‘द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ के एक अंश का हिंदी अनुवाद

बीस साल बाद अरुंधति राय का दूसरा उपन्यास आया है ‘द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैप्पीनेस’. मैंने इसके एक अंश का अनुवाद किया है जो आज ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ में प्रकाशित हुआ है. आप भी पढ़कर बताइयेगा- मॉडरेटर

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जब उसको पहली बार ऐसा महसूस हुआ कि वह घर के बाहर जा सकती थी तो जहाँआरा बेगम ने बच्चे आफताब को साथ लिया और हज़रत सरमद शहीद की दरगाह चल पड़ी, जो उसके घर से महज दस मिनट की दूरी पर था. तब तक उसको हजरत सरमद शहीद की कहानी का पता नहीं था, और उसको तो इस बात का भी कोई अंदाजा नहीं था कि उसके कदम इतने यकीनी तरीके से उनकी दरगाह की तरफ क्यों बढे थे. शायद उन्होंने उसको आवाज़ दी हो. शायद वह उन अनजान लोगों से आकर्षित हो गई हो जिनको वह मीना बाज़ार जाते समय वहां बैठे देखा हो, अपनी पिछली जिंदगी में जिस तरह के लोगों को वह तब तक देखने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी जब तक कि वे उसके सामने ही न आ जाएँ. अचानक वे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण लोग लगने लगे थे.

हजरत सरमद शहीद की दरगाह आने वाले सभी लोगों को उनकी कहानी का भी पता नहीं होता था. कुछ लोग टुकड़ों-टुकड़ों में जानते थे, कुछ बिलकुल नहीं जानते थे और कुछ ने तो अपनी कहानियां ही बना ली थीं. ज्यादातर लोगों को यही पता था कि वे यहूदी आर्मेनियाई व्यापारी थे, जो अपनी जिंदगी के प्यार की खातिर फारस से सफ़र करते हुए दिल्ली आ गए थे. बहुत कम लोगों को यह पता था कि उनकी जिंदगी का वह प्यार अभय चंद, एक कमसिन हिन्दू लड़का, था, जिनसे वे सिंध में मिले थे. ज्यादातर लोगों को यही पता था कि वे बड़े प्रसिद्ध यहूदी थे और उन्होंने इस्लाम धर्म को अपना लिया था. बहुत कम लोग यह जानते थे कि अपनी आध्यात्मिक खोज के कारण उन्होंने आखिरकार रुढ़िवादी इस्लाम का भी त्याग कर दिया था. बहुत लोगों को यह पता था कि सार्वजनिक रूप से फांसी पर चढ़ाए जाने से पहले वे शाहजहानाबाद की सड़कों पर नंगे फ़कीर की तरह रहते थे. कम लोगों को यह पता था कि उनको सार्वजनिक रूप से नंगे रहने के अपराध में फांसी पर नहीं चढ़ाया गया था बल्कि उनका अपराध यह था कि उन्होंने अपने धर्म का त्याग किया था. उस वक्त के बादशाह औरंगजेब ने सरमद को अपने दरबार में बुलाया और बोला कि वह ‘ला इल्लाह इल्लल्लाह, मुहम्मद-उर रसूल अल्लाह’ का कलमा पढ़कर यह साबित करें कि वे सच्चे मुसलमान थे. लाल किले के राज दरबार में वे काजियों और मौलानाओं की अदालत में नंगे खड़े थे. जब उन्होंने कलमा पढना शुरु किया तो आकाश में एक दूसरे से अलग होते हुए बादल ठहर गए, उड़ते हुए पंछी आकाश में जम से गए और किले में हवा भारी और अपारदर्शी हो गई. लेकिन उन्होंने जैसे ही पढना शुरू किया कि रुक गए. उन्होंने कलमा का बस पहला हिस्सा ही पढ़ा: ला इल्लाह यानी ईश्वर नहीं है. इससे आगे वे उन्होंने नहीं पढ़ा, उन्होंने जोर देते हुए कहा कि जब तक उनकी आध्यात्मिक यात्रा पूरी नहीं हो जाती और जब तक वे अल्लाह को पूरे दिल से नहीं अपना लेते, तब तक कलमा पढना इबादत का मजाक उड़ाना ही होगा. औरंगज़ेब ने अपने काज़ियों के कहने पर सरमद की फांसी का आदेश दिया.

इससे यह समझ लेना कि जो लोग हजरत सरमद शहीद की दरगाह पर बिना उनकी कहानी को जाने इबादत के लिए जाते थे वे अज्ञानतावश ऐसा करते थे, जिनको तथ्यों और इतिहास के बारे में कुछ भी पता नहीं था, तो यह गलत होता. क्योंकि दरगाह के भीतर जो दुआ पाने के लिए जाते थे उनको सरमद की मुक्त आत्मा का अहसास इतना सच महसूस होता था जितना कि तमाम ऐतिहासिक साक्ष्य मिलकर नहीं हो सकते थे. उन्होंने सर्वनाश की सम्भावना के सामने आने पर भी धार्मिक अनुष्ठान के स्थान पर आध्यात्मिकता के सद्गुणों को, तड़क-भड़क और गुरूर के स्थान पर सादगी को जनता के बीच प्रचलित किया. सरमद की आत्मा ने अपने यहाँ आने वालों यह इजाजत दी कि वे उसकी कहानी को ले जाएँ और जो चाहे सो बना दें.

जब जहाँआरा बेगम उस दरगाह पर आने वाली एक जानी पहचानी शख्सियत बन गई तब उन्होंने वह कहानी सुनी(और सुनाई) कि किस तरह से सरमद के सर को जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर उसके धड़ से अलग कर दिया गया था. उनको अंतिम अलविदा कहने के लिए वहां जनसमुद्र उमड़ पड़ा था. किस तरह धड़ से अलग होने के बाद भी उनका सर मोहब्बत के गीत गाता रह गया था, और अपने बोलते हुए सर को उन्होंने उतनी बेपरवाही से उठाया था जिस तरह से आजकल मोटरसाईकिल चलाने वाले हेलमेट उठाते हैं, और जामा मस्जिद की सीढियां चढ़ने लगे, फिर उतने ही मस्ताने अंदाज में वह सीधा जन्नत चले गए. इसीलिए, जहांआरा बेगम सुनाती थीं कि जामा मस्जिद की पूर्वी सीढ़ियों के पास हजरत सरमद की उस छोटी सी दरगाह की फर्श और छत लाल है. तीन सौ से अधिक साल गुजर गए लेकिन हजरत सरमद के खून को धोया नहीं जा सका. दरगाह को चाहे वे जिस रंग से रंगते, देखते देखते वह अपने आप लाल रंग का बन जाता.

पहली बार जब वह भीड़ के बीच से रास्ता बनाती हुई- इतर-फुलेल बेचने वाले,  जूतों की रखवाली करने वाले, विकलांगों, भिखारियों, बेघरों, ईद के दिन जिबह किये जाने के लिए मुटाते बकरों और दरगाह के बाहर तिरपाल के नीचे एक दूसरे से सटकर बैठे खामोश, बुजुर्ग हिजड़ों के बीच से गुजरती- दरगाह की छोटी सी लाल कोठरी के भीतर पहुंची तो जहाँआरा बेगम बेहद शांत हो गईं. सड़क से आती आवाजें मद्धिम पड़ने लगीं और ऐसा लगा जैसे बेहद दूर से आ रही हों. वह एक कोने में बैठ गईं और उनका बच्चा उनको गोद में सोया हुआ था, वह लोगों को देख रही थीं, मुसलमान और हिन्दू, अकेले या जोड़ों में आ रहे थे, और दरगाह के के चारों तरफ लगे जंगलों में लाल धागे, चूड़ियाँ और कागज़ पर लिखी अर्जियां बाँध रहे थे, और सरमद से मिन्नतें मांग रहे थे कि वे उनके ऊपर कृपा करें. तभी जहांआरा बेगम की नजर एक जर्जर काया वाले बूढ़े आदमी के ऊपर पड़ी जो एक कोने में बैठा हुआ आगे पीछे हिल रहा था, चुपचाप ऐसे रो रहा था जैसे उसका दिल टूट गया हो. तब जहांआरा बेगम ने अपने आंसुओं को भी गिरने दिया. यह मेरा बेटा आफताब है, उन्होंने फुसफुसाते हुए सरमद से कहा. मैं इसे आपके पास लेकर आई हूँ. इसका ख्याल रखियेगा. और मुझे सिखाइए कि मैं इसको किस तरह से प्यार करूँ.

हज़रत सरमद ने वही किया.

आफताब की जिंदगी के पहले कुछ सालों के दौरान जहांआरा का रहस्य कायम रहा. वह इन्तजार करती रहीं कि उसके जो अंग लड़कियों जैसे थे वे भर जाएँ, वह उसको हमेशा अपने पास ही रखती थीं और उसको लेकर वह बुरी तरह से रक्षात्मक रहती थीं. यहाँ तक कि छोटे बेटे सादिक की पैदाइश के बाद भी वह आफताब को खुद से बहुत दूर नहीं जाने देती थीं.

जब आफताब पांच साल का हुआ तो वह चूड़ीवालान में लड़कों के उर्दू-हिंदी मदरसा में पढने के लिए जाने लगा. एक साल के भीतर ही वह अरबी में कुरआन की बहुत सारी आयतें पढ़ सकता था, हालाँकि यह साफ़ नहीं था कि वह कितना समझ पाता था- यही बात दूसरे बच्चों के बारे में भी सही थी. आफताब औसत लड़कों से बेहतर था, लेकिन बहुत छुटपन से यह बात समझ में आ गई कि उसमें संगीत का हुनर था. उसकी आवाज मीठी थी, पक्के गायकों वाली और एक बार सुनकर ही किसी भी धुन को गा सकता था. उसके अम्मी-अब्बा ने यह तय पाया कि उसको उस्ताद हमीद खान के पास संगीत सीखने के लिए भेजा जाए, जो आला दर्जे के संगीतकार थे और चांदनी महल के अपनी टूटी फूटी हवेली में बच्चों को हिन्दुस्तानी संगीत सिखाया करते थे. आफताब जब नौ साल का हुआ तो वह राग यमन, दुर्गा और भैरव में बीस मिनट का बड़ा ख़याल गा सकता था. वह बड़ी सहजता से लखनऊ की बाइयों की अदा से चैती और ठुमरी गा सकता था. पहले तो लोग हैरान हो जाते थे, उसका हौसला बढाते थे, लेकिन जल्दी ही दूसरे लड़के उसको चिढाने लगे: यह लड़की है. न यह लड़का है न लड़की. यह लड़का लड़की दोनों है. लड़की-लड़का, लड़का-लड़की! ही! ही! ही!

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