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कलाकार जीवन भर एक ही कृति बनाता है: सीरज सक्सेना

जाने माने चित्रकार, सेरेमिक कलाकार, लेखक सीरज सक्सेना के साथ कवि-कला समीक्षक राकेश श्रीमाल की बातचीत की किताब आई है ‘मिट्टी की तरह मिट्टी’सेतु प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब का एक अंश पढ़िए-

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राकेश श्रीमाल– मिट्टी में काम शुरू करने के बहुत पहले, यानी बचपन में मिट्टी से खेलते हुए, मिट्टी को भूमि समझते हुए, आख़िर कैसे आपका शुरुआती अबोध लगाव मिट्टी के साथ हुआ? और उस नासमझ उम्र में मिट्टी के मायने आपके लिए क्या थे?

सीरज सक्सेना– हर बचपन की तरह मेरा बचपन भी सामान्य था। हर माता-पिता की तरह मेरे माता-पिता ने भी हम दोनों, लगभग समान उम्र के भाइयों, को उनकी क्षमताओं के अनुसार बहुत लाड-प्यार और पढ़ाई के लिए अनुशासन की छाया के साथ बड़ा किया। बचपन निमाड़ के खरगोन में बीता। पिता उस वक्त राज्य परिवहन में मैनेजर थे। उस वक्त तक वे (उनके पिता जिन्हें हम बाबा कहते थे) के दबाववश भारतीय सेना छोड़ चुके थे। खरगोन के आसपास के गाँवों में उनके मित्रों के घर हम जाया करते थे। निमाड़ की काली मिट्टी के खेतों से भुट्टे कपास तथा अन्य खेतों में उगने वाली फसलों को करीब से देखा करते थे। काली मिट्टी में कई बार जूते धँस जाते थे और फिर हमें उठाकर वहाँ से सूखी ज़मीन पर खड़ा किया जाता था। जूते से खेत की काली गीली मिट्टी का एक टुकड़ा मैं देर तक अपने हाथ में रखता था। कुछ देर में वह सूखकर एक छोटी गोली में बदल जाता था। वह गोली मेरी छोटी सी जेब जिसमें गोली ही रखी जा सकती थी खरगोन तक आती और खिलौनों के बीच गुम हो जाती थी। यह अनायास ही होता था। उस वक्त मुझे मिट्टी की कोमलता और उसमें स्पर्श के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था। गर्मियों की छुट्टियों में जब हम अपने नाना के घर एक माह के लिए जाते तो मामा जी के खेत, जो अभी बुआई के लिए तैयार हो रहे होते थे, हम भाइयों के लिए बड़ा खेल का मैदान होते और ट्यूबवेल की बड़ी और छोटी दो हौदियों से होता हुआ क्यारियों में बहता पानी खेतों की ओर जाता। एक खेत में जब पानी भर चुका होता तो उन्हीं क्यारियों को बन्द कर दूसरे खेत की ओर पानी को छोड़ा जाता। मिट्टी, जो पानी में घुल जाती है, वह पानी रोक भी लेती है यह सब खेतों के क्रियाकलाप रोमांचित करते। हम भी ट्यूबवेल के बहते पानी से खेलते मिट्टी से उन्हें बीच में रोकते तो कभी मिट्टी हटाकर बहते पानी में उठती छोटी-छोटी भँवरों को देख उनमें तिनके तैराते। दूर बहते पानी के पास बहुत से सफेद बगुले भी आते और खेतों में कुछ चुगते हमें लगता कि वे भी हमारी तरह पानी और मिट्टी से ही खेलने आए हैं। जब बहुत छोटा था तो मुझे याद है कि मैं हर बच्चों की तरह थोड़ी मिट्टी चाट भी लिया करता था तो कभी चॉक। मुँह स$फेद होता तो मम्मी समझ जातीं। पर यह सामान्य ही था। अब लगता है कि बचपन में जब मिट्टी छूती है उँगलियाँ या शायद स्पर्श ढूँढ़ती हो। खेत में ट्रेक्टर की जुताई से उभरती मिट्टी में मिट्टी की लकीरें भी मुझे तब भी और आज भी बहुत आकर्षित करती हैं। एक तमन्ना है कि खेतों को अपने रेखा संयोजन से जोतूँ और फिर उनमें गेहूँ बोऊँ। फिर अपने लहलहाते हरे रेखांकन को बढ़ते हुए, और कटते हुए देखूँ। किसान अपने खेत में कितने तरह के रूपों और रंगों के साथ वर्षभर रमा रहता है, यह भी देखा है अपने बालपन में। मिट्टी के घरौंदे भी खूब बनाये हैं और मिट्टी के खिलौने (जो उस वक्त सहज ही मिल जाया करते थे) से भी खूब खेला हूँ। मिट्टी को कई बार खेल-खेल में चखा भी है। मिट्टी में लकड़ी से रेखांकन करने में भी बहुत आनन्द आता था। आज की तरह हमारे बचपन में अधिक रोका-टोकी (प्रतिबन्ध) नहीं थी और न ही माता-पिता को बच्चों के लिए किसी भी प्रकार का भय था। पर उस वक्त बिल्कुल भान नहीं था कि बड़े होकर यही मिट्टी मेरे लिए सम्प्रेषण का माध्यम होगी।

 

राकेश श्रीमाल- ऐसा कब और कैसे हुआ कि मिट्टी से खेलते हुए, उसकी नमी या गीलेपन ने आकार लेना शुरू किया और वह एक अघोषित तालीम की तरह आप के जीवन में उतरता गया?

सीरज सक्सेना- बचपन में मम्मी के आसपास ही मैं घूमता रहता था; उनके बिना मेरा मन नहीं लगता था। वे जब रसोई में खाना बना रही होती थीं तब भी मैं उनकी साड़ी के पल्लू से चिपका रहता था। आटा गूँथने के बाद वे रोटी बनातीं और मुझे आटे का एक टुकड़ा दे दिया करतीं जिससे मैं उनके पास ही बैठा उस आटे से खेलता रहता। यह खेल उनके लिए भी सुविधाजनक था क्योंकि इस खेल के बहाने मैं भी उनके करीब ही रहता था। आटे में भी मिट्टी की तरह ही लोच होती है। मैं आटे से चिडिय़ा या छोटी रोटी या कोई अन्य आकार बनाता था और मम्मी के साथ देर तक रसोई में रहता था। रसोई मेरे लिए एक खेल की जगह थी। यहाँ मेरा खूब मन लगता था। मैं आटे से और भी तरह-तरह के आकार बनाता था जिसे मम्मी तवे या कढ़ाई में पकाती और जब वह पका हुआ आकार भोजन की थाली में आता तो मैं बहुत खुश होता था। यह सिलसिला कुछ साल चला और जल्द ही मैंने चकले पर बेलन से रोटी और पराठा बनाना भी सीख लिया। जब मम्मी का उपवास होता तो मैं उनके लिए पराँठे बनाता। जिसे वे उसके अनगढ़ आकार की परवाह किये बगैर चाव से ग्रहण करतीं। यहाँ मिट्टी नहीं थी पर यह अनुभव मेरे ज़हन में गहरे से घर कर गया। आज भी मेरे मिट्टी में काम करने के औज़ारों में बेलन विशेष रूप से अनिवार्य है। बेलन के बिना मेरा काम थोड़ा मुश्किल है। बेलन एक ऐसा टूल है जो हर देश में व्याप्त है। मैं जहाँ भी गया हूँ वहाँ सिरेमिक स्टूडियो में मुझे भाग्यवश बेलन मिला है जिसकी वजह से ही मैं देश-विदेश में अपने शिल्प गढ़ पाया हूँ। रसोई में आटे के रूप में मैं कई आकारों को बनते और उन्हें पकते देखता था। हर आकार की खुशबू और स्वाद भिन्न होता है। होली के पहले गुजिया बनने का रिवाज़ घर में रहा है और मेरे पिता भी बड़े उत्साह से मम्मी का हाथ बँटाते हैं। मुझे कभी रसोई में यह नहीं लगा कि यह काम लड़कियों का है जिसमें मैं रुचि लेता हूँ। हालाँकि मेरे भाई की रुचि अन्य खेलों में थी और वे घर के बाहर अपने खेल में व्यस्त रहते थे। कभी गोल फूली हुई कचोरी कढ़ाई से निकलती तो कभी चिप्स या पापड़, कभी पूरन पोली बनती तो कभी आलू के पराँठे, कभी अनरसे बनते तो कभी बेसन गट्टे, कभी दाल बाफले बनते तो कभी लड्डू। हर दिन रसोई में एक नया आकार बनता और शायद इसी वजह से मेरे मन में रसोई के प्रति कभी ऊब नहीं रही। आज भी मुझे रसोई में प्रयोग करते रहने में आनन्द आता है। विदेश में भी मुझे किसी भी रसोई में जाने में कभी हिचक नहीं हुई। जब आर्ट कॉलेज पहुँचा तब वहाँ पास ही की बस्ती की महिलाएँ कोयले के पाउडर से छोटे-छोटे गोले बनाती और उन्हें धूप में सुखाती जब वे सूख जाते तो वे इससे अपना चूल्हा जलातीं। जब वे काले गोले ज़मीन पर सूख रहे होते थे तब आकर्षक लगते थे। मेरे शुरुआती सिरेमिक के कामों में उससे सम्बन्ध साफ देखा जा सकता हैं। बल्कि आज भी मेरे नये सिरेमिक संस्थापनों में वह असर दिखता है। आटे में लोच और तरह-तरह के आकार गढऩे का मेरा अभ्यास मेरे लिए सिरेमिक स्टूडियो में आज भी काम आ रहा हैं। पर बचपन में यह कल्पना कभी नहीं की थी कि यह माध्यम मेरे जीवन में अन्त तक साथ रहेगा।

राकेश श्रीमाल– खेल-खेल में आटा गूँथने की शुरुआत ने रूप-आकार गढऩे के लिए कैसे उम्र भर प्रेरित किया?

सीरज सक्सेना– खेल की बात बचपन तक साथ रही। बचपन बीता और वे सब बातें भी उम्र के साथ दब गयीं। खिलौने भी घर पर अब यहाँ-वहाँ बिखरे हुए नहीं होते। स्कूल गये और एक-दो-तीन-चार रटने में लग गये। घर में अब कॉपी, किताबें, पेन्सिल, पेन आदि बिखरे रहने लगे। पेन-पेन्सिल और अन्य पठन सामग्री से भी घर में बच्चों की उपस्थिति दर्ज होती है। स्कूली शिक्षा के अपने चैलेंजेज होते हैं। जो स्कूल में सीखते हैं, समाज में सीखते हैं, बड़ों और अपने आसपास के लोगों के व्यवहार से सीखते हैं। फिर पैसे की अहमियत और उससे व्यक्ति की जाँच-परख होते देखते हैं। पर मिट्टी से समाज का सम्बन्ध क्षीण ही देखा। स्कूल की देहरी बस अब लाँघने का समय आया और अब जीवन में विषय क्या हो यह प्रश्न आँखों के सामने तैरने लगा। खुद को इस प्रश्न में डूबा देखा कोई विषय मुझे जँचा नहीं। कि सौभाग्य से ललित कला संस्थान के युवा कलाकारों की एक समूह प्रदर्शनी में जाने का मौका मिला। आर्ट गैलरी मुझे स्वप्नलोक सी लगी और युवा खुश और जीवन्त लगे, उनके चेहरे पर युवा मुस्कान उन्हें और आकर्षक बना रही थी। फिर इस विषय के बारे में विस्तार से पता किया और तैयारी के बाद कला महाविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में बैठा। इस तरह चित्र के प्रति आकर्षित होकर मैंने ललित कला संस्थान में दाख़िला लिया। आम कक्षाओं की तरह यहाँ बैठने के लिए पंक्तिबद्ध टेबल और कुर्सियों  की जमावट नहीं होती है, कक्षा का भीतरी माहौल भी खुला हुआ होता है। हमारी मिट्टी की क्लास कॉलेज की दूसरी इमारत में नीचे लगती थी। यहाँ कुछ ग्राफिक प्रेस रखीं हैं। उनकी खामोशी से लगता था कि कई सालों से किसी कलाकार ने उन्हें छुआ नहीं है। इन्हीं खामोश और अपने उपयोग की प्रतीक्षा में रखी इन प्रेसों के आसपास ही हम मिट्टी में आकार गढ़ते थे। सिलेबस के अलावा भी हम मन से कुछ आकृतियाँ मिट्टी में बनाते थे।

पाँच वर्षीय इस स्नातक कोर्स में शुरुआती दो वर्षों में मिट्टी में भी काम करवाया जाता है और इससे सम्बन्धित कुछ पढ़ाया भी जाता है। मिट्टी की क्लास में रिलीफ आकार और छोटे शिल्प भी बनाये। चूँकि कॉलेज में भट्टी नहीं थी अत: मेरे सहपाठी नवनीत म्हात्रे के घर के आँगन में हम एक छोटी भट्टी बनाते और अपने शिल्प पकाते। नवनीत के दादा जी मिट्टी के गणेश बनाने के लिए प्रख्यात थे। उन्हें करीब से बारीक काम करते हुए देखते थे। मिट्टी में उनके टूल के उपयोग को भी गौर से देखते थे। नवनीत का मन भी मिट्टी के काम करने में रमता था और उसे घर से ही अनजाने ही अपने दादा जी को काम करते देखते एक ट्रेनिंग मिली हुई थी। उसके घरवाले भी उसके मिट्टी में काम करने को पसन्द करते थे। हम दोनों ने अपने सिलेबस के अतिरिक्त भी मिट्टी में खूब काम किया। पर मिट्टी से यह रिश्ता दो साल बाद अधिक नहीं रह पाया। अन्तिम तीन वर्षों में आर्ट कॉलेज में सिर्फ चित्रकला पर ही केन्द्रित पढ़ाई हुई। फिर जब भारत भवन में काम करने का विचार बनाया तब वहाँ सिर्फ दो ही स्टूडियो थे। ग्राफिक और सिरेमिक। मैंने सिरेमिक में काम करना चुना। इस तरह मैं पुन: मिट्टी के करीब आया और इस बार यह रिश्ता गहराया। मैंने डूबकर मिट्टी में खुद के लिए कलात्मक सम्भावनाएँ तलाशना शुरू किया। मिट्टी शिल्प को बड़ी भट्टी में पकाया। अपने लिए एक राह खोजी। मिट्टी अब मेरे लिए कला का एक स्थायी भाव है। जब दिल्ली आना हुआ तब चित्रकारी करना पुन: शुरू हुआ। मेरे पास खुद के रहने की ही जगह संकुचित थी ऐसी हालत में मिट्टी में काम करने की जगह बनाना कठिन था। इस समय का उपयोग मैंने चित्र बनाने में किया। दिन में चित्र बनाते और रात में उन्हें पलंग के नीचे रखकर सुखाते। तीन सालों बाद खुर्जा में मैंने मिट्टी में काम करने की जगह तलाशी और आज बीस सालों से वहीं मैं अपना मिट्टी में सृजन कर रहा हूँ।

राकेश श्रीमाल– चित्र या शिल्प को अन्तिम रूप देते हुए क्या अपने को भी उस समय विशेष में अन्तिम रूप देते हैं और उसे पूरा कर लेने के बाद क्या आगामी काम करने की बेचैनी तक अपने को भी पूरा ही महसूस करते हैं?

सीरज सक्सेना– इस पूर्णता के बारे में, जिसके बारे में आपका प्रश्न है, एकाधिक उत्तर हो सकते हैं। मैं उस कलाकार की बात से सहमत होता हूँ कभी कि ‘कलाकार जीवनभर एक ही कृति बनाता है, यह भी मानता हूँ कि कला एक असीम सागर है और पिकासो जिन्होंने जीवनभर काम किया, खूब काम किया, कहते हैं कि ‘मैंने इस सागर की कुछ बूँदें ही अब तक महसूस की हैं।‘

जैसे नदी बहती रहती है निरन्तर। मुझे लगता है कि कलाकार भी नदी की ही तरह बहता है और यह जीवन उसका एक छोटा गन्तव्य है जहाँ वह कुछ देर ठहरकर फिर आगे बढ़ जाता है। चित्र या शिल्प जब पूर्ण होने वाला होता है तब उसके पूर्ण होने का अहसास हो जाता है और फिर चित्र (जिसमें डुबकी लगायी होती है) से धीरे-धीरे चित्र की सतह पर आकर उसे पूर्ण करते हैं। चित्र पूर्ण होने के पहले ही नये चित्र का एक खाका हवा में आँखों के सामने ठिठक जाता है। जैसे आँखों में कोई आकार बनता है शायद उसी तरह।

पहले एक चित्र जब पूरा होता था तो उसके पूर्ण होने का उत्सव देर तक बना रहता था। पर अब एक चित्र या शिल्प पूरा होते ही दूसरे काम की शुरुआत करने की बेचैनी अधिक रहती है। चाहे माध्यम कोई भी हो। एक चित्र पूरा भी कई छोटे-छोटे आरम्भ से होता है। पूर्णता इन्हीं अनेक आरम्भों का प्रतिफल है। मुझे यह भी लगता है कि कलाकृति पूर्ण नहीं है। चाहे शिल्प हो या चित्र उसमें जगहों पर कुछ और जुडऩे की गुंजाइश बची रहती है। शायद यह बात कविता पर भी सटीक बैठती हो। या हमें लगता हो पर हम इसे बोलने-लिखने या कहने से कतराते हैं। वैसे भी भारत के कलाकार स्वयं कला पर कम ही बोलते हैं, दूसरे और महत्त्वपूर्ण विषयों की बात तो दूर है। चित्र जब पूरा होता है तो वह एक दैविक संतोष का अहसास कराता है। उस तरह का संतोष कुछ-कुछ प्रेम से भी हमें अनुभव होता है।

चित्र या शिल्प बनाते हुए समय का ध्यान नहीं रहता बल्कि कभी-कभी लगता है कि चित्र सृजन और समय साथ रखना ठीक नहीं है। कला में समय का आभास ज़रूर लगाया जा सकता है चित्र में बसे बिन्दुओं, रेखाओं और रूप से। सृजनरत रहते हुए समय का भान नहीं रहता। जिस भी प्रिय काम को जब करते हैं तो ऐसा ही महसूस होता है। यह भी कहा जा सकता है कि सृजनरत रहते हुए हम उस समय को अपनी कला में थाम लेते हैं। कला और समय पूरक है। कला समय को छेड़ नहीं सकती। कम-से-कम फिलहाल तो मैं यह मान रहा हूँ। पर यह मानता हूँ कि समय के साथ चीज़ें बदलती हैं। कुछ खिलता है, कुछ मुरझाता है। विचार भी, मन भी समय की गति के साथ बदलता रहता है। इसी वजह से जीवन में भिन्नता बनी रहती है और रोचकता भी।

 

राकेश श्रीमाल– आपकी कला के उस कथ्य को आप किस तरह ग्रहण करते हैं, जब वह पूर्ण होने के उपरान्त, अपनी उपस्थिति या अनुपस्थिति में बहुत धीरे से शब्दहीन आपसे कुछ कहता है? क्या आप उसे सुन पाते हैं?

सीरज सक्सेना- पूर्ण होने के बाद चित्र, शिल्प, कपड़ा-कृति, ग्राफ़िक प्रिंट आदि अपनी-अपनी तरह से असर छोड़ते हैं और पूर्ण होने के पश्चात् उनकी उपस्थिति भी कुछ अलग होती है जैसे। चित्र बनने के बाद (पूर्ण होने के बाद) हालाँकि इस पूर्ण होने को व्याख्यायित करना मेरे लिए कठिन है कि ऐसा कौन-सा क्षण होता है जब चित्र का पूर्ण होना तय होता है। यह एक दैविक अनुभूति है (हालाँकि मैंने आज तक देवी या देवताओं को नहीं देखा है)। चूँकि मेरे चित्रों की रचना प्रक्रिया कोई प्रचलित व्याकरण पर आधारित नहीं होती है। खैर! इस पूर्णता पर हम फिर बात करेंगे। अभी आपके प्रश्न पर केन्द्रित होने की कोशिश करता हूँ।

पूर्ण होने के बाद चित्र स्टूडियो में, फ्रेमर शॉप पर, कला वीथिका में। किसी स्थायी संग्रह में, किसी के घर या ऑफ़िस की दीवार पर अलग-अलग ढंग से दृश्य अनुभव प्रदान करता है। चित्र पूर्ण होने के बाद भी अपने (दर्शक के) दृश्य अनुभव की परिपक्वता के हिसाब से बदलता रहता है। हालाँकि अब यह एक जड़ पदार्थ में तब्दील हो चुका होता है। पर फिर भी हर बार देखने पर या कुछ अन्तरालों के बाद पुन: उसी चित्र या कलाकृति को देखने पर हमें भिन्न अनुभूति होती है। यह चित्र पर भी निर्भर करता है अगर चित्र जड़ है (पोस्टर की तरह है या उसपर कुछ और कहानी लदी है) तो वह एक भौतिक वस्तु जैसे परदे या सोफे की तरह हर बार देखने पर एक-सा ही दिखेगा।

अपने ही पूर्ण हो चुके चित्र को अलग-अलग जगहों और समय में देखने पर हर बार नवीन अनुभूति होती है। जैसे, मैंने टेट कला संग्रहालय लन्दन में मार्क रोथको के चित्रों को दो बार दो अलग-अलग समय में देखा और हर बार मैंने उनके चित्रों में कुछ नया देखा। जबकि उनके चित्रों में भटकने के लिए न अधिक रूपाकार हैं न ही रंग और रेखाएँ तो बहुत ही नगण्य होती हैं उनके चित्रों में। उनका एक ही चित्र मैं घण्टों देख सकता हूँ। वहीं कभी वे चित्र (जिनमे दृश्य माया के अनेकों लुभावने बिम्ब होते हैं व प्रलोभन और आकर्षण भी भरपूर होता है) जिसे अधिक तथाकथित लोकप्रियता भी हासिल है उनके सामने ठहरने का भी मन नहीं होता। हर चित्र कुछ कहता है। बस, उसे सुनने के लिए परिपक्व दृष्टि और गहरे से गुँथा हुआ दृश्य अनुभव होना चाहिए या निर्मल मन और पवित्र आँखें। किसी बड़े चित्र के स्टूडियो से चले जाने के बाद कुछ दिनों तक उसकी उपस्थिति एक अदृश्य खुशबू की तरह मौजूद रहती है। और स्मृति में बसकर उस चित्र की रचना होती रहती है। उसे शब्दों में व्यक्त कर पाना कठिन है, जैसे किसी की अनुपस्थिति को आप एक हद तक ही व्यक्त कर पाते हैं पर उसकी अनुपस्थिति गहरी होती है। कभी-कभी कोई अनुपस्थित चित्र किसी शिल्प में या रेखांकन में या चित्र में पुन: अनुगुँजित हो जाता है: हर रचनाकार के आसपास ही मौजूद रहता है और उसके आत्मविश्वास में उसकी झलक महसूस की जाती है एक नयी भाषा में।

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