नीली नदी, गुलाबी दरख़्त और एकाकी जीवन

पूनम दुबे इन दिनों डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में रह रही हैं। डेनिश भाषा सीख रही हैं। इस बार अर्से बाद अपनी यात्रा कथा के साथ लौटी हैं। इस बार स्थान  है जर्मनी का एक छोटा सा शहर ऍनडरनाख। बहुत पठनीय है-

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राइन नदी के किनारे बसे ऍनडरनाख एक छोटे से जर्मन टाउन की पिक्चर परफेक्ट खूबसूरती यात्रियों के दिलोदिमाग को मंत्रमुग्ध कर देती है, हालाँकि यहाँ यात्रियों का बसेरा जर्मनी के बाकी शहरों के मुकाबले कम ही होता है। ताज़ी हवा, साफ सुथरी सड़कें, खूबसूरत टाउन स्क़्वेर के आस-पास कैफ़ेज और रेस्टॉरेंट, मनमोहक आर्किटेक्चर, हरे भरे पार्क और नीली लहराती राइन नदी, नदी के किनारे हरे भरे पेड़ और गुलाबी क्वांजन चेरी की छाया में बनी बेंचेस बिल्कुल ही पिक्चर परफेक्ट सिनरी! टाउन को शिद्दत और सलीके से संभाला गया है। कौन हैं वे ख़ुशनसीब लोग जो इतनी सुंदर जगह में रहते हैं। कैसा होता होगा यहाँ के लोगों का जीवन- मेरे मन में सवाल उठते हैं? काश मेरा भी एक घर होता इस नदी के किनारे और उसके बाहर होते गुलाबी क्वांजन चेरी के पेड़!

पिछली रात जब हम कोलोन से एक घंटे की ड्राइव के बाद रात के अँधेरे में क़रीब साढ़े नौ बजे यहाँ पहुंचे, तब हमें इस टाउन की खूबसूरती का अंदाजा नहीं था, केवल इतना पता था कि हमारा होटल राइन नदी के किनारे है। हालाँकि अँधेरा हुए एकाध घंटे ही हुए थे लेकिन आसपास के माहौल में शान्ति इस कदर घुली थी मानो कि न जाने कितने ही सदियों से यहाँ शांति बरक़रार है। हम दोनों अपने कमरे में भी फुसफुसाकर बातें कर रह रहे थे ऐसा न हो कि हमारी आवाज से यहाँ कि शांति भंग हो जाए। नदी के किनारे रहना अपने आप में खूब रोमांचक था, और दूसरे दिन सुबह होते ही जैसे मैंने अपने कमरे के विंडो से परदे को हटाया तो ख़ुशी दोगुनी हो गई।  सामने दर्शन हुए लहराती राइन नदी और नदी पर तैरती एक बड़ी से शिप के, पता नहीं कहाँ से आ रही थी और कहाँ जा रही थी वह शिप। नदी के उस पार कोई दूसरा टाउन है। उस पार के घरों की झलकियां दिखाई दे रही थीं, और उनसे भी दूर बहुत दूर पहाड़ दिखाई दे रहे थे। और इन सभी के ऊपर बिछी थी नीले आसमान की चादर, बादलों का कोई पता ठिकाना नहीं, अच्छा दिन है टाउन एक्स्प्लोर करने का। खिड़की से बाहर का नज़ारा देखते हुए मन में लालसा हुई कि एक लंबे समय के लिए यहीं रुक जाऊं और रोज हर सुबह प्रकृति की इस तस्वीर को निहारती रहूँ। अप्रैल के कुछ आखरी दिन बचे थे, स्प्रिंग की खुशबु हवाओं में बिखरी हुई थी। इन दिनों मौसम का मिज़ाज ही अनोखा होता है, कभी हल्की धूप तो कभी बारिश कभी बादल तो कभी नीला आसमान।

ब्रेकफास्ट के बाद सोचा नदी के किनारे वाक करुँगी और टाउन भी घूम लूंगी। टिपिकल यूरोपियन ब्रेकफास्ट के बाद मैं निकली अपने सफ़र पर और राहुल अपने काम के सिलसिले में अपने सफ़र पर। कानो में हेडफ़ोन पर ‘व्हाट अ वंडरफुल वर्ल्ड’ लूप में सुनते हुए मैं नदी किनारे वाक करती जा रही थी। दिन के बारह बज चुके थे, हल्की धूप निकल आयी थी और तापमान क़रीब अठारह डिग्री था, लम्बी वाक के लिए परफेक्ट! कई लोग दिखाई दिए वाक करते हुए, कुछ अकेले तो कुछ अपने कुत्ते के साथ, कुछ एकाध बेंच पर धूप सेकते भी दिखे। आपने आस-पास से गुजरते लोगों को मैं स्माइल देकर नज़रों से ग्रीट करती हूँ कभी-कभार मेरी ग्रीटिंग का जवाब स्माइल से मिलता है कभी कभार नहीं। मैं इस खूबसूरत टाउन की मन ही मन प्रशंसा करती हूँ, “व्हाट अ वंडरफुल वर्ल्ड!” ख़ैर कुछ असर गाने का भी था। कहते हैं यू आर व्हाट यू ईट और मैं कहती हूँ योर मूड इज़ व्हाट यू लिसेन (यानी की म्यूजिक) । म्यूजिक एक बहुत ही पॉवरफुल माध्यम है अपने इमोशन और फीलिंग को एक्स्प्लोर करने का ऐसा मुझे लगता है। इसी म्यूजिक के सहारे ही पिछले साल हाफ मैराथन दौड़ी थी कोपेनहेगन में, बस म्यूजिक हो साथ। चलते-चलते एक से ज्यादा घंटा बीत गया और मैं एक डेड एन्ड पर आ पहुंची मुझे रास्ता बदलना पड़ा। उसी रास्ते के मोड़ पर ढ़ेर सारे आर.वी.( ट्रैवलिंग ट्रेलर) पार्क हुए दिखाई दिए। ये सभी लोग यात्री थे और यह ट्रेलर ही इनका घर है। मैं उन ट्रेलर्स को देखती हूँ और सोचती हूँ कितनी रोमांचक होती होगी इन ट्रेलर की यात्रा, कभी किसी दिन हम भी ट्रेलर से यात्राएं करेंगे, यह सोचकर आगे बढ़ जाती हूँ।

नदी के किनारे से चलते हुए मैं अपना रुख़ टाउन स्क़्वेर की ओर करती हूँ। बिना किसी मैप के बस चलती जाती हूँ।  यूरोप में रहते-रहते चलने की आदत लग गई। अब चलना दूभर नहीं लगता हालाँकि मुंबई में चलना अब भी रास नहीं आता। कुछ पल रूककर वहां के आर्किटेक्चर को निहारती हूँ। टाउन के ओल्ड वाल को देखती हूँ चर्च को देखती हूँ और मेरा मन न जाने क्यों अपने देश में कुछ ही महीने पहले की गयी पूरी की यात्रा के पास भटकने लगता है। मुझे जगन्नाथ और कोणार्क मंदिर याद आते हैं। उस दिन जब मैं कोलोन के प्रसिद्ध कैथीड्रल के भीतर में गयी थी तब भी कुछ ऐसा ही हुआ। मन अपने आप तुलना करता है, मन खोजता है समानताएं, निहारता है असमानताएं, सराहता है भिन्नताएं।  वर्तमान यात्राओं के साथ अनगिनत भूतकाल और भविष्य की यात्राएं चल रही होती हैं। शायद यात्राओं पर टाइम का कांसेप्ट लागू नहीं होता, तीनो काल एक साथ घटित हो रहे होते हैं। सब कुछ आपस में घुलमिल जाते हैं।

टाउन स्क़्वेर काफी हद तक खाली ही मिला। कुछ लोग कॉफ़ी पी रहे थे और कुछ लंच कर रहे थे। वह मुझे देखते हैं, और मैं उन्हे! शायद मेरा वहां होना उन्हें   आश्चर्यचकित कर रहा था। मुझे या तो कोलोन में होना चाहिए था या फ़्रंकफ़र्ट जैसी सिटी में, वैसे इरादा हमारा फ़्रंकफ़र्ट जाने का ही था लेकिन राहुल के कुछ काम के चलते यहाँ छोटा सा स्टॉप लिया था। न जाने क्यों लेकिन टाउन स्क़्वेर का माहौल बुझा-बुझा सा था, कोई ख़ास चहल-पहल नहीं थी। दुकाने खाली थीं, कैफेज खाली थे। जो लोग आस-पास दिखे ज्यादातर लोग उम्र में सीनियर और बुजुर्ग थे। यंग लोगों की कमी थी इस टाउन में ऐसा मुझे महसूस हुआ।  इन बड़े-बड़े खूबसूरत घरों में कौन रहता है?  इन घरों के बाहर इन लॉन को कौन सजाता है? यहाँ लोग ज्यादातर बूढ़े ही दिखे मुझे। और जो यंग लोग यहाँ काम करते हैं वह यहाँ के लोकल लोग नहीं लगे मुझे, वह कहीं किसी और देश से आये हैं अपनी रोजी रोटी कमाने, जैसे मेरे होटल के रेस्टसरेंट की अटेंडेंट या फिर कमरे की सफाई करने वाली वे दो लड़कियां वह भी लोकल नहीं लगी मुझे। शायद यहाँ रहने वाले लोगों के परिवार के बच्चों को इस टाउन की खूबसूरती रास न आयी। हो सकता हैं जो मेरे लिए खूबसूरती हो वह इनके लिए बोरियत हो। इसलिए वे बड़े शहरों में जाकर बस गए हों, बस पीछे छूट गए यह लोग। महान फिलॉस्फर फ्रेडरिक निएचे ने कहा है, “यहाँ कोई तथ्य नहीं, केवल व्याख्याएं हैं।”

 त्यौहारों के समय तो जरूर ही खिलखिलता और मुस्कुराता होगा यह टाउन, शायद मेरी टाइमिंग गलत है। शायद समर में ज्यादा चहल पहल हो, मैं मन ही मन सोचती हूँ। मैं भीड़ को मिस नहीं कर रही लेकिन फिर भी मन में सवाल घूम रहे थे। अकेले खाली सड़कों गलियों में चलना मुझे पसंद है वह मुझे सोचने और महसूस करने का मौका देते हैं, अपने आप को सुनने का मौका देते हैं। उस दिन करीब २३ किलोमीटर चली पूरे टाउन की पदयात्रा कर ली।  वापस लौटी तो खुशी थी कि पूरा टाउन देख लिया एक ही दिन में लेकिन साथ में एक मायूसी भी थी न जाने क्यों?

दूसरे दिन भी वही रास्ता लिया राइन के किनारे से वाक करती हुई टाउन स्क़्वेर पहुंची। एक अजीब से मायूसी है यहाँ की फिज़ाओं में, हो सकता हो यह मेरे मन का भ्रम हो या फिर हो सकता हो सच। जीवन एक ही स्पीड और एक लूप में चलती जा रही थी इस टाउन में।  कल वाली बूढ़ी दादी दिखाई दी अपने कुत्ते के साथ लकड़ी के सहारे मोटे से विंटर जैकेट में सर को झुकाये कहीं चली जा रही थीं। क्या यह वही दादी हैं या इनके जैसे और भी हैं। वही लोग दिखे वाक करते हुए एक दूसरे को हाय हेल्लो करते हुए लेकिन अपने आप में अकेले, साथ थे तो उनके कुत्ते।  कुत्ते अच्छे कम्पैनियन होते हैं मन ही मन सोचा। इस पिक्चर परफेक्ट टाउन में कुछ मिसिंग था राइन नदी का पानी यहाँ बहता जरूर है लेकिन यहाँ के लोगों की जिंदगियाँ रुकी हुई हैं।  यहाँ लोग अकेले से लगे  मुझे, मैं भी तो अकेले ही घूम रही थी। हालाकिं फर्क इतना है कि मैं अकेले घूम रही थी और वह अकेले जी रहे हैं।

अपने आस-पास के बूढ़े लोगों के जीवन की जो भी झलकियाँ मिली वह मुझे एकाकी लगी और यह एकाकी जीवन इनकी चॉइस नहीं है यह यहाँ का डिफ़ॉल्ट सेटअप है। पता नहीं क्यों लेकिन स्प्रिंग के रंगों में रंगे टाउन की खूबसूरती मुझे खटकने सी लगी। हम वेस्टर्न संस्कृति से खूब प्रेरित होते हैं। यहाँ की खूबसूरत सड़कों, इमारतों, और घरों की तस्वीरें हमें दीवाना कर देती हैं। लेकिन हमें कोई इन खूबसूरत शहरों के आस-पास से जाती इन सुनसान स्लीपी टाउन्स और अँधेरी गलियों का सच कोई नहीं बताता। वेस्ट से ही प्रेरित होकर हम अपनी आइडेंटिटी और इंडिवीजुएलिटी के लिए दिन-रात लड़ रहें हैं। हम फ्री होना चाहते हैं समाज से, परिवार से, रिश्तों से, सोचने वाली बात है क्या हम सच में फ्री हैं? या फिर हम दूसरों के फ़्रीडम की परिभाषा को जी रहे हैं?  मेरे हैडफ़ोन पर गाना चलता है, “लुक ऐट आल द लोनली पीपल!” और चेहरे की मुस्कान ने आँखों से बहते पानी ने ले लिया?  मार्केज ने सही कहा था, “एक अच्छे बुढ़ापे का रहस्य बस एकांत के साथ एक सम्मानजनक समझौता है।”

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