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सुरों के शहंशाह थे मेहदी हसन

मेहदी हसन नहीं रहे. जिस दौर में गजल गायकी शोर-शराबे में बदलती जा रही थी मेहदी हसन ने उसे  अदब और तहजीब बख्शी. आज ‘जनसत्ता’ ने सम्पादकीय में उचित ही लिखा है कि उनकी गायकी में केवल रागों को साधने का कौशल ही नहीं था बल्कि उसे सुनने वालों तक सही ढंग से पहुंचाने की कोशिश भी दिखाई देती है. मुझे लगता है कि वे गजलों को इतनी आत्मीयता से गाते थे कि हर सुनने वाले को अपने-अपने से लगते थे. आज उनको श्रद्धांजलि देते हुए हिंदी कवि प्रेमचंद गाँधी ने ‘अपने  मेहदी हसन’ पर लिखा है जिसे उन्होंने अपने लड़कपन के दिनों में ढूंढा था और जो अपनी गजलों के साथ हमारी तन्हाइयों में सदा हमारे साथ रहेंगे- जानकी पुल. 
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ग़ज़ल में मेहदी हसन से जब पहला परिचय हुआ तो वो हमारी किशोरावस्‍था के दिन थे, जब फिल्‍म संगीत का बुरा दौर शुरु ही हुआ था और लोकप्रिय संगीत में पंकज उधास चांदी जैसा रंग है तेरा लेकर मेरे हमवयस्‍कों में नई हिलोरें लेकर आए थे। निम्‍न मध्‍यवर्गीय परिवारों में रेडियो भी उन दिनों में दहेज में मांगी और दी जानी वाली चीज़ों में शुमार हुआ करता था। हमारे यहां अरब देशों में मजदूरी के लिए जाने वाले लोग गर्व से टू-इन वन लेकर आते थे और यही वह दौर था, जब कैसेट की लोकप्रियता ने संगीत को एक नया सहारा दिया था। एल.पी. रिकॉर्ड की विदाई का वह दौर अभी शुरु ही हुआ था, जब मैंने चौड़ा रास्‍ता, जयपुर में संगीत की एक दुकान पर मेहदी हसन को पहली बार सुना था। मुझे मालूम नहीं था कि यह किसकी आवाज़ है जो 14-15 बरस की उमर में इस तरह मेरे वजूद को जकड़ रही है। उस दुकान पर एचएमवी का लोगो हुआ करता था, इसलिए मैं और मेरे दोस्‍त मानते थे कि यही असली एचएमवी की दुकान है। तो एक दोपहर प्रेमप्रकाश टाकीज में एक फिल्‍म देखने के बाद बाहर निकले तो बाकी दोस्‍त अपनी राह चल दिये और मैं अपनी साइकिल लिए अपने रास्‍ते पर। वहीं प्रेमप्रकाश के सामने ही संगीत की उस दुकान में मेरे लिए बिल्‍कुल अलग कशिश भरी आवाज़ में ग़ुलों में रंग भरे बादे नौबहार चले सुनाई दिया। मुझे ख़याल भी नहीं रहा कि कब शाम हुई और कब एलपी ख़त्‍म हुआ। मैं सीधा दुकान के भीतर गया और गायक का नाम पूछा। दुकानदार ने एलपी कवर दिखाया तो उस पर मेहदी हसन का नाम था और उसमें उपलब्‍ध ग़ज़लों की सूची। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का नाम मैं पढ़-सुन चुका था। मुझे पहली बार अहसास हुआ कि ग़ज़लों को कोई गायक इस तरह भी गा सकता है।
जाहिर है कि एलपी खरीदने की न तो औकात थी और ना ही ज़रूरत, क्‍योंकि घर में एलपी तो दूर रेडियो तक नहीं था। लेकिन मेहदी हसन की आवाज मेरे जेहन में ऐसे बैठ गई कि मेरे लिये ग़ज़ल का पर्याय ही मेहदी हसन हो गया। जब भी कहीं ग़ज़ल के रूप में पंकज उधास या किसी और को सुनता तो लगता कि यार मेहदी हसन से तुलना कहां की जा सकती है। इस वाकये के करीब 7 महीने बाद घर में टू इन वन का आगमन हुआ तो पहली खोज ही मेहदी हसन की शुरु की। मुझे ताज्‍जुब हुआ कि शहर में एलपी से कैसेट पर रिकॉर्ड करके देने वाले किसी भी शख्‍स के पास मेहदी हसन नहीं था। इस छानबीन में ना जाने कितनी पुरानी ग़ज़लें कैसेटों में भरती गईं और करीब एक महीने की भागदौड़ के बाद एक बंदे के पास मेहदी हसन की 6 ग़ज़लें मिलीं। मैंने इन ग़ज़लों को उन दिनों में ना जाने कितनी बार सुना होगा। मेरे लिए उस उम्र में यह एक अलग ही रूहानी किस्‍म का अनुभव था। ये छह ग़ज़लें थीं-
1. रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ 2. बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो ना थी 3. ग़ुलों में रंग भरे बादे नौबहार चले 4. जिंदगी में तो सभी प्‍यार किया करते हैं … और 5. अबके हम बिछड़े तो 6. देख तो दिल कि जां से उठता है
किशोरावस्‍था में जो लगावट मेहदी हसन से हुई, वह दिनोंदिन परवान चढ़ती रही। आज उनके ना रहने पर उन्‍हीं की लगावट का शेर याद आता है, कुछ उसके दिल में लगावट जरूर थी वरना, वो मेरा हाथ दबाकर गुज़र गया कैसे। इस लगावट के इतिहास को याद करने पर महसूस होता है कि मेहदी हसन और बाकी ग़ज़ल गायकों में क्‍या फर्क था, जो कभी भी नहीं पाटा जा सकेगा। किसी गायक के प्रति कोई असम्‍मान मेरे मन में कभी नहीं रहा, लेकिन मेहदी हसन का जो मुकाम है, वहां कोई नहीं पहुंच सकता।
मैं ग़ज़ल गायिकी में सबसे बड़ा मुरीद कुंदन लाल सहगल का रहा हूं और आज भी हूं। सुर की जो गहराई और तड़प सहगल में है वो बेमिसाल है। यूं ग़ज़ल गायिकी में मेहदी हसन से पहले नज़ाकत सलामत अली खान और नूरजहां की जबर्दस्‍त धाक थी और उनके बाद और साथ के लोगों में बेगम अख्‍तर, फरीदा खानम, मोहम्‍मद रफी, मुकेश, इकबाल बानो, तलत महमूद, भूपेंद्र और जगजीत सिंह जैसे कई महान कलाकारों ने ग़ज़ल को आम आदमी तक पहुंचाया है, लेकिन मेहदी हसन ने जो काम किया, उस पर अकबर इलाहाबादी का शेर याद आता है, जो उन्‍होंने सर सैयद अहमद के लिए कहा था-
हमारी बातें ही बातें हैं सैयद काम करता था
न भूलो फर्क जो है कहने वाले करने वाले में
खुद मेहदी हसन ने कई बार बातचीत में भी और कार्यक्रम के दौरान गाते हुए भी इस बात को रेखांकित किया है कि वे किस तरह से पूरी ग़ज़ल के मूड को ध्‍यान में रखते हुए कंपोज करते थे। अब देखने की बात यह कि ग़ज़ल में कविता की दृष्टि से देखें तो हरेक शेर अपने आप में स्‍वतंत्र होता है, बावजूद इसके मेहदी हसन सुरों की ऐसी दिलकश बुनाई करते हैं कि एक ही राग में शाइरी के इतने सारे मूड्स को इस खूबसूरती के साथ खिला देते हैं कि हर शेर पर दाद दिये बिना रहा नहीं जाता। बहुत संभव है कि ग़ज़ल पढ़ने पर कोई शेर कमज़ोर नज़र आए, लेकिन मेहदी हसन के गले से निकलकर वो एक नायाब शेर में तब्‍दील हो जाता है। इसलिये मुझे व्‍यक्तिगत तौर पर महसूस होता है कि शाइरी में लफ़्जों को मानी देने का ही नहीं, उनके तमाम तरह के काव्‍यार्थों और प्रतीकार्थों को भी अपने सुरों से व्‍यक्‍त करने का बड़ा काम किया है। मेहदी हसन जैसे बेहद सुरीले गायक सदियों में पैदा होते हैं और मेरे विचार से संगीत के तमाम जानकार लोग इस बात को कुबूल करते हैं कि वे सच में सुरों के शहंशाह थे।
हमारे युग के ही नहीं हमारे पुरोधा कवि-शायरों को भी जितने सुरीले ढंग से मेहदी हसन जैसे महान गायकों ने जो जनप्रियता दी है, उसके सामने दुनिया के कई विश्‍वविद्यालयों का काम छोटा लगता है। मीर, ग़ालिब, दाग़, ज़ौक़, सौदा, ज़फ़र अनगिनत शायर हैं जो ग़ज़ल गायिकी के कारण ही शायद उस आम जनता में व्‍यापक हुए, जिन्‍होंने उनका कलाम नहीं पढ़ा और मेरे ख़याल से यह ग़ज़ल गायिकी की बड़ी उपलब्धि रही है।
मेहदी हसन को मैंने एक कार्यक्रम में लाइव भी सुना है और उसी दौरान यह मालूम हुआ कि वो तो मेरे राजस्‍थान के ही हैं। बाद में उनके उस लूणा गांव में भी गया, जहां उनका जन्‍म हुआ। वहां उनके पुरखों की कब्रें हैं और मां की भी। मेहदी हसन बस एक बार गये थे वहां। उनकी रग-रग में राजस्‍थानी लोक और पारंपरिक संगीत की जड़ें कितनी गहराई तक पैबस्‍त हैं, यह जानना हो तो उनका गाया मांड सुनिए। उनके घर में भाषा के तौर पर राजस्‍थानी का ही चलन था, यह बात मुझे कराची में पता चली जब मैं एक राजस्‍थानी मूल के हमउम्र नौजवान से मिला। उसने मुझसे सीधे राजस्‍थानी में बात की तो बहुत अच्‍छा लगा। वो भी मेहदी हसन के नजदीकी किसी गांव का मूल निवासी था। वो मुझे अपने घर ले जाना चाहता था और मैं मेहदी हसन से मिलना। हारकर उसने मोबाइल से फोन कर पूछा तो मालूम हुआ कि मेहदी हसन तो इलाज़ के लिए बाहर गये हुए हैं। कराची में तमाम राजस्‍थानी अपनी मातृभाषा में ही बोलते हैं, यह सुनकर बहुत अच्‍छा लगा था। मुझे उस नौजवान का नाम तो याद नहीं, लेकिन उसने जयपुर में जिस इलाके में अपना ननिहाल बताया था, वो संगीतकारों का ही इलाका था। उस नौजवान का मेहदी हसन के घर पर रिश्‍तेदारी के कारण आना-जाना भी रहा था, हालांकि उसका खुद का संगीत से कोई रिश्‍ता नहीं था, वह तो टिंबर मर्चेंट था, उसके शब्‍दों में खातीड़ा। मैंने एक लाइव कार्यक्रम के एलबम में संगतकारों को हिदायत देते हुए मेहदी हसन की बातचीत सुनी है, जिसमें वे राजस्‍थानी में ही निर्देश दे रहे थे और कार्यक्रम शायद लंदन में हो रहा था। इस बात का जि़क्र इसलिए कि जड़ों से गहरा जुड़ाव एक बड़े कलाकार के कितनी अहमियत रखता है, यह आज की पीढ़ी शायद ही समझ सके।
वे जिस खानदान में पैदा हुए उसमें 16 पीढि़यों से संगीत विरासत में चला आ रहा था, लेकिन बंटवारे में उनका परिवार पाकिस्‍तान क्‍या गया, रोटियों के लाले पड़ गये। साइकिल सुधारने से लेकर मोटर मैकेनिक तक के कितने काम किये। वे जिस दौर में उभर कर आए, उस दौर में अपना अलग मुकाम हासिल करना कोई हंसी खेल नहीं था। आवाज़ के फ़नकारों की उस आकाशगंगा की चकाचौंध में मेहदी हसन का सितारा यूंही नहीं चमका था। पाकिस्‍तानी सिनेमा ने उन्‍हें शोहरत दी, पैसा दिया लेकिन उनका सबसे शानदार दौर मेरे लिहाज से वह है, जब वे सिनेमा को अलविदा कहकर पूरी तरह ग़ज़ल गायिकी में रम गये। उन्‍होंने अपनी शारीरिक तकलीफों के कारण सिने गायिकी को अलविदा कहा था, इसलिये उन्‍होंने अपनी अदायगी और पेशगी को एक अलग रंग दिया, जो उनकी सेहत को, गले को और सबसे ज्‍यादा सुनने वालों को सुकून देती है। हर लफ़्ज़ के मानी खोलना और उसके लिए सुरों से खेलना मेहदी हसन का बहुत प्‍यारा शग़ल रहा है, क्‍योंकि इसी से वह सुनने वालों के बिल्‍कुल नज़दीक चले जाते हैं और हरेक लफ़्ज़ को भी श्रोता के दिल में पैबस्‍त कर देते हैं। सेहत के कारण वे भले ही एक स्‍केल नीचे गाते रहे हों, लेकिन राग से बाहर जाकर अपनी सुविधा से खेलना या छेड़छाड़ करना उन्‍हें कभी पसंद नहीं आया। जबकि और दूसरे लोग यह काम बारहा करते रहे हैं, लेकिन मेहदी हसन ने रागदारी के साथ कोई समझौता नहीं किया, बल्कि एक हद तक कहें तो राग का अर्थविस्‍तार ही किया, फिर वो चाहे बंदिशों की रचना में हो या कि शाइरी को बयां करने का सुरीला अंदाज़ हो। ग़ज़ल को शुद्ध शास्‍त्रीय ढंग से सुरों का मखमली पैरहन पहनाकर आम अवाम की आंखों की दिलकश दोशीजा बना देने वाले मेहदी हसन के रूप में दुनिया ने एक ऐसा फ़नकार खो दिया है, जो अपने सुरों में ही लोगों के दिलों पर सदियों तक राज करेगा। 

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