‘सामायिक सरस्वती’ पत्रिका का जुलाई अंक हाथ में आया तो सबसे पहले इस स्मरण-लेख पर नजर ठहर गई. पढता गया, नीलाभ जी की यादों में डूबता गया. उनकी पत्नी भूमिका द्विवेदी ने बहुत दिल से लिखा है और नीलाभ जी के बोहेमियन व्यक्तित्व का सम्यक मूल्यांकन करने की एक रचनात्मक कोशिश की है. यह ‘सामायिक सरस्वती’ के इस नए अंक का यादगार लेख है. मस्ट रीड टाइप. सिर्फ इस लेख को पढने के लिए पत्रिका खरीदी जा सकती है. वैसे इसमें पढने लायक सामग्री और भी है – मॉडरेटर
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नीलाभ जी के बालसखा सुहृद और सुपरिचित साहित्यकार श्री दूधनाथ सिंह जी कहते हैं- ऊपर से कठोर, तेज तर्रार लेकिन अन्दर से बेहद सरल, सहज और मधुर प्राणी रहे नीलाभ जी…
उनके लिए हुई एक शोकसभा में उनके पुराने मित्र अजय जी ने कहा- जिन्दगी को खूबसूरत, सार्थक और आबाद कैसे बनाया जा सकता है ये कोई नीलाभ से सीख सकता है। लेकिन उसी एक जिन्दगी को बदसूरत, निरर्थक और बर्बाद करना भी नीलाभ से ही सीखा जा सकता है।
मेरे खयाल से नीलाभ जी के लिए इसके सटीक टिप्पणी कोई अन्य नहीं हो सकती। उस शख्स पर लिखना एक जटिल तजुर्बा लेकिन बेहद सहज सरल अभिव्यक्ति हैI जैसे कि वो खुद महज एक शख्स न होकर शख्सियत रहे। वो जटिल से जटिल अभिजात्य वर्ग के व्यक्ति होने के साथ-साथ अतिशय जमीनी जीवन जीते रहे, उनसे सादा और उनसे दुरूह व्यक्ति का इस धरातल पर मिलना कठिन है।
वो जब पहली बार मिले मुझसे तो मेरी लिखी एक कहानी काला गुलाब, मई जनसत्ता रविवासरीय में प्रकाशित, पढकर थोड़ा सा होमवर्क किए हुए मिले थेI कुछ मैरून टीशर्ट पहने, कान में चमकता बूंदा, आवाज में खनक और कसरती देह में एक चपलता थीI ये बातें उनकी रंगीन बानगी बयान कर रही थी, लेकिन रह रहकर आंखों में गहरी उदासी तैरती दिखती थी।
उनके अल्फ़ाज़ बहुत तराशे हुए और जहीन थे, जहां अकेलेपन की तकलीफ स्पष्ट थीI जिससे मैं खुद व्यक्तिगत रूप से परिचित थी। उन्होंने उसी वक्त बड़ी साफगोई से अपनी जिन्दगी की कुछ जरूरी परतें खोल दी थीं- भूमिका जी, तब नीलाभ मुझे आप सम्बोधित करते थे, मैं एक गरीब, अकेला, उदास आदमी और बेशक एक बुजुर्ग कवि हूं…कई सारे कर्जे हैं मुझ पर जिन्हें मुझे चुकाना हैI मेरी एक बीवी थी जिसका 2010 में देहान्त हो चुका हैI मेरे दो बेटे हैं जिन्होंने बीसियों साल से मुझसे बात तक नहीं की है। क्या तिस पर भी मैं आपके सामने विवाह का प्रस्ताव रखने की हिम्मत कर सकता हूं। ये जानते हुए भी कि आपके सामने पूरा आसमान, पूरी दुनिया और लाखों चाहने वाले बिखरे पड़े हैंI जब मैंने आपका लिखा पढ़ा तभी मुझे लगा था कि आप एक संजीदा दिमाग और समृद्ध लेखनी की धनी हैं इसलिए ये बातें आपसे कह रहा हूंI मुझे वास्तव में आपकी बेहद सख्त जरूरत है, मुझे ठुकराइए मत, प्लीज…हालांकि मेरे इख़्तियार में सिवाय इल्तिज़ा के कुछ नहीं…
मैं चुपचाप उन्हें देखे जा रही थीI जवाब समझ नहीं आ रहा था, कोई पहली ही मुलाकात में कैसे इतना बहादुर बन सकता है। न हां कहते बन रहा था और न नाI मेरे पास उनके प्रस्ताव को ठुकराने की सबसे बड़ी वजह उनकी उम्र थीI लेकिन हां कहने की ठोस, खूबसूरत और दिलफरेब वजहें भी मौजूद थीं। उनका अपरिमित ज्ञान, उनका प्रभावशाली व्यक्तित्व, उनकी मनमोहक बातें, उनका मनाना, रिझाना, अकुलाना, बहलाना, इतराना।
एक कड़वा यथार्थ और भी था जो नीलाभ जी के प्रस्ताव के लिए मेरी सहमति का कारक बन रहा था। मेरा मंत्री के घमंडी, बददिमाग भतीजे की मंगेतर होना। जो बात बात पर अपने रुतबे, अपनी ऊंची औकात की व्याख्या करना नहीं भूलता था और न जाने क्यूं उस परिवार को विवाह की भीषण हड़बड़ी भी थी।
कहां नीलाभ जी जैसे प्रकाण्ड विद्वान की विनम्रता से लबरेज मीठी सरल वाणी, कहां संसद और मंत्रालय पर बोझ सरीखा, आडम्बरों से गुंथा हुआ, बड़ी-बड़ी प्रापर्टी को सिर पर मुकुट जैसा सजाए हुए परिवार का इकलौता चिराग और अहम में डूबी उसकी अतिशय घमंडी काली जबान…।
मेरे पास अन्य विकल्प भी थे- जिनमें शैक्षिक विकल्पों सहित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से सहपाठी रहे मेरे फ्रेंच मित्र गेब्रीएल और उसकी स्नेहिल मां का आत्मीय वैवाहिक निमंत्रण भी विचाराधीन था। लेकिन गेब्रीएल को गो-मांस नोच-नोचकर खाते देखकर भी मेरा जी भिनक जाता था, भले ही वो एक शानदार चित्रकार था, लेकिन मैं खुद शाकाहारी सुपरिचित ब्राह्मण परिवार की पैदाइश भी थी।
इस तरह 6 जून 2013 को हुई एक विराट लेकिन संतुलित मधुर व्यक्तित्व की उस पहली मुलाकात ने मुझे बड़े प्रेम से श्रीमती नीलाभ अश्क बना दिया। बेशक उस बड़े बाल, चमकदार चेहरे, घनी दाढ़ीमूंछ वाले और लहीम सहीम देहयष्टि वाले, कई भाषा-साहित्य और उनके विधाओं के पारंगत बाबा में कोई जादू जरूर था- जिसके मेरी जिन्दगी में दमदार दखल के बाद मुझे कोई भी और देशी-विदेशी रिझा नहीं पाया।
उनका भोर में उठना, रविशंकर के सितार या जैज का रिकार्ड सुनना, फिर कश्मीरी कहवा बनाकर, मेरी प्रिय गुलाम साहब की ग़ज़ल प्ले कर, मेरा माथा सहलाते हुए रोजाना बिना नागा मुझे जगाना, ठीक नौ बजे चाय पीना, भरवां शिमला मिर्च बनाना, मेरे माथे की शिकन पर शोध करना, मेरा लिखा हुआ तन्मयता से पढ़ना, उस पर चर्चा करना, फूलों सा मुझे सहेजना, संवारना, दुलारना- कभी न भुलने वाली बातें हैंI और अभी हाल ही में मेरे पांव पकड़कर आंसुओं की बरसात के साथ माफियां मांगना, हाथ पकड़कर रो-रोकर कहना मुझे अस्पताल नहीं जाना, नहीं जाना, बच्चों जैसे चीखना-चिल्लाना- दवा नहीं खाऊंगा, नहीं खाऊंगा ऐसी मर्मान्तक और रूह कंपाने वाली स्मृतियां है जिन्हें जेहन से धुंधला भी करना असंभव है।
आखिरी वक्त का वो दारुण दौर जब नीलाभ पैसे-पैसे के लिए परेशान थे। जब मोहल्ले के हर बनिया के बहीखाते में इनका लम्बा-चौड़ा उधार दर्ज होने लगा, जब उनकी जर्जर सेहत देखकर कई दुकानदारों ने उन्हें उधार देने से मना कर दिया, जब छोटे-छोटे कामगर लोग उनसे तकाजा करने लगे, तब एक दिन बीड़ी वाले से नीलाभ महज 500 रुपये उधार लेकर खुश-खुश आए और बोले- कुछ दवाएं तो आ ही जाएंगी। मैं ये सुनकर रोने लगीI मैंने मेरी मां के पहनाए अपने दोनों कंगन उतारकर उनके हथेली पर रख दिए और समझाने लगी- क्यों दर-दर भीख मांग रहे हैंI ये जेवर ऐसे आड़े वक्त के लिए ही तो होते हैं ना।
उन्होंने मेरे कंगन वापस मुझे पहना दिए और बीमारी के बावजूद ऊंची आवाज में बोले- इतनी छोटी लड़की ब्याह कर इस दिन के लिए तो नहीं लाया थाI अपने तो सारे गंवा ही चुका हूं, अब तुम्हारे पहने हुए जेवर बेचने से बेहतर है कि मैं हमेशा के लिए आंखें मूंद लूं…आगे ऐसे कड़वे विकल्प मेरे सामने मत झाड़ना…Iउनकी खुद्दारी, उनकी अकड़, उनके अटल इरादों की कोई सानी नहीं। उनकी जिदों का कोई तोड़ नहीं।
इस दौरान वे कई मर्तबा घर के हर कोनों पर बेहोश होकर गिरते रहे, मोहल्ले के एक-एक शख्स ने मेरा साथ देते हुए उन्हें उठाया, बिस्तर तक पहुंचायाI हर कदम उन्हें सम्भाला, जिन एक-एक आंटी, भाभी, भइया, अंकल की मैं सदा ऋणी रहूंगी।
वाशवेसिन के नीचे जिस जगह वो आखिरी बार गिरकर दोबारा कभी नहीं उठे उस जमीन से मैं अभी भी बचकर किनारे से जाती हूं कि कहीं उन पर मेरा पांव न पड़ जाएI वो आज भी चैन से आंखें मूंदे वहीं लेटे दिखाई देते हैं।
उस मनहूस 23 जुलाई की सुबह मैं डाक्टर और नर्सों से उसी जगह बुरी तरह झगड़ रही थी- आप इन्हें होश में लाइए, आपका दिमाग खराब हो गया है? क्या बकवास कर रहे हैं आप लोग…ये तो रोज बेहोश हो रहे हैं। वही इंजेक्शन लगाइए, वही दवा दीजिए जिससे आप इनके होश वापस लाते हैं। ये इतना लम्बा-चौड़ा दवा का परचा, ये टेस्ट, ये नौटंकियां, ये ड्रामे आपने क्लीनिकली डेड लिखने के लिए कराये थे। आप और आपका स्टाफ इस दिन के लिए नचा रहा था मुझे… ये आदमी मर नहीं सकता, मैं कुछ नहीं जानती आप इन्हें होश में लाइए बस…
निश्चित रूप से ये उनका भरपूर प्रायश्चित और आत्मा से किया हुआ पश्चाताप ही है जो आखिरी वक्त उनके चेहरे पर एक अलौकिक तृप्ति और असीम शान्ति दिखा रहा था। जबकि पिछले महीनों की बीमारी से उनका चेहरा और पूरा शरीर बहुत मुरझा गया था। निगम बोध घाट पर उनकी मृत देह पर उड़ती हुई मक्खियों को लगातार मैं अपने आंचल से उड़ाती रही और किसी दिव्य महन्त जैसे दमकते चेहरे को देखते हुए सोचती रही कि अभी ये आंखें खोल देंगे और शायद कि बरस ही पड़ेंगे कि महारानी जी, ये तुम मुझे कहां ले आई हो, चलो जल्दी घर चलें वरना ट्रैफिक बढ़ जाएगा…
अन्तिम समय की उनके चेहरे की उस दैवीय कान्ति ने मुझे वास्तव में बेहद झकझोरा भी है और एक आध्यात्मिक इत्मीनान भी दिया है कि वे सद्गति को प्राप्त हुए हैं…।
वरना उनका कहा मुझ धर्मभीरू हिन्दू पत्नी को भयभीत करता था कि मैं बड़ा कुकर्मी हूं, तुम नयी मिली हो इसलिए मेरे बारे में ज्यादा नहीं जानती हो, मैंने बड़े पाप किए हैI देखना मैं तो नरक में बैठकर खूब शराब पीयूंगा…।
वो एक बहोत प्यारे और पहली नजर में दिल जीत लेने वाले इन्सान थे।
उन्होंने जीवन में बेशक तमाम अपराध किए लेकिन सरेआम स्वीकारा, खुलेआम माफी मांगी।
यूं तो नीलाभ जी का मोस्ट फेवरेट अड्डा इलाहाबाद और इलाहाबाद में भी नीलाभ प्रकाशन दफ्तर रहा लेकिन दिल्ली की सड़कों में भी फेरा दर फेरा लगाना हम दोनों का उन्मुक्त चस्का था। वो हर जगह जाकर उस खास जगह का पूरा अतीत सुना देते थे- मसलन उन्होंने बताया कि पूरा कनाट प्लेस उनके सामने बसाया गया है। उनकी इस तरह की बात सुनकर मैं हमेशा कह दिया करती थी- मैं ठीक ही तो कहती हूं आप सचमुच अंग्रेजों के जमाने के जेलर ही हैं…I इस पर पहले तो वो जोर का ठहाका लगाते थे और फिर कार की स्पीड अचानक बहुत बढ़ा देते थे।
वो मस्त, बिंदास और आवारा जीवन जीते थे। कोई रोक-टोक उन्हें कभी पसन्द नहीं थी, न खुद के लिए, न किसी भी और के लिएI यहां तक कि मेरे कैसे भी परिधान, परिवेश और आदतों पर उन्होंने ताउम्र एक सवाल तक नहीं कियाI कभी कोई रोक नहीं लगाई। फ्रेंच सोहबत से प्रभावित मेरे कुछ परिधान हिन्दी साहित्य जगत में विवाद और चर्चा का विषय भी बनेI लेकिन नीलाभ जी को रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ा।
किताबों और शब्दकोशों में हर वक्त डूबे हुए वो एक बहुआयामी, बहुप्रतिभाशाली, धुरन्धर पढ़ाकू, अव्वल जिद्दी, बहुत ज्यादा खुद्दार और बड़े ही बातूनी आदमी थे, जिनके साथ वक्त का गुजरना पता ही नहीं चलता था।
वे जितने धुरन्धर ज्ञाता क्लासिक विषयों के थे उतने ही मास्टर आधुनिक तकनीकी के थे। उनके व्यक्तित्व के ये सारे विरले संगम बड़ी मुश्किल से देखने को मिलते हैं।
उन हर मिनट के साथी के लिए था लिखना दुनिया का एक बेहद तकलीफदेह तजुर्बा है। पिछले छह महीने में बीमारी के दौरान उन जैसे हट्टे-कट्टे पहलवान को चलने-फिरने से मजबूर देखकर कभी-कभी मेरी आंखें छलक पड़ती थीं और वो मेरी बांह मजबूती से थाम कर कहते थे जिस पर मैं ताउम्र अमल करूंगी- मैं रहूं न रहूं लेकिन मेरी कही बातें याद रखनाI ये तय बात है कि मैं तुमसे पहले दुनिया को विदा कहूंगा लेकिन अकेले रोकर मत जीना, इस दुनिया से लड़कर जीना, मेरी भूमिका रोएगी नहीं, वो लिखेगी, कहानी लिखेगी, कविता लिखेगी, खुशियां लिखेगी और अश्क लिखेंगी…
हम दोनों बहुत कुछ एक जैसी नियतियों के साझेदार रहे- जितने बदनसीब वे कमोबेश उतनी ही मैं…जितना भाग्यशाली उनका जीवनI कुछ मायनों में वैसा ही मेरा।
वो अपनी ओर से किसी के लिए हमेशा सबसे अच्छा करना चाहते रहे लेकिन कई बार वो उनका अच्छा चाहना वांछित व्यक्ति तक पहुंचा ही नहींI मेरे लिए वो बहुत कुछ सुंदर और सकारात्मक करना चाह रहे थे लेकिन उनकी बद से बदतर होती सेहत और इसी वजह से डगमगाती अर्थव्यवस्था ने उनका ख्वाब पूरा नहीं होने दिया।
बेशक ये उस वांछित व्यक्ति या खुद मेरी ही मन्द तकदीर कही जाएगी।
उनकी एक खास बात जो उन्हें कई सारे भीषण ज्ञानियों के बीच ला खड़ा करती है वो उनका कीमती पत्थरों का विशद, विस्तृत और सूक्ष्म ज्ञान। गजब हैरान करने वाली बात तो ये रही कि जौहरी खुद नगीनों और रत्नों के बारे में नीलाभ जी से जानकारी और सलाह मांगा करते थे।
मेरी हैरानी देखकर कहते थे- प्यारी, उनका मेरे लिए सम्बोधन प्यारी या जान का कोहेनूर या महारानी जी होता था, हैरान परेशान मत रहो! सबसे कीमती हीरा मैंने खोज लिया हैI ये दीगर बात है कि मेरा कोहेनूर मुझे उम्र के आखिरी पड़ाव में मिलाI लेकिन कोई बात नहीं, उसे सहेजने का दमखम अभी है मुझमें…
उनके चेहरे की एक एक झुर्री अनगिनत तजुर्बे और तकलीफों का आईना थी। उनकी कुल जमा बहत्तर बरस की जिन्दगी में उनके अपने खुद के बयालीस पते रहे,जिनमें लंदन का साढ़े चार बरस का निवास भी उल्लेखनीय है। उन्होंने अपनी जिन्दगी से जुड़े एक एक शख्स को संवारा और भली तरह से बसा दिया। मेरा उनका महज तीन सालों का भीषण साथ रहा और इन तीन सालों में उन्होंने तीन सौ मर्तबा एक ही बात कहीं- तुम मुझे मेरी जवानी में क्यों नहीं मिल गई, मैं तभी से संभला और सुधरा इनसान होता।
मैं भी हमेशा एक ही जवाब देती- भई आपकी जवानी में जब मैं पैदा ही नहीं हुई थी तो मिलती कहां सेI और सुधार की कोई उम्र नहीं होती। अगर आप चाहें तो अभी भी सुधर सकते है।
न मैं उन्हें पच्चीस बरस का बना सकती थी न खुद को सत्तर का।
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Email: bhumika.jnu@gmail.com
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