गरिमा श्रीवास्तव का उपन्यास ‘आउशवित्ज: एक प्रेम कथा’ को पढ़कर यह पत्र लिखा है प्रोफ़ेसर रामेश्वर राय ने। गरिमा जी का यह उपन्यास निस्संदेह इस साल प्रकाशित दो श्रेष्ठ उपन्यासों में एक है। उथल-पुथल दौर में प्रेम की हूक की यह कथा आपको विचलित भी कर देती है और आनंद से भी भर देती है। फ़िलहाल वाणी प्रकाशन से प्रकाशित इस उपन्यास पर रामेश्वर राय जी का यह पत्र पढ़िए जो इस उपन्यास की एक बेहतरीन व्याख्या के रूप में लिखा गया है-
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एक पत्र गरिमा के नाम
प्रिय गरिमा,
तुम्हारी किताब आउशवित्ज़:एक प्रेम कथा जब वाणी प्रकाशन से मिली, तभी सोचा कि इसे फुर्सत से पढ़ूँगा। संयोग से गोवा आने का कार्यक्रम बन गया। दिल्ली फ़ुर्सत नहीं देती। अपने अतीत की विरासत और अवशेषों को भीड़ और वाहनों से रौंदकर उसने जिस अराजक, अशांत और विक्षिप्त परिवेश को निर्मित किया है, उसमें अध्ययन,चिंतन या सृजन, मुझे असंभव जान पड़ता है। दक्षिणी गोवा के कोलवा बीच इलाके में ‘सोल वेकेशंस’ नामक एक होटल में रुका हूँ। हरा भरा और ख़ामोशी में डूबा एकांत परिसर, चिड़ियों की अलग-अलग आवाज़ें, नारियल के पत्तों से खेलती हवाएँ, स्विमिंग पूल के गहरे नीले जल के आईने में किसी पक्षी की उड़ान दिख जाती है। यह उत्तरी भारत का नहीं, गोवा का दिसंबर है। चटक धूप, समंदर की उमस वाली हल्की गर्मी, कमरे में पंखे और एसी की ज़रूरत। अगर होटल परिसर में दूधिया रोशनी का दबदबा न होता,तो तारों की दुनिया भी निगाहों में आती। फिर भी भोर के आलोक, दिन की ढलान, अरब सागर की लहरों में समाधि लेती शाम और रात की नीरवता को महसूस करने का माहौल तो गोवा देता ही है। ऐसे ही परिवेश में तुम्हारा यह उपन्यास पढ़ा।
एक रचना का रिश्ता हर पाठक से एक जैसा नहीं होता। रचनाएँ भी एक जैसी कहाँ होती हैं!कुछ तो साहित्य के बाज़ार में चर्चा, पुरस्कार और फैशन के लिए रची जाती हैं, कुछ विमर्शवादी राजनीति के कीर्तन के लिए, कुछ व्यवस्था-परिवर्तन के महा स्वप्न को धरती पर उतार लाने के लिए तो कुछ हिंदी पाठकों की दुनिया (चाहे वह कितनी ही छोटी हो) से यह कहने के लिए कि ‘मैं भी हूँ।’ तुम्हारे उपन्यास ‘आउशवित्ज़:एक प्रेम कथा’ को मैंने इत्मीनान से धीरे-धीरे पढ़ा। इस किताब की अंतर्वस्तु और संरचना पाठक से धैर्य, एकांत और ठहराव की अपेक्षा रखती है। स्मृति, अनुभूति एवं दुख की आंतरिकता को इतिहास के रंगमंच पर प्रस्तुत करने वाली तुम्हारी इस कृति में कथा कहने की कोई अधीरता नहीं है। अधूरे प्रेम की स्मृति एवं व्यथा से उपन्यास का आरंभ होता है। प्रेम के टूटने या अधूरेपन का दर्द तो वैयक्तिक होता है, लेकिन प्रेम-कथाएँ इस दर्द को एक सार्वभौमिक विस्तार देती हैं। क्षण को सनातन से, व्यक्ति को समष्टि से और निजता को मानवीय नियति के सिरे से जोड़ने की प्रक्रिया में ही रचना सार्थक और प्रामाणिक होती है। रचना पाठक और रचयिता के बीच एक सेतु बनाती है, जिस पर चलते हुए वह अपने पीछे छूट गई दुनिया, स्मृतियों और अनकहे दर्द की ओर लौटता है। उपन्यास के पहले पृष्ठ पर ही यह कथन संकेत देता है कि यह कथा नहीं, बल्कि जीवन है। जीवन और रचना को धारण करके ही समझा जा सकता है। कभी किसी टूटी, अधूरे पन्नों में बिखरी ज़िंदगी, गुजरे वक्त़ की ख़ामोशी में लिपटी इमारतें, कथा या फ़िल्म का कोई चरित्र अपना लगने लगता है। हमारा मन उसे धारण कर लेता है। तुमने दलित,मुस्लिम और बांग्ला स्त्रियों की आत्मकथाओं पर गंभीर, शोधपरक काम किया है। इन आत्मकथाओं से गुजरते हुए तुमने स्त्री-जीवन का नेपथ्य भी देखा होगा और उस सामाजिक संरचना को भी, जिसने उसे मानवीय गरिमा और अधिकारों से वंचित किया है। उपन्यास-लेखन और शोध में वैर का संबंध तो नहीं है,लेकिन शोध-सामग्री एवं उसके निष्कर्ष रचना को तथ्यों एवं आँकड़ों के रेगिस्तान में बदल सकते हैं। शोध से अर्जित ज्ञान,अध्यापन कर्म और व्यक्तिगत जीवन को रचनात्मक ताप से गला कर उन्हें कृति की अंतर्वस्तु में बदलने की चुनौती का सामना तुमने किया होगा। तुम्हारी इस रचना में दूसरे विश्वयुद्ध की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, यहूदियों का इतिहास, हिटलर के नाम गाँधी का पत्र, साड़ियों एवं मछलियों की बेशुमार कोटियों की चर्चा से तुम्हारे अध्यवसाय एवं बहुज्ञता का साक्ष्य तो मिलता है, लेकिन क्या यह तथ्यपरकता रचना की अंतर्वस्तु को अधिक घनत्व देती है? ये प्रसंग रचना के प्रवाह में द्वीप की तरह दिखाई देते हैं। रचना के भीतर होकर भी रचना से स्वतंत्र! संभवत तुम्हारा इरादा सच को इतिहास के साक्ष्य से पुष्ट करने का रहा हो, लेकिन मेरी समझ में एक रचनाकार ऐतिहासिक तथ्यों एवं वस्तुगत ज्ञान के अतिक्रमण से ही वह रचनात्मक तनाव अर्जित करता है, जो किसी रचना का प्राण तत्त्व है। इस तनाव के अभाव में रचना उड़ान की क्षमता खोकर सूचनाओं की जमीन पर रेंगने लगती है। रचना ऐतिहासिक और सामाजिक सच के समानांतर सच की एक अपनी दुनिया बनाती है, जिसमें कल्पना और यथार्थ, स्मृति और स्वप्न, प्रत्यक्ष और रहस्य तथा ज्ञात और अज्ञात की परा कोटियाँ उलझी होती हैं।मुझे लगता है कि रचना की इस चुनौती और ख़तरे से तुम वाक़िफ हो। बाहर को जान लेना क्या स्वयं को भी जान लेना है? शोधजनित ज्ञान के गुरुर को उपन्यास का यह लेखकीय कथन चकनाचूर कर देता है : ‘हम ख़ुद से कितना गाफ़िल रहते हैं! अपने ही मन को समझ नहीं पाते। इतना पढ़ लिख लेने के बाद भी मेरे भीतर की स्त्री का मन क्या उन्नत हो पाया? … कितना कठिन होता है ख़ुद को सँभालना, दूसरे को सँभालने से कई गुना कठिन।’
उपन्यास का आरंभ प्रतीति सेन की स्मृतियों से हुआ है। कौन है यह प्रतीति सेन?बांग्लादेश के रहमाना ख़ातून की नातिन,एक रेप विक्टिम टिया की बेटी,जिसका पिता अज्ञात और माँ अनदेखी है?पोलैंड के सबीना की सहेली? अधूरे प्रेम की कसक एवं अर्थहीनता के रेगिस्तान में जीवन का अर्थ तलाशती एक युवती, जिसके भीतर यह सवाल गीली लकड़ी की तरह सुलग रहा है कि ‘मैं कौन हूँ?’ लेखिका गरिमा श्रीवास्तव से प्रतीति सेन का क्या संबंध है? व्यक्तित्व,स्वभाव एवं अन्य बातों के आधार पर प्रतीत सेन को लेखिका का प्रतिरूप मानने का भ्रम हो सकता है, लेकिन प्रतीति सेन एक औपन्यासिक चरित्र है, जिसे तुमने अपनी स्मृतियों, अनुभवों एवं विचारों से गढ़ा और विकसित किया है। वह तुम्हारे अंतस के धागे से जुड़ी,कथा के आकाश में तैरती पतंग है। तुमसे बँधी,लेकिन तुमसे स्वतंत्र। प्रतीति सेन की स्मृतियों में कुछ दृश्य हैं, जिन्हें तुम्हारी आँखों ने देखा है। एक दृश्य पर मैं बहुत देर तक रुका रहा। उपन्यास में यह दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन का दृश्य है। यह महज़ दृश्य नहीं है, बल्कि उसमें जीवन की नश्वरता की ग़मगीन परते हैं। इस दृश्य को देखते हुए कबीर याद आते हैं। चिता की लपटों में राख होती देह को देखतीं कबीर की आँखें। जीवन का हर उत्सव अंततः एक अवशेष में बदल जाता है: ‘प्रतिमा के विसर्जन का इतना बड़ा आयोजन, नदी- तट पर पड़े रहते दुर्गा प्रतिमाओं के अवशेष, मिट्टी गल जाती, गलती जाती,लेकिन प्रतिमा की सजावट के निशान तट की मिट्टी को छोड़कर जाते नहीं, पता नहीं किसके इंतजार में! विसर्जन मुझे कभी नहीं भाया। मुझे सूर्यास्त के नदी तट पर आहिस्ते-आहिस्ते डूबती दुर्गा का बिंब दुख से भर देता।’ पृष्ठ 10 जीवन के सारे संबंध,विश्वास, धारणाएँ और मूल्य अंततः समय की लहरों में समा जाते हैं और इतिहास के तट पर घटनाओं एवं सूचनाओं के अवशेष में रह जाते हैं! यह दृश्य पाठक के भीतर निर्गुण भाव को पुनर्जीवित करता है।
जीवन में दुख के अनेक अध्यायों में एक अध्याय प्रेम के अधूरेपन का भी है। प्रेमी अभिरूप परिवार के दबाव में किसी और लड़की से शादी कर लेता है। जीवन के निर्णायक बिंदु पर पुरुष ही क्यों समझौता करता है? वह क्यों सुविधाओं और सुरक्षा का वरण करता है, स्त्री को भावनात्मक झंझावात एवं अकेलेपन में छोड़कर? अकेली रह गई प्रतीति सेन ने लेखिका से माँगा होगा अपने दर्द के हिस्से का दृश्य। दुख की सूचना नहीं, बल्कि एक पूरा परिदृश्य, जिसमें प्रकृति, देह, और मन की परछाइयाँ दिखें। तुमने बहुत आत्मीयता और निजता के गहरे स्पर्श से प्रतीति सेन के दुख को साकार किया है — ‘सोचती हूँ कि भावुकता भी क्या शै है! आप उसकी गिरफ़्त में यूं चले जाते हैं,ज्यों मकड़ी के जाले में फँसता शिकार। ये यूनिवर्सिटी की घनी शामें थीं, जिन्हें मैंने चुपचाप अपना बना लिया था। अश्वत्थ वृक्ष के पत्तों की झनझनाहट,सूखी टहनी पर बड़ी-चौड़ी आँखें लिए बैठा उल्लू, गहराती रात को अपने कोटर से झाँकती गिलहरी – सब मेरे दुख के साक्षी अनायास ही बन उठे। हॉस्टल का गेट जब बंद होने को होता,तब मैं जाती चुपचाप और थके कदमों से बिस्तर पर पड़ रहती। किसका सोग मना रही थी मैं? अभिरूप से बिछड़ने का, आत्मसम्मान पर लगी चोट का,रहमाना ख़ातून की नातिन होने का या जीवन की निरुद्देश्यता का? .. वे दिन भी क्या थे! जीवन का रास्ता आगे क्या होता हो, सूझता नहीं था।… मेरी चुप्पी दिनों- दिन बढ़ती जा रही थी। लगता था, मन के आकाश पर बादलों का डेरा स्थायी हो चला है।’12 ‘मेरा खिलौना टूट गया है’–इस सूत्र वाक्य में एक अफ़साने की मौन व्यथा विराम लेती है। खिलौने तो टूट ही जाते हैं! नियति के हाथों में चाहे दुनिया हो या फिर प्रेम, वहाँ तो सब खिलौना ही है! प्रतीति सेन अंतर्मुखी है,संकोची, समारोह भीरु :’ मुझे जैसों में सामाजिकता रह भी कहाँ जाती है। किसी निमंत्रण में जाते समय हाथ-पैर काँपने लगते हैं।’14 लेकिन वहह दब्बू या छुईमुई नहीं है। वह अपने कर्म,चुनाव और अपनी क्षमताओं को लेकर आश्वस्त है।वह जानती है कि उसने अपने बूते पर अपनी पहचान बनाई है। उस पर किसी का एहसान नहीं, किसी का कर्ज़ नहीं । अपने आत्मसंबोधन में वह सोचती हैं : ‘इस रास्ते के काँटे, रोड़े-पत्थर, सब तुमने अकेले दम पर साफ किए हैं, और यदि कोई तुम्हारे साथ रहे हैं तो वे हैं – ये धरती, ये आकाश, यह प्रकृति।ये ही तुम्हारे संघर्ष के साक्षी रहे हैं, जिन्होंने तुम्हारे अकेलेपन को एकांत में तब्दील करने का हुनर सिखाया है।’14 दुख और संघर्ष की घाटियों से गुजर कर ही जीवन का विस्तार और उसके शिखर दिखाई देते हैं। ‘शेखर : एक जीवनी’ की भूमिका में अज्ञेय लिखा था : ‘वेदना में एक शक्ति है, जो दृष्टि देती है।जो यातना में है, वह द्रष्टा हो सकता है।’वेदना से अर्जित दृष्टि के आलोक में प्रतीति सेन जीवन के अनेक सार्वभौमिक सत्यों का साक्षात्कार करती है।उनमें से एक सत्य यह भी है:
‘तन तन कहीं भी जाए,मन की यात्रा की कोई सीमा नहीं।… ज़िंदगी ऐसे ही चलती है टुकड़ों- टुकड़ों में। पूरे जीवन का खाका तय करके, उसी रास्ते पर अनुशासित होकर नहीं चला जा सकता। जीवन में जो, जैसा, जिस रूप में आए, उसे ग्रहण करना ही गति है।ज्ञानार्जन के लिए एकाकीपन ज़रूरी है,लेकिन वह समाज से, लोगों से कटकर, संवादहीन होकर संभव नहीं। भावों, विचारों का आदान-प्रदान दृष्टि को साफ और प्रखर बनाता है।’17 यह साफ और सूत्रात्मक दृष्टि दुख की एक लहर से कच्चे घड़े की तरह बिखर जाती है। होने के आलोक में जानने का खोखलापन उद्भासित हो उठता है : ‘यह जानते हुए भी मेरा मन क्यों ठहर जाता है? देखने लगता है बार-बार मुड़ कर पीछे, शायद कोई पुकार ले।’ 17 जबकि कोई पुकारने वाला नहीं है,फिर पुकार सुनने की आकांक्षा अस्तित्व के किस केंद्र से उठ रही है? क्या जीवन जानने और होने के दो केंद्रों में बँटा हुआ है? जानना किसी और केंद्र पर है और होना किसी और पर?जानना रंगमंच है और होना नेपथ्य। जानना नाटक है और होना जीवन। इस सच को प्रतीत सेन ईमानदारी से स्वीकार करती है। गरिमा,क्या इस सच को प्रतीति सेन ने तुमसे हासिल नहीं किया है?कथा के प्रवाह में कई बार प्रतीति सेन अपनी औपन्यासिक पात्रता छोड़कर तुममें विलीन हो जाती है।चरित्र और लेखकीय जीवनानुभूति का यह अद्वैत बिंदु इस उपन्यास का सर्वाधिक सघन,मर्मस्पर्शी और अविस्मरणीय प्रसंग है : ‘क्यों घूमती हो प्रतीति सेन दर-दर दुख की तलाश में? एक जगह रुक जाओ न! ठहर जाओ। पैंतालीस बसंत-पतझड़ बीत गए। कितनी तो बारिशें आईं और गईं,अनगिन काल , बैसाखियाँ – बहुत देख ली दुनिया। ठहरो तो सही।किसी पेड़ के नीचे बैठकर सुस्ताने का समय आ गया है। अब तो शरीर भी थकेगा। कौन देखभाल करेगा तुम्हारी? कोई नहीं, कहीं नहीं। तुम्हारी सूची में कोई नहीं, सिर्फ़ तुम, तुम्हारी रिसर्च और स्मृतियाँ… क्या खोया और क्या पाया? पाने के नाम पर नौकरी और भीतर पसरी अथाह चुप्पी।’37 इस अंश के बाद आगे पढ़ना संभव नहीं हुआ। घड़ी देखी। रात के साढ़े नौ बज चुके थे। पानी पीकर और कमरे का दरवाज़ा बंद कर मैं सागर-तट पर चला गया। मीलों तक फैला हुआ रेतीला तट। हवा एवं लहरों का नाद। तट की दुधिया रोशनी से परे, सागर और आकाश के बीच फैला हुआ घना अँधेरा। टहलते हुए, लहरों के शोर के समानांतर यह वाक्य मेरे ज़ेहन में गूँजता रहा : ‘क्या खोया, क्या पाया? पाने के नाम पर एक नौकरी और भीतर पसरी अथाह चुप्पी। ‘सोशल मीडिया के बुलडोजर ने मनुष्य की निजता और उसके उस नेपथ्य को रौंद डाला है,जहाँ जीवन के बुनियादी प्रश्न साँस लेते थे। साहित्य के एक सिरे पर समाज होता है और दूसरे पर व्यक्ति का आत्म संशय, जीवन की व्यर्थता का बेधक एहसास, अकेलेपन की ठिठुरन,जिसे ज्ञान और सार्वजनिकता की कोई उष्मा दूर नहीं कर पाती। उपन्यास का यह कथन भी याद आया कि हर दुख का समाधान नहीं होता। मैं सोचते हुए वापस लौटा कि जो रचना पाठक के भीतर उद्वेलन पैदा नहीं करती,वह चाहे जितनी चर्चित और पुरस्कृत हो, उसका महत्त्व केवल दस्तावेज़ी ही रहेगा। वह पाठक की स्मृति और उसकी भाव-संपदा का हिस्सा नहीं बन सकती।
रहमाना ख़ातून! द्रौपदी देवी से रहमाना ख़ातून बनने की कथा-यात्रा मुझे कई बार रुकना पड़ा। तेरह वर्ष की उम्र में विराजित सेन के साथ विवाह हुआ।सोलह वर्ष की उम्र तक तीन बच्चों की माँ बन गई। बेटी टिया और पति के साथ बांग्लादेश गईं। फिर भारत लौटना नहीं हुआ। बांग्लादेश के मुस्लिम लीग और मुक्तिवाहिनी के राजनीतिक संघर्ष की कीमत चुका कर वे रहमाना ख़ातून बनीं। वे स्वयं बलवाइयों के बलात्कार का शिकार हुईं और अपनी चौदह साल की बेटी टिया के साथ पाकिस्तानी कैंपों में सैनिकों के द्वारा की गई चरम बर्बरता का साक्षी बनीं। बलात्कार से गर्भवती हो गई अबोध बेटी की संतान प्रतीति को माँ बनकर पाला-पोसा। बेटी टिया विवाह एक अच्छे घर में करा कर कनाडा भेजा,और नातिन प्रतीति को पढ़ने के लिए कोलकाता। और जीवन की राह पर अकेले चलते हुए एक दिन उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा। अंतिम संस्कार पास-पड़ोस के लोगों ने किया। क्या द्रौपदी देवी उर्फ़ रहमाना ख़ातून की ऐसी ज़िंदगी नियतिजन्य थी या फिर स्त्री होने की सज़ा थी? रहमाना ख़ातून के जीवन पर सोचते हुए साँसे धीमी हो जाती हैं,कल्पना और यथार्थ के बँटवारे बेमानी हो जाते हैं। रहमाना ख़ातून को नींद नहीं आती। कभी थोड़ी देर के लिए आँख झपकती है, तो डरावने सपने झपट्टा मारते हैं? एक स्त्री, जिसने अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं किया। क्या ज़िंदगी स्त्री से स्वाभिमान की इतनी बड़ी कीमत वसूलती है? रात ढल गई है। मैं कुछ और सोचना चाहता हूँ लेकिन रहमाना ख़ातून की ज़िंदगी मुझे बार-बार घेर लेती है। मुझे लगता है कि वह उपन्यास का एक चरित्र मात्र नहीं,स्त्री-जीवन की त्रासदी का एक सनातन रूपक है।
सबीना की कथा उपन्यास में होलोकास्ट का अध्याय जोड़ती है। वह प्रतीति सेन और दूसरे विश्व युद्ध के विध्वंस एवं हिटलर द्वारा यहूदियों के नरसंहार के बीच एक कड़ी जैसी है। सबीना की भी कहानी है। इस कहानी में उसकी माँ है, प्रेमी है,संबंधों की ऊष्मा से रहित एक वैवाहिक जीवन है।इस कहानी के पर्दे पर राष्ट्रवाद,, नस्ल समाजवाद और धर्म के नाम पर की गई बर्बरताओं के भयावह दृश्य हैं। सबीना के पास दादा की डायरी है जिसमें कंसंट्रेशन कैंप की यातना के विचलित करने वाले विवरण हैं –
‘जानवरों की तरह हमें स्टेशन-वैगन में भरकर यहाँ, इस अँधेरे, डरावने स्टेशन पर उतार दिया गया। हम सब निहत्थे और उनके पास राइफलें, पिस्तौल, कोड़े और जर्मन शिकारी कुत्ते। ट्रेन से उतरते ही औरतों, मर्दों की अलग-अलग कतारें बनवा दी गईं। मेरे पीछे वाली बूढ़ी औरत तो कई बार गिर गई। जर्मन शिकारी कुत्ते हम पर लगातार भौंक रहे थे। लगता था – मौका पाएँ तो यहीं चींथ डालें। तब तो समझ में नहीं आया था कि हम सबको ट्रेन से उतार कर पंक्तियों में क्यों खड़ा कर दिया गया था। गोद के बच्चों की रोने की समवेत आवाज़, बूढ़े-बुढ़ियों की कलप भरी आवाजू और लगातार भौंकते कुत्ते। सर्द और निस्पृह आकाश, ट्रेन के इंजन से निकलती धुएँ की अंतिम, रहस्य भरी साँस, सुबकियाँ – इन सबने मिलकर यह एहसास करा दिया था कि यह वह जगह है, जहाँ पहुँचना अंतिम है। यहाँ आया जा सकता है, पहुँचा जा सकता है, वापस नहीं जाया जा सकता।’ 26
एक सवाल है कि साहित्य-प्रेमी पाठक-समुदाय तुम्हारी इस कृति को उपन्यास के रूप में पढ़ेगा या इतिहास के रूप में? इस रचना की परिधि में इतिहास,वस्तु-वर्णन और वैचारिक सूत्रों का प्रतिशत कथा की तुलना में अधिक है,लेकिन ये उपन्यास की परिधि पर हैं। केंद्र पर है स्त्री। राष्ट्र, धर्म,विचारधारा जैसे बड़े मुद्दों में निहित हिंसा और बर्बरता की शिकार। देह और मन पर बर्बरता के ज़ख्म लिए, जीने को अभिशप्त। इतिहास की आँखों से ओझल लाखों स्त्रियों की यातना के इतिहास को तुमने आत्मकथा की शक्ल में दर्ज़ किया है। केंद्र और परिधि के बीच जो शून्य है, उसी में आहत,मर्दित जख्म़ी, मगर अपराजित स्त्रियों की आवाज़ें तैर रही हैं। स्त्रियों के नाम, उम्र और देश अलग-अलग हैं, मगर जीवन की कहानी तो एक ही है। ‘आउशवित्ज़ : एक प्रेम कथा’ इतिहास के समानांतर स्त्री होने की यातना का इतिहास है। इस उपन्यास के सभी स्त्री चरित्रों ने जीवन की गहरी यातना से गुजर कर अपना व्यक्तित्व अर्जित किया है। चरित्रों को निर्मित और विकसित करने का करिश्माई कौशल तुम्हारी लेखनी में है। तुमने द्रौपदी देवी के पति और अपने नाना विराजित सेन को भी गहरी सहानुभूति से देखा है। बांग्लादेश से अपनी पत्नी को वापस ना ला पाने पर स्वयं को का पुरुष महसूस करने वाले विराजित सेन का या आत्मा लाभ उपन्यास के मार्मिक प्रसंगों में से एक है :
“वे कई बार अनजानते ही रेलवे स्टेशन पर जाकर खड़े हो जाते, हैं कहीं पत्नी दिख जाए शरणार्थियों की भीड़ में,बेटी टिया का हाथ थामें ट्रेन से उतरती हुई। कई बार लाल पाड़ की साड़ी पहने हुए किसी अन्य को देखकर भ्रम भी हुआ, लेकिन वे अपनी बात किसी से साझा नहीं कर सकते थे। प्रश्न- प्रतिप्रश्न अपने भीतर ही चलते रहते –
तुम वहाँ रुके क्यों नहीं?
कहाँ रुकता? देखा नहीं तुमने,मुझ पर फरसा चलाने को तैयार थे।
तुम पुलिस के पास जा सकते थे।
चारों और मारो-काटो के शोर में मुझे कुछ सूझा ही कहाँ। हाथ में पैसे भी नहीं थे कि कहीं ठहर कर सोच सकूँ।
तुम्हारे सामने तुम्हारी पत्नी के साथ.. और तुम्हें अपनी जान की पड़ी थी। बेटी के बारे में भी नहीं सोचा।
पर मैं अकेला था। बलात्कार से पत्नी को कैसे बचाता? वे छह-सात थे।दरिंदगी उनकी आँखों से टपक रही थी।
तुमने पत्नी की रक्षा का वचन दिया था!
अब शायद ही जीवित हो वह, पर बेटी याद आती है।” पृष्ठ 190
उपन्यास के आख़िरी पन्ने पर अस्पताल में मरणासन्न विराजित सेन टैगोर रचित ‘गीत बितान’ का एक पद लटपटाये उच्चारण में है बोल रहे हैं: मैं जानता हूँ कि तुम मेरे मन के भीतर की बात से अनजान नहीं हो, मैं छुपाना चाहता हूँ पर मेरी आँखें सब भेद खोल देती हैं।’उपन्यास के पृष्ठ पर कथा ख़त्म हो गई है।शाम ढल गई है।भीड़ से दूर रेत पर बैठा लहरों का सिलसिला देख रहा हूँ। कमरे में लौटकर एक बार फिर किताब खोलता हूँ और नज़र तुम्हारे इस लेखकीय कथन पर ठहर जाती है :’ कथा ख़त्म कहाँ होती है कोई?चलती जाती है। बिराजित और किशोरी पत्नी की प्रेम कथा,सबीना और आंद्रेई की अधूरी कथा,प्रतीति और अभिरूप की कथा ..वह रुकती कहाँ है! नित नूतन होकर सृष्टि के आदिकाल से चली ही आती है, मनुष्य की विकल्पहीनता के गहरे एहसास के साथ….

