आज चार्ली चैपलिन की जयंती है. ऐसे में उनकी फिल्म ‘द किड’ को याद किया है युवा फिल्म अध्येता सैयद एस. तौहीद ने. आजकल बच्चों को लेकर जिस तरह हमारे समाज की संवेदना छीजती जा रही है वैसे में इस फिल्म को याद करना प्रासंगिक भी है- मॉडरेटर
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चार्ली चैपलिन की The Kid मानवीय रिश्तो की तपिस का बेहतरीन उदाहरण थी.फ़िल्म एक महान संदेश picture with a smile—and perhaps a tear’ से शुरू होती है.मानवीय संवेदनाओ की यह प्रस्तुति चैपलिन की यादगार
फिल्मों में से एक थी .इसे आपकी पहली फुल लेंथ फीचर फ़िल्म माना जाता है.बीस दशक की महानतम फिल्मों में शुमार यह चार्ली की यादगार पेशकश थी.आपने कामेडी व नाटकीयता का दिलचस्प मिश्रण नही देखा हो तो इसे देखना
चाहिए.आवारा बेफिकरे ट्रांप के जिम्मेदार बनने की कहानी.नाटकीयता का पहलू होने से फ़िल्म की समय सीमा बढ़ गयी थी.आपकी शार्ट फिल्में आवारा अंदाज पर ज्यादा आश्रित थी.उस निराले अंदाज़ के साथ यहां मानवीयता का संदेश भी
है.ओपनिंग संदेश विषयवस्तु का दर्पण..इस प्रयोग से बनी फिल्मों में शुरुआत से रूचि बन जाती है.यह चलन लोकप्रिय भी हुआ.फ़िल्म की थीम बयान करने का वो नायब तरीका था.चैपलिन की The Kid इसका बेहतरीन उदाहरण थी…ट्रांप की आवारा लेकिन उपयोगी दुनिया में ले जाने का सादा सच्चा स्पर्शमय जरिया.चैपलिन के हास्य व्यंग्य व तमाश कलाकारी का नमूना.वो अनुभव जिसमे हमारा प्रिय ट्रांप अपने बीते वक्त से मुलाकात कर रहा था. लावारिस मासूम में उन्हें अपना बचपन मिला था.आवरगी व तंगी के बावजूद लावारिस मिले मासूम को अपने से अलग करना गंवारा न किया.कथा में हास्य रस ट्रांप के रिपेयरिंग रोजगार से जुडा था.हर उम्र के लोगों को आहलादित करने वाला कलेवर.आर्थिक तंगी में भी खुशनुमा बेफिक्र जिंदगी गुजारने का फन दिखाती कहानी.बीस दशक के उत्तरार्ध में रिलीज यह फ़िल्म अपने जमाने में सबसे लोकप्रिय रही थी.
समय सीमा कम होने से पटकथा सीधे कहानी पर थी.मां-बाप द्वारा त्याग दिए गए लावारिस बच्चे की कहानी.बेवफा प्रेमी एवं अस्पताल से मायूस किस्मत की मारी मां Edna purviance अपने नवजात को दुनिया हवाले कर जाने को मजबूर
मां की कहानी.कोई सहारा मिल जायेगा कि उम्मीद में शिशु को खुद से अलग कर दिया.बदनामी का डर शायद उसे यह सब करने को कह गया.शायद आगे जाकर यही बच्चा किसी की आंखो का तारा बने.उसे अंदाज़ा था कि वो बच्चे को अपना नाम नहीं दे सकती..नया कल देने के लिए उसे त्याग देना ठीक लगा.उम्मीद थी कि बच्चे का कल ठीक होगा.एक कोठी सामने खड़ी गाड़ी में उसे रख चली गयी.लेकिन क़िस्मत को अलग ही गंवारा था..गाड़ी चोर उडा ले गए.यह उठाईगिरे भला किस पर तरस खाने वाले थे.बच्चे को गाडी से निकाल कूड़ेदान पर छोड निकल लिए.समाज को सताने वालों का खुशमिजाज ट्रांप से कभी तुलना नहीं करें.इत्तेफाक से वो नवजात वहां से गुजर रहे ट्रांप को दिखाई पड गया.मज़बूरी के कारण फिलवक्त वो इस मुसीबत को अपनाना नहीं चाहता था.एक दो बार दुसरे के हवाले कर जिम्मेदारी से भागने की फ़िराक में रहा.लेकिन चाहकर भी उससे अलग नही हो प रहा था.शायद खुदा ने बच्चे की जिम्मेदारी उसे ही दे डाली थी.शिशु के पास से मिला संदेश कि जिसमे लावारिस का ख्याल रखने का अनुरोध था..ट्रांप
के निर्णय को शक्ति दी.अब वो नवजात उसका अपना था.उसे पाल कर बड़ा कर रहा था.खुदा की तरफ से मिली जिम्मेदारी को हंसकर निभाना वो खूब जानता था.पांच बरस बाद…अब वो बच्चा बड़ा होकर लिटिल ट्रांप Jack Coogan बन गया है.भूखमरी से निजात पाने के लिए बाप-बेटे ने रोजगार का एक नायाब तरीका तलाश लिया था.खिडकियों के टूटे शीशे की मरम्मत किया करते थे.जूनियर तोड़ता तो सीनियर रिपेयर करता.रहने का अंदाज़ भी निराला…एक दूसरे सीखकर..एक सीनियर दूसरा जूनियर.खाना बनाने व परोसने में जूनियर को मिली तरबियत देखें.आपका बच्चा गर आपके लिए खाना बनाकर रेडी रखे तो कमाल फील होता है.दिन भर की रोजगारी बाद जो कुछ होता खा लेना था.खाने को लेकर भावनाएं केवल पेट भर जाने की थी.बदन पर ढंग के कपडे नही फिर भी जिंदगी से मलाल नहीं.
लाइट कामेडी फ़िल्म में बातों को हिसाब से ही करुणामय नजरिए से देखा गया.नाटकीयता के साथ हास्य का मनोरंजक पुट देखें.जुनियर को मुसीबत में घिर जाने पर होशियारी से निकल जाना आता था.खिडकियों का कांच तोडकर एक से
दूसरी जगह भाग जाना देखें.बच्चे को अनाथालय ले जाने आए अधिकारीयों का प्रसंग भी देखें.ट्रांप पिता से बढ़कर था.कूड़ेदान पर फेंके हुए बच्चे का पिता बनकर उसी ने अपनाया.अब पांच बरस बाद बच्चे की खोज खबर अनाथालय ने ली थी.पुत्र को पिता से अलग करने वहां आए थे.जबरन उठाकर जूनियर को अनाथालय की गाड़ी में डाल दिया..जिगर को टुकड़े को ट्रांप अलग होने देगा? पांच बरस से सुख दुःख के साथी को यूं जाने देगा?एक घर से दुसरे घर ऊपर के रास्ते गाड़ी की पीछा करके बच्चे को अनाथालय जाने से बचा लिया.विश्व सिनेमा के बेहतरीन दृश्यों में शुमार यह देखने लायक है.अनाथालय के अधिकारी लड़के को गाड़ी में जबरन ले जा रहे…असहाय-तड़पता बच्चा गाड़ी से हांथ बाहर निकाले पिता से मदद मांग रहा.कह रहा की आपसे दूर नहीं जाना…वहां नहीं जाना.मदद में पिता गाडी का पीछा कर रहा..लिटिल मास्टर के लिए सीनियर का प्यार देखें.एक प्यारे से रिश्ते को जिन्दा रखने का जज्बा सीखें .बच्चे खातिर
किसी भी मुसीबत से भिड जाना इसे कहते हैं.चैपलीन व कुगन बीच का समन्वय सुंदर बन पड़ा .पांच बरस का लिटिल पिता की तरह कपडे पहनता था.अपने से बड़े उम्र के कपड़ो साथ चैपलीन के सांचे में ढला नजर आया था. फ़िल्म में सपनों की दुनिया अथवा dreamland प्रयोग से ट्रांप की बस्ती को स्वर्ग का जहान बनते देखना कल्पनाओ को सुकून देता है. स्वर्ग की वो बस्ती जहां कहानी के किरदार परिस्तान के बाशिंदे थे.सफेद पोशाक में यह लोग बस्ती के अमन का
इजाफा करते दिखाए गए…सब ठीक चल रहा था कि पतित आत्माएं व चरित्र परिस्तान का नुकसान करने लगे. कहानी में यह प्रसंग जूनियर व सीनियर के मिलने फिर दुनिया द्वारा छीन ले जाने की बुरी कोशिशो से जुडा था.फ़िल्म का पार्श्व संगीत का हालात व इमोशंस के हिसाब से इस्तेमाल बहुत भाता है. गाड़ी में बच्चे को रख चली जाने बाद गलती को सुधारने मां वापस आई लेकिन वो मिला नहीं.चोरी हो चुकी गाड़ी में रखा बच्चा भी बदकिस्मती से गलत जगह चल
गया.क्या होगा अब उसका?यह सोंचकर मां गश खाकर गिर पड़ी थी.उसे नहीं मालूम था की मासूम की तक़दीर में ट्रांप का प्यार लिखा है.बहरहाल कभी किस्मत से मजबूर रही वही मां पांच बरस बाद मशहूर कलाकार बन गयी थी.शो की समीक्षाएं भी लिखी जा रही थी.घर पर प्रशंसा संदेश व फूलों के गुलदस्तों का आना यही कह रहा कि अब उनकी एक पहचान है.गरीब बस्तियों में जाकर वहां के बच्चों के साथ वक्त गुजारना महिला को बहुत सुख देता था.उन बच्चों में उसे अपना खोया बच्चा नजर आता था.उसे नही मालूम कि जिस जूनियर ट्रांप को उसने खिलौना दिया वो वही बच्चा था! इस खिलोने के साथ जूनियर बहुत खुश होकर खेल में मग्न था. एक नटखट लड़का उसके हांथ से खिलौना लेकर भागा…लेकिन वो उसके पीछे गया.लडके से बहुत झगडा किया कि मेरी चीज वापस करो.इन दृश्यों को देखकर आपका मुरझाया दिल खुश होगा..मुसकुराएंगे.यह सब चलने के बीच अमीर महिला भी वहां आ गयी.इस सब झेलकर तबियत खराब हुए बच्चे को उठाकर वहीं ले आई जहां पहली बार खिलौना दिया था.उसने ट्रांप से बच्चे का इलाज कराने को
कहा.इलाज करने आए डाक्टर को घर से वही पुराना संदेश जिसमे उसकी देखरेख का अनुरोध था..हांथ लग गया. अगले दिन बच्चे की तबियत का हाल जानने अमीर महिला ट्रांप के घर पहुंची.लेकिन घर पर कोई नहीं मिला. हां इलाज कर रहा
डाक्टर जरुर रास्ते में मिला..अपना लिखा पुराना संदेश उसे डाक्टर से मिला.महिला के नजरिए से भी स्थापित हुआ की जूनियर ट्रांप उसी का खोया बच्चा था .पुलिस व अनाथालय की नजर से बचने के लिए पिता-पुत्र ने वो रात मुसाफिरखाने में गुजारी.लेकिन उनकी मुसीबतें अब भी बरकरार रही..वहां के केयरटेकर को अख़बार से मालूम हो गया कि पुलिस इस हुलिए वाले दो लोगों की तलाश कर रही..बच्चे पर भारी ईनाम भी है.आधी रात में बच्चे को उठाकर पुलिस थाने लेकर चला आया.खबर मिलने पर उसकी खोयी मां उसे अपने साथ घर ले आई.महिला ने पुलिस को ट्रांप को भी तलाशकर लाने को कहा.पुलिस उसे पकड़कर अमीर महिला के घर ले आई.वहां आकर ट्रांप को भी मालूम हो गया की जूनियर की
मां वही महिला है.बरसों बाद मां को उसकी बिछड़ी संतान मिल गयी थी.बाप बेटे को जुदा करना उसे उचित नहीं लगा…इसलिए ट्रांप को भी मेहमान बना लिया. बच्चे के सुखद भविष्य संकेत पर फ़िल्म समाप्त हुई.
The Kid की कहानी चैपलीन के निजी जीवन से प्रेरित मानी जाती है.चैपलीन की पत्नी ने बच्चे को जन्म दिया था.वो आया तो दुनिया में जरूर,लेकिन बड़ी कम हयात लेकर.परिवार ने अपने महज तीन दिन के नए मेहमान को खो दिया.इस तरह के पीड़ादायक अनुभवों को आदमी ताउम्र भुला नहीं पाता . मां ने कलेजे का टुकड़ा पल में गंवा दिया था.एक पिता के दिल पर गहरा जख्म लगा था.घटना ने पिता को ट्रांप का यह हमदर्द व जिम्मेदार किरदार रचने की प्रेरणा दी होगी.एक
लावारिस नवजात को अपनाकर आवारा निर्धन ट्रांप ने दरियादिली की एक मिसाल रखी थी.
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