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  • इश्क ए हकीकी का सागर: बुल्ले शाह

    प्रसिद्ध आलोचक माधव हाड़ा के संपादन में बुल्ले शाह की कविताओं का संचयन प्रकाशित हुआ है। राजपाल एंड संज प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक की समीक्षा लिखी है मोहम्मद हुसैन डायर ने। आप भी पढ़ सकते हैं-

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    भक्ति आंदोलन ने देश और काल की सीमाएँ तोड़ी थी। यह आंदोलन इतना व्यापक था कि इससे कोई भी वर्ग अछूता नहीं रह पाया। इस आंदोलन को फलने फूलने में भारतीय संस्कृति के साथ-साथ अलग-अलग देशों की संस्कृति की भूमिका भी रेखांकित की जाती है। सूफी आंदोलन कुछ इसी प्रकार का है जो मूल रूप से अरबी फारसी संस्कृति में फला फूला। धीरे-धीरे जब इसका प्रसार भारतीय समाज तक पहुँचा तो यह स्थानीय प्रभाव से मुक्त नहीं रह पाया। यहाँ के सूफी संतों ने भी प्रेम के रंग में दुनिया को रंगने का प्रयास किया। पंजाबी क्षेत्र के सूफी संतों में जिनका नाम सबसे प्रमुखता से लिया जाता है उनमें से एक नाम है, बुल्ले शाह। बुल्ले शाह के व्यक्तित्व और कृतित्व के विभिन्न पहलुओं से रूबरू करवाती प्रोफेसर माधव हाडा द्वारा संपादित पुस्तक “कालजयी कवि और उनका काव्य : बुल्ले शाह” आधुनिक विचारधारा को प्रेम के रंग से परिचित कराने का प्रयास करती है।

    कसूर जैसे इस्लामिक अध्ययन केंद्र में हजरत गुलाम मुर्तजा और मौलाना मुर्तजा कसूरी के सानिध्य में शिक्षा प्राप्त करने वाले बुल्ले शाह ‘हीर रांझा’ की कहानी लिखने वाले सैयद वारिस शाह के सहपाठी थे। अध्ययनकाल के दौरान लगातार सूफियों की सोबत करने के कारण बुल्ले शाह पर इस विचारधारा का गहरा प्रभाव पड़ा। अपने गुरु हजरत इनायत शाह के वो जान ए नशीं थे। प्रोफेसर माधव हाडा यह बताते हैं कि दीक्षित होने के बाद बुल्ले शाह अपने गुरु से तनिक भी दूर रहना नहीं चाहते थे। गुरु की सच्ची सेवा किसी भी तीर्थ यात्रा या हज यात्रा से श्रेष्ठ होती है, इस पंक्ति पर यह किताब बुल्ले शाह और हजरत इनायत शाह के उदाहरण द्वारा अपनी मुहर लगाती है। किताब की भूमिका इस ओर संकेत करती है कि सूफी जो कभी जात-पात और पंथ को तवज्जो नहीं देते हैं, इसी परंपरा पर बुल्लेशाह भी आगे बढ़ाते हैं।

    माधव हाड़ा किताब की भूमिका लिखते वक्त अपनी लेखनी का अंदाज किस्सागो रखते हैं। भाषा में कहानीपन होने के साथ-साथ कई वृतांत इसकी भूमिका में देखने को मिल जाते हैं। ये वृत्तांत बुल्ले शाह का इनायत शाह से दीक्षित होना हो, बुल्ले शाह का हज यात्रा की योजना निरस्त करना हो, अब्दुल्ला नाम से ‘बुल्ले शाह’ में परिवर्तन होना हो, गुरु शिष्य में किसी बात को लेकर मनमुटाव हो, दोनों के मतभेद दूर करना हो या फिर अपने यार की जुदाई में तड़पने का वृतांत हो, ये वृत्तांत पाठक को कहीं पर भी भटकने नहीं देते हैं। सब्र के साथ पढ़ने के साथ-साथ ‘आगे क्या हुआ होगा’ की जिज्ञासा लगातार बनी रहती है।

    कुरान शरीफ में एक आयत आती है, “अला इन्ना औलिया अल्लाही ला खौफुन अलैहिम वलाहुम यहज़नून” (पारा 11, सुरे युनुस, आयत 62 ) जिसका अर्थ कुछ इस तरह से है, “खबरदार! बेशक औलिया अल्लाह (अल्लाह के वलियों) पर न कोई खौफ है और ना वो रंजीदा गमगीन होंगें।’ इस सूफियों के आला दर्ज़े की पुष्ठी कराती इस आयत के अनुसार ही यह किताब सूफीवाद की महानता के आलोक में बताती है कि बुल्ले शाह की इबादत बंधन मुक्त थी। घर परिवार समाज की रूढ़ियाँ और दकियानूसी सोच उन्हें साधना से नहीं रोक सकी।

    “हद तपे सो औलिया, बेहद तपे सो पीर,

    हदो बे हद दोऊँ तपे, वाको नाम फकीर।”

    की उक्ति को जीवन में उतारते हुए बुल्ले शाह ने अपनी साधना से किस तरह से ‘राह ए इलाही’ में अपने जीवन को समर्पित कर दिया, यह भी यह पुस्तक बताती है।

    “बुल्ला शाह संभल जब आप देखा,

    सदा सोहंग प्रकाश होए झुल एं।”

    अर्थात बुल्ले शाह ने जब संभल कर देखा तो उसे प्रतीति हुई कि मैं वही उसका प्रकाश हूँ। यह पंक्ति ‘अनल हक’ या फिर ‘अहम्ब्रह्मास्मि’ की ओर साधक को ले जाती है। सभी एक ही नूर की रोशनी से निकले हुए हैं और सभी को उसमें मिल जाना है, का भाव भी इसमें देखने को मिलता है। बुल्ले शाह अपने काव्य के माध्यम से ईश्वर और आत्मा के मिलन के समय को व्यक्त करने का प्रयास करते हैं।

    रोज़े हज्ज नमाज नी माए, मैंनू पिया ने आण भुलाए।

    जद प्रिया दिआं खबरां पईयां, मंतक नाहिव सब्भे भुल्ल गईआं।

    कहकर नमाज रोजा या यूं कहें तो धार्मिक आडंबर को मिथ्या घोषित कर गुरु के प्रति प्रेम को श्रेष्ठ बताया है।

    सूफियों की विशेषता अक्सर पुल बनाने वाले के रूप में रेखांकित की जाती है। ये पुल भाषा, संस्कृति और समाज को जोड़ने वाले होते हैं। अपनी भाषा में सूफी इस तरह की मिठास घोलते हैं कि वह भाषा उच्च वर्ग की न होकर सामान्य जन समुदाय की संवेदनाओं की वाहक हो जाती है। अपने प्रेम की रात को दुनिया वालों के सामने रखते वक्त जिन पंक्तियों का सृजन यह संत करते हैं, उनमें ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं जो दो धर्मों को जोड़ने वाले साबित होते हैं। ‘कलमे को बंसी की धुन’ के रूप में प्रस्तुत करती यह पुस्तक भी कुछ इसी ओर संकेत करती है।

    यह पुस्तक बताती है कि बुल्ले शाह बनावट से बहुत दूर है। उनका चिंतन, उनकी इबादत, उनका समर्पण बिल्कुल मौलिक है। वे अपने आप को धर्म, संप्रदाय,मत, विचार, पहचान से जुड़ी हुई बाधाओं से दूर बताते हैं। इसकी पुष्टि हेतु बुल्ले शाह के एक पद द्वारा भी समझा जा सकता है।

    मैं बे-क़ैद मैं बे-क़ैद। ना रोगी ना वैद।

    ना मैं मोमन ना मै काफ़र। ना सैय्यद ना सैद।

    ये पंक्तियाँ जहाँ बंधन मुक्त इबादत की ओर साधक को ले जाती है, वही कबीर के ‘ना में मंदिर ना में मस्जिद ना काबा कैलाश में’ पद की ओर भी ले जाने का कार्य करती है।

    बुल्ले शाह की कविताएँ मुख्य रूप में तीन भागों में विभाजित किए जा सकती है, पहला, उनका प्रारंभिक दौर जो उनके इस्लामी के अध्ययन और उसके प्रति ज्ञान को दर्शाता है। जबकि दूसरा चरण बुल्ले शाह और उनके पीरो मुर्शिद के संपर्क के दरमियान का माना जा सकता है। वहीं यह पुस्तक इस ओर इशारा करती है कि बुल्ले शाह की कविता का अंतिम चरण उनके तसव्वुफ की स्थिति का चित्रण करती है। बुल्ले शाह के काव्य में बारहमास, काफ़ी, गढ़ाँ, सीहरफ़ी, अठवारा, दोहा का विस्तार से प्रयोग हुआ है। इनके साहित्य की भाषायी विविधता और रचनात्मक विविधता के पीछे का कारण बताते हुए माधव हाड़ा लिखते हैं कि पंजाब का क्षेत्र सूफियों का गढ़ रहा है। इसके अलावा विविध सांस्कृतिक पहलू यहाँ  मौजूद रहे हैं। इस कारण बुल्ले शाह की रचनाओं में जो मिठास और दर्द भरा राग मिलता है, वह इसी की अभिव्यक्ति समझी जा सकती है। इस पुस्तक में बुल्ले शाह के संदर्भ में लोक आख्यान और ऐतिहासिक प्रमाण दोनों दिखते हैं। पुस्तक में 89 काफ़ीया, 22 दोहे 10, गढ़े, एक अठवारा, एक बारहमासा और एक सीहरफ़ी का संकलित है। इसमें करतारसिंह दुग्गल, नजीर अहमद और अनवर अली रोहतक  के द्वारा संपादित इसमें सम्मिलित किए गए हैं।

    यह पुस्तक कई मायने में अनूठी है। जिस तरह का संकलन इसमें समाहित है, वह सूफी संप्रदाय में मौजूद प्रगतिशील चेतना को सामने लाने के साथ-साथ उसके भीतर छुपे आध्यात्मिक रहस्य को भी पाठकों से परिचित कराती है। इश्क को खुदा मानने वाली इस विचारधारा के एक अनमोल नगीने बुल्ले शाह की काव्य पंक्तियों का जिस तरह से शब्दशः अनुवाद किया गया है और उनके संदर्भ प्रस्तुत किए गए हैं, वह काबिले तारीफ है। लगभग 112 पृष्ठों में फैली यह पुस्तक सूफियों के रहस्यवाद की गहराइयों को समझाने के साथ-साथ आज के समाज को रोशनी देने का कार्य भी करती है। प्रकृति के बनाए हुए हर तत्त्व से अनहद प्रेम करना सूफियों की रवायत रही है। बुल्ले शाह के पदों में यह तथ्य इस पुस्तक में सर्वत्र बिखरे पड़े हैं।

    संपर्क: व्याख्याता (हिंदी), रा. उ.मा. वि. आलमास, ब्लाक मांडल, जिला भीलवाड़ा, मो. 9887843273 Email – dayerkgn@gmail.com

    बुल्ले शाह (कालजयी कवि और उनक काव्य), संपादक: माधव हाड़ा,   राजपाल एंड सन्ज, दिल्ली, 2023,  मूल्य: रु.185, पृ. 112

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