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  • सुजाता के उपन्यास ‘दरयागंज वाया बाज़ार फ़त्ते ख़ाँ’  से एक अंश

     

    आज पढ़िए जानी मानी लेखिका सुजाता के उपन्यास ‘दरयागंज वाया बाज़ार फत्ते खाँ’ का एक रोचक अंश। राजकमल से प्रकाशित इस उपन्यास की पृष्ठभूमि भारत विभाजन है। पढ़िये साल का पहला पुस्तक अंश- मॉडरेटर

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    पाकिस्तान नहीं, हमें चाहिए यूनाइटेड इंडिया

    दरवाज़े की कुंडी बहुत ही धीमे से तीन बार बजी। मास्टर ने दरवाज़ा खोला। “अंदर आओ जल्दी।” महनूर भीतर दाखिल हुई और नक़ाब हटाया। उसने आते ही बोलना शुरु किया “अगले हफ़्ते लाहौर में पाकस्तान को लेकर कोई रेसोल्यूशन पास करने वाली है लीग। अब्बा को वहाँ चलने को राज़ी करने के लिए मौलवी साहब आए थे। ये ज़रूर कुछ ख़ौफ़नाक प्लान बना रहे हैं।” मज़कूर ने कुर्सी से खड़े होते हुए कहा “और यह हम होने नहीं देंगे। पाकिस्तान नहीं, हमें चाहिए यूनाइटेड इंडिया। मज़हब के नाम पर किसी अलग देश का तसव्वुर हमारा नहीं है।”

    “लेकिन आप कर ही क्या सकते हैं?” परेशान होते हुए महनूर ने कहा।

    “हम इसकी मुख़ालफ़त करेंगे, अख़बार में लिखेंगे, पर्चे बाँटेंगे, जुलूस में यूनाइटेड इंडिया के नारे लगाएंगे। मुट्ठी भर सियासी लोग सभी मुसलमानों का मुक़द्दर नहीं लिख सकते।” मज़कूर की आवाज़ जितनी धीमी और दबी हुई थी उतनी ही मज़बूती से उसकी मुट्ठियाँ तनी हुई थीं।

    “ख़ुदा दे वास्ते, तुसाँ लहोर न चले जाणा। लीगी आप लोगों की बात नहीं सुनेंगे, न बर्दाश्त करेंगे।” महनूर को इन दोनों के जोश और मूर्खता पर पूरा भरोसा था। अनुरोध करती हुई निगाह उसने मास्टर पर डाली।

    “यह तो होना ही था महनूर। अब डरने का वक़्त नहीं है। लाहौर तो हम जाएँगे। अगर अभी इसे न रोका गया तो कभी नहीं रोका जा सकेगा। जो भी इनका इरादा हो, यह रेज़ोल्यूशन तो पास नहीं होने दिया जाएगा।” सुंदरलाल ने कहा।

    “तो मैं भी चलूंगी। यहाँ मेरे लिए रक्खा ही क्या है?” महनूर तड़प उठी।

    “ले चलते, लेकिन हमारे पास कोई प्लान ही नहीं है फ़िलहाल। मुझे पहले आज़ाद मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के कुछ लोगों से बात करनी होगी। हो सकता है उधर कुछ सोचा गया हो, लेकिन जब तक तुम्हारे मुताबिक कोई प्लान न हो तुम्हें साथ ले जाना ख़तरनाक होगा।” मज़कूर ने कहा तो सुंदरलाल ने तुरंत टोकना ज़रूरी समझा।

    “पागल हो क्या मज़कूर, प्लान हो तब भी नहीं ले जाना, यहाँ रहीम मियाँ को पता लगा कि हम उनकी बेटी को भगा कर ले गए तो सब पर आफ़त आ जाएगी। अभी जीशान यहाँ से निकला है, आसान नहीं है सब। नहीं महनूर, अभी वह वक़्त नहीं आया कि तुम…”

    “कब आएगा मास्टर ! कोई वक़्त आता भी है किसी बेवा की ज़िंदग़ी में? कोई भी ऐसा वक़्त जब वह मौत छोड़कर कुछ भी और चुन सके अपने लिए? किसे पड़ी है मेरी? ज़िंदा रही या मारी गई, बोझ ही तो हूँ माँ-बाप पर, उनके घर में पड़ी-पड़ी रोटियाँ तोड़ने के अलावा क्या दे सकती हूँ उन्हें। बेवा लड़की को घर में रख अफसोस मनाते रहने से तो कहीं कम होगा मेरे मर जाने का सोग मनाना।”

    मज़कूर को लगा इस समय दोनों को कुछ पल अकेला छोड़ देना बेहतर होगा। गला खखारते हुए उसने सुंदरलाल से कहा “मैं गली तक देख के आता हूँ कि सब ठीक है!” और दरवाज़ा बंद करते हुए सीढियाँ उतर गया।

    सुंदरलाल ने महनूर को खींच कर ख़ुद से सटा लिया। “इक-इक हँजू जे गिरदा पया है तेरियाँ अक्खाँ तों, मेरे दिल विच घाव कर रया है। कमली, तेरी ज़िंदग़ी का कोई मोल नहीं? पूछ मुझसे क्या हाल होता है मेरा जब निक़ाब हटता है तेरा और नूर ही नूर फैल जाता है मेरी ज़िंदग़ी में। पूछ मुझसे कि जब तेरे लब लरजते हैं तो मेरी धड़कने कैसे बेक़ाबू हो जाती हैं, तेरी नाक का लौंग लश्कार मारता है तो मुझे याद आता है कि कैसे ये मेरे सीने के बालों में उलझता है और फिर गड़ जाता है। ऊपर देख मेरी महनू…” देर तक सुंदर उसकी आँखों में जाने क्या ढूँढता रहा। शायद वही हरिणी जो निश्शंक कुलाँचे भरती है जंगल में लेकिन अनजान आहट से डरकर दुबक जाती है और भूल जाती है अपना ज़िंदा होना।

    “कहाँ हो आप?” महनूर ने उसे टोका।

    “जंगल में। भटक रहा हूँ एक हिरनी के पीछे। कभी लगता है मेरी आहट क्या मेरी साँस भी पहचानती है और कभी मुझ ही से अजनबी हो जाती है।”

    “मुझे ले चलो मास्टर!”

    “तुम्हें लगता है वापस नहीं आ पाएंगे हम?”

    “मैं वापस नहीं आना चाहती।”

    “लेकिन…”

    “आप मुझे किसी लायक नहीं समझते?”

    “तुम मुझसे ज़्यादा क़ाबिल हो।”

    “बहकाने वाली बात है जी!”

    “सच है! तुम वहाँ क्या करोगी महनू!”

    “सब कुछ। मैं पर्चे बाँट दूंगी ख़वातीन के बीच। मैं लाहौर के किसी लड़कियों के स्कूल में पढा लूंगी।” उसे अचानक लगा वह न जाने क्या-क्या कर सकती है! उसे सब बता देना चाहिए “मैं झँडे सिल दूंगी। मैं नारे की तख़्तियाँ लिख दूँगी।’ सुंदरलाल उसे सिर्फ देख रहा था, देख रहा था कि यह तड़प क्या है, किस क़दर है, इसकी हद क्या है? “मैं फिरंगी की गोली खा लूंगी, क़ुर्बान हो जाऊँगी देश के लिए। औरत के लिए बनाई गई बंद, छोटी-सी दुनिया में घुट-घुट कर मर जाने के लिए मजबूर न करो मास्टर! ख़ुदा के लिए, रहम मत खाओ, दोस्ती निभाओ।” और आँसुओं की धार सुंदरलाल के कुर्ते को भिगोती रही। उसने कसकर महनूर को बाहों में बाँध लिया। बहुत तेज़ बाढ थी, सब बहे जा रहा था, गहरी-गहरी जमी हुई जड़े उखड़ रही थीं, चट्टाने टूट रही थीं और उस बाढ में दोनों कसकर एक दूसरे को पकड़े सब थमने का इंतज़ार कर रहे थे।

    “सब ठीक हो जाए तो जल्द मैं तुझसे शादी करूंगा महनू!”

    “बिना शादी किए क्या साथ के कोई मानी नहीं?”

    “क्या शादी के साथ मानी नहीं?”

    “बेवा हूँ। यह मुझपर एहसान होगा।”

    “यह मुझपर नेमत होगी।”

    “शादी करके आप भी घर की चारदीवारी में क़ैद नहीं कर देंगे?”

    “नहीं…”

    “आपको नहीं लगेगा कि मैं शौहर हूँ और बीवी को मेरे आराम का ख़्याल करने के लिए घर में रहना चाहिए?”

    “नहीं…”

    “आप दुनिया बदलेंगे, अख़बार में लिखेंगे, नारे लगाएँगे और मैं बूहे पे खड़ी होकर आपकी राह तकूंगी?”

    “नहीं…”

    “तो फिर क्या? क्या मास्टर?”

    दरवाज़ा खुला और मज़कूर अंदर आया। “महनूर, तुम्हें निकलना चाहिए।” एक पल लगा उसे सम्भलने में।

    “मास्टर!” दरवाज़े से निकलते-निकलते महनूर ने मुड़कर कहा, कुछ सेकेंड उसे ग़ौर से देखा और आगे कुछ कहते न बना। वह सीढियाँ उतर गई। बन्ने खाँ की छत्ता हवेली के पीछे सुनसान में पहुँच कर बुर्क़ा उतारा, झाड़ी के पीछे से कुछ आवाज़ हुई, महनूर ने ध्यान से देखने की कोशिश की लेकिन कुछ भी नहीं था वहाँ। सोचा कोई बिल्ली होगी और चुन्नी ओढ कर बाज़ार के पीछे से घर की गली में मुड़ गई। दरवाज़े में घुसते ही अम्मी के मेहंदी से लाल हाथ पीठ पर ज़ोर से आकर पड़े।

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