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  • कथा-कहानी
  • इरशाद ख़ान सिकंदर की कहानी ‘अनासिर में ज़हूरे-तरतीब’

    इरशाद ख़ान सिकन्दर शायर हैं, आजकल उनके नाटकों की धूम मची हुई है। वे बहुत अच्छे क़िस्सागो भी हैं। यक़ीन न हो तो यह कहानी पढ़िए- मॉडरेटर

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    नेटवर्क की समस्या के कारण बात करते-करते हनी बालकनी की तरफ़ आ गयी तभी सामने वाले घर से किसी प्रौढ़ महिला की आवाज़ सुनायी पड़ी।
    ‘’पहले प्याज़ छीलकर काट लो बारीक-बारीक, उसके बाद लाल होने तक भून लेना’’। और एक बुज़ुर्ग आकृति इधर-उधर डोलने लगी।
    हनी ने आकृति की तरफ़ ध्यान न देते हुए अपनी बात जारी रखी।
    ‘’सब मर्द साले एक से होते हैं। अनाड़ी नहीं हूँ मैं। और सुन!  तू ना ज़्यादा तरफ़दारी मत कर उसकी..फ़ोन रख रही हूँ…फ़ोन.. रख रही हूँ मैं ।’’ हनी ने ज़रा ऊँची आवाज़ में आख़िरी एक-एक शब्द चबाते हुए वाक्य दोहराया और कॉल डिसकनेक्ट करते हुए तेज़ी से अंदर आकर मोबाइल बेड पर फ़ेंक दिया।
    मोबाइल फिर बज उठा ‘’ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़हूरे-तरतीब…’’
    हनी ने मोबाइल उठाकर उसका गला घोंट दिया और कमरे में बेतरतीब पड़ी किताबों को तरतीब से रखने के विषय में सोचने लगी। मंटो, मीर, टैगोर, प्रेमचन्द, काफ़्का, गोर्की, टॉलस्टॉय सब के सब मानो हनी के चेहरे की ओर देख रहे थे तभी दीवार पर अपनी जगह पा चुकी मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी की तस्वीर मुस्कुराते हुए बोल उठी-‘’औरत की ज़बान और मर्द की आँखों का दम सबसे आख़िर में निकलता है’’। हनी भी मुस्कुरा उठी।
    आज इस कमरे में शिफ़्ट हुए एक सप्ताह होने को आया लेकिन सामान अभी पूरी तरह व्यवस्थित नहीं हो पाया है। अकेली जान क्या-क्या करे दफ़्तर का बोझ कन्धों पर सवार होकर घर तक भी पहुँच आता है। लैपटॉप टेबल पर अपनी तशरीफ़ टिकाये बॉस की तरह उसे घूर रहा है। ऊपर से हनी की सबसे प्यारी दोस्त रिद्धि जिसे आकर इस वक़्त उसकी कुछ मदद करनी चाहिए तो वो भी फ़ोन करके ज़ीशान की तरफ़दारी में लगी हुई है।
    हाँ किसी वक़्त ऐसा हुआ था जब लड़कों के उसकी तरफ़ आकर्षित होने को लेकर रिद्धि के छेड़ने पर मज़ाक़-मज़ाक़ में हनी ने कह दिया था कि ‘’मैं हनी हूँ! मेरी तरफ़ चींटे तो आयेंगे ही’’ तो क्या कॉलेज के उस मज़ाहिया जुमले को आज की परिस्थित में कटाक्ष की तरह इस्तेमाल करना उचित है? कमीनी कहती है ‘’घड़ी साबुन के स्लोगन का अर्थ समझ और पहले इस्तिमाल करो फिर विश्वास करो की नीति अपना’’। सही कहा है किसी ने ‘औरतें ही औरतों की सबसे बड़ी दुश्मन होती हैं’ और औरत अगर बेस्ट फ़्रेंड हो तो ख़ुदा की पनाह! अब चाहे कुछ भी हो जाए साला अपनी ज़िंदगी में हनी किसी सूरत ज़ीशान फीशान किसी भी मर्द की इंट्री नहीं होने देगी..।
    वो कोई मर्द के रहमो-करम पर जीवन जीने वाली अबला नहीं है, वो समय की आँखों में आँखें डालकर हर मुश्किल का सीना चाक कर देने वाली आज की पढ़ी-लिखी और अपने पैरों पर खड़ी स्त्री है। उसने अभी-अभी ही तो एक मर्द से मुक्ति पाई है। मर्द भी कौन? जिसे समाज ने सात फेरों के साथ सात जन्मों के लिए उसके पल्लू से बाँध दिया था लेकिन वो बंधन इतना कमज़ोर निकला कि सात महीने भी न टिक सका।
    परम आदरणीय पतिदेव किसी और के मोह-पाश में बँधे थे, और वो बंधन इतना मज़बूत था कि सात फेरों वाले बंधन की उसके आगे कोई हैसियत न थी। ऐसे में हनी के आगे चारा भी क्या था वो कोई खूँटे से बँधी गाय तो थी नहीं जो रूखा-सूखा खाकर एक कोने में पड़ी रहती सो उसने बग़ावती निर्णय लिया जो कि ऐसी परिस्थित में हर लड़की को ले ही लेना चाहिए अब इसमें जिस किसी की भी नाक कटती हो कटती रहे उसकी बला से!
    रिद्धि को तो सब पता है फिर भी दुष्ट ज़ख़्मों पर नमक छिड़कने के लिए रोज़ नये-नये प्रेम प्रस्ताव लेकर हाज़िर हो जाती है। न जाने उसे क्या मज़ा आता है हरकारा बनने में! ज़ीशान इतना ही अच्छा है तो ख़ुद क्यों नहीं पहले इस्तेमाल करती…! अपनी शरारत भरी सोच से हनी ख़ुद लजा सी गयी और उसके औरतपन की महक पूरे कमरे में फैल गयी उसने अपने जिस्म को बिस्तर पर लगभग फ़ेंक दिया। सामने की दीवार पर मोनालिसा की पेंटिंग मुस्कुरा रही थी। सामने वाले फ़्लैट से उसी प्रौढ़ महिला की आवाज़ आ रही थी।
    ‘’प्याज़ बराबर चलाते रहना देखो जलने न पाए..’’।

    अभी तो तीस बसंत भी नहीं देखे हनी ने लेकिन इसी उम्र में क्या-क्या देख लिया। इन मम्मी-पापाओं का भी कुछ समझ नहीं आता कि ऐसा क्यों करते हैं? लड़की के अभी दूध के दांत टूटे नहीं कि ब्याहने की जल्दी लग जाती है और अगर किसी कारण रिश्ता निभ नहीं पाया तो चारों तरफ़ से दोषी केवल लड़की। अच्छा-ख़ासा जर्नलिज़म करने के बाद पत्रकार बन रही थी। इंटर्न हो चुका था इतने बड़े चैनेल में नौकरी लगभग पक्की हो गयी थी लेकिन उसी बीच शादी पक्की करके सब गुड़-गोबर कर दिया। ग़लती हनी की भी थी जो घरवालों की बातों में आ गयी ।
    “अच्छी फ़ेमिली है करोड़ों का कारोबार है”।
    “उनके आगे तो हम कुछ भी नहीं फिर भी उन्होंने तुझे पसंद किया है वो भी बिना किसी डिमांड के। तू भी तो कहती थी कि दहेज़ न लेने वाले व्यक्ति से ही शादी करेगी। ले तेरे मुँह की बात पूरी हो गयी रिश्ता ख़ुद चलकर आया है“।
    “नौकरी का क्या है आख़िर अपने सुख-सुविधाओं के लिए ही तो लोग नौकरी करते हैं वो तो भगवान की दया से तुझे यूँ ही मिल रहा है’’।
    उस वक़्त हनी आख़िर क्यों नहीं समझा पायी कि जर्नलिज़म मेरा पैशन है जूनून है सुकून है? शादी में कोई बुराई नहीं लेकिन क्यों ससुराल पक्ष शादी के बाद बहू के नौकरी करने के पक्ष में नहीं था और इस बात पर सब सहमत भी हो गये यहाँ तक कि ख़ुद हनी भी? यही करना था तो इतनी पढ़ाई-लिखाई का क्या फ़ायदा? तो क्या उस वक़्त धन-सम्पदा की चमक-दमक ने उसकी अक्ल पर पर्दा डाल दिया था?
    उस वक़्त रिद्धि ने समझाया भी था कि शादी-वादी ठीक है लेकिन नौकरी अपने हाथ में रख। लेकिन कहाँ मानी थी वो। रिद्धि और हनी दोनों को एक साथ ऑपर्चुनिटी मिली थी लेकिन लाभ उठाया केवल रिद्धि ने। रिद्धि ने नौकरी को चुना और हनी ने शादी को।
    ख़ैर अब शादी तो गयी भाड़ में शुक्र है इस कठिन परिस्थिति में जबकि उसके मम्मी-पापा भी उससे ख़फ़ा थे, रिद्धि के रेफ़रेंस से उसे ये जॉब मिल गयी थी।
    चैनल अभी छोटा था काम अधिक था और सैलेरी कम थी लेकिन तेज़ आँधी में दिये का इतना जलना भी ग़नीमत है।
    ये सब तो अपनी जगह है लेकिन ये कमबख़्त ज़ीशान को मुझमें क्यों दिलचस्पी जागी है? कॉलेज के दिनों में तो कभी कहा नहीं अब जनाब प्रेम बंदूक़ चला रहे हैं वो भी रिद्धि के कंधे पर रखकर। दब्बू कहीं का अगर इतना ही प्यार है तो आकर ख़ुद इज़हार क्यों नहीं करता?

    ‘’ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़हूरे-तरतीब..’’ मोबाइल की आवाज़ ने अपने ध्यान में खोयी हनी का ध्यान भंग किया। मम्मी का फ़ोन था उसका जी नहीं चाहा कि फ़ोन उठाये क्या मालूम फिर कोई शादी का प्रस्ताव आ गया हो।
    फ़ोन बजता रहा और वो बालकनी में बैठी चाय पीती रही।
    ‘’पानी थोड़ा सा गुनगुना कर लो फिर बेसन घोलना और घोलकर कुछ देर के लिए रख देना…..’’। सामने वाले फ़्लैट से फिर उसी प्रौढ़ महिला की आवाज़ सुनायी पड़ी। इस बार हनी ने ग़ौर किया तो पाया कि ये प्रौढ़ आवाज़ वो रोज़ सुबह-शाम सुनती है और हमेशा इसी तरह हुक्म देते हुए-
    मछली तल ली? मिर्ची काटकर डालना, सरसों के तेल से बघार लगाना, हींग का तड़का देना आदि-आदि और एक बुज़ुर्ग अंकल ख़ामोशी से हुक्म बजाते रहते हैं।
    यहाँ तक कि गमलों में पानी डालते हुए जेंट्स कपड़ों के साथ महिला वस्त्र भी बालकनी की रस्सी पर फैलाते हुए हर बार अंकल ही दिखे हैं। क्या ये इस घर के मुलाज़िम हैं? लगते तो नहीं हैं।
    ‘’ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़हूरे-तरतीब…’’ । फ़ोन फिर बज उठा और हनी का ध्यान बुज़ुर्ग अंकल से हटकर फ़ोन की स्क्रीन पर पहुँच गया। बॉस का फ़ोन था उसने घड़ी देखी और बात करते-करते ऑफ़िस जाने की तैयारी भी करने  लगी।

    रविवार की सुबह कामकाजी महिलाओं के लिए अक्सर नींद में डूबी होती है लेकिन हनी रविवार को पार्क में जाकर पसीना बहाना पसंद करती है क्योंकि बाक़ी दिनों में ऑफ़िस के कारण उसे एक्सरसाइज़ का मौक़ा ही नहीं मिल पाता।
    पार्क में गोल-गोल चक्कर काटते हुए पाँच किलोमीटर की वाक के बाद थककर चूर हनी ज़रा सुस्ताने की ग़रज़ से बेंच की तरफ़ बढ़ी तो देखा एक बेंच पर वही सामने वाले फ़्लैट के बुज़ुर्ग अंकल बैठे अख़बार पढ़ रहे थे।
    हनी यूँ ही बेग़रज़ उनके पास पहुँची और उन्हें दोनों हाथ जोड़कर नमस्ते किया।
    “नमस्ते..नमस्ते बैठो बेटा”। अंकल ने इतनी मुहब्बत और उत्साह से नमस्ते का जवाब दिया जैसे उसे बरसों से जानते हों। हनी बेंच के दूसरे सिरे पर बैठ गयी।  
    “तुम्हें यहाँ पहले कभी नहीं देखा…?” अंकल ने प्रश्नवाचक शैली में कहा।
    “जी अंकल मैं अभी पिछले हफ़्ते ही शिफ़्ट हुई हूँ। ठीक आपके सामने वाले फ़्लैट में रहती हूँ”।
    “अच्छा अच्छा वो गुप्ता जी वाले फ़्लैट में? हाँ लगा तो था कोई आया है लेकिन अब आँखें इतनी बूढ़ी हो चली हैं कि दूर का कुछ भी साफ़ सुझाई ही नहीं देता”।
    हनी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या बात करे। तभी अनचाहे ही उसने कहा।
    “अंकल एक बात पूछूँ?”
    “ज़रूर ज़रूर एक क्या सौ पूछो।”
    “मैंने देखा है हमेशा आप ही किचन में…. ।” हनी की बात पूरी होने से पहले ही अंकल ठहाका मारकर बड़ी ज़ोर से हँसे। हनी ने देखा सामने से एक भारी बदन की प्रौढ़ महिला हाँफते-डाँफते हुए चली आ रही हैं उनकी चाल से लग रहा था कि उनके घुटनों में शदीद तकलीफ़ है।
    “क्या हुआ क्यों ठठा रहे हैं?” हनी ने आवाज़ से पहचाना कि ये वही प्रौढ़ महिला हैं जिनकी अबतक उसने सिर्फ़ आवाज़ ही सुनी थी।
    “देखो ये तुम्हारी पोती क्या पूछ रही है? गुप्ता जी वाले फ़्लैट में आयी है तुम्हारे सब कारनामे देखती रहती है”।
    “नहीं अंकल मैं तो बस ऐसे ही…”।
    “क्या पूछ रही है…?” कहते हुए आंटी बेंच के बीच में बैठने लगीं अंकल अख़बार रखकर उनको बैठने में मदद करने लगे।
    हनी को लगा कि शायद उसका सवाल बेतुका था उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था। आंटी की साँसे ज़रा नियंत्रित हुईं तो अंकल ने फिर कमान सँभाल ली।
    “ये पूछ रही है कि तुम आख़िर मुझपर इतना रौब क्यों जमाती रहती हो? जब देखो तब किचन में ये बनाओ वो बनाओ..”। अंकल ने हनी की तरफ़ देखकर मुस्कुराते हुए कहा तो हनी का मन भी गुदगुदा उठा। आंटी ज़ेरे-लब मुस्कुराईं।
    “बुढ़ापा आ गया लेकिन खिलंदड़पन छूटा नहीं तुम्हारा….” । फिर हनी से मुख़ातिब होते हुए बोलीं-
    “बेटा बुरा मत मानना इनकी बात का…।”
    “अरे नहीं आंटी ऐसा कुछ नहीं है दरअसल…।” लेकिन आंटी को हनी की बात सुननी ही नहीं थी वो अपनी रौ में बहती रहीं।
    “…बड़े चटोरे हैं तेरे अंकल जीवन भर तरह-तरह के पकवान बनाकर खिलाती आयी हूँ लेकिन अब कौन खिलायेगा? तीन महीने का वक़्त दिया है मुए डाक्टरों ने। मरने से पहले-पहले मास्टर शेफ़ बनाना है तेरे अंकल को।”
    “हुआ क्या है आपको?” हनी ने बुझी सी आवाज़ में पूछा।
    “कैंसर…।” आंटी के इस एक शब्द ने हनी के मन को झकझोर दिया उसने दुखी स्वर में कहा-
    “ओह…सॉरी आंटी।“
    “किस बात के लिए सॉरी? अरे तू क्यों दुखी हो रही है मुझे देख क्या मैं तुझे दुखी लग रही हूँ। बेटा मेरा तो हमेशा से यही मानना रहा है कि जीवन और मृत्यु दोनों को भरपूर इंजॉय करना चाहिए। मैंने तो अपनी अंतिम यात्रा के लिए सामान की पूरी लिस्ट लिखकर तेरे अंकल को दी है उसमें अपनी पसंद की साड़ी मंगलसूत्र चूड़ी कंगन काजल बिंदी सिन्दूर सब शामिल हैं और रजनीगंधा के फूल भी, मुझे रजनीगंधा बहुत पसंद है ना इसीलिए…।”
    आंटी बोले जा रही थीं और हनी अवाक सी उन्हें सुन रही थी उसे अपनी आँखों और कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था वो मन ही मन कह रही थी सलाम है आंटी आपको।
    “….और मेरे मेहमानों की एक अलग लिस्ट है, मैं चाहती हूँ सब आएँ और धूम-धाम से नाचते-गाते मुझे विदा करें….।”
    और कुछ देर बाद अंकल आंटी दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे घर की तरफ़ चल दिए। जाते-जाते आंटी ने मुड़कर कहा-
    “तुम भी ज़रूर आना बेटी।”
    हनी दोनों लोगों को जाते हुए देखती रही। आंटी नज़रों से ओझल हो गयी थीं लकिन चित से उतर ही नहीं रही थीं।
    “ज़िंदगी क्या है अनासिर ज़हूरे-तरतीब… ।” अंततः मोबाइल की कॉलरट्यून ने उसका ध्यान भंग किया।      

    आज रविवार है। रौशनदान से धूप की बौछार इस तरह कमरे की दीवार पर गिर रही है जैसे पम्पिंग सेट का पानी ज़मीन पर गिरता है। रात में अधिक देर तक काम करने के कारण हनी की नींद ही नहीं खुली दस बज चुके हैं अब तो पार्क में धूप इतनी तेज़ हो चुकी होगी कि स्किन जलने लगेगी। हनी ने सोचा छोडो यार सोते हैं लेकिन उसे कालोनी में कुछ शोर-शराबा सा सुनायी दिया उसकी तन्द्रा टूट गयी वो बिस्तर से उठी और बालों का जूड़ा बनाते हुए बालकनी से झाँककर नीचे देखा उसका कलेजा धक से हो गया- 
    अंकल वाले फ़्लैट के नीचे सफ़ेद टेंट लगा था और ज़मीन पर सफ़ेद चादर से ढँकी डेडबॉडी रखी थी। हनी को आंटी का कहा वो वाक्य याद आया “तुम भी ज़रूर आना बेटी।”
    कुछ देर बाद हनी ऑटो लेकर शहर में फूलों की दुकान छान रही थी कई दुकान देखने के बाद उसे एक जगह रजनीगंधा के फूल मिले उसने फूल लिए और कॉलोनी की तरफ़ बढ़ गयी ।

    टेंट के नीचे और इर्द-गिर्द बहुत से पुरुष थे जिनमें कुछ बैठे थे तो कुछ खड़े, नीचे बिछी दरी पर कुछ महिलायें आँचल से मुँह दबाये बैठी सुबक रही थीं।
    हनी की नज़रें अंकल को ढूँढ रही थीं वो और किसी को नहीं जानती थी उसने पहले कभी ऐसी परिस्थिति सामना भी नहीं किया था इसलिए वो समझ नहीं पा रही थी कि उसे क्या करना चाहिए। कुछ देर सोचने के बाद वो आगे बढ़ी और डेडबॉडी के पैरों की तरफ़ पहले फूल रखे फिर दोनों हाथ जोड़कर आँखें बंद करके प्रार्थना करने लगी। जब आँखें खोलीं तो अपने कंधे पर एक झुर्रियों भरा हाथ पाया। उसने पलटकर हाथ का चेहरा देखा।
    “ये फूल तेरे अंकल को नहीं मुझे पसंद थे बेटी… ।” इतना कहकर वो आवाज़ लड़खड़ा गयी।
    “ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़हूरे-तरतीब…. ।” हनी ने झुँझलाकर मोबाइल स्विच ऑफ़ कर दिया।

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    लेखक परिचय
    नाम- इरशाद ख़ान ‘सिकन्दर’

    जन्म- 8 अगस्त 1983 (उत्तर प्रदेश के सन्त कबीर नगर ज़िले में)
    प्रकाशित कृति – आँसुओं का तर्जुमा (ग़ज़ल संग्रह) दूसरा इश्क़ (ग़ज़ल संग्रह)
    जौन एलिया का जिन (नाटक) एवं देश की तमाम पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित
    सम्प्रति-  सिनेमा,टेलिविज़न और रेडियो के लिए लेखन कार्य 
    संपर्क-    हाउस नम्बर- 209 G, 2nd फ़्लोर श्याम टॉवर के पास, पटपड़ गंज गाँव मयूर विहार फ़ेज़-1 दिल्ली -110091
     मोबाइल – 9818354784
    ई संपर्क –  ik.sikandar@gmail.com
          
     
             

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