबसूरत थे और उसने सुबुद्धि का परिचय देते हुए अपनी नाक की तरह उन्हें छिदवाया-बिंधवाया नहीं था।  लोगों  की  जहालत की सीमा नहीं है, कानों में जगह-बेजगह छेद कर धातु के टुकड़े लटका लेते हैं , जैसे नर्म  कार्टिलेज और नाज़ुक हड्डियों के भँवर वाले कान अपने आप में सुंदर नहीं।  मैं कानों की बारीकियाँ जानता हूँ।  दिन भर में बीसियों कान देखता हूँ, माने शौकिया नहीं, यही मेरा काम है।  मैं ऑडियो टैक्नीशियन हूँ।  कान दरअसल बेहद संवेदनशील और निजी अंग हैं।  मुझे आश्चर्य है कि उन्हें उघाड़े घूमने का चलन कैसे पड़ा, उनके गुप्त भेदों को ढाँप कर क्यों नहीं रखा जाता।  ख़ैर , ऐसे सुघड़ और रक्त के स्वस्थ प्रवाह से चमकते कान मेरे देखने में कम ही आते हैं , अधिकतर तो झुर्रीदार, मुरझाए बीमार कान होते हैं जिनकी अँधेरी गुह्य सुरंगों में बरसों का कर्कट सट गया है। ऐसे कानों के बाद सुथरे सुंदर कान देखने का सुख…

मैं हाथ में चम्मच थामे पशोपेश में पड़ा था।  ऐसा नहीं की मैं वाक्पटु नहीं, लेकिन हर किसी से बात नहीं  करता।  मेरी माँ खीझ कर कभी कभी कहती है – ये तो माँगे मुँह का है। दरअसल उस लड़की की बग़ल में बैठ कर अकेले-अकेले खाना मुझे अटपटा लग रहा था और उसे अपनी थाली में से खाने का निमंत्रण देना उससे भी अधिक अटपटा ।  हालांकि मैं उसे क़तई नहीं जानता था लेकिन उसने अपनी जगह मुझसे बाँटी  थी। मैंने तय किया कि उससे पूछ लेना चाहिए कि वह कुछ खाना पसंद करेगी या फिर चाय वग़ैरह। ‘आप कुछ… ‘ मैं उसकी ओर मुड़ा ही था कि दोनों हाथों में पकवानों से भरी तश्तरियाँ  लिए एक आदमी मेज़ की ओर बढ़ा आया।  ‘सब गर्मागर्म  है,’ उसने हाथों की तश्तरियाँ मेज़ पर रख दीं।  ‘कोतम्बीर वड़ा, काँदे – पोहे, मिसल। और सीरा।  तुम्हारे मन का सब।’ वह मंझोले क़द का कसरती बदन वाला आदमी था और एक बेतुकी सी, कसी हुई लाल-नीली कमीज़ पहने था जिस में से उसकी छाती और बाँहों की मासपेशियां झलक रही थीं।

‘मेरे मन का सब?’ लड़की अब उस आदमी की ओर देख कर मुस्कुरा रही थी।

बैठने को झुका आदमी एक क्षण रुका।  ‘हाँ, बिल्कुल, सब… अरे नहीं। ‘ उसने मुट्ठी गोल कर माथा ठोका और तेज़ क़दमों फिर से काउंटर की ओर बढ़ गया।  लड़की गर्दन मोड़ कर उसे जाते देखती रही।  मैंने चम्मच से इडली को कोंचा।  नर्म पड़ी इडली तीन टुकड़ों में बँट गई।

बाहर बादल घने हो कर झुक गए थे।  मैंने मानसून में अक्सर देखा है कि बादल घिरने पर एक नीला-सलेटी उजाला  फैल जाता है और रोज़मर्रा की हर चीज़ कुछ अलग, कुछ कोमल दिखने लगती है – तारकोल मँढ़ी सड़क, कुत्ते-बिल्ली की आकृति के कचरादान,  कंक्रीट से घिरा बीमार पेड़ – सब  पर एक मृदु कमनीयता छा जाती है ।  मैं  चुपचाप खाने लगा।  मुझमें चुप रहने का बड़ा माद्दा है, बल्कि मुझे चुप रहना पसंद है। दिन भर ऑडियोमैट्री लैब में भिन्न पिच के स्वर सुनने, श्रवण यंत्रों को ट्यून करने और बहरे कानों में चिल्लाने के बाद किसे चुप्पी अच्छी नहीं लगेगी? लेकिन यह भी सच है कि गुमसुम मुस्कान वाली उस लड़की की बग़ल में बैठ कर मेरी कुछ कहने की इच्छा हो रही थी हालाँकि एक अनजान लड़की से क्या कहा जा सकता है ? इसलिए मैं अपने निरर्थक और अनकहे शब्द इडली के टुकड़े के साथ चबाने लगा।  लाल नीली कमीज़ वाला आदमी लौट आया।  इस बार उसके हाथ में कागज़ की प्लेटों  में वड़ा-पाव थे।  उनसे सौंधी और लाल मिर्च से धारदार गंध उठ रही थी। मेरे नथुने फड़क उठे।  ‘ यह लो ,’ उसने प्लेट लड़की के सामने रख दीं और हेलमेट वग़ैरह सरका कर सामने वाली सीट पर बैठ गया, ‘अब तुम्हारे मन का सब कुछ ले आया। ‘

‘सब कुछ?’ लड़की की मुस्कान ज्यों की त्यों थी। ‘इस रेस्त्रां में सब कुछ मिलता है? मेरे मन का सब कुछ?’

‘तुम्हें कुछ और चाहिए? मैन्यू बदल गया है. बहुत सी नई डिश हैं।  कुछ और लाऊँ?’ आदमी उठ पड़ने को सन्नद्ध था।

जैसा कि मैं कह चुका हूँ वे दोनों मेरे लिए क़तई अनजान थे। मैं वहाँ था लेकिन उनमें शामिल नहीं था, न ही उनसे मेरा कोई सरोकार हो सकता था। फिर भी मैंने अजनबियों की बातों में न पड़ने का अपना नियम तोड़ कर कहा ‘मैन्यू में सब कुछ भले न हो, लेकिन बहुत कुछ है। यहाँ का वड़ा-पाव बढ़िया हैं, बॉम्बे का वड़ा-पाव तो बस नाम को मशहूर है, उससे पुराने तेल और बासी आलू की हीक आती हैं।  यहाँ सब ताज़ा बनता है। ‘

आदमी ने मेरी ओर देखा।  ‘ठीक कहते हो।  हाईवे पर सबसे अच्छा खाना यहीं मिलता है।  हम यहाँ काफी समय बाद आए हैं और कुछ भी नहीं बदला है। ‘

‘हम यहाँ काफी समय बाद आए हैं और सब कुछ बदल गया है। ‘ लड़की ने कहा।

आदमी हल्का मुस्कुराया।  लड़की की तरह नहीं, लड़की से एकदम भिन्न, बल्कि जैसे उसके बावजूद।

‘कुछ भी बदलना ज़रूरी नहीं है, धानी, सब कुछ पहले जैसा हो सकता है। नन ऑफ़ दिस इस इर्रिवर्सिबल। ‘

लड़की जवाब में एक गहरी मुस्कान मुस्कुराई।  गहरी माने जैसे मुस्कुराहट उसके खूब भीतर डूब कर उबरी हो, जैसे किरणें पानी में गिर कर चिलकती हैं।  मैं ठीक ढँग से कह नहीं पा रह क्योंकि न मैं मुस्कानों के और ना ही किरणों के बारे में कुछ जानता हूँ, मैं तो बस कानों के बारे में जानता हूँ जिनकी अंधी सुरंगों में सब धँस जाता है और लौटता नहीं।

‘कुछ भी पहले जैसा नहीं हो सकता। अभी हम ये भी नहीं जानते कि बदला क्या क्या है और जब तक जान पाएंगे, तब तक सब कुछ फिर से बदल गया होगा। ‘ लड़की ने हल्दी और धनिये से गमकते काँदे- पोहे में एक चम्मच मीठा सीरा मिलाया।

‘कुछ भी कहाँ बदला? हम दोनों यहां बैठे हैं और तुम हमेशा की तरह मीठा-नमकीन मिला कर खा रही हो। ‘

‘लेकिन सारे स्वाद बिलकुल बदल गए हैं । ‘

आदमी ने कोतम्बीर वड़े का एक टुकड़ा चटनी में डुबो कर मुँह में डाला।  ‘तुम्हारा वहम है, धानी, सच में कुछ नहीं बदला है… ‘

वे दोनों मेरा वहाँ होना बिलकुल भूल चुके थे। बारिश होने लगी थी । पहले कांच के छर्रों सी बूंदों ने नीली -स्लेटी रौशनी को बींधा, फिर बादल धारासार बरसने लगे, सड़क, बीमार पेड़ और दूर के धुंआसे पहाड़ों पर एक सी सरगर्मी के साथ। रेस्त्रां का दरवाज़ा खुलने पर बौछार के साथ पानी का धड़कता शोर भी भीतर आता।

‘तुम यहाँ अक्सर आते हो?’  आदमी की अनदेखती आँखें मुझ पर थीं।

‘हाँ, हर हफ्ते। ‘ मैंने कहा। लोगों से बातचीत न करने का एक कारण यह भी है कि लोग प्रश्न पूछने लगते हैं – कहाँ रहते हो, क्या करते हो, परिवार वग़ैरह? और प्रश्न पूछने से सलाह देने की दूरी एक झपाके में पार कर लेते हैं – तुम्हें माँ -बहन को बंबई ले आना चाहिए, तुम्हें उनके पास पुणे लौट जाना चाहिए , दक्षिण चले जाओ, वहाँ बड़े अस्पताल हैं , उत्तर चले जाओ, वहां का मौसम बेहतर है , पूर्व-पश्चिम कहीं भी जाओ, बस अपना देश मत छोड़ो, यहाँ क्या कमा लोगे, विदेश चले जाओ…. यानि तरह-तरह की सलाह जिसका निचोड़ यह कि वह न करूँ जो कर रहा हूँ, वहाँ न बना रहूँ जहाँ हूँ…. लेकिन मुझे कहना पड़ेगा कि वह आदमी खोद-खाद करने वाला नहीं था। ‘हम पूना बहुत समय बाद जा रहे हैं। ‘ उसने कहा।  उसकी खोई-उलझी सी आँखें मुझ पर टिकी रहीं. कुछ कहना लाज़मी था, सो मैंने कहा – ‘तुमने बिलकुल सही समय चुना है।  घाट  इस समय बहुत सुन्दर हैं , एकदम हरे।  मानसून का सच्चा आनंद यहीं है। ‘

‘हम मानसून का आनंद उठाने नहीं जा रहे हैं। ‘ लड़की ने हाथ की चम्मच तश्तरी में टिका दी।

‘अच्छा, फिर शायद रिश्तेदारों से मिलने… ‘

‘अँह, नहीं,’ लड़की ने सर हिलाया।

‘धानी … ‘आदमी बोला।

लड़की ने अपनी चमकती आँखें आदमी की आँखों में चुभा दीं। ‘हम पूना तलाक़ लेने जा रहे हैं।  ‘

मैं अचकचा गया।  अपने तैंतीस साला जीवन में मेरा कभी ऐसी स्थिति से साबिक़ा नहीं पड़ा था।  मैंने अपनी थाली में मुरझाते डोसे और ठन्डे पड़ते सांबर पर निगाह डाली।  ऐसी संगीन बात के बाद खाना खाने जैसा मामूली काम कैसे किया जाए? हलकी नीली पोशाक़ में एक वेटर मिटटी के सकोरों में चाय और स्टील के गिलासों में फ़िल्टर कॉफी ले आया।  उन दोनों ने चाय के सकोरे उठा लिए।  ‘यहाँ पहले वर्दी वाले वेटर नहीं थे। ‘ आदमी ने चाय की चुस्की ली।

मैं कॉफ़ी लेना चाहता था लेकिन वेटर जा चुका था।  ‘वर्दियाँ और नए मैन्यू को छः एक महीने ही हुए हैं। ‘ मैंने बताया।  ‘शायद मालिक बदल गया है। ‘

‘पुराने मालिक ने रेस्तरां छोड़ दिया?  ये भी एक तरह का तलाक़ ही हुआ, नहीं?’ लड़की अब भी मुस्कुरा रही थी।

मुझे उसकी लगातार मुस्कराहट से चिढ हुई।  ये थक नहीं जाती ऐसे मुस्कुराते?

‘ये सब धानी का ही आइडिया था,’ आदमी ने कहा, ‘ये तलाक़ वग़ैरह का… ‘

‘शादी करने का भी मेरा ही आइडिया था। ‘

 रेस्त्रां में बारिश और लोगों के कण्ठस्वरों का बोझिल गुंजार सा था।  मुझे उस गुंजार से भी चिढ हो रही थी।

‘हमने तुमको एकदम परेशानी में डाल दिया है, नहीं ?’ लड़की मेरी ओर देख रही थी।  मेरी झुँझलाहट बह गई .

‘वैसे परेशान होने जैसी कोई बात है नहीं, ‘ आदमी ने तसल्ली दी, ‘मैं दस सालों से जानता हूँ धानी को, हम पाँच  सालों आर्किटेक्चर कॉलेज में साथ थे, फिर दो साल बाद शादी और शादी के तीन साल…. इसके दिमाग़ में कुछ फ़ितूर आ जाए तो बस….’

‘हमारा तलाक़ मेरे दिमाग़ का फ़ितूर है?’

‘तो क्या है ? कोई बात ही नहीं है। यानि ऐसी कोई बात नहीं कि… यानि तुम कह सकती थीं… अब भी कह सकती हो…’ लड़की चुपचाप उसे देखती रही। ‘धानी शुरू से ही ऐसी है,’ वह कहता गया, ‘एकदम बेजोड़ सी… पहले मेंढकों की वजह से अच्छा भला घर छोड़ना पड़ा और फिर ये तलाक़ का शगूफ़ा… ‘

‘लेकिन मेंढकों से परेशानी तो तुम्हें थी !’

‘कितना बढ़िया घर था, ट्रेन स्टेशन के पास, पानी-बिजली की समस्या नहीं, किराया भी वाजिब और फिर धानी ने मेंढक देख लिए…’

‘मेंढक वहाँ थे तो कैसे नहीं देखती? और उनसे घिनाते तो तुम थे!’

‘मेरी उन पर नज़र ही नहीं जाती अगर तुमने दिखाए नहीं होते और हमें वो घर नहीं छोड़ना पड़ता। ‘

लड़की खिलखिला कर हँस पड़ी।  उसके नाक के छल्ले काँप उठे और कान हल्के लाल पड़ गए।  ‘अब हमने तुम्हें बिलकुल उलझा दिया है !’ उसने मेरी ओर देखा।

ज़ाहिर है मुझे सब कुछ समझ में नहीं आया था , मसलन मेंढक और तलाक़।  मुझे कुछ कुछ वैसा ही महसूस हो रहा था जैस पहली बार ऑडिओग्राम देखने पर लगा था। मेरे लिए ऑडिओग्राम की तिरछी, बारीक़, विचित्र कोणों पर अचानक मुड़ती रेखाएं और एक्स-वाए धुरियों पर लिखे अंक थे अबूझ लेकिन डॉक्टर ने देखते ही कहा – नॉइज़ इंडयूस्ड हियरिंग लॉस।  कोकलिआ पर असर है।  ऊँची फ्रीक्वेंसी की आवाज़ें सुनाई नहीं देती होंगी, हियरिंग एड के लिए फ्रीक्वेंसी लिखो।

मैंने सावधानी से कहा , ‘ ट्रेन स्टेशन के पास वाजिब किराए वाला घर मिलने की कठिनाई मैं जानता हूँ।  ऐसा घर मिलने पर छोड़ना नहीं चाहिए।  लेकिन ये तुम दोनों का निजी मामला है।  शायद मुझे कहीं और बैठना चाहिए।’ रेस्त्रां बारिश की वजह से पहले से भी अधिक भर गया था।  लोग जहाँ-तहाँ खड़े हो कर खा रहे थे।

‘बिलकुल नहीं,’ लड़की ने कहा, ‘वैसे भी कुछ निजी नहीं रहा, सब कुछ फ़ैमिली कोर्ट में फ़ाइल हुआ है।’

आदमी ने गहरी सांस ली।  ‘धानी के दिमाग़ में कुछ बैठ जाए बस…’

‘मेंढक मेरे दिमाग़ में बैठे थे?’ लड़की ने चाय का सकोरा मेज़ पर रख दिया और मेरी ओर मुड़ी।  ‘ मैं मेंढ़कों वाली पूरी बात बता सकती हूँ, फिर तुम खुद ही निर्णय कर लेना। ‘

आदमी ने अपनी बाँह सीट की पुश्त पर फैलाई और पीठ ढील दी।  ‘धानी , हो सकता है इसे जाने की जल्दी हो। ‘

‘इस धुआँधार बारिश में कौन जा सकता है? और मुझे तुम जल्दी में नहीं दिख रहे। या हो?’ लड़की ने गर्दन तिरछी कर पूछा।

‘नहीं ,’ मैंने कहा, ‘मुझे जल्दी नहीं। ‘ इस बेतरह बारिश में मैं बाहर निकलने वाला नहीं था। इसका ठोस कारण था। मैंने लैब में काम करने के शुरूआती  महीनों में ही सीख लिया था कि अपनी सेहत का ध्यान रखना कितना ज़रूरी है। लैब के नियम बहुत कड़े हैं। लैब में आने वाले ज़्यादातर मरीज़ बड़ी उम्र के हैं और टैक्नीशियन को ज़रा सी खांसी ज़ुकाम हो तो तुरंत लैब से हटा कर फैक्ट्री ड्यूटी, माने जिस फैक्ट्री में हियरिंग एड बनते हैं वहाँ उन्हें जांचने और क्वालिटी कंट्रोल का काम। गड्ढों और ट्रकों से भरी सड़क पर दो घंटे आने-जाने का सफ़र और  कारखाने में आठ घंटे लगातार खड़े रह कर मशीनें टेस्ट करना।  इससे बेहतर है बारिश और ठण्ड से बच कर रहना।

‘ऐसी लम्बी-चौड़ी बात है भी नहीं कि घंटों लग जाएँ बताने में, ‘ लड़की ने कहा , ‘साल भर पहले की ही बात है जब हम पूना छोड़ कर बॉम्बे आए थे।  मैं हमेशा से पूना में रही, मम्मी-पापा, भाई बहन, दोस्त सब वहीं। ‘

‘लेकिन तुम्हें पूना ख़ास पसंद कब था?’ आदमी बोल उठा, ‘तुम तो हमेशा कहती  थीं – छोटा शहर, सब कुछ सीमित, संकीर्ण।  बल्कि तुम तो ऑस्ट्रेलिया जाना चाहती थीं।  ऑस्ट्रेलिया के मुक़ाबले तो मुंबई कहीं पास है। ‘

‘ऑस्ट्रेलिया साल भर को जाना था पढ़ने के लिए लेकिन तुम पीछे हट गए।’

‘तब हमारी शादी नहीं हुई थी, धानी। नौकरी करते छः महीने हुए थे। काम सीख रहे थे, पैसे भी कहाँ थे हमारे पास…’

‘काम सीखना यानी हॉंग कॉंग , सिंगापुर की बिल्डिगों की नक़ल पर नक़्शे खींचना। ‘ उसने मेरी ओर नज़र डाली , ‘ तुम्हें पूना में जो सबसे चमकती-दमकती और भद्दी इमारत दिखे, जान लो कि वह हमने ही डिज़ाइन की है।  हमने ग्रीन डिज़ाइन और नैचुरल लाइंस और लोकल मटीरियल के विषय में पढ़ा था और सादा, पश्चिमी घाटों के लैंडस्केप से घुलती -मिलती इमारतों के प्रोजेक्ट बनाए थे और अंत में बनाया क्या ? काँच और प्री -फ़ैब कंक्रीट की बिल्डिंगे जिन्हें गर्मियों में ठंडा और सर्दियों में गर्म रखने के लिए बिजली फूँकनी पड़े। ‘

‘हमारी बनाई बिल्डिंगों की माँग है, उनकी उपयोगिता है। पूना में जितना काम किया हमने, बढ़िया किया। मुझे तो अफ़सोस ये है कि बहुत से अच्छे नक़्शों पर काम आगे नहीं बढ़ा। साइट-सर्वे, ब्लू-प्रिंट, ऑटोकैड पर नक़्शे – सब पर मेहनत करो लेकिन कोई अड़चन आ जाए, फ़ाइनैंसिंग की समस्या या कोई बिल्डिंग परमिशन नहीं, और बस, क्लाइंट की ओर से सन्नाटा और बिल्डिंग रद्द। ।  ‘

‘वही एक बात तो अच्छी हुई। अगर हमारे खींचे सब खाके इमारतों में बदल गए होते तो शहर और भी ज़्यादा कुरूप होता।  ‘

‘धानी की बातों से तुम यह नहीं सोच लेना कि हमने बुरा काम किया।’ आदमी मुझसे मुखातिब हुआ। ‘ये इसी तरह की इम्प्रेक्टिकल बातें करती है। हम अच्छे आर्किटेक्ट हैं। ‘

‘हम अच्छे आर्किटेक्ट हैं जो बुरी बिल्डिंगे बनाते हैं। ‘

‘तुम्हें धानी की बात को ज़्यादा तवज्जह नहीं देनी चाहिए।‘ आदमी अब भी मेरी ओर देख रहा था।  ‘अच्छे काम के कारण ही हमें मुंबई की बड़ी फ़र्म से ऑफ़र मिला।’

‘तुम्हे ऑफ़र मिला क्योंकि दोस्तों के साथ पार्टनरशिप वाला प्लान बीच में छोड़ कर तुमने नौकरी के लिए अप्लाई किया।’

‘मैंने अप्लाई करने से पहले तुम्हें बताया था, धानी। हमने कॉलेज में इतनी मेहनत इसलिए नहीं की थी कि एक छोटे से शहर में एक छोटी सी प्रैक्टिस जमाने में ज़िंदगी बिता दें। ‘

‘खैर,’ लड़की ने नैप्किन से अपनी अंगुलियाँ पौंछी, ‘हम बॉम्बे आ गए और रहने के लिए घर ढूँढने लगे।  एक ठीक-ठाक घर मिल भी गया। ‘

‘ठीक-ठाक? एकदम परफ़ेक्ट।  मेरे दफ्तर और ट्रेन स्टेशन के नज़दीक, बाज़ार और मंदिर बग़ल में। मकान मालिक भी बहुत डीसेंट आदमी, डिपॉज़िट भी नहीं माँगा। ‘

‘डिपॉज़िट तो इसलिए नहीं माँगा क्योकि तुमने उसकी बेटी को पढ़ाने लिए मुझे आगे कर दिया था।’

‘उसमें बुराई क्या थी, धानी? रिया नए शहर में तुम्हारे लिए अच्छी कम्पनी थी और तुम तो कॉलेज में भी जूनियर बैच को आर्ट और डिज़ाइन पढ़ाती थीं। ‘

‘क्योंकि वो पढ़ना चाहते थे, ऐसा नहीं कि तुम अन्तोनिओ गौडी की बात करो और सामने वाला कहे – नीले कुर्ते के साथ लाल नेलपॉलिश क्यों?’

‘तुम को तो बस बढ़ा – चढ़ा कर बोलने की आदत है। रिया ऐसी नहीं है। ‘

‘तो कैसी है? तुम्हीं बता दो। ‘

आदमी का चेहरा सुर्ख़ पड़ गया।  ‘मैं ये नहीं कह रहा कि वो बहुत होशियार है… ‘

लड़की मेरी ओर मुड़ी।  ‘उस घर में हमें कुछ महीने हो गए थे, एक सुबह मैं बाथरूम में दाख़िल हुई तो एक कोने में कुछ हरक़त लगी।  पहले मुझे लगा कि शायद भ्रम हुआ हो , नींद से जागने पर कभी कभी आँखें कुछ-का-कुछ देखती हैं, जैसे विचित्र रंग या लरजन, नहीं?’

मैंने गर्दन हिलाई । हालाँकि मैं आँखों के बारे में नहीं जानता लेकिन कानों को आवाज़ों का भ्रम हो जाता है। कान ऐसी आवाज़ें सुन लेते हैं जो होती ही नहीं। हमारे लैब में मरीज़ घंटी जैसी तीखी आवाज़ की शिकायत करते हैं जबकि ऑडियो लैब में एकदम सन्नाटा होता हैं। अगर कानों को भ्रम हो सकता है तो आँखों को क्यों नहीं ?

‘लाइट जला कर देखा तो एक मेढ़क था, सिक्के जितना छोटा और रंग ऐसा मटमैला-सुनहरा कि दीवार और फर्श में घुल-मिल जाए और लगे कि कुछ है ही नहीं। फिर ध्यान से देखा तो एक नहीं, कई मेंढक थें, कोने-अंतरों में, दीवार से सटे, साबुन-तेल के आले में, हर जगह।  एक बार आँखें उन्हें देखने की अभ्यस्त हो गईं तो वे सब जगह दिखाई पड़ने लगे, पूरे घर में, कमरे, हॉल, रसोई सब कहीं।  उतारे हुए जूते, सिंक में रखे बर्तन, तहाए हुए कपडे, वो हर जगह थे। शायद हमेशा से ही थे, बस मैंने ग़ौर से देखा नहीं था। ‘

‘मानसून में मेंढक निकलना आम बात है,’ मैंने कहा, ‘खासकर अगर घर के आस-पास हरियाली हो। ‘

‘वो जाड़ों का मौसम था और हमारी बिल्डिंग के चारों तरफ सीमेंट का अहाता था, नक़ली घास बॉर्डर और गमलों में प्लास्टिक के पौधे। हरा पेड़ देखने के लिए ट्रेन से घंटा भर का सफ़र करना पड़े!’

‘वो एक नई, साफ़ -सुथरी बिल्डिंग थी,’ आदमी कोतम्बीर वड़े के टुकड़े इकट्ठे कर रहा था, ‘हमसे पहले किसी को ऐसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा था। मक़ान मालिक ने दवाई छिड़कवाई  लेकिन एक भी मेंढक नहीं मरा।’

‘वे मरने वाले मेंढक थे ही नहीं।’ लड़की ने कंधे उचकाए।  ‘मुझे मेंढकों से परेशानी नहीं थी, बस चौकन्ने रहने से थी, हमेशा चौकन्ना रहना बहुत थकाने वाला होता है…’

‘मैं तो उन मेंढकों के ज़िक्र से थक गया था,’ आदमी ने गहरी सांस ली, ‘जो मिलता, पहला सवाल करता कि मेंढकों की प्रॉब्लम सॉल्व हुई क्या? घर-बाहर सब जगह मेंढकों की प्रॉब्लम साथ चिपकी रहती।  मेरे लिए कहीं भी रिलैक्स कर पाना मुश्किल हो गया था। ‘

मैं उनकी बात समझ पा रहा था। पूना में जहाँ मेरी पहली नौकरी लगी थी, वहाँ मुझे भी ऐसा ही कुछ अनुभव हुआ था, यानी मेंढक वग़ैरह नहीं लेकिन मैं भी वहाँ निश्चिंततता महसूस नहीं कर पाता था।  हालांकि नौकरी में कोई बुराई नहीं थी –  तनख़्वाह ठीक-ठाक, साथ काम करने वाले भी।  जिस डॉक्टर के साथ काम करता था, वह भी भला आदमी था लेकिन बस बोलने में थोड़ा तुतलाता था, ‘स’ और ‘श ‘ की ध्वनियाँ उसके मुंह से एक विचित्र सिसकार के साथ निकलती थीं।  जब भी बोलता, उसका फुसफुसाता स्वर साँप की फूत्कार सा सरसराता था।  ऑडिओमेट्री वाले कमरे के सन्नाटे में  काम करते हुए जब वो सहसा कोई निर्देश देता तो देह में बिजली  का करंट जैसा लगता। मैं सारा वक़्त चौकन्ना रहने लगा , गर्दन साधे, कंधे अकड़ाए।  शाम को घर लौटता तो शरीर के बल खोलना मुश्किल होता आखिर मुझे वह नौकरी छोड़नी पड़ी।  मैं यह नहीं कह रहा कि उस डॉक्टर की सिसकार और घर में सिक्के जितने छोटे मेंढक भर जाने में कोई समानता है, बस इतना भर कहना चाहता हूँ कि जिस तरह की परेशानी और असुविधा की वे बात कर रहे थे, वह मैंने झेली है।  ‘मैं समझ सकता हूँ। ‘ मैंने उन्हें तसल्ली दी।

‘मैं भी। ‘ लड़की ने कहा।

आदमी की उलझन भरी आँखें लड़की पर टिक गईं।  वह उसकी ओर झुक आया।  उसके हाथ लड़की के हाथों पर मँडराए।  ‘तुम समझती हो, धानी? वाक़ई? फिर ये सब क्या…?’

लड़की ने अपने कन्धे झटके, शरीर ताना और उठ खड़ी हुई। ‘चलो, बारिश रुक गई है।“

‘लेकिन… ‘

‘हमें कोर्ट के लिए देर हो रही है।’

आदमी भूला सा उठा।

‘माफ़ करना,’ मैं अपनी जिज्ञासा दबा नहीं पाया.

उन दोनों ने मेरी और देखा।

‘क्या तुम जानते हो कि उन मेंढकों का क्या हुआ? उनसे छुटकारा मिला या वे अब भी उस घर में हर कमरे में भरे हैं ?’

एक क्षण की चुप्पी के बाद लड़की ने कहा, ‘नहीं, हम नहीं जानते ।’

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