• लेख
  • श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास: अधूरे होने की व्यथा

    आज हिन्दी के मूर्धन्य लेखक श्रीलाल शुक्ल की जन्म-शताब्दी है। इस अवसर पर यह लेख पढ़िए। लिखा है अंग्रेज़ी के जाने माने उपन्यासकार अमिताभ बागची ने। अमिताभ बागची को उपन्यास ‘हाफ़ द नाइट इज गॉन’ के लिए प्रतिष्ठित जेसीबी अवार्ड मिल चुका है। उनका एक उपन्यास ‘The Householder’ श्रीलाल शुक्ल को समर्पित भी है। यह लेख पहली बार 2011 में ओपन मैगज़ीन में प्रकाशित हुआ था। आज उनकी जन्मशताब्दी पर इसको substack.com पर पुनः प्रकाशित हुआ है। नीचे मूल लेख का लिंक भी दिया गया है। आप यहाँ हिन्दी में पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

    =============================

    साहित्य का इतिहास एक खुलती हुई पांडुलिपि  की तरह होता है, जिस पर सच बोलने वालों के नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज होते हैं। 28 अक्तूबर 2011 को इस पांडुलिपि में एक और नाम जुड़ गया। श्रीलाल शुक्ल इस दुनिया से विदा हुए और हमारे सामूहिक विरसे में ऐसा रचनात्मक काम छोड़ गए, जो आज़ाद भारत की राष्ट्र-निर्मिति जिस झूठ और भ्रष्टाचार के ढेर पर टिकी है, उसमें सुरंग बनाकर घुसता है और भीतर छिपी खोखलेपन की परतों को उधेड़ देता है।

    श्रीलाल शुक्ल का लेखन मूलतः एक ही सवाल के इर्द-गिर्द घूमता है—क्या गहराई तक भ्रष्ट हो चुकी दुनिया में नैतिक आचरण मुमकिन है? इस सवाल से पैदा हुई झुँझलाहट धीरे-धीरे एक ज्वलनशील क्रोध में बदल जाती है; वही ग़ुस्सा शुक्ल की सधी हुई क़लम में उतरता है और पन्नों पर ऐसे फूट पड़ता है कि हिन्दी या किसी भी ज़बान में लिखी गई सबसे मज़ेदार गद्य-धाराओं में उसकी गिनती की जा सके। मगर यह अफ़सोस की बात है कि शुक्ल को ज़्यादातर लोग सिर्फ़ उनके व्यंग्य के लिए जानते हैं। सच यह है कि अपने पूरे कृतित्व में उन्होंने उस मायूसी को भी मात दी है, जिसे व्यंग्य अक्सर बयान करता है, और नैतिक संभावना की उस बड़ी दुनिया को खोज निकाला है—जिसका पता सिर्फ़ उन्हीं को चलता है, जिनकी रूहानी या कलात्मक सहनशीलता उस कठिन इम्तिहान पर खरी उतरती है।

    यह यात्रा सूनी घाटी का सूरज (पहली बार 1957 में प्रकाशित) से शुरू होती है—एक ऐसी कहानी से, जिसमें असफलता पहले से ही तय है। इसका नायक वीर है, असाधारण प्रतिभाशाली, अत्यंत संकल्पशील और पूरी तरह ईमानदार—उस किस्म का युवक, जिसे विवेकानंद अवश्य सराहते। इसी अर्थ में वह शुक्ल का सबसे कमज़ोर पात्र है। उसकी अंतिम नियति करुण है, और उसकी करुणा स्वयं उस व्यवस्था पर एक प्रहार बन जाती है, जो ऐसे लोगों को नष्ट कर देती है। इसके अलावा इसमें बहुत कुछ जोड़ने को नहीं है।

    लेकिन शुरुआती रचनाएँ इसलिए लिखी जाती हैं कि उन्हें आगे चलकर पार किया जा सके—और शुक्ल जी ने यह कर दिखाया मकान (1976) में। यह उस उपन्यास के बाद आया जिसमें फिर एक मासूम नायक समाज की सड़ाँध से अभिभूत दिखाई देता है—राग दरबारी—जो इसके बावजूद साहित्य की एक अमर कृति है।मकान की कथा एक कायर क्लर्क, नारायण बनर्जी की है, जो संयोग से एक अत्यंत प्रतिभाशाली सितारवादक भी है। शुक्ल के सबसे सधे हुए पुरुष पात्रों की तरह बनर्जी की मर्दानगी भी सीमाबद्ध है। वह अपनी महिला शिष्यों के प्रति कामना से भरा रहता है—वे उसकी संगीत-प्रतिभा की पूजा करती हैं, और साथ ही उसकी अधपकी रिझाने की कोशिशों का मज़ाक उड़ाकर उसे नपुंसक भी कर देती हैं। परिवार के लिए घर जुटाने की नाकाम कोशिशों से त्रस्त, और एक नई शिष्या के साथ किसी तरह शुरू हो गए व्यभिचारी संबंध से उलझा हुआ बनर्जी, अंततः अपनी कला में शरण खोजता है। यहीं हमें संगीत पर लिखा गया साहित्य का शायद सबसे मार्मिक और सजीव गद्य मिलता है। मकान लिखते हुए शुक्ल ने सचमुच एक अद्भुत कारनामा किया है—उन्होंने उस भावनात्मक धारा की दिशा ही बदल दी है, जिससे संगीत पोषित होता है; उन्होंने उसे लिखित गद्य के भीतर प्रवाहित कर दिया है। इस उपलब्धि का परिणाम यह है कि पाठक को बिना बताए ही यह समझ में आ जाता है कि पवित्र कला से बनर्जी का संबंध ही उसे बचाता है—उसी के कारण, उसकी सांसारिक असफलताओं के बावजूद, वह अंततः एक नैतिक प्राणी बन पाता है। इस उपन्यास की संरचना में कला ही नैतिकता का एकमात्र संभावित आश्रय है। यह नैतिकता के अस्तित्व की पुष्टि तो करती है, लेकिन साथ ही उसे अधिकांश लोगों की पहुँच से बाहर भी कर देती है—यहाँ तक कि स्वयं क्लर्क नारायण बनर्जी की भी।

    पहला पड़ाव (1987) पढ़ना शुरू करते समय एक और पराजयवादी कथा का भय मन में उभर आता है। यह शुक्ल की अपनी प्रिय रचनाओं में से एक थी—एक ऐसा उपन्यास, जिसे उन्होंने एक अधूरे रह गए द्विखंड (डिप्टिक) के पहले हिस्से के रूप में सोचा था, ताकि भारत के सबसे अभागे लोगों में से कुछ—बिलासपुरी प्रवासी निर्माण मज़दूरों—के प्रति अपनी गहरी सहानुभूति को स्वर दे सकें।

    इसका नायक, संतोष कुमार उर्फ़ सत्ते—कानून का एक निकम्मा छात्र, और पहले रेलों में धक्के खाते रहने वाला एक लम्पट-सा दैनिक यात्री—अपने गाँव के एक रसूख़दार व्यक्ति द्वारा बनवाए जा रहे नए मकान की निर्माण-स्थली पर ओवरसीयर की नौकरी पकड़ लेता है। सत्ते वहाँ अपना समय ज़्यादातर यूँ ही बिताता है—जसोदा पर लार टपकाते हुए, एक निर्माण मज़दूर है और असाधारण रूप से सुंदर है।

    जब जसोदा का पति मारा जाता है, तो सत्ते अपने ही दुनियादार और चालाक ढंग से यह पता लगाने की कोशिश में लग जाता है कि उसे किसने और क्यों मारा। धीरे-धीरे हमें यह एहसास होने लगता है कि उसकी पहले की वही वासना अब किसी अजीब, लेकिन उम्मीद जगाने वाली कीमिया से गुजरकर, उन दबे-कुचले लोगों के प्रति करुणा में बदल रही है—जिनके शोषण में वह खुद भी शामिल रहा है।

    कहानी के अंत तक रहस्य सुलझता नहीं है, लेकिन सत्ते की अंतरात्मा जाग उठती है—और उसके साथ ही शुक्ल के लेखन में उम्मीद की एक नई आहट भी सुनाई देती है। एक साक्षात्कार में शुक्ल जी ने कहा था कि सत्ते उन पात्रों में से था, जो अपने लेखक के हाथ से निकलकर अपनी ही ज़िंदगी जीने लगे—जो अपनी शुरुआती रूपरेखा की कैद में रहने से इनकार कर देता है। मुझे यह सोचकर अच्छा लगता है कि शायद सत्ते ने अपने रचयिता को भी चकित कर दिया—यह मानने से इनकार करके कि नैतिक जीवन असंभव है।

    बिश्रामपुर का संत (2000) में कुंवर जयन्ती प्रसाद का प्रकट होना—जो सचमुच एक घृणास्पद नायक है—लेखक की संवेदनशीलता में इससे भी कहीं बड़ा छलांग है। हम उससे पहली बार तब मिलते हैं, जब वह अस्सी वर्ष का है—अवसरवाद पर टिकी सार्वजनिक सेवा की एक लंबी पारी के अंत पर। बहुप्रतीक्षित राजदूत पद न मिल पाने की निराशा और सुंदरि की मृत्यु—एक ऐसी स्त्री, जिसकी उसने दशकों पहले कामना की थी—उसे वापस अपने गाँव की ओर मोड़ देती है, जहाँ वह भूदान आंदोलन के बचे-खुचे अवशेषों के साथ काम करने लगता है। यहाँ यह उल्लेख करना उचित होगा कि 23 मई 1952 को महात्मा गांधी से अपनी आभा ग्रहण करने वाले एक संत-पुरुष के नेतृत्व में चला वह भले इरादों वाला, पर कमज़ोर ढंग से सोचा गया आंदोलन, तब एक निर्णायक मोड़ पर पहुँचा, जब उसमें “पूरा का पूरा गाँव” दान कर दिया गया। यह गाँव—हमीरपुर ज़िले का मंगरोथ—उस समय एक उप-मंडलीय मजिस्ट्रेट के अधिकार-क्षेत्र में आता था, जिनका नाम था श्रीलाल शुक्ल। संयोग से वे वहीं मौजूद थे, जब करिश्माई विनोबा भावे गाँव में आए और उसकी ज़मीन को दान घोषित कर दिया।

    मैं उस युवा लेखक को मन ही मन देख सकता हूँ—अन्य कनिष्ठ सरकारी अफ़सरों के साथ पृष्ठभूमि में खड़ा हुआ—घटना के रंगमंच पर उपस्थित पात्रों को यह अंदाज़ा भी नहीं कि लगभग पचास साल बाद वही व्यक्ति एक ऐसा गम्भीर उपन्यास लिखेगा, जो आधी-अधूरी लोकलुभावन नैतिकता के सहारे ऊँचा नैतिक आसन हथियाने की कोशिश करने वाले तमाम आंदोलनों की आत्मधर्मिता की परतें उधेड़ देगा। लेकिन भूदान आंदोलन पर किया गया प्रहार जितना महत्त्वपूर्ण है, उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है—आसानी से दानवीकृत किए जा सकने वाले कुंवर जयन्ती प्रसाद के भीतर विवेक का विकास। यहाँ शुक्ल एक ऐसी सहानुभूतिपूर्ण छलांग लगाते हैं, जो पहली नज़र में किसी अगम खाई को पार करने जैसी लगती है। कुंवर जयन्ती प्रसाद को एक अंतिम, उद्धारकारी कर्म के योग्य बनाकर शुक्ल हमें निर्णायक रूप से दिखा देते हैं कि नैतिक प्रेरणा हम सबके भीतर निवास करती है—और उसे खोज लेने के लिए कभी भी बहुत देर नहीं होती।

    शुक्ल अपने पीछे एक और महत्त्वपूर्ण सीख छोड़ जाते हैं—जो उनके पचहत्तरवें जन्मदिन पर दिए गए एक साक्षात्कार में सामने आती है। जब उनसे पूछा गया कि इस उम्र में भी उन्हें लिखते रहने की प्रेरणा कहाँ से मिलती है, तो उन्होंने कहा:
“वही चीज़ जो पहले थी—अनुभवों का एक उलझा हुआ समुच्चय… जो अब तक लिखे गए को अपर्याप्त मानता है, अधूरेपन की पीड़ा पैदा करता है, और मुझे लगातार कुछ नया लिखने के लिए उकसाता रहता है।”

    श्रीलाल शुक्ल का समूचा लेखकीय जीवन इस बात का आदर्श उदाहरण है कि एक लेखक को हमेशा अधूरेपन और अपर्याप्तता के ख़िलाफ़ संघर्षरत रहना चाहिए—यह जानते हुए भी, शायद, कि यह संघर्ष कभी समाप्त नहीं होता। एक दिन व्यक्ति का निजी संघर्ष अवश्य समाप्त हो जाता है, जैसा कि 28 अक्टूबर 2011 को इस साहित्य-पुरुष के साथ हुआ।

    लेकिन किताबें अब भी मौजूद हैं—गवाही देने के लिए तैयार—ठीक उसी तरह, जैसे दुनिया का महानतम साहित्य देता आया है—मनुष्य की उस बुनियादी आकांक्षा की, जो एक नैतिक जीवन जीने की चाह से जन्म लेती है।

    मूल लेख का लिंक-https://amitabhabagchi1.substack.com/p/the-pain-of-incompleteness

     

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    1 mins