धरती के स्वर्ग में कश्मीरी लाल मिर्च !  

विमलेन्दु का यह लेख कश्मीर की हमारी रूढ़ छवि को थोड़ा विचलित कर देने वाला है. लेकिन यह भी एक सच है. विमलेन्दु के विचार को जगह देना जनतांत्रिकता का तकाज़ा है- मॉडरेटर

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सबसे पहले कश्मीर के मौजूदा दृश्य पर एक विहंगम नज़र डाल लेते हैं. इसके बाद कश्मीर के निकटवर्ती अतीत में उतरेंगे. धरती का स्वर्ग माने जाने वाले कश्मीर में आज कश्मीरी लाल मिर्च की तीखी गंध आबो-हवा में तैर रही है. आज़ादी के बाद कश्मीर में अस्थिरता का यह सबसे भीषण दौर है. नब्बे के दशक में, जब कश्मीर में आतंकवाद अपने चरम पर था, तब भी कश्मीर को लेकर शेष भारतीयों के मन में ऐसा संशय नहीं था, जैसा आज है. पाकिस्तान की नज़र तब भी कश्मीर पर थी, आज भी है. आज हम ज्यादा बड़ी और ताकतवर सैन्यशक्ति हैं. लेकिन आज हम आश्वस्त नहीं हैं कि कश्मीर को बचा पाएंगे या नहीं.

इन दिनों जब हम कश्मीर की कल्पना करते हैं तो उसमें डल झील, शफ़्फ़ाफ़ चोटियाँ, सेब के बगीचे और दिल में जादू जगाने वाली स्त्रियाँ नहीं दिखतीं. अब सुरक्षाबलों पर पत्थर फेंकते बच्चे, बूढ़े, जवान और लड़कियाँ दिखती हैं. उजाड़ घाटी और गाँव दिखते हैं. सेना के मारे जा रहे अधिकारी और जवान दिखते हैं. धुँआ दिखता है और धुँआ धुँआ ज़िन्दगी दिखती है. महबूबा मुफ्ती और फारुख अब्दुल्ला की कुटिल मुस्कान दिखती है.

केन्द्र में मोदी की सरकार बनने के बाद बहुसंख्यक कश्मीरी जनता किसी अदृश्य-अमूर्त आशंका से भर गई थी. आगे चलकर जब राज्य में महबूबा की पीडीपी और भाजबा की गठबंधन सरकार बनी तो कश्मीरी जनता, राजनीति और शासन में असमंजस और बढ़ गया. महबूबा हमेशा अलगाववादियों के प्रति सहानुभूति रखती रही हैं. और भाजपा अलगाववादियों का मुह तक नहीं देखना चाहती. भाजपा जब सत्ता में नहीं थी तो उसने अक्सर धारा 370 के औचित्य पर सवाल उठाए. जाहिर है, कश्मीर को लेकर दोनों के एजेण्डे अलग हैं. पिछले ग्यारह महीनों में कश्मीर में उपद्रव बहुत अधिक बढ़ गया. सीमापारसे लगातार हमले हो रहे हैं. आतंकवादी बैंक लूट रहे हैं. जवानों को मार रहे हैं. हमें कहा जा रहा है कि अपनी सेना पर भरोसा रखें. हम रखे हुए हैं भरोसा. प्रधानमंत्री जी कश्मीर पर कुछ नहीं बोलते. रक्षामंत्री हर हमले के बाद इसे दुश्मन की कायराना हरकत करार देते हैं. गृहमंत्री कड़ी निन्दा कर देते हैं. इस बीच वो हुआ जो अब तक नहीं हुआ था. अभी तक  विश्व समुदाय यही कहता रहा है कि कश्मीर, भारत-पाकिस्तान का द्विपक्षीय मसला है. हम इसमें दखल नहीं देंगे. लेकिन कुछ दिन पहले अमेरिका ने चेतावनी दी है कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष बढ़ा तो अमेरिका चुप नहीं बैठेगा. इस चेतावनी के बाद मुझे एकाएक ईराक, अफगानिस्तान और सीरिया के मंज़र नज़र आने लगे. आज़ाद भारत की यह सबसे बड़ी कूटनीतिक पराजय है.

मुझे ताज्जुब हुआ यह देखकर कि कश्मीर पर कुछ कहने लिखने में प्रतिष्ठित सेकुलर विचारक और लेखक संकोच कर रहे हैं. जिन्होंने कुछ लिखा भी तो इस पूर्व घोषणा के साथ कि ‘जुर्रत कर रहा हूँ’. यद्यपि उन्होंने लिखा पर ऐसी कोई जुर्रत नहीं की, जो उन्हें असुविधा में डाल दे. कश्मीर पर लिखने से हमारे सेकुलर साथी आमतौर पर बचते रहे हैं. लेकिन इस बार मीडिया के उन्मादी कवरेज और सोशल मीडिया में अपने प्रशंसकों के दबाव में इन लेखकों को कुछ कहने लिखने को मजबूर होना पड़ा.

कश्मीर पर कुछ बोलने में संकोच क्यों हो जाता है ? क्या इसलिए कि कश्मीर पर कुछ बोलते हुए एक ऐसी इमानदारी की दरकार है जो आपकी वैचारिक छवि पर एक खरोंच लगा सकती है ? कश्मीर पर बात करते हुए पहले आपको कश्मीरी हिन्दुओं और बौद्धों की बात करनी पड़ेगी, उसके बाद मुसलमानों की. कश्मीर पर बात करते हुए आपको पहले कश्मीरी पंडितों की दुखती रग पर हाथ रखना पड़ेगा. कश्मीर पर बात करते हुए आपको कहना होगा कि वहाँ मुसलमान आक्रान्ता हैं. लेकिन इतनी हिम्मत हममें नहीं है. इसीलिए हम कुछ रटे हुए जुमलों के सहारे कश्मीर की झीलों में अपनी नैया खेते रहते हैं. हम पाकिस्तान, आई.एस.आई., और भारतीय सेना को मिलाकर एक ऐसा रसायन तैयार करते हैं जो कश्मीर की रगों में उन्माद पैदा कर देता है.

हमें यह मानने में संकोच क्यों होता है कि कश्मीर पहले हिन्दुओं का है, उसके बाद मुसलमानों का. कश्मीर की स्वायत्तता की माग, कश्मीरी हिन्दुओं का हक है, अलगाववादी मुसतमानों का नहीं. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि महर्षि कश्यप के नाम पर स्थापित कश्मीर प्राचीनकाल में हिन्दुओं का राज्य था. जब यहाँ सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार किया तो बौद्धों की अच्छी खासी आबादी यहाँ निर्मित हो गई. हिन्दू और बौद्ध, दोनों धरती के इस स्वर्ग पर बिना किसी तकरार के रह रहे थे. मध्यकालीन संस्कृत कवि कल्हड़ ने अपनी कृति ‘राजतरंगिणी’ में कश्मीर राज्य के सौन्दर्य, वैभव और सहअस्तित्व का उदात्त वर्णन किया है. कश्मीर पर अशोक और उज्जैयिनी के शासक विक्रमादित्य द्वितीय का भी शासन रहा. आधुनिक काल में रणजीत सिंह ने कश्मीर पर आक्रमण करके वहाँ सिखों का शासन स्थापित किया लेकिन बाद में कश्मीर के राजा गुलाब सिंह से उनकी सन्धि हो गई और कश्मीर, कश्मीरियों को वापस मिल गया.

इस बीच मुसलमान कश्मीर में आ चुके थे. 12 वीं शताब्दी के अन्त तक फारस से सूफी इस्लाम कश्मीर में आया. सूफी इस्लाम प्रेम और भक्ति का प्रचारक था, इसलिए कश्मीर में वह बड़ी सहजता से स्थापित हो गया. धीरे धीरे कश्मीर में इस्लाम बढ़ता गया और चौदहवीं शताब्दी में कश्मीर पर मुस्लिम शासन शुरू हो गया. इसके बाद कश्मीर में कभी हिन्दू तो कभी मुस्लिम शासन रहा. आप जानते हैं कि भारत की आजादी के समय कश्मीर के राजा हरि सिंह थे और कश्मीर एक स्वायत्त रियासत थी. भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम की एक अहम शर्त के मुताबिक देशी रियासतों को यह फैसला करने की आजादी दी गई कि वो भारत अथवा पाकिस्तान राज्य में अपना विलय कर लें या स्वतंत्र बने रहें. हरि सिंह कश्मीर को स्वतंत्र रखना चाहते थे. यहीं से कश्मीर की कभी न खत्म होने वाली समस्या शुरू होती है.

इतिहास की बात फिलहाल यहीं तक. अब बात वर्तमान की. कश्मीर का वर्तमान शुरू होता है ठीक भारत की आजादी के समय से. कश्मीर का वर्तमान शुरू होता है जवाहर लाल नेहरू की उस ऐतिहासिक भूल से जब उन्होंने कश्मीर के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ में पहुँचा दिया. यह बात 1947-48 के कबाइली हमलों के बाद की है. कबाइलियों के साथ मिलकर पाकिस्तानी सेना ने जब कश्मीर पर आक्रमण किया तो हरि सिंह को भारत की मदद लेने के लिए मजबूर होना ही था. और मदद भी कश्मीर के भारत राज्य में विलय की शर्त पर ही मिलनी थी. इसे स्वीकार किया जाना चाहिए कि यह एक भौगोलिक और राजनीतिक विलय था. कश्मीरी मुसलमान आधे अधूरे मन से ही भारतीय राष्ट्र के नागरिक बने थे. कबाइली हमले में कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में चला गया, तो नेहरू इसकी गुहार लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ की चौखट पर चले गए. संयुक्त राष्ट्र संघ ने जो समाधान दिया. वही भारत के गले की फाँस बन गया. उसने कहा कि पाकिस्तान कब्जे वाले इलाके से कबाइलियों को हटाए, और भारत कश्मीर में जनमत संग्रह कराए. लेकिन न तो पाकिस्तान ने कबाइलियों को हटाया और न भारत ने जनमत संग्रह कराया.

1957 में जब कश्मीर की विधानसभा ने भारत में कश्मीर के विलय को वैधानिक स्वीकृति दी, तभी यह तय हो गया था कि कश्मीर बरसों बरस भारत का सिरदर्द बना रहेगा. कश्मीरियों के जनमत संग्रह को टालने के लिए जो शर्तें भारत राष्ट्र ने मानीं, उनसे हमेशा के लिए भारत और कश्मीर के बीच एक परायापन पैदा हो गया. कश्मीर में आपातकाल नहीं लागू हो सकता. कश्मीर का राज्यपाल, वहाँ के मुख्यमंत्री की सलाह पर नियुक्त होगा. कश्मीर की दण्ड संहिता अलग है. संविधान अपना है. विदेशी मामलों, सुरक्षा और मुद्रा चलन को छोड़कर, बाकी हर मामले में कश्मीर स्वायत्त हो गया.

इसी स्वायत्तता को स्वतंत्रता में बदल देने की महत्वाकांक्षा में कश्मीरी मुसलमानों नें कश्मीर के मूल निवासियों को धीरे धीरे वहाँ से खदेड़ना शुरू कर दिया. लाखों कश्मीरी हिन्दू अपनी ज़मीन से विस्थापित होकर दर दर भटकने को मजबूर हुए. हिन्दुओं को विस्थापित करने के लिए कश्मीरी मुसलमानों ने आतंकवाद का सहारा लिया. पाकिस्तान के लिए यह सुनहरा मौका था. पहले पाकिस्तान से फंडिंग शुरू हुई. फिर नब्बे का दशक आते आते पाकिस्तान कश्मीर में आतंकवाद का प्रायोजक बन गया. विदेशी जमीन से चलाए जा रहे आतंकवाद से निपटना भारत सरकार के लिए कठिन जरूर था लेकिन असंभव नहीं. भारतीय फौज की जाँबाजी और शहादत के दम पर भारत ने 21 वीं सदी के आते आते, कश्मीर के आतंकवाद पर काफी हद तक काबू पा लिया. पिछले तीन आम चुनावों में कश्मीरी जनता के उत्साह और भागीदारी को देखकर यह लगने लगा था कि कश्मीरी मुसलमान अपली अलगाववादी मानसिकता को छोड़ रहे हैं. भारत की असली जीत यही होती कि कश्मीरी मुसलमान भारत को अपना देश मानने लगते.

कश्मीर के मुसलमानों और देश के बाकी हिस्से के मुसलमानों की मानसिकता में एक बड़ा फर्क है. देश के दूसरे हिस्सों के कुछ मुसलमानों के भीतर हिन्दुओं के प्रति साम्प्रदायिक द्वेष भले हो, लेकिन देश के तौर पर भारत से उनका कोई नकार नहीं है. उग्र हिन्दुत्व के तमाम प्रयासों के बाद भी वो यह मानने को तैयार नहीं हुए कि उनका कोई और मुल्क हो सकता है. लेकिन कश्मीरी मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग, पाकिस्तान में अपना संभावित मुल्क देखता है. उनकी इस आकांक्षा को कश्मीर के राजनेता कभी खुलकर तो कभी छुपकर हवा देते रहे. बुरहान वानी की मौत पर जब फारुक अब्दुल्ला यह कहते हैं कि वह मरने वाला आखिरी नौजवान नहीं है, तो वे कश्मीर में भड़क रही आग और उसकी लपट को बढ़ाने वाली हवा की ओर संकेत कर रहे है.

कश्मीर इन दिनों अलगाववाद के उभार के एक ऩये दौर में है. यह उभार अहमद शाह गिलानी, मीर वाइज़ र यासीन मलिक के दौर से कुछ अलग चरित्र लिए हुए है. कश्मीर में अब असल समस्या आतंकवाद नहीं है. यहाँ आतंकवाद अब एक व्यवसाय बन गया है. अलगाववादी नौजवानों को विदेशी आतंकी संगठनों से पैसा मिलता है. केन्द्र राज्य सरकार मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए अनाप शनाप पैसे कश्मीर में देती हैं. साथ ही कश्मीर में सक्रिय एन.जी.ओ., धार्मिक संगठनों से भी कश्मीरी मुसलमान पैसे ऐंठते हैं.

केन्द्र में मोदी सरकार बनने के बाद कश्मीर में एक नये तरह की हलचल पैदा हुई. कश्मीरी यह जानते थे कि संघ और भाजपा कश्मीर में धारा 370 के पक्ष में नहीं रहे हैं. मोदी सरकार के आते ही उन्हें कश्मीर की स्वायत्तता खतरे में दिखने लगी. कहना न होगा कि कश्मीर में स्वायत्तता की आड़ में ही अलगाववाद पलता रहा है. महबूबा मुफ्ती के साथ भाजपा के गठबंधन ने कश्मीरियों के संदेह को और मजबूत किया. सब जानते हैं कि महबूबा की पार्टी हमेशा अलगाववादी मुसलमानों का समर्थन करती रही है. कश्मीरियों को लगने लगा है कि भाजपा और महबूबा के बीच कोई ऐसा गुपचुप एजेण्डा है जो उनके हितों को कोई अप्रत्याशित क्षति पहुँचा सकता है.

अब तक जितनी सरकारें केन्द्र में रहीं, उनकी प्राथमिक कोशिश रही है कि कश्मीर अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा न बने. कोई भी सरकार नेहरू की गलती दोहराना नहीं चाहती थी.इसलिए कश्मीर में पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया जाता रहा और उसे समस्या के केन्द्र में बताया गया. जबकि असल समस्या कश्मीर का कुशासन, बढ़ती बेरोजगारी, और कश्मीरी हिन्दुओं का विस्थापन था. कश्मीर को अपने साथ रखने के लिए सबसे जरूरी है कि कश्मीरी हिन्दुओं का पुनर्वास कराया जाये, ताकि कश्मीरी मुसलमानों के भीतर से एकाधिकार का भाव खत्म हो. कश्मीर के शासन में हिन्दुओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाये. युवाओं को वैध रोजगार मुहैया कराये जाने चाहिए. कश्मीर में अवैध तरीके से आ रहे धन को रोकने के पुख्ता इंतज़ाम भी होने चाहिए. यह सब तभी हो सकता है जब केन्द्र और राज्य सरकार के बीच बेहतर समझ और तालमेल हो.

बुरहान वानी की मौत के बाद उमड़ी कश्मीरियों की भावना से बहुतों को लगा कि यह सेना की ज्यादती के खिलाफ प्रतिक्रिया है. सेना को आततायी की तरह पेश किया गया. लेकिन यह एक भ्रम है. सेना पर हो रहे उग्र हमले, असल में राष्ट्र के विरुद्ध आक्रोश है. सेना तो राष्ट्र का एक टूल है. कश्मीरियों को याद होगा, जब पिछले साल बाढ़ से कश्मीर तबाह हो रहा था तो सेना ने ही उनका जीवन बचाया था. कश्मीरियों नें खुले दिल से सेना का एहसान माना था. ऐसा नहीं हो सकता कि साल भर में सेना उन्हें दुश्मन नज़र आने लगे. कश्मीरियों का यह उग्र व्यवहार, अपनी स्वायत्तता खोने और मुफ्त के पैसों से हाथ धोने के डर से पैदा हुआ है.

  • विमलेन्दु
  • 8435968893

 

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