
वरिष्ठ लेखक जयशंकर की किताब ‘गोधूलि की इबारतें’ कथेतर गद्य की एक अच्छी किताब है। आधार प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब पर यह टिप्पणी लिखी है युवा कवयित्री प्रिया वर्मा ने-
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बहुत बार, मन यात्रा करने का विचार करता है, अगर वह ऐसा नहीं कर पाता तो बीते समय में की हुई यात्राओं की स्मृति कुरेद कर कुछ खुराक हासिल करता है।
किताब पढ़ना- शायद हम किसी किस्म की भूख की तृप्ति के लिए चुनते होंगे।
अगर कोई नुस्खा फायदेमंद हो तो उसे और जरूरतमंद को बताने से मनुष्यता में वृद्धि होती है। मनुष्य में संवेदना की तलाश करना किताब का सबसे प्रथम काम है।
“गोधूलि की इबारतें” ऐसी ही किताब है, जो कि अच्छी पढ़ने लायक किताबों में नाम शामिल करने के योग्य हैं। यद्यपि बहुत संभव है कि यह किताब किसी एक भी विधा की शुद्धता की कड़ी बाधा दौड़ में भागीदारी का दावा करने में असमर्थ हो, पर यह अपनी तरह से अनूठी किताब इसलिए है कि यह रोज़ गोधूलि बेला में बैठकर अपने आत्म को दर्ज़ करते हुए बाहर की घटनाओं और दृश्यों से उनकी संगत बैठाने जैसा लेखन है। अर्थात अधिकांश भाग पढ़ते हुए लगा कि लेखक की डायरी आँखों के सामने खुल गई है और पन्नों के उस पार लेखक के देखे, समझे, पढ़े और सोचे हुए का दैनिक लेखाजोखा है। सशक्त, कसा हुआ गद्य, जिज्ञासा जगाता हुआ लेखक के देखे हुए के भूगोल, इतिहास और दर्शन को बांचता हुआ उनके परिचित लेखकों के संसार में भ्रमण हेतु उंगली थामे साथ लिए जाता है।
मेरी दृष्टि में यह डायरी रेखाचित्र, निबंध, वक्तव्य, कहानी, कविता, उपन्यास और सिनेमा पर महत्वपूर्ण दस्तावेजों का विशद समुच्चय है जिसे पढ़ते समय लगता है कि हम विश्व के जवाबदेह नागरिक हैं और बहुत कुछ जानना शेष है, बहुत सारी रिक्तियां हैं जिन्हें स्पर्श करना बाकी है, बहुत-सी बातें हैं जिन्हें स्वर देना रह गया है, बहुत-से दृश्य अभी देखने से छूट गई हैं और उन दृश्यों में स्वयं की उपस्थिति पर बात करना भूला हुआ रह गया है। जहां हमें घूमना है ऐसे बहुत सारे स्थान अनदेखे हैं। सिनेमा, कला, साहित्य, समाज से जुड़े लोग, लेखक और कवि जो उनके समग्र जीवन दर्शन में हमसे अनजाने रह जाएंगे। हम कितना कम जी पाएंगे या शायद जी कर भी जीवन की आत्मा से अनभिज्ञ रह जाएंगे।
लेखक जयशंकर जी ने साहित्य, कला, संगीत और सिनेमा जगत के जगमगाते हुए लोगों के लिखे, दिखाए और जताए हुए संसार के समानांतर उतरते हुए जीवन में उनकी उपस्थिति के अर्थ को अपनी दृष्टि के नए आयामों में दर्ज़ करके कथेतर गद्य में एक अलग तरह का कदम रखा होगा। यह किताब करीब तीन वर्ष पहले आधार प्रकाशन से आई, पर इसे साल दो हज़ार तेईस में पढ़ते हुए भी यह नहीं लगता कि देर हुई। मतलब कि आगे भी वर्षों तक यह किताब प्रासंगिक और अहम बनी रहेगी इन सरोकारों के चलते कि इस से पढ़ने वाले के सामने एक नया भले ही बीता हुआ संसार खुलता है, पर वह नई दृष्टि से देखा गया संसार लगता है ।
लेखक जयशंकर जी जैसे ज़हीन पाठक और महीन दर्शक इस किताब की सबसे बड़ी खासियत हैं क्योंकि यह उन की साहित्यिक स्वीकारोक्तियों का गद्य है।
वे ‘ लाल टीन की छत’ से पढ़ने के आरंभिक सुख का स्वीकार करते हुए दुनिया भर के अच्छे लेखकों को उद्धृत करना नहीं भूलते। एक अध्याय ‘पुस्तक का जादू’ में वे लिखते हैं —
‘ कोई भी अच्छी किताब आपके जीवन में धीरे-धीरे आती है। उसका आपके जीवन में आना बिल्कुल किसी मित्र की तरह आना होता है। धीरे-धीरे चुपचाप एकदम शुरुआत में वह आपकी जिंदगी के ऊबड़- खाबड़ आंगन में चहलकदमी कर रही है। वह आपके आसपास से शहर के लिए निकलती है। उसकी निगाहें कभी-कभार आपके मन की किसी खिड़की पर थम जाती हैं। फिर एक दिन आता है जब आप अपने मन और मस्तिष्क के दरवाजों पर उस किताब की हल्की-हल्की दस्तकों को सुनते हैं। इस तरह एक दिन आप अपनी आत्मीय पुस्तक के लिए दरवाजा खोलते हैं और बाद में वही पुस्तक आपके लिए कितने-कितने दरवाजों और खिड़कियों खोलती है ‘
भावगत संरचना, सरल कथ्य, भाषाई सहजता और वैचारिक स्पष्टता ने गोधूलि की इबारतें को महत्वपूर्ण और आत्मीय पुस्तक होने योग्य बनाया है।
गोधूलि की इबारतें की संरचना पांच भागों में विभाजित है – इस तरह कहें कि एक लंबी कहानी या एक वृहद उपन्यास अनेकों उपकथाओं में गुंथा हुआ, अनेक संस्मरणों और विश्व सिनेमा को दिखाती एक लिखित डॉक्यूमेंट्री है।
एक किताब के मूल भाव तक पहुंचने में एक गंभीर पाठक को समय लग सकता है और समय देकर किताब को पढ़ना भी चाहिए।
गोधूलि की इबारतें का हर खंड महत्वपूर्ण है और प्रत्येक खंड की विषयवस्तु आत्म- विवेचना है, कहीं-कहीं आत्मालोचना भी लगती है। लेखक की जीवन यात्रा का साहित्यिक वृतांत पढ़कर पाठक को प्रेरणा मिलती है, संतोष होता है, जीवन के प्रति आशा और लिखे हुए में आस्था बढ़ती है—
‘….”सूखा” जैसी कहानी पढ़ते हुए महसूस होता है कि किसी के इस कथन में सच्चाई है कि एक सच्ची किताब हमें पढ़ती है। पढ़ने की अपनी प्रक्रिया का जटिल और कठिन होना भी इस किताब के साथ रहते हुए याद आता रहता है। किसी बड़ी और सच्ची कृति को उसके रचनाकार के उसे रचे जाने के वक्त के आत्मसंघर्ष के अभाव में पूरी तरह समझा ही नहीं जा सकता है। पिछले बरसों में इन कहानियों को बार-बार पढ़ा है, अपने लिए इन्हें अविस्मरणीय और असाधारण पाया है, लेकिन इनके सौंदर्य को मैं जितना जैसा महसूस करता हूं उन्हें उस तरह शब्दों में व्यक्त क्यों नहीं कर पाता क्या इसलिए माना जाता है लेखक के समकालीन पाठक उसके कृतियों को पूरी तरह से ठीक तरह से समझ ही नहीं पाते हैं क्या सचमुच में एक सुंदर कृति को पूरी तरह पढ़ पाना पाठक का स्वप्न ही बना रहता होगा?’ (‘निर्मल वर्मा की असाधारण कहानियां’ अध्याय से)
यदाकदा बिखरा हुआ-सा महसूस होता है पर यह उस तरह का बिखराव है जैसा कि बारिश की किसी शाम में आसमान के अलग-अलग रंगों के से बनता और बिगड़ता सौंदर्य हो और दर्शक को बांधे रखता हो।
(१)-
‘एक एक कहानी के लिए नोट्स, उसकी हल्की-सी थीम। 3738 बरस की एक विवाहित स्त्री रोज ही अपने दफ्तर के लिए बस पकड़ने के लिए अपनी बस्ती की एक गली से गुजरती है एक दिन दफ्तर के लिए निकलते ही उसे पता चलता है की गली की शुरुआत के मकान के 40 बरस के बैचलर ने छत पर लटक कर खुदकुशी की है वह याद करती है कि इसी घर से वह रोज ही पश्चिमी शास्त्रीय संगीत का कोई न कोई अंश सुना करती थी वह पहली बार उस घर के भीतर जाती है और वह दीवार पर उसे अपनी युवावस्था की एक तस्वीर टन ही नजर आती हैं वह दफ्तर नहीं जाती है घर लौटती है और इस तरह उसके मन का भटकाव शुरू होता है और लेखक के मन के गलियारों के भटकाव भी’
(२)-
‘ मुझे अपने थोड़े- बहुत लिखे गए में जो बात अत्यधिक हताशा देती है वह यह है कि मैं हिंदी जैसी समृद्ध और संघर्षशील भाषा में लिख तो रहा हूं लेकिन उसकी विराट् शक्तियों, विस्तार और गहराइयों से मेरी थोड़ी-सी भी पहचान मुझे अपनी भाषा में नजर नहीं आती। लगभग बीस वर्षों से लिखते हुए यदि मैं इतने कम शब्दों से अपना काम चला रहा हूं तो उसमें यह बात भी है कि मैं भाषा से अपने अनुराग को उस तरह बढ़ा नहीं रहा हूं, जिस तरह से मुझे बढ़ाना चाहिए।’
(‘अपनी भाषा से रिश्ता’, अध्याय से)
अपने हर अध्याय के साथ पाठक को बांधती हुई मुक्त भी करती जाती है, पाठक के मन पर पैनी पकड़ बनाते हुए उसके भीतर भाषा में कह सकने की सीमा के लिए आगाह करती जाती है। इतना विस्तृत वितान है यह कि विरला पाठक ही होगा जो इसे एक बैठक में पढ़ सकेगा। क्योंकि हर अध्याय किसी नए अक्ष पर नाचती हुई पृथ्वी की गति में मग्न भाव से लिखा गया है इस तरह कि आप पढ़िए और विचार में गोता लगाइए।
‘समाज बदलता है, आदमी से आदमी के रिश्तों में परिवर्तन आता है, आदमी का अपने समय से, अपनी सभ्यता से, अपने समाज और देश से संबंध बदलता रहता है और समाज में आते ये बदलाव साहित्य में भी बदलावों को प्रेरित करते रहते हैं।
जीवन की खोज करते रहना साहित्य का स्वभाव है, मगर जीवन का आविष्कार करना साहित्य की जिम्मेदारी है।
हमें इस सच का भी ध्यान रखना चाहिए कितनी तेजी से दुनिया बदलती है, उतनी तेजी से ना भाषा बदलती है और ना ही बदल सकती है।
साहित्य का परिवर्तन अंतरात्मा का परिवर्तन है इसलिए उसकी गति धीमी होती है।’
(‘साहित्य समाज और राजभाषा’ अध्याय से)
लेखक बहुत अधिक संप्रेषित करना नहीं चाहते हुए भी बहुत गहनता से विचारसरोवर में हिलोर पैदा करते हैं।
एक साहित्यिक की नियमित डायरी पढ़ते हुए पता लगता है कि ये सभी नियमित नोट्स करीब तीन दशक के अंतराल पर अब एक अदना-सी पाठक के हाथ लग गए हैं और वह पढ़कर रोमांचित हुई जा रही है। और पढ़ते हुए वह चाहती है कि साथी पाठकों को इन नोट्स का आस्वाद लेना चाहिए।
यह कल्पना कि पढ़ने वाले के द्वारा इस डायरी के हर पन्ने पर इसके लेखक जोकि एक गहन और गंभीर विश्लेषक हैं की अनुभवी दृष्टि और विचार से रोमांचित होता हुआ उस ईमानदारी के बारे में सोचने लगता है जो कि कहीं ना कहीं जाकर बेईमानी में बदल सकती थी पर नहीं बदली। और यही लेखक की जीत है।
अधिकांश बेस्ट सेलर्स की वह लेखकीय बेईमानी जो अपनी पूरी ईमानदारी से प्रेरणा प्राप्त कर दसियों किताबें प्रकाशित करवाने भर प्रसिद्धि प्राप्त कर लेती है ( जैसा कि चलन में है) पर ऐसा नहीं होना- इस किताब और किताब के लेखक दोनों को एक विशिष्ट फेहरिस्त में दर्ज करते हैं और बधाई का पात्र बनाते हैं।
संभव है कि यह किताब बहुत से पाठकों के लिए नहीं हो जैसा कि होता भी है कि हर किताब हर पाठक के रुचि, स्वभाव और जीवन अनुभव के अनुरूप नहीं होती किंतु जिन भी गंभीर अध्येताओं अथवा पाठकों के लिए यह किताब मुफीद बैठती होगी, यह उन्हें एक साथ अनेक रसों में डुबो देती होगी।
मतलब कि कई बार यह उन्हें बहुत हद तक उदास और चुप कर देती होगी और कई बार आश्चर्य में में डाल कर बोलने को बेचैन कर देती होगी।
गोधूलि की इमारतें के चौथे भाग में संस्मरण है जिनमें सिमेट्री के बाद का वह मोड़ अपना शहर और बनारस सपना और यथार्थ बहुत सुंदर बन पड़े हैं अपना शहर पढ़ते हुए लगा कि जैसे लेखक के साथ उसके शहर की यात्रा पर है
(१)-
‘ बाजारू संस्कृतियों के भयावह दौर में अपने आप को सिर्फ जीवित रखने के लिए हर शहर को एक जैसा हो जाने के लिए विवश होना पड़ रहा है। अब भी लखनऊ, हैदराबाद, इलाहाबाद और पुणे जैसे शहरों में भटकते हुए कहीं यह चुभता रहता है कि हम उस शहर में नहीं घूम रहे हैं जिसके बारे में बीस-पच्चीस बरस पहले ही हमने पढ़ा था, सुना था। एक दिन आएगा जब हम इस शहर की अपनी निजता और निराले पर और अस्मिता को पूरी तरह खो देगी पर शायद ऐसा नहीं होगा ऐसा होना भी नहीं चाहिए।’
(२)- अपने शहर का कुछ भी पराया नहीं होता है पर आए शहर दूसरे शहर होते हैं अपना शहर अपना ही शहर होता है अपना शहर जिस अपनेपन को देता रहता है वैसा अपनापन और कहां नसीब हो सकता है इसलिए भी शहर के बारे में लिखना शहर का ऋण चुकाना मुश्किल ही नहीं असंभव काम भी है ‘
(‘अपना शहर’ संस्मरण से )
अनेक यूरोपीय, भारतीय और लातिन अमरीकी फिल्मों उनके निर्देशकों, उनके कलाकारों, उल्लेखनीय चित्रकारों, मानीखेज़ लेखकों और कवियों, महान किताबों – विशेषकर टॉलस्टॉय, चेखव, दोस्तोयवस्की, पुश्किन, काफ्का, जेम्स जॉयस, टॉमस मान, निर्मल वर्मा, मुक्तिबोध के ज़िक्र के साथ, बहुत सारी कलाकृतियों को और स्थानों को जैसे दिल्ली के मंडी हाउस, पालिका बाजार, गांधी शांति प्रतिष्ठान, कनॉट प्लेस, निर्मल वर्मा के घर, नगरीय पुस्तकालय से लेकर नागपुर, आमला , बंगाल और बनारस तक के भौगोलिक रूप, रस, गंध के इतर उन शहरों और उन की खास जगहों में पाई जाने वाली स्थानीयता की आत्मा को स्पर्श कर एक तरल गद्य की विधा में दर्ज करने से गोधूलि की इबारतें मर्मस्पर्शी बनती जाती है।
कई बार आश्चर्य होता है कि लेखक ने संसार की विशालता को कितनी सूक्ष्मता से देखा और इसमें घुमक्कड़ी की है। एक जीवन में उन्होंने कितनी फिल्में देख डालीं हैं और कितनी अनथक यात्राएँ की हैं, निरंतर संगीत की संगति की हैं, एकांत का अभ्यास किया है, अहर्निश किताबें पढ़ी हैं और इस किताब के पीछे शायद उसकी मंशा संसार में नए और अच्छे पाठकों को बनाने के लिए तो इस तरह गोधूलि की इबारतें भावोद्दीपन करती हुई साथ ही आम सरल पाठक के सामान्य ज्ञान में वृद्धि भी करती है।
बहुत से अनुच्छेद ऐसे बन पड़े हैं जो कि भावुक मन वाले पाठक को हाथ में कलम लेकर बैठने को विवश कर देते हैं ताकि उनकी पंक्त- पंक्ति में आए महत्वपूर्ण नामों और सुझावों को लिखा जा सके, नई किताबों के नामों को नोट किया जा सके और उन्हें पढ़कर इस संसार को देखने की नई दृष्टि विकसित की जा सके।
सारा अच्छा सिनेमा जो कि आम जनमानस की आंख के आगे किन्ही व्यावसायिक साजिशों के चलते कभी आया ही नहीं यह किताब न सिर्फ उनके नाम की परतों को आज़ादी से खोलती है बल्कि उनमें आए पात्रों को सामने लाकर इस तरह खड़ा कर विश्लेषण करती है कि वह पाठक से सीधा सवाल करते हैं कि इतने अरसे तक हमसे दूर क्यों रहे?
गोधूलि पढ़ते हुए लगता है कि हम किसी कला वीथिका में घूमते हुए चित्रों के साथ समय बिता रहे हैं। ये चित्र अमूर्त और मूर्त दोनों संसारों के बीच बने गलियारे को कभी- कभी गहरा और गाढ़ा कर देते हैं और कभी कभी इतना धुंधला कि कोई अंतर लगता ही नहीं।
कुछ पंक्तियां शांत पानी में फेंके हुए नन्हे पत्थरों की तरह हैं जो प्रतिध्वनियां पैदा करती हुई याद में बनी रह जाना चाहती हैं।
लगता है कि यह एक संगीत है जो आत्मा की झिलमिल सतह पर बजता हुआ छूने को मिल गया है- किसी खोई हुई अधूरी लिखी धुन के कुछ अंश इन पन्नों पर लिखे मिल गए हैं, जो कि इतने लंबे अरसे से गुम थे कि महसूस ही नहीं होते थे कि ये भी हमारे जीवन सारांश के संदर्भ हैं।
१-
‘बूढ़ा होना ही जीवन है; बूढ़ा होना ही जादू है और जीवन और जादू के बीच भटकना? यह एक बावला सवाल है।’
२-
‘यह वहां नहीं जाना चाहतीं। अपने देश में ही मरना चाहती हैं। देश में उतना नहीं, जितना परिचित पास-पड़ोस में, परिचित परिवारों और पेड़ों के बीच। पेंशन से एक हिस्सा कब्रिस्तान में अच्छी जगह के लिए, अपनी कब्र के बेहतर होने के लिए बचाती रही हैं। इनका यह भी मन है कि इनकी कब्र के पत्थर पर इनकी ही लिखी गई एक कविता होनी चाहिए।’
(‘बुढ़ापा : कुछ रेखाचित्र’ से)
गोधूलि की इबारतें किसी तरह की भारी भरकम व्याख्या नहीं करती अपितु चेतना के एक अनछुए तल पर कुछ मथती है जिस से लेखक ही नहीं लेखक द्वारा दर्ज की हुई सारी वैचारिक चेष्टाओं के प्रति मन में आदर भाव पनपता है। और एक संकल्प भी स्वयं बनता है कि इसे लौटकर फिर से पढ़ेंगे ताकि जो भी धुंधला छूट गया हो, वह प्रकाशमान हो सके।
प्रिया वर्मा

