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  • भोजपुरी लोकोक्तियों में नारी

     

    भोजपुरी भाषा की लोकोक्तियों में नारी विषय पर यह शोध आलेख भेजा है सुनीता मंजू ने। सुनीता सीवान में प्राध्यापिका हैं। आप लेख पढ़कर अपनी राय दीजिए-

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    जब लोक शब्द किसी शब्द के साथ जुड़ता है, तो अंतस में गुदगुदी होती है। लोक सहज, सरल संगीत की तरह जीवन के हर क्षेत्र में घुला रहता है। लोक कथाएं, लोक नृत्य, लोक गीत, लोकोक्तियां लोक जीवन के अंग हैं। भोजपुरी भाषी क्षेत्र का लोक साहित्य अत्यंत समृद्ध है। कहीं लोकगीतों की तान है, तो कहीं लोक कथाओं की बैठक। लोकोक्तियां इतनी प्रचलित हैं, कि एक सामान्य भोजपुरी भाषी अपनी बातचीत में जाने-अनजाने दिन भर में अनेक लोकोक्तियों या कहावतों का सहारा लेता ही है। डॉ० जयप्रकाश कर्दम के अनुसार “मुहावरे लोकोक्तियां और कहावतें समाज की चेतना की अभिव्यक्ति हैं। लोग क्या सोचते हैं, एक दूसरे के प्रति उनकी किस तरह की मानसिकता और व्यवहार है, मुहावरे और कहावतों में यह बहुत स्पष्टता के साथ देखा जा सकता है। सामाजिक यथार्थ की बहुत सारी अंदरूनी परतें मुहावरे और कहावतों के माध्यम से खुलती हैं।”01 महिलाओं के प्रति भोजपुरी समाज या हिंदी पट्टी का  समाज क्या सोचता है, यह लोकोक्तियों के माध्यम से जाना जा सकता है। लोकोक्तियों कहावतों के माध्यम से आदर्श नारी के मानक बनाए गए हैं। वहीं दूसरी ओर इन लोकोक्तियों द्वारा नारी की स्वतंत्रता एवं स्वच्छंदता पर भी अंकुश लगाने का प्रयास किया गया है। अध्ययन की सुविधा के लिए भोजपुरी की मुख्य लोकोक्तियों को निम्न भागों में बांटा जा सकता है।

    सौंदर्य एवं श्रृंगार संबंधित

    भारतीय समाज में नारी के सौंदर्य के विशेष मानक हैं। भोजपुरी में नारी के रूप रंग की विशेषता बताती या कुरूपता का उपहास उड़ाती लोकोक्तियां मौजूद हैं। “कानी बिना रहलो न जाए कानी के देख के अखियों पिराए”02  अर्थात एक आंख से कानी महिला कुरूप होती है। उसको देखकर कष्ट की अनुभूति होती है। परंतु वह महिला है, घर बाहर के सब काम संभालती है। अर्थात उसके बिना काम भी नहीं चल सकता। यहां नारी के प्रति समाज के विचार सामने आते हैं। यह कहावत अन्य सभी मानको (नाटी, काली, पतली, मोटी) पर भी लागू होती है। इसी प्रकार एक अन्य कहावत है “सकल चुरइल के मजमून परी के”03   यह लोकोक्ति किसी महिला को कुरूप बताने के लिए बोली जाती है। सुंदर चेहरे को परी और कुरूप चेहरे को चुड़ैल बताया गया है।  कहने का तात्पर्य यह है कि जितनी तारीफ सुनी थी महिला उतनी सुंदर नहीं है। अक्सर नई बहुओं को इस लोकोक्ति द्वारा प्रताड़ित किया जाता है। एक अन्य लोकोक्ति है “गोर चमाइन गरबे आन्हर”04 इसका अर्थ है कि दलित जाति की गोरी महिला घमंड से भरी होती है। यहां ना केवल गोरे रंग को श्रेष्ठ बताया जा रहा है,  बल्कि साथ ही साथ जाति विशेष में कोई गोरा नहीं होता यह भी दर्शाया जा रहा है। यह तो रूप रंग की चर्चा करती लोकोक्तियां है। अब उन लोकोक्तियों की बात करते हैं, जिनमें महिला के सजने संवरने शृंगार करने का उपहास बनाया गया है। “बुढ़वा भतार पर पाँच को टिकुली”05  “बूढ़ घोड़ी लाल लगाम”06 “सास के परान जाए, पतोह करे काजर।”07  इन लोकोक्तियों का सामान्यतः एक ही अर्थ है, महिला के सजने संवरने पर आपत्ति दर्ज करना।  अगर महिला बूढी  है तो शृंगार ना करें,  पति बूढ़ा है तो शृंगार ना करें,  सास या घर का कोई सदस्य परेशानी में है, तो बहू को शृंगार नहीं करना चाहिए। आश्चर्य है कि बहू के कष्ट में होने पर, घर के अन्य सदस्यों को क्या करना चाहिए इससे संबंधित कोई लोकोक्ति नहीं दिखाई देती।

    रहन-सहन एवं व्यवहार संबंधित

    एक स्त्री को कैसे रहना चाहिए। कैसे बोलना चाहिए। कैसे हँसना चाहिए। कैसे चलना चाहिए। यह समाज ने तय कर रखा है। लोक जीवन में आमतौर पर निम्न वर्ग की मजदूर महिलाएं मुखर होती हैं।  उन पर अंकुश कसने के लिए विभिन्न लोकोक्तियों का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार की भोजपुरी लोकोक्तियां उल्लेखनीय हैं। “करनी न धरनी धिया होइह ओठ बिदुरनी”08 इस लोकोक्ति का अर्थ है कि बिना कुछ कर्म के , यह लड़की बोलती रहती है। जबकि आदर्श लड़कियों को मितभाषी होना चाहिए। “छोट खटिया ढुलकत घोर (घोड़ा) नारी करकसा विपत के ओर”09  अर्थात छोटी खाट,  लुढ़कता हुआ घोड़ा और कर्कश बोली वाली नारी विपत्ति लाते हैं।  यहां नारी को मृदुभाषी होने का उपदेश दिया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर अगर स्त्री मधुर भाषी है, मिलनसार है, सब से हंस कर बोलती है, तो उसे चरित्रहीन साबित करती एक अन्य लोकोक्ति मौजूद है “हँस के बोले नारी सारा काम बिगाड़ी।”10 अब बताइए नारी करे तो क्या करे?  इतना ही नहीं घर में हुए लड़ाई झगड़े का जिम्मेदार महिलाओं के व्यवहार को ही ठहराया जाता है। इसे प्रोत्साहित करती लोकोक्तियां भोजपुरी में प्रचुर मात्रा में हैं। “अगिया लगाई छउड़ी बर तर ठाड़”11 अर्थात सभी के बीच झगड़ा करवा कर यह लड़की एक तरफ खड़ी है। “छउड़ी छाव करे अंगुरिया काट के घाव करे”12  अर्थात सहानुभूति प्राप्त करने के लिए महिलाएं झूठा नाटक करती हैं। सहानुभूति के लिए स्वयं को हानि पहुंचाने को भी तैयार रहती हैं। “सराहल बहुरिया डोम घरे जाली”13 अर्थात बहू की ज्यादा तारीफ करने से निकृष्ट काम करने लगती है। अतः उसे डांटना फटकारना ही ठीक है। “सुधा बहुरिया के घूघ तर सांप बियाले”14 अर्थात जो ज्यादा सीधे स्वभाव की बहू होती है, वास्तव में भीतर से विषैली होती है। उपरोक्त उदाहरणों द्वारा स्पष्ट है कि नारी के रहन-सहन एवं बोली व्यवहार पर समाज द्वारा अंकुश लगाया गया है।

    भोजन संबंधित

    भारतीय समाज में सामान्यतः घर में पुरुषों की पसंद का भोजन बनता है। महिलाएं पुरुषों के भोजन करने के बाद ही भोजन करती हैं। उनमें भी घर की बहू से अपेक्षा की जाती है कि वह सब के खाने पीने के बाद अंत में खाना खाए। भोजन को लेकर कई लोकोक्तियां है जो महिलाओं की स्थिति को दर्शाती हैं। “खा ले बेटी दूध भात, आखिर परबे बिराना हाथ”15  यहाँ बेटी को प्यार से दूध भात खिलाया जा रहा है। क्योंकि माँ को पता है कि ससुराल में भली-भांति भोजन नहीं मिलेगा। “मेहरारू के खाइल आ मरद के नहाइल ना बुझाला”16 अर्थात पुरुष तुरंत स्नान कर लेता है।  परंतु भोजन देर तक इत्मीनान से डटकर (छत्तीस पकवान का) करता है। वहीं महिला जैसे तैसे तुरंत भोजन कर लेती है, परंतु स्नान करने में ज्यादा समय लगाती है। एक अन्य लोकोक्ति है “खाए के बेटी लुटे के दमाद, हाथ गोड़ पर ला पर गोतिया देयाद”17  यहाँ बेटी को जमके खाने वाला और दामाद को धन लूटने वाला बताया गया है। “जहाँ ढेर मऊगी तहवाँ मरद उपास”18 इसका अर्थ है कि अधिक महिलाओं वाले घर में पुरुष को भूखा रहना पड़ता है। कोई महिला भोजन नहीं बनाती है। “सात बेर सतुअन  भतार के आगे दतुअन”19 अर्थात स्वयं सात बार भोजन करके पति को दातुन दे रही है। यह अच्छी महिला के लक्षण नहीं हैं। ध्यान देने की बात है कि पति (बिना हाथ में दिए) दातुन करने के लिए भी समर्थ नहीं है। सामान्यतः बहू को बचा खुचा बासी भोजन करना पड़ता है। परंतु बेटे को जन्म देने के बाद, उसको बढ़िया भोजन खिलाया जाता है। ताकि बच्चे को दूध पूरा मिल सके। इस बात की पुष्टि करती दो लोकोक्तियां भोजपुरी में उल्लेखनीय हैं। “लौऊटल भाग भईली ललकोरी, नित उठ दूध भर भर खोरी”20  एवं “लइकवा के भागे लरकोरिया जिएले”21  एक अन्य लोकोक्ति में भरपेट भोजन पाने के लिए पत्नी चाल चलती है। वह बहुत ज्यादा आटे की एक मोटी रोटी पका लेती है, क्योंकि एक ही रोटी उसे मिलने वाली है। “सात सेर के सात पकवनी चौदह सेर के एकही, तु दाहिजा सातों खइला, हम कुलवंती एकही”22 स्पष्ट है कि भोजपुरी समाज में महिलाओं के भोजन की क्या स्थिति थी। पिछड़े इलाकों में आज भी यही स्थिति है। महिलाएँ यह कहते हुए पाई जाती हैं कि पति और बच्चों ने खा लिया तो हमारा पेट भी भर गया।  महिलाओं की अल्पायु में मृत्यु दर का मुख्य कारण कुपोषण है। जो महिला स्वयं सबके लिए भोजन बनाती है, सब की सेहत का ख्याल रखती है, बस अपने लिए पौष्टिक भोजन नहीं बना पाती है।  बचे खुचे बासी भोजन से ही काम चला लेती है। यह दयनीय स्थिति है। शिक्षा के साथ-साथ आधुनिकता आने से समाज में बदलाव आया है। परंतु अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना बाकी है।

    घरेलू कामकाज

    पारंपरिक भारतीय समाज में, महिलाओं का मुख्य कार्य घरेलू कार्य करना है। बहू के आते ही सास घरेलू कार्य की जिम्मेदारी उसे सौंप देती है। बहू, बेटी को घरेलू कार्य करने का उपदेश देती अनेक लोकोक्तियां भोजपुरी में मौजूद हैं। “गोड़िनीया के बेटी के ना नइहरे में सुख ना ससुरे सुख”23  तथाकथित गोड़ (भड़भुजा) जाति की लड़की के कष्ट को दर्शाया गया है। मायके में भी वह भाड़ में दाना भूनती है, और ससुराल में भी। “उठ बहुरिया साँस ल ढेकी छोड़ जाँत ल”24 इसका अर्थ हुआ कि एक काम को छोड़कर दूसरा काम करना है।  दूसरा काम थोड़े कम श्रम का है, तो वही बहू के लिए आराम का समय है। “सास बाड़ी कूटत पतोह बाड़ी सूतल”25 बहू के ऊपर व्यंग्य है। सास काम कर रही है और बहु सोई है। “हम रानी तू रानी के भरी डोला के पानी”26 सभी महिलाएँ सुकुमार हैं  तो घरेलू काम कौन करेगा। “नया भौजाई के बढ़नी में लछन”27 लोकोक्ति का अर्थ है कि नई बहू (भाभी) किस प्रकार झाड़ू लगाती है उससे उसके लक्षण पहचान में आते हैं। “धियावा के माई रानी, बूढ़ी समइया भरेली पानी”28 इसका अर्थ है कि बेटी के रहते माँ को घरेलू कार्य की चिंता नहीं थी। परंतु बेटी के विवाह के पश्चात बुढ़ापे में बहू के लिए बाहर से पानी भर कर देना पड़ता है। अर्थात घरेलू कार्य में हाथ बटांना पड़ता है। उदाहरणों से स्पष्ट है कि भोजपुरी समाज में महिलाओं को घरेलू कार्य की पूरी जिम्मेदारी दी गई है। चाहे वह सास करे, बहु  करे  , बेटी करे या कोई भी महिला करे।

    रिश्तों से संबंधित

    महिलाओं के विषय में रिश्तों का आदर्श प्रस्तुत करती अनेक लोकोक्तियां भोजपुरी भाषा में पाई जाती हैं। उदाहरण “अरधी मेहरी, बटइया खेत”29  इसका अर्थ है कि दूसरी पत्नी बटाई के खेत के समान होती है।  अर्थात जिस प्रकार बटाई के खेत पर अपना अधिकार नहीं रहता,  आधी ही फसल मिलती है, उसी प्रकार दूसरी पत्नी पर पूरा अधिकार नहीं होता। वह अपनी मनमर्जी करती है। यहाँ स्पष्ट देखा जा सकता है कि स्त्री को एक प्रकार की संपत्ति माना जा रहा है। वहीं दूसरे पति के लिए पत्नी क्या सोचती है वह इस लोकोक्ति में स्पष्ट है “अरधी भतार पर सरधा बुतवनी, बसिया भात पर बेनिया डोलवनी”30 अर्थात महिला को दुहाजू पति मिला है।  उसी पर अपने सारे शौक पूरे करने हैं। एक लोकोक्ति है “मोर पिया मोर बात ना पूछे मोर सुहागिन नाउ”31  इसी भाव की एक और लोकोक्ति है “का पर करीं सिंगार पिया मोर आन्हर”32 इन लोकोक्तियां का अर्थ है कि महिला के लिए पति ही सर्वस्व होता है। “आपन हारल मेहरी के मारल, कोई ना कहेला”33 अर्थात् पत्नी से मार खाना अत्यंत अपमानजनक है। “सास के लुगरी, पतोह के गोड़पोछना”34 अर्थात सास की अनिवार्य वस्तु का बहु के  लिए कोई महत्व नहीं है। “उतरते बहुरिया जन्मते लईकवा”35 अर्थात छोटे बच्चे को जैसा बनाओ वो वैसा ही बनेगा। वैसे ही नई बहू को जैसे सिखाओ समझाओ वो वैसा ही करेगी। आश्चर्य है कि एक नवजात बच्चे और नववधू को समान समझा जा रहा है। मानो नवजात के समान बहु भी विवेकशून्य है। “मूअल सौत सतावेले, काठो के ननद बिरावेले”36  अर्थात सौतन कैसी भी हो वह परेशान करेगी। और ननद कितनी भी अच्छी हो वह भाभी को जरूर ताने मारेगी। सास-बहु, ननद- भाभी के रिश्तो में कड़वाहट को ये लोकोक्तियाँ बढ़ाती हैं। महिला के माँ रूप को सबसे ऊँचा दर्जा दिया गया है।  “सब के दुलार माई के हँकार”37  अर्थात कोई कितना भी प्रेम करें माँ की डाँट की भी बराबरी नहीं कर सकता। “माई निहारे ठठरी, तिरिया निहारे गठरी”38  अर्थात माँ को पुत्र की सेहत की चिंता रहती है। परदेस से आने पर माँ उसका बदन निहारती है।  कहती है कितना दुबला हो गया है। वहीं पत्नी गठरी निहारती है और कहती है मेरे लिए क्या लाए हैं?  “माई के जीव गाय अईसन, पूत के जीव कसाई अईसन”39 अर्थात पुत्र कितना भी दुष्ट हो,  माँ को ना  पूछे, तभी भी माँ की ममता कम नहीं होती है। उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि महिलाओं के लिए लोकोक्तियों में दिशा निर्देश जारी किए गए हैं।  उन्हें उपदेश दिये गये हैं कि किस प्रकार रिश्ते निभाने चाहिए।

    जातिगत एवं यौन शोषण संबंधित

    जातिगत भेदभाव को दर्शाती और महिलाओं के यौन शोषण से संबंधित लोकोक्तियां भोजपुरी में पाई जाती हैं। ये लोकोक्तियाँ भोजपुरी समाज के ताने-बाने को भलीभांति व्यक्त करती हैं। उदाहरण “चमार के बेटी के नाम रजरनिया”40 अर्थात दलित जाति को अपने बच्चों का नाम भी घृणास्पद रखना चाहिए। इसकी आधारशिला मनुस्मृति का निम्नलिखित श्लोक दिखाई पड़ता है:-

    माङगल्य ब्राहमणस्य स्यात्क्षत्रियस्य बलान्वितम्।

    वैश्यस्य धनंसयुक्त्म् शूद्रस्य तु जुगुप्सितम्। ।41

    अर्थात ब्राह्मण शिशु का नाम मंगलबोधक, क्षत्रिय शिशु का नाम शौर्य बोधक, वैश्य शिशु का नाम समृद्धिबोधक और शूद्र शिशु का नाम घृणाबोधक रखना चाहिए।  एक और लोकोक्ति है अबरा के मउगी, गाँव भर के भऊजी”42  अर्थात निर्धन की पत्नी से  गाँव भर के लोग छेड़छाड़ करते हैं। “लाजे भवे बोलस ना, सवादे भसुर छोड़स ना”43 ये लोकोक्ति जेठ के द्वारा छोटे भाई की पत्नी के यौन शोषण को दिखाती है। “संइया से संवास ना, देवर मारे मटकी”44 इस लोकोक्ति से आभास होता है की देवर भी भाभी पर निगाह रखता है।

    निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि भोजपुरी में लोकोक्तियां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। एक नारी के दृष्टिकोण से इनका विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि, महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पिछड़ी हुई है। परिवार में सिर्फ उनके कर्त्तव्य बताए गए हैं। उनके अधिकारों की कहीं कोई चर्चा नहीं है।  सास बहू ननद भाभी के रिश्तो में कड़वाहट की जड़ भी इन्हीं लोकोक्त्तियों में देखी जा सकती है। भोजपुरी भाषी समाज शिक्षा प्राप्त करने के साथ आधुनिक हुआ है।  शिक्षित महिलाओं की स्थिति बेहतर हुई है। परंतु अशिक्षित समाज में आज भी महिलाएँ इन्हीं लोकोक्तियों द्वारा असमानता के बोझ को ढो रही हैं। लोकोक्तियाँ हमारी धरोहर हैं। इन्हें सहेजना जरूर चाहिए। परंतु जो लोकोक्तियाँ परिवार और समाज में वैमनस्य को जन्म दें उन्हें भूलना ही बेहतर है। जो लोकोक्तियाँ जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करें, प्रेरणा दें, उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुँचाना आवश्यक है।

    संदर्भ सूची

    आलेख में प्रयुक्त लोकोक्तियों को भोजपुरी भाषी क्षेत्र में लेखिका द्वारा सुना गया है एवं निम्नलिखित स्रोतों से सहायता ली गयी है।

    01 डाॅ० जयप्रकाश कर्दम, पुस्तक- लोक साहित्य महत्व एवं प्रासंगिकता, संपादक- डाॅ० रामभरोसे, संजय प्रकाशन, नई दिल्ली। पृष्ठ संख्या- 47

    02 से 40. तक https://www.jogira.com

    41 मनुस्मृति, अध्याय-2 श्लोक 31 एवं 32

    42 से 44 तक https://www.jogira.com

    डाॅ० सुनीता

    सहायक प्रोफेसर

    हिन्दी विभाग

    राजा सिंह महाविद्यालय

    सीवान

    बिहार

    पिन- 841226

    ईमेल- pranay1992015@gmail.com

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