• समीक्षा
  • आईनासाज़: संवादधर्मिता और सूफ़ीवाद का आख्यान

    प्रसिद्ध लेखिका अनामिका के उपन्यास ‘आईनासाज़’ पर यह टिप्पणी लिखी है युवा लेखक महेश कुमार ने। अनामिका के उपन्यासों में संवाद प्रमुख होता है। यह संवाद काल सीमा से पड़े जाकर भी होता है। इस बात को बहुत विस्तार से पकड़ा है महेश कुमार ने। जानकी पुल की ओर से साल की यह पहली पोस्ट इसी उम्मीद में कि नये साल में आपसी संवाद अधिक मुखर हो- मॉडरेटर

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    ‘आईनासाज़’ अनामिका का उपन्यास है। यह राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है। यह उपन्यास कथानक के स्तर पर दो काम करता है। पहला, अमीर खुसरो का एक साहित्यिक जीवन चरित (hagiography) प्रस्तुत करता है। इसके जरिये हमारे सामने मध्यकाल का एक सांस्कृतिक इतिहास सामने आता है। एक लेखक, पिता, कवि और सूफी का वैचारिक जद्दोजहद प्रकट होता है। दूसरा, उपन्यास मध्यकाल और समकालीन समय के बीच एक संवाद स्थापित करता है। अमीर खुसरो की कविता, उनका सूफी संगीत और भारतीयता का विचार मध्यकाल और समकालीन समय के बीच सेतु का काम करती है। इसे दो ऐतिहासिक समय के बीच संवाद भी कह सकते हैं। इस संवाद से निकलकर आता है ‘गंगा-जमुनी’ तहजीब की अनिवार्यता। पिछले दो दशक से यह कहा जा रहा है कि ‘गंगा-जमुनी’ तहजीब इतिहासकारों द्वारा फैलाया गया झूठ है। ऐसा कहने वालों में वो हैं जो मध्यकाल के इतिहास को केवल ‘हिन्दू-मुस्लिम’ के संघर्ष की तरह देखते हैं। जो लोग उपर्युक्त तहजीब को मानते आए हैं उनका मत है कि अब यह खतरे में है। इस खतरे से आगाह करने के लिए ज्यादातर उदाहरण वो मध्यकाल के राजनीतिक इतिहास से ही देते हैं। वो बताते हैं कि कौन से हिन्दू राजा ने कितने मुसलमानों को अपने यहाँ रखा या कौन से मुस्लिम बादशाह ने हिंदुओं को महत्वपूर्ण पद सौंपे। केवल इतना भर से मध्यकाल के इतिहास के प्रति जागरुक नहीं किया जा सकता। उस काल का समृद्ध सांस्कृतिक और साहित्यिक इतिहास है। उसमें सूफियों और भक्त कवियों की कविताएँ हैं। उन कविताओं के विभिन्न स्रोत हैं जिसका संबंध मंदिर, मस्जिद, लोक जीवन, भारतीय मिथक और हिन्दू-मुस्लिम के आपसी संवाद से है। इन सबके बीच जो आवाजाही है, संवाद है और सांस्कृतिक विनिमय है उसको जनमानस के बीच स्थापित किए बिना कट्टरता और साम्प्रदायिकता से नहीं लड़ सकते हैं। इस संदर्भ में देखें तो ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ , ‘सेक्युलरिज्म’ से ज्यादा व्यापक और प्रासंगिक पारिभाषिक शब्द है। ‘सेक्युलरिज्म’ अपने साथ एक राजनीतिक निहितार्थ लेकर चलता है और इसके स्थापित होने का इतिहास भी ऐसा ही है; जबकि ‘गंगा-जमुनी’ शब्द भारतीय जनमानस, उसके लोक और स्मृति के ज्यादा अनुकूल और इतिहाससम्मत है। यह उपन्यास इस दृष्टि को स्थापित करता है।

    इस उपन्यास के दो हिस्से हैं। पहला हिस्सा मध्यकालीन राजनीति, दरबारी लेखन और लेखकीय स्वतंत्रता का द्वंद्व, सूफ़ीवाद का विकास, तत्कालीन दुनिया में सांस्कृतिक बदलाव और स्त्रियों की स्थितियों को एक सूत्र में पिरोता है जिसके केंद्र में खुसरो हैं। दूसरा हिस्सा समकालीन समय का है। इसमें युवाओं का बिखरा हुआ जीवन, एडहॉक रिश्ते, साहित्यिक कुटिलताएँ, स्त्रियों पर हर तरह के हमले और इन सबके बीच में सूफ़ी दर्शन और अमीर खुसरो की प्रासंगिकता है।

    उपन्यास शुरू होता है मध्य एशिया में शांतिवार्ता की असफलता के कारणों पर चर्चा से। सिद्धू सपना को ईमेल पर चिट्ठी लिखता है उसमें वह जिक्र करता है कि शांतिवार्ता असरकारी नहीं होती हैं क्योंकि उससे संबद्ध लोग ‘सूफ़ियों का हृदय’ नहीं रखते।  यह इस उपन्यास के भीतर प्रवेश करने का दरवाजा है जहाँ स्पष्ट संदेश है कि आगे का कथानक शांति, प्रेम, करुणा और युद्ध विराम की ईमानदार इच्छाशक्ति की होगी। जीवनी और जीवन चरित में एक मुख्य अंतर  ‘तथ्य’ और ‘किवंदती’ का है। मध्यकालीन संतों, सूफियों और राजाओं-बादशाहों के जीवन चरित लोकप्रिय हैं और जनता में अबतक स्थापित हैं। लेखिका ने इस उपन्यास में जीवन चरित के इस पक्ष का साहित्यिक छूट के तौर पर उपयोग किया है। उपन्यास ‘तथ्य’ और ‘किवंदतियों’ के समुच्चय से अपनी साहित्यिकता को प्राप्त करता है। अमीर खुसरो का जन्म एक ‘नव-मुस्लिम’ (मंगोल जिन्होंने बाद में इस्लाम अपनाया और खिलजी के समय में इन्होंने विद्रोह भी किया और कुछ नव-मुस्लिम रणथंभौर के किले के सुरक्षा में भी तैनात थे)[1]  परिवार में हुआ। वे हिन्दू रीति-रिवाज की छाँह में आगे बढ़े।  ‘गंगा-जमुनी’ तहजीब उनको विरासत में मिला । अपनी काव्य प्रतिभा के सहारे खुसरो गुलाम वंश के दरबार तक पहुँचे । दरबारी होने के बाद ही खुसरो की कई पहचान और उस पहचान से नत्थी चुनौतियों तथा अंतर्द्वंद्वों से हमारा परिचय होता है। चुनौतियों और अंतर्द्वंद्वों से ही खुसरो की कविता निखरती है । तात्कालिक परिस्थितियों से उपजे तनाव से कवि के आत्मसंघर्ष की अभिव्यक्ति हो पाती है और एक गृहस्थ खुसरो और कलाकार-कवि खुसरो का टकराव उपस्थित होता है।

    अमीर खुसरो:- इतिहास और जीवन चरित से बुनी हुई साहित्यिकता।

    उपन्यास में प्रसंग है कि पद्मिनी के जौहर से खुसरो बेहद उदास और अपराधबोध से ग्रस्त हैं। खुसरो के कहने पर ही पद्मिनी अपना चेहरा दर्पण में दिखाने के लिए राजी हुई थी।

    अपनी उदासी में खुसरो कहते हैं:-

     “ पद्मिनी की राख उड़- उड़कर

    पूछ रही है मुझसे- ‘कैसे हो?’

     ‘कैसा हूँ?’ क्या जानें, कैसा हूँ!

     वादाख़िलाफ़ी और मैं?

     हाँ, मैं ही। ज़िम्मा तो मैं ही लिया था।

     कैफ़ियत मुझको ही देनी थी।”

    खुसरो कवि थे। कवि जिसपर उसका श्रोता-पाठक बादशाह और शासक से ज्यादा भरोसा करता/करती है। इस तरह देखें तो कवियों की भी जनता होती है। इस प्रसंग में पद्मिनी खुसरो की श्रोता-पाठक जनता है। उसका भरोसा टूटा। कवि का दिल टूटा। लेखिका ने इस मामले में इतिहास से छूट लेकर जीवन चरित को और ऊँचाई देने की कोशिश की हैं। ख़ज़ाइनुल फुतुह में कहीं भी यह चर्चा नहीं है कि खुसरो ने खिलजी को रोकने की कोशिश की या पद्मिनी से खुसरो का कोई संबंध था। मोहम्मद हबीब द्वारा अनुदित ख़ज़ाइनुल फुतुह के फुटनोट्स में यह दर्ज है कि “पद्मिनी की कथा कर्नल जेम्स टॉड ने फैलाया जिसका कोई ऐतिहासिक विश्वसनीयता नहीं है।”[2] इंडिया टुडे के एक लेख में भी इस पद्मिनी और रतनसेन की ऐतिहासिकता की पड़ताल करते हुए यह बताया गया है कि “पद्मिनी नाम की स्त्री की जौहर की कोई जिक्र नहीं है”[3]। यह प्रयोग खुसरो के ‘गंगा-जमुनी’ परवरिश को विस्तार देने के लिए है। यह बताने के लिए है कि यदि बादशाह ‘कवि और सूफी’ की सुनता तब यह परिस्थिति न पैदा होती। एक तरह से पद्मिनी की कथा को खुसरो की दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है जिसके मूल में सूफियों के प्रेम और करुणा का सिद्धांत है। लेखिका ने खुसरो के इतिहासकार वाले पक्ष को भी सामने रखा है। खिलजी के समय के सुधारों, व्यापारिक उन्नति और न्याय संबंधित नीतियों को साहित्यिक रूप देती हुई लिखती हैं कि “धोबियों के यहाँ कम ही गंदे कपड़ों के ढेर पड़े रहते हैं, सरायों से ठहाकों की आवाज़ों आतीं। ख़ातूनें भी घर की ओर मुँह किये आराम से चरखा चलाती हुई दीख पड़तीं।” देवल रानी और ख़िज्र खां के प्रेम कहानी की चर्चा भी खुसरो के इतिहासकार पक्ष को दिखाता है। खुसरो संगीतकार भी थे जो सूफियों का एक प्रमुख गुण है। कव्वाली, वाद्ययंत्रों का निर्माण और गज़ल में उनका योगदान है। इसमें दो बातें हैं। खुसरो सामाजिक परिवर्तन के लिए विचार और संगीत को साथ लेकर चलने वाले हैं। केवल वैचारिकता शुष्कता पैदा करती है। उसमें करुणा का योग हो इसके लिए संगीत जरूरी है। संगीत की यह प्रेरणा उनको अयोध्या के मंदिरों में होने वाले गायन-वादन से मिला। कट्टर मुसलमान उनको मूर्तिपूजक समझने लगे। उन्होंने इसकी चिंता नहीं की।

    उन्होंने गाया “बारिहि लाइयो, राम मनाइयो!”

    इस तरह खुसरो का जीवन ‘इतिहास’ और ‘जीवन चरित’ के आवाजाही में ‘गंगा-जमुनी’ विचार को भारतीयता का मूल विचार मानने का प्रस्ताव रखता है।

    खुसरो:- गृहस्थ, कवि, शिष्य और दरबारी होने के विविध संदर्भ।

    एक गृहस्थ के रूप में उनके विचार भी डर और पुरुषवादी सोच से निर्मित है। कायनात उनकी बेटी है। अपनी बेटी के बारे में उनका मत है कि “चाहता हूँ, पर्दा करे। घर के बाहर न निकले। जो पढ़ना है, मुझसे ही पढ़े। शायरी करने लगी है तो बेशक करे, पर सुनाए सिर्फ शौहर को।” एक पिता होने के नाते यह डर स्वाभाविक था। वे एक दरबारी थे। उन्होंने देखा था कि सत्ता में बैठे लोग स्त्रियों को कैसे रौंदते हैं और उसे अपनी जीत मानते हैं। पर्दा प्रथा और बाल विवाह का और मजबूत होते जाने में तत्कालीन युद्धोन्मादी प्रवृत्तियों का योगदान तो था ही। लेकिन, यह कहना कि शायरी सिर्फ शौहर को सुनाए इसमें खुसरो का पुरुषवादी दृष्टि है। यह स्त्रियों की ‘बुद्धिमता’ और उससे कमाए जाने वाले ‘पाठक-श्रोता’ पर नियंत्रण की कोशिश है। इसका विरोध उनकी पत्नी ही करती है यह कहकर कि “किससे पर्दा करूँ, कौन है ग़ैर कि कोख से ही मेरी तो ये संसार है।” यह पूरा प्रसंग स्त्रियों की रचनात्मकता, उनकी भाषा और अनुभव को रेखांकित करने के साथ यह बताती है कि ‘डर का मनोविज्ञान’ कैसे यथास्थितिवाद को बनाए रखने में सहयोग करता है। खुसरो का डर और उनकी संवेदनशीलता अंततः पितृसत्ता के पक्ष में ही है। अपने बेटों के लिए उन्हें ‘सुरक्षा’ की कोई चिंता नहीं है। एक तो ज्योतिष और दो को व्यापारी बनाया। इस तरह वे अपने बेटों के लिए समझदार और बेटियों के लिए डरपोक (प्रोटेक्टिव) पिता हुए। यहाँ उनका कवि और दरबारी होना भी काम नहीं आया। पति के रूप में अपनी पत्नी की रचनात्मता के लिए वही विचार हैं जो बेटियों के लिए है। लेकिन, अपनी पत्नी (महरु) के प्रति वे हमेशा आस्थावान हैं। प्रगतिशीलता और दृढ़ता के मामले में महरु ज्यादा साहसी है। वो कहती है मुझे ‘खुसरो’ की तलब है ‘अमीर’ की नहीं।

    दरबारी खुसरो और कवि खुसरो के बीच मूल अंतर ‘लेखकीय आजादी’ का है। दरबारी खुसरो इतिवृत्त लिखने में सहज है। लेकिन जब बात कविता की होती है जहाँ वह खुलकर स्त्रियों और आमजन की आजादी के बारे में लिखना चाहता है तब उसकी खुद की आजादी आड़े आ जाती है। वह अपनी पत्नी से कहते हैं “मेरी मुश्किल यह है महरु कि जिस आँख ने दूसरी आँख फोड़ी, उसके क़सीदे पढ़ने पड़ रहे हैं।…मेरी कलम मुझको धिक्कारती है इस मजबूरी पर। क़लम की आजादी के ख़्वाब बुनने लगा हूँ कि आगे आने वाली कौमों को अपनी कलम गिरवी रखने की मजबूरी न हो।”  उनकी यह इच्छा उन्हें बार-बार निजाम पिया की ओर ले जाती है। उस बहाने से वो अपने समकालीन सूफियों से मिलते हैं। गुरु-शिष्य का यह रिश्ता केवल भावनात्मक न होकर एक वैचारिक आंदोलन का रूप लेता है। मलिका उसकी एक कड़ी है जो बताती है कि “धीरे-धीरे सूफ़ी दुनिया की सभी बोलियों में शायरी करते दिखाई देंगे। इतालवी, फ्रांसीसी, अंग्रेजी, स्पैनिश, फ़ारसी और हिंदवी आदि कुछ भाषाएँ तो ख़ुदा के नूर में नहा ही जाएंगी। फरिश्ते किताब की शकल में नमूदार होंगे! जहाज भर-भर किताबें इधर से उधर जाएंगी।”  यहाँ सूफीवाद एक ऐतिहासिक जरूरत और दुनियाभर में होने वाले वैचारिक आंदोलनों का प्रतिनिधि बन जाता है। इसमें केवल प्रेम ही नहीं तार्किकता भी एक पक्ष हो जाता है। तार्किकता यह है कि अपने पक्ष के कारण सूफ़ी कट्टर हिन्दू-मुसलमान के निशाने पर आ गए और बदले में खुसरो का सूफ़ीवाद अपने बच्चों से यह कहता है कि “तुम भी इश्क़ इख़्तियार करना, सच्चाई की जिंदगी जीना, ज़ुल्म से नफ़रत करना और आदमी से मुहब्बत। बाकी तमाम उम्र सभी नफ़रतों से आज़ाद रहना।” यह खुसरो का हिंदुस्तान के लिए वसीयतनामा है।

    खुसरो:- समकालीनता और इतिहास के बीच संवाद के संदर्भ।

    उपन्यास का दूसरा हिस्सा 21वीं सदी पर केंद्रित है। स्त्री-पुरुष संबंध, उपभोक्तावाद और जीवन की सार्थकता, लेखकीय आजादी और स्त्री का संबंध, स्त्रीवादी आंदोलन और सूफ़ीवाद का संबंध दूसरे हिस्से में संवाद करते नजर आते हैं। सपना इन मुद्दों और इससे संवादरत पात्रों की गवाह है।

    खुसरो अपने जीवन में एक कामयाब पिता, स्नेहसिक्त पति और समझदार दोस्त बनने की कोशिश करते रहे। जहाँ भी कोई उलझन होती अपने ‘निजाम पिया’ के पास चले जाते।

    आधुनिक जीवन में मानस और महिमा के प्रेम पर रोजगार, व्यक्तिगत महत्वकांक्षा और पारिवारिक जिम्मेदारी हावी है। जीवन की अनिश्चितता ने उसके आपसी रिश्ते को ‘एडहॉक’ में बदल दिया, अब छूटा की कब छूटा वाली हालत। इस ‘डर’ ने महिमा के मनोविज्ञान को इतना प्रभावित किया है कि उसका इलाज मंत्र, भभूत, व्रत-उपवास और दान में खोजने लगी। यह प्रसंग ‘डर का मनोविज्ञान’ और ‘आध्यात्मिक उपभोक्तावाद’ के आपसी रिश्ते को पाठक के सामने रखता है। आज अध्यात्म ‘कमोडिटी’ में बदल गयी है। इसके लिए कथावाचकों और नित नए किस्म के देवताओं और मंदिरों आदि का एक बाजार खड़ा हो गया है जो हमारी भावनात्मक, आर्थिक और शैक्षणिक असुरक्षाओं को ‘कैश’ करती है। ठीक ऐसी स्थिति में सूफ़ीवाद यह प्रस्ताव करता है कि शिक्षा और कला जबतक आपस में नहीं जुड़ेंगे, इनका रोजगारपरक संबंध नहीं होगा तबतक युवा पीढ़ी को आर्थिक और भावनात्मक तौर पर मजबूत नहीं बनाया जा सकता। खुसरो का अपना जीवन भी ऐसा ही था । कला और रोजगार दोनों उनके जीवन में नत्थी था। आज नहीं है।

    खुसरो की दूसरी चिंता थी ‘लेखकीय आजादी’ और ‘स्त्रियों के लिए एक सुरक्षित दुनिया’ ताकि वो भी लिख सकें, रोजगार कर सकें और समाज उनको ‘शरीर’ समझे जाने की मानसिकता से मुक्त होकर इंसान के तौर पर समझ सकें। खुसरो का यह संघर्ष अबतक जारी है। उपन्यास में यह हिस्सा स्त्री भाषा और वैचारिकी से ओतप्रोत है। सपना, ललिता, श्यामा, सरोज किंडो, शहाना, नफ़ीस, सिद्धू-महिमा के जीवन यहाँ केंद्र में है। सपना का जीवन प्रसंग मॉडलिंग की दुनिया और आसाराम बापू के बलात्कारी पक्ष से जुड़ता है। वहाँ से निकलकर वह ललिता मैडम और श्यामा दी से जुड़ती है। श्यामा दी के यहाँ मिलती हैं सरोज किंडो जो एक लेखिका है। लेखिका ने बतरस और किस्सागोई की क्रमबद्धता में स्त्रियों की एक समूह बनाती हैं। इस समूह के बहाने वो वर्तमान समय में स्त्रियों से जुड़ी चुनौतियों और चिंतनों को एक कथात्मकता में पिरोती हैं।

    सरोज किंडो के लेखकीय जीवन के बहाने ‘लेखकीय आजादी’ और ‘स्त्री,प्रकाशक,प्रस्ताव’ की दुनिया खुलती है। सरोज एक प्रतिभाशाली स्त्री है। एक सांसद उसे मुश्किल परिस्थितियों में अपने आवास पर शरण देता है। प्रकाशकों से मिलवाने में सहयोग करता है। उसका वह अतिरिक्त फायदा सरोज से चाहता है। मना करने पर उसके चरित्र पर लांछन लगाता है। इस पूरे प्रकरण में साहित्य की दुनिया का काला पक्ष खुलता है। श्यामा दी कहती हैं कि “शिक्षादीप्त स्त्री उतनी ही अकेली है जितना की ध्रुवस्वामिनी थी। रामगुप्तों का समाज है, चंद्रगुप्त नजर ही नहीं आते।” साहित्य के रामगुप्तों के समाज में जो गुटबाजी होती है स्त्रियों के खिलाफ उसमें कई ‘कविता सिंह’ जैसी स्त्रियाँ भी होती हैं जो चर्चा में बने रहने के लिए ऐसे षड्यंत्रों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। यह चौकड़ियाँ अब सोशल मीडिया और फेसबुक पर जमती हैं। ललिता, सपना , सरोज और श्यामा दी इस प्रवृत्ति से परेशान होती हैं कि यह समय स्त्रियों और लेखिकाओं से उनकी ‘आजादी’ का बहुत ज्यादा कीमत वसूल कर रही है। उनका खुद का जीवन भी इसी से त्रस्त है।  वो मानती हैं कि “छत, बाथरूम और भंडार घर औरतों का तीसरा फेफड़ा है। छत और मेट्रो उन्हें मायके की निश्चिन्तता देती हैं।” आधुनिक कही जाने वाली इस 21वीं सदी में आज भी स्त्रियों को एकांत और चिंतन के लिए यह कहना स्त्री सशक्तिकरण की धज्जियाँ उड़ाने के लिए पर्याप्त हैं। स्त्री भाषा की यह व्यंग्यात्मक टोन यह बताने के लिए सटीक है कि आज स्त्रियों को एक साथ कई भूमिकाओं को जिसमें घर-बाहर शामिल हैं, निभाना पड़ रहा है। इसके बावजूद उनका मानना है कि “स्त्री आंदोलन अन्य रैडिकल आंदोलनों की तरह सर्वोच्छेदनवादी नहीं रहा। उसने परंपरा से रूढ़ियाँ फटक-बीनकर उसके पोषक तत्व संभाल लिए हैं और देह-दोहन का शिकार हम जैसी स्त्रियों का मनोबल बढ़ाने के लिए लगातार इनका उपयोग भी किया है- खासकर अफ्रीका में, एशिया में और लातिन अमेरिका में जहाँ प्रकृति साहित्य, प्रेम और अध्यात्म की विधायिका शक्ति के रूप में केन्द्रस्थ रही है।” यह एक ऐसा विचार है जिसके केंद्र में अहिंसा, रचनात्मकता और संवाद है। शोषण के जितने टूल्स समाज, राजनीति और पितृसत्ता ने स्त्रियों के खिलाफ ईजाद किया है; उसी को रचनात्मकता में बदलकर इन प्रतिक्रियावादी विचारों से संवाद करना और अपने लिए स्पेस तैयार करना इस विचार का उद्देश्य है।

    ऐसी परिस्थितियों में सपना की मुलाकात नफ़ीस और शहाना से होती है। नफ़ीस सूफ़ीवाद में गहरी आस्था रखने वाले व्यक्ति हैं। उनके जीवन के केंद्र में करुणा, प्रेम, सहयोग और वैयक्तिकता का सम्मान शामिल है। शहाना उनकी पूर्व प्रेमिका-पत्नी हैं। दोनों मनुष्यता की सेवा में तत्पर हैं। शहाना का जीवन दर्शन एड्रिन रिच के लेस्बियन कॉन्टिनम से प्रेरित है। अपनी पेंटिंग में उसी को वह प्रतिबिंबित करती है। रिच का लेख ‘हेट्रोसेक्सयूएलिटी एंड लेस्बियन ऐक्सिस्टेंस’[4] विस्तार से बताता है कि कैसे श्रम, शरीर, लिंग, अधिकार, यौनिकता आदि को पितृसत्ता ने नियंत्रित करके दोहन किया। दुनियाभर में इसके लिए स्त्री देह को बदला, शोषण और विजय के रूप में पुरुषों ने इस्तेमाल किया। इस अर्थ में सपना और शहाना का विचार एकरूप होकर स्त्रियों का एक वैश्विक बहनापा रचती हैं और यह प्रस्तावित करती हैं कि “फील इट, शट इट, फॉरगेट इट की क्षणवादी संबंध सजे-सजाए काउंटरों पर सेक्स तो बेच सकती है, प्रेम नहीं।” प्रेम करने के लिए संवाद जरूरी है। नफ़ीस, शहाना, सपना, श्यामा दी, ललिता मैडम, सिद्धू-महिमा, शक्ति दा ये सब एक वैकल्पिक समाज और आदर्श के लिए प्रयासरत और संवादरत हैं। स्त्रियों की यह दुनिया और उनके सिद्धांत खुसरो के चिंतन और सूफ़ीवाद से एकमेक है। एक तरह से लेखिका ने स्त्रीवादी चिंतन को सूफ़ीवाद के करीब लाने की कोशिश की है। आज का समय जिसमें ‘खुसरो’ जैसों की नागरिकता संदिग्ध हो चली है। केतन यादव की कविता ‘अमीर खुसरो का नागरिकता प्रमाणपत्र 2024’ से उधार लेते हुए कहें तो :-

    “पीर मुसीद हज़रत ख़्वाजा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर

    “सकल बन फूल रही सरसों” को बिखरने वाले को उठाओ

    अजूबा जिसने छाप तिलक किया, हाल की मिसकी में

    जिसकी बुनियाद पर हिंदुस्तानी ज़ुबान टिकी है , वही—

    इकलौते कदम जिनके आगे मिर्ज़ा गालिब का सिर झुकता था

    पूछो उससे वसीयत के काग़ज़ात

    ख़ारिज़ दाखिल कोई, कब्र का ही नक्शा सही

    ढू़्ंँढ़ों जल्दी ढूँढ़ो !

    किस देश चलोगे अब खुसरो

    चहुँ रैन ही पड़ी है जब ,

    ढ़ूँढों – ढ़ूँढों ,  काग़ज़ात ले आओ अपने।”

    हम सबको खुसरो के पक्ष में सत्ता और स्वयं से संवाद करने की जरूरत है ताकि उनका सपना ‘मरने’ से बचा रहे और हम सब मनुष्य बने रहें। ललित चतुर्वेदी के शब्दों में कहें तो ‘मनुष्य नहीं रहने का मतलब संवाद के लायक नहीं रहना। सिर्फ बोलते रहना, सुनना नहीं।’ इस उपन्यास का केंद्रीय विचार भी यही है कि हमसब एकदूसरे को सुने, संवाद करें ताकि खुसरो का ‘भविष्य’ ज्यादा न्याय पसंद और आजाद रहे।

    यह उपन्यास अपनी किस्सागोई, स्त्री दृष्टि और स्त्री भाषा, कई चिंतनों और अतीत तथा वर्तमान के संयुक्त साहित्यिकता के कारण विशेष है। यही विशेषता इस उपन्यास की औपन्यासिकता भी और इसके कारण कहीं-कहीं बिखराव और बोझिलता भी है। उपन्यास का दूसरा हिस्सा कई लेखकों के परिचय, चिंतनों और उक्तियों से पटा पड़ा है। विवरण की अधिकता रोचकता को प्रभावित करती है। असल में उपन्यास जिस ‘वैश्विकता’ को संबोधित है वह पाठक से साहित्य के इतिहास का अध्ययन चाहता है। इस उपन्यास का उद्देश्य ही सूफ़ीवाद और वैश्विक नागरिकता के बीच संवाद है। 

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    (उपन्यास राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है)

                                                                                                                             

    [1] https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.280754/page/n3/mode/1up  Muhammad Habib, 1931,pp:- 40.

    [2] https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.280754/page/n3/mode/1up  Muhammad Habib, 1931,pp:- 50.

    [3] https://www.indiatoday.in/movies/bollywood/story/padmavati-who-was-rani-padmini-husband-maharawal-ratan-si

    ngh-1091009-2017-11-21

    [4] https://posgrado.unam.mx/musica/lecturas/Maus/viernes/AdrienneRichCompulsoryHeterosexuality.pdf

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