अनुराग चतुर्वेदी की पुस्तक का अंश: बाल ठाकरे का इंटरव्यू

अनुराग चतुर्वेदी देश के जाने माने पत्रकार हैं। धर्मयुग, रविवार, संडे ऑब्जर्वर जैसी पत्र पत्रिकाओं में पत्रकारिता की एक लंबी पारी खेलने के बाद वह नब्बे के दौर में मुंबई में सांध्य दैनिक हमारा महानगर से बतौर संपादक जुड़े। तब सांप्रदायिकता और आतंकवाद से जूझती मुंबई में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की मशाल लेकर चलती पत्रकारिता की एक पतली मगर मजबूत धारा की अगुआई करने वालों में शामिल रहे। पत्रकारिता के अलावा एनजीओ के जरिए समाज के सबसे कमजोर तबकों का संबल बनने का सराहनीय प्रयास भी अनुराग जी के खाते में दर्ज है। ऐसी विविधतापूर्ण जीवन यात्रा के अनेकानेक दिलचस्प पहलुओं को समेटती उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक ‘हवाओं की दस्तक’ जल्दी ही छप कर आने वाली है। यहां प्रस्तुत है उसी पुस्तक का एक अंश जिसमें उनके पहली बार शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के आवास जाने और उनका इंटरव्यू लेने का प्रसंग है- संपादक

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बाल ठाकरे का इंटरव्यू

बाल ठाकरे बोले, मैं मुस्लिम संपादकों की मैगजीन के लिए इंटरव्यू नहीं देता

रविवार को छोड़ा नहीं था, पर छोड़ने का तय हो गया था. संडे ऑब्ज़र्वर नाम का साप्ताहिक दिल्ली-मुंबई से शुरू करने की योजना थी. उदयन शर्मा प्रधान सम्पादक थे और मालिक अम्बानी घराना था. इस प्रोजेक्ट के साथ पहले दिन से जुड़ा हुआ था. अनिल अम्बानी, उदयन शर्मा और मैं कई मीटिंग्स कर चुके थे और उषाकिरण (जहां उन दिनों अम्बानी परिवार रहा करता था) जाकर भोजन भी करके आ चुके थे. दिल्ली में वसंत विहार की एक कोठी में अम्बानी परिवार के विश्वस्त उनियाल जी के साथ फ़ाइनल मुलाक़ात हुई और अख़बार के ड़मी अंक निकालने का तय हुआ.

संडे ऑब्ज़र्वर हिन्दी नाम का कोई  अख़बार तो था नहीं, इसलिए हम तब अपने को रविवार का कहते थे और मेल-मुलाक़ात के लिए इस नाम का उपयोग करते थे. मुलाक़ात के दौरान ही नयी योजना की जानकारी देते थे.

मुंबई का मतलब तब होता था फ़िल्मी दुनिया, अपराध की दुनिया के बदनाम गिरोह और राजनीति में बाल ठाकरे.

सम्पादक बने उदयन शर्मा ने बॉम्बे से अपनी पत्रकारिता की शुरुआत की थी और वे बॉम्बे को अच्छी तरह जानते थे. उदयन शर्मा ने कहा, पहले अंक में ही हमें बाल ठाकरे से बातचीत चाहिए. लंबी हो, विवादास्पद हो और जल्दी हो.

बाल ठाकरे और शिवसेना से मेरा कोई परिचय नहीं था. घनिष्ठता तो बिलकुल नहीं. हमारे समाजवादी विचारों के पारिवारिक मित्र और मुंबई आने पर सबसे पहले मिले दीपक भाई की शिवसेना के नेता सुधीर जोशी से अच्छी जान-पहचान थी और तब सुधीर जोशी और मनोहर जोशी का सेना में जलवा था.

दीपक भाई ने सुधीर जोशी को मेरा परिचय संडे-रविवार के संवाददाता के रूप में दिया और एक शुक्रवार की देर शाम को बांद्रा (पूर्व) स्थित मातो श्री में इंटरव्यू तय हो गया. हार्बर लाइन से बांद्रा जाना मुझे हमेशा अच्छा लगता है. विंडो सीट मिल जाये तो क्या कहना. बांद्रा स्टेशन से कई बार साहित्य सहवास (डॉक्टर भारती का निवास) पत्रकार (सरल जी निवास) और एम.आई.जी. कॉलोनी (जयंत धर्माधिकारी का निवास) गया था पर बाल ठाकरे के यहाँ पहली बार ही जा रहा था. एक छोटे से बरामदे में बैठाया गया. वहाँ बेंच रखी थी, एक-दो कुर्सियाँ रखी हुई थीं. पानी की व्यवस्था थी. एक मटका था, एक छोटा ग्लास रखा था. थोड़ी देर में बारिश शुरू हो गयी. मुंबई वाली तेज. कुछ पानी अंदर भी आया. लोग आ जा रहे थे, सामान्य भी और ख़ास भी. पर अपना नम्बर नहीं आ रहा था. एक पी.ए. नुमा आदमी ज़रूर बैठा था जो हर आगंतुक को अंदर जाने की अनुमति दे रहा था. मेरे पास सवालों की यादी (सूची) थी जिसे मैं बार-बार पढ़ रहा था. सोचा यह सवाल पहले, फिर थोड़ा विवास्पद बाद में.

तभी बुलावा आया. ठाकरे साहब ने मुझे देखा और बैठने का इशारा किया. उन्होंने ओल्गा टेलिस के बारे में पूछा जिन्हें मुंबई का, तब का हर राजनीतिक नेता जानता था. ओल्ग़ा पत्रकारिता के क्षेत्र में इज्जत से लिया जाने वाला नाम था. मैंने सोचा अब सामान्य परिचय हो चुका है, बातचीत शुरू की जानी चाहिए. मैंने सवालों की सूची निकाली, तभी बाल ठाकरे बोले, यह इंटरव्यू तो संडे के लिए है ना? मैंने कहा, “यह रविवार के लिए है.“

बाल ठाकरे ने पूछा, “उसका सम्पादक कौन है?“

मैंने जवाब दिया, ”उदयन शर्मा“.

बाल ठाकरे ने फिर सवाल पूछा, ”एम.जे. अकबर क्या हैं वहाँ?”

मैंने जवाब दिया, “वे हमारे ग्रुप एडिटर हैं“. अकबर साहब का रुतबा बढ़ाने के ख़्याल से मैंने कहा, “उनका नाम सभी प्रकाशनों में छपता है, रविवार में भी.

“अच्छा,यह बात है.“ ठाकरे साहब का थोड़ा आश्चर्य भरा जवाब था. वे सिगार जला चुके थे. काफ़ी भगवा वस्त्र धारण किए हुए थे. बोले, “मैं मुस्लिम सम्पादकों की मैगज़ीन के लिए इंटरव्यू नहीं देता.”

बातचीत ख़त्म.

बाहर बारिश. सम्पादक को सूचना दे आया था, पेज ख़ाली रख दिये गये थे. अब क्या होगा? सोचने लगा. तभी एकदम एक कहानी याद आयी. सोचा थोड़ी साम्प्रदायिक है, पर सुना दो. शायद बात बन जाये!

बात बिगड़ चुकी थी. मैंने कुतर्क से बात फिर शुरू की कि बातचीत हो जाये और जिस इंटरव्यू के लिए मैं आया हूँ वो हो जाये. मैंने कहा वे मुस्लिम है, यह सच बात है. लेकिन मेरी माँ महाराष्ट्र की हैं और हम लोग मथुरा से खानदेश शिवाजी महाराज के कारण आये. यह कहानी क़रीब पाँच सौ साल पुरानी है. इसकी कोई ऐतिहासिकता तो नहीं है पर यह हम चतुर्वेदियों की परम्परा का हिस्सा बन गया है. हमारे पुरखों ने आगरा के क़िले से बाहर निकले शिवाजी महाराज और उनके बेटे संभाजी को सुरक्षित रूप से रायगढ़ पहुँचाया. मथुरा से रायगढ़ की यात्रा में मथुरा के चौबे शिवाजी के साथ रहे और इसका बदला मुग़ल राजा ने सामूहिक नरसंहार करके चुकाया. यह ज़लियांवाला बाग़ नरसंहार से भी बड़ा हत्याकांड था. हज़ारों चतुर्वेदी मारे गये. फिर भी शिवाजी का साथ नहीं छोड़ा. वे चितौड़गढ़ के रास्ते महाराष्ट्र गये. कई परिवार बेडच नदी के किनारे पीपली गाँव में रहने लगे. मिसरों की पीपली में हमारी दादी रहती थीं. हमारे बाबा उदासीन सम्प्रदाय के सदस्य थे और 32 साल की उम्र में गृहस्थ बने. वे हाड़ौती क्षेत्र के झालावाड़ रियासत के मुलाजिम थे. हमारे नाना के पुरखों को शिवाजी महाराज ने खानदेश के जलगाँव में बसाया. वे नसीराबाद में बसे जहां मेरे पिता ने पहले इंग्लिश हाईस्कूल के प्रिन्सिपल का पद 21 वर्ष की उम्र में सम्भाला.

आगे की कहानी ने तो बाल ठाकरे का मन ही बदल दिया. “विवाह किसी भी समाज की सबसे पवित्र परम्परा होती है, जहां स्मृति के साथ उत्सव भी मनाया जाता है. आज भी जब चतुर्वेदी बारात आती है तो जब बारातियों को भोजन कराया जाता है तो “मुग़ल पसारे“ जाते हैं. जहां बारात बैठती है उस जगह आटे से मुग़लों की शक्लें उकेरी जाती हैं, जिसका आशय होता है, मुगलों, हम तुमसे इतनी नफ़रत करते हैं कि इस आनंद के दिन भी हम तुम्हारी कब्र पर बैठ कर यह आनंद उत्सव मना रहे हैं.

यह है नरसंहार के ख़िलाफ़ संस्कृतियों का प्रतिरोध. हम तो पीड़ित लोग हैं. हमें तो सताया गया था. अब आप ही न्याय कीजिए. क्या आप मुझे इंटरव्यू देंगे या नहीं, आपको चुनना है. सम्पादक के अतीत से या हमारे बलिदान से. शिवाजी के लिए हमारे समुदाय ने काफ़ी अत्याचार सहे अब आप तो यह ना करें.”

यह सुन बाल ठाकरे का दिल पसीज गया. बोले, जो पूछना है. पूछो.

बातचीत लम्बी चली.

अभी भी लगता है, यह कहानी सुना के मैंने अच्छा किया या नहीं? अकबर का ज़िक्र करते ही क्या मुझे उन्हें प्रणाम कर निकल आना चाहिए था?

बाहर बारिश रुक गयी थी. हार्बर लाइन भारी बारिश के बावजूद बंद नहीं हुई थी.

-अनुराग चतुर्वेदी

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