प्रदीप दाश के उपन्यास ‘चरु, चीवर और चर्या’ का अंश

बड़े दिनों बाद एक दिलचस्प ऐतिहासिक उपन्यास पढ़ा- ‘चरु, चीवर और चर्या’। लेखक हैं प्रदीप दाश। उपन्यास की पृष्ठभूमि बौद्ध धर्म है, मध्यकाल से पहले के दौर में उड़ीसा में धर्मों का द्वंद्व किस तरह चल रहा था, उसमें राज्य की भूमिका कैसी थी? सब कुछ बहुत रोचक तरीक़े से इस उपन्यास में आया है। सबसे उल्लेखनीय है उपन्यास का हिन्दी अनुवाद। सुजाता शिवेन जी ने मूल उड़िया से उपन्यास का इतना अच्छा अनुवाद किया है कि लगता ही नहीं है कि आप अनूदित उपन्यास पढ़ रहे हैं। पेंगुइन स्वदेश की एक अच्छी प्रस्तुति। फ़िलहाल आप अंश पढ़कर संतोष करें-

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सबसे उल्लेखनीय घटना थी, घनघोर वर्षा की उस रात में राजकुमारी का वह प्रश्न। इतने समय के बाद अचानक ऐसे किसी प्रश्न का सामना उन्हें करना पड़ेगा, प्राज्ञाचार्य सोच नहीं पाए थे। एक नारी, वह भी एक विशाल राज्य की साम्राज्ञी का एक वैरागी भिक्षु से इस तरह के प्रश्न पूछना शायद असमीचीन था, पर अभी तक उनके लिए मन-ही-मन वे इंतज़ार कर रहीं हैं—यह बात अब छुपी नहीं थी। किंकर्तव्यविमूढ़ भिक्षु उस रात भी निरुत्तर थे। भौम पटरानी घनघोर वर्षा से भयभीत नहीं हुईं थीं और उत्तर का उन्हें इंतज़ार रहेगा, वे जाते-जाते यह कह गईं थीं। प्रश्न वही था, राढ़ राजदरबार में राजा से सोचकर बताने का उन्होंने जो वादा किया था, क्या उस बात पर अभी तक वे किसी निर्णय पर नहीं पहुँचे थे? इसी प्रश्न ने उस रात प्राज्ञाचार्य को आश्चर्यचकित कर दिया था। इतने बड़े साम्राज्य और विख्यात राजा शिवकरदेव की इकलौती रानी को उत्तर देने का साहस वे उस दिन कर नहीं पाए थे। राजा की शक्ति का आकलन उनके पास था, पर महारानी को इतना निर्द्वंद और निर्भय देखकर अब तक नहीं कर पाए निर्णय के करीब मानो प्राज्ञ पहुँच गए थे। सिद्धि और लक्ष्य की प्राप्ति के लिए साधन-संगिनी का निर्वाचन अपने आप उनके मन में आ गया था। अब तक उनके मन में छिपी हुई उनकी यह कमज़ोरी, इच्छा, आकांक्षा लगामहीन हो गई थी। अपनी सुंदरता, गुण और सबसे ज़्यादा महारानी की उनके प्रति आसक्ति और प्रेम की भावना अब दिनोदिन प्राज्ञाचार्य को अपने स्रोत के साथ बहा ले जा रही थी।

उन्हें यह महसूस हो रहा था कि दिन में एक बार ही सही राजकुमारी को देखने की इच्छा से भीतर-ही-भीतर वे बेचैन हो जाते थे। अपने भीतर की इस हलचल को इससे पहले शायद वे समझ नहीं पाए थे। नहीं तो उस दिन फिर एक बार रानी के आमंत्रण को वे स्वीकार नहीं करते। अपराह्न के अधिवेशन से निकलकर अपने कमरे की तरफ़ जाते समय अचानक सामने महारानी को देखकर वे चौंक पड़े। उनके रास्ते को लगभग रोककर खड़ी महारानी को इस समय देखने की आशा नहीं थी उनकी, फिर भी मन उनका पुलक से भर गया था। महारानी ही बात शुरू करते हुए बोली, ‘आज अपने उद्यान में मैं फिर आचार्य की दर्शनाभिलाषी हूँ। ढलती साँझ को मैं इंतज़ार करूँगी भदंत का। क्या मेरी यह अभिलाषा पूर्ण हो पाएगी?’

अपनी सहमति देने के लिए क्या कहें, यह उन्हें समझ नहीं आ रहा था। वे एक तरह से मूक बन गए थे, पर महारानी छोड़ने वाली नहीं थी। बोलीं, ‘क्या इस मौन को मैं आपकी सहमति समझूँ?’

प्राज्ञ आख़िरी तक कुछ बोल नहीं पाए, लेकिन शायद इस तरह के आमंत्रण का इंतज़ार उन्हें बहुत दिनों से था, पर इस आमंत्रण का उत्तर देने के लिए, पहले से सोचे गए कल्पित उत्तर तक उस पल पहुँचना, उनकी पहुँच से बाहर हो गया था। उनके सीने की धड़कन तेज़ हो गईं थीं। आनंदातिरेक में आवाज़ का पथ अवरुद्ध हो गया था। वे केवल सिर हिलाकर अपनी सहमति दे पाने में सफल हो पाए थे। उत्तर पाने के बाद महारानी वहाँ से चली गईं थी, पर जाते-जाते उनकी मुस्कराहट ने फिर एक बार प्राज्ञाचार्य को हिला दिया था।

मन अधीर हो रहा था। अपराह्न से साँझ की ओर ढल रहा समय उन्हें लंबा लग रहा था। धीरे-धीरे साँझ घिरने लगी, पर उन्हें जिस घनी संध्या का इंतज़ार था, वह नहीं आई थी। उस दिन पूर्णिमा की तिथि थी। साँझ के आकाश में चारों तरफ़ रोशनी उतर आई थी। अंधेरा आ नहीं पाया था। संध्या और रत्नगिरि शीतल चाँदनी की रजत आभा में विभोर हो उठी थी। उत्तीर्ण संध्या को आचार्य पहचान नहीं पा रहे थे। क्या हो रहा था, वे समझ नहीं पा रहे थे। जाने के लिए तैयार होकर भी वे निकल नहीं पा रहे थे। यह रजत शुभ्र दिग्विदिग क्या सच में उत्तीर्ण साँझ की लग्न है? पर मन अपने काबू में भी नहीं था। सच में क्या महारानी अपनी पुष्प वाटिका में पहुँची होंगी? इतंज़ार में होंगी क्या?

इस तरह के कई संशय मन में लिए प्राज्ञाचार्य आख़िर में आसन से उठकर एक-एक डग भरते हुए पहाड़ के शीर्ष की उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर बढ़े। इसी दिशा में बढ़ने के बाद पत्थर की सीढ़ी उतरकर उन्हें तलहटी में जाना होगा। वहीं है रानीमहल और वहाँ से कुछ ही दूरी पर है तालाब और पुष्पवाटिका। एक उद्दाम आवेग में सीढ़ी-दर-सीढ़ी पार करते हुए वे नीचे उतर गए।

वह पुष्प वाटिका प्राज्ञाचार्य की कल्पना से भी अधिक मनोरम और आकर्षणीय थी। जीवन में त्याग और निवृत्ति की चर्या में डूबे बौद्ध भिक्षु का कमज़ोर कल्पना लोक ऐसे सुंदर बगीचे की कल्पना नहीं कर पाया। आम्र मंजरी की भीनी-भीनी सुगंध के साथ निर्मल लता कुंज आजन्म तपस्वी आचार्य को मोहित कर रहा था। उद्यान के बीचोबीच एक चबूतरे पर महारानी की छाया को देखकर वे अपने भीतर और भी सिमट गए। उनके कदम आगे नहीं बढ़ रहे थे। महरानी से वे क्या कहेंगे, कैसे कहेंगे, यह बिलकुल भी समझ नहीं पा रहे थे। आज भी क्या महारानी अपना वही सवाल दोहराएँगी? इस बीच वे टूटकर चूर-चूर हो गए हैं, क्या यह बात कह पाएँगे? वे भला कैसे उनका सामना करेंगे?

पाँव आगे बढ़ नहीं रहे थे, पर वे रुक भी नहीं पाए। महारानी ख़ुद आगे बढ़कर उनका हाथ पकड़कर उन्हें चबूतरे पर ले गईं। सफेद चाँदनी में सफेद संगमरमर का चबूतरा चमक रहा था। चबूतरे पर बैठाते हुए महारानी उनके पास ही बैठ गईं। संकोच था या सम्मान, प्राज्ञाचार्य महारानी की तरफ़ देख नहीं पा रहे थे। देखते तो देख पाते की महारानी के जुड़े में जैसे कई चंद्रमल्लिका खिल उठे हैं, पर कुछ कहने से पहले ही महारानी ने आचार्य के सामने खीर पात्र रख दिया। खीर की सुगंधित महक से अचरज से भरकर प्राज्ञाचार्य बोल पड़े, ‘पायसान्न?’

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