सीमा भारद्वाज की कहानी ‘चदरिया झीनी रे झीनी’

आज पढ़िए सीमा भारद्वाज की कहानी, ट्विटर पर जौनसी नाम से ट्विटर हैंडल चलाती हैं, जो शेर-शायरी के दीवानों के बीच बहुत लोकप्रिय है। आज उनकी एक छोटी सी कहानी पढ़िए-

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रेखा रामफूल, राजकुमारी शेरसिंह, प्रीति जयनारायण केंद्रीय कन्या विद्यालय की पाँचवी क्लास की क्लास टीचर मूर्ति मैडम नाम पुकारती गयी और आख़िरी नाम तक पहुँची। अटेंडेंस लेते हुए रोज़ाना आख़िरी नाम पूनम रामधन का होता था। आज यानी 20 अगस्त 1991, दिन सोमवार रहा होगा, सोमवार ही था,  पूनम रामधन स्कूल नहीं आई थी ।
दिन बीता। कहीं से ख़बर फैली की पूनम ने ख़ुदकुशी कर ली है! ये शब्द पहली दफ़ा कान में पड़ा था। “इत्ती सी उम्र में कौन ख़ुदकुशी करता है कोई हादसा हुआ होगा” विमला मैडम, मूर्ति मैडम को कह रही थी। आम तमाम तरह की अटकलें लगने लगी, छुट्टी होते होते सब जगह अजीब सा शोरगुल था। इंसान जितने जतन और तेज़ी से ग़लत बातें सोचता है अगर सही बातें सोचने लगे तो धरती स्वर्ग हो जाए ! पूनम क्लास में सबसे बड़ी थी हम बाक़ी लड़कियों से, यही क़रीब चार या पाँच साल बड़ी। मैं 10 साल की थी उस वक़्त! शायद देर से स्कूल जॉइन किया था उसने। पढ़ने में बहुत होशियार नहीं थी लेकिन सादगी और सीधेपन में अव्वल। लम्बी, साँवली, प्यारी सी, मुझे तो उसके बाल बहुत ही अच्छे लगते थे, ये एक हाथ जितनी लम्बी चोटी होती थी उसके बालों की। क्लास की सफ़ाई भी जमके करती थी! यूँ तो मूर्ति मैडम बहुत प्यार करती थी हम सबसे लेकिन कभी कभी मुझे वह ज़हर लगती थी क्योंकि वो पूनम से ढेर सारा काम कराती थी। पूनम के पापा यानी रामधन अंकल मटके और दिये बनाते थे यानी पेशे और जाति  से कुम्हार। बाबा ने मनु स्मृति पढ़ाते हुए एक बार बताया था कि पहले काम के आधार पर जात होती थी न कि जन्म के आधार पर। ख़ैर! मुझे तब भी समझ नहीं आता था और अब भी समझ में नहीं आता कि मेरे पापा जो स्वस्तिक और ॐ बनाते हैं वो एक मटके बनाने वाले से कैसे ऊपर हुए, जबकि स्वस्तिक और ॐ तो किसी काम भी नहीं आते और कोई भी ख़ुद से बना सकता है! लेकिन मटके, सुराही और दिये तो सबके कितने काम आते थे और फिर गाँव में बस वही बना सकते थे। मेरे पापा और रामधन अंकल दोस्त थे, साथ में वॉलीबाल भी खेला करते थे! उस रात पापा माँ को बता रहे थे कि ‘किसी ने पूनम को ख़राब कर दिया’ यानी उसकी इज़्ज़त को तार तार कर दिया। मुझे याद आया वो अपनी चुन्नी को कभी इज़्ज़त तो कभी लाजवंती कहती थी। यानी  उसकी चुन्नी को फाड़ दिया था किसी ने। उस की दादी ने उसे गेंहू में डालने वाली चूहे मारने की दवा पिला दी! पापा माँ को कह रहे थे “वो अपने बाप को नँगा कर गयी!” और मैं सोच रही थी, अच्छा! उसने अपने पापा के कपड़े ले लिए होंगे तो दादी ने ऐसा किया क्योंकि उस बेचारी के लत्ते कभी कहीं से तो कभी कहीं से फटे होते थे ! अब उसे स्कूल आने के लिए साबुत कपड़े तो चाहिए ही होंगे, तो ले लिए होंगे… बेचारी! नीचे पौली में बाबा ने कबीर का भजन अपने ट्रांजिस्टर में चला दिया!

चदरिया झीनी रे झीनी

अष्ट-कमल का चरखा बनाया,
पांच तत्व की पूनी ।
नौ-दस मास बुनन को लागे,
मूरख मैली किन्ही,
चदरिया झीनी रे झीनी.

चादर ओढ़ शंका मत करियो,
ये दो दिन तुमको दीन्हि,
मूरख लोग भेद नहीं जाने,
दिन-दिन मैली कीन्हि,
चदरिया झीनी रे झीनी…!!!

मैं मुँह दबा कर रोते-रोते उसकी लम्बी चोटी को याद कर रही थी, मैं सोच रही थी कि उसके पापा मीनाक्षी जीवनलाल की तरह दर्ज़ी क्यों नहीं हुए …कपड़े सिलते तो पूनम की चुन्नी भी तार तार न होती, और वह भी नँगे होने से बच जाते! ज़रूरतें भी नरभक्षी होती हैं महरुमियों की तरह …कई बार हम अपनी जरूरतों का और कई बार अपनी महरुमियों का भोजन बन जाते हैं!
मुझे उस दिन से जाग लगी है। जाने कब नींद आएगी!

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