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किनारे बैठी औरत धोती रहती है अपने शोक

हाल के दिनों में जिन कुछ कवियों की कविताओं ने मुझे प्रभावित किया है महेश वर्मा उनमें एक हैं. हिंदी heartland से दूर अंबिकापुर में रहने वाले इस कवि की कविताओं में ऐसा क्या है? वे इस बड़बोले समय में गुम्मे-सुम्मे कवि हैं, अतिकथन के दौर में मितकथन के. मार-तमाम चीज़ों के बीच अनुपस्थित चीज़ों की जगह तलाशती, छोटे-छोटे सुकून के पल तलाशती उनकी कुछ कविताएँ आज पढते हैं- 
जानकी पुल.
——————
1.
अनुपस्थित
सामने दीवार पर
चौखुट भर जगह है एक तस्वीर की
कोई तस्वीर नहीं है एक जगह है-
तस्वीर के न होने की,
यह न होना भी इतनी पुरानी घटना कि
पिछले बार की पुताई में मिल नहीं पाया था-
इस चौखुटे से पुती हुई बाकी दीवार का रंग.
अलग से और उजला दिखने लगा है इस खाली जगह का खाली रंग
एक जि़द की तरह जब  की गई दोबारा पुताई बस इस चैखुटे भर की .
क्या था इस जगह पर ?
देवता-पितर या शाश्वत झरते झरने का भूदृश्य ?
  कोई प्रमाणपत्र ?
याद करते हुए देखने लगता हूँ खिड़की से बाह
दूर एक सूखा वृक्ष और उसकी टहनियाँ,
जैसे खाली जगह हरे पत्तों के न होने की.
अपने अनुषंगों के साथ आती जाती रहती उस पर भी वर्षा
और गहराता जाता सूखी टहनियों के बीच का अनुपस्थित हरा रंग.
निशब्द घुस जाता असमय मारा गया दोस्त सोचने की
धुंधली कोठरी में.
भूल की तरह आ जाता जिसका नाम जीवित दोस्तों की महफि़ल में
फिर और साफ दिखने लगती वह जगह दोस्त के न होने की,
इसके बाद दिखने लगता शब्दों का न होना शब्दों के बीच.
अंततः की तरह लौटते हुए अपने कमरे
सामने दीवार पर-कोई तस्वीर नहीं है एक जगह है
तस्वीर के न होने की.
अपने अनुपस्थित की तरह देखता हूँ यह, अपना कमरा.
मेरे अनुपस्थित की तरह देखता है यह मुझको.

2.

पुराना पेड़

वह दुख का ही वृक्ष था
जिसकी शिराओं में बहता था शोक
दिन-भर झूठ रचती थीं पत्तियाँ हंसकर
कि ढका रह आए उनका आंतरिक क्रँदन

एक पाले की रात
जब वे निःशब्द गिरतीं थीं रात पर और
ज़मीन पर
हम अगर जागते होते थे
तो
खिड़की से यह देखते रहते थे

देर तक

3.
आदिवासी औरत रोती है
आदिवासी औरत रोती है गुफाकालीन लय में.
इसमें जंगल की आवाज़ें हैं और पहाड़ी झरने के गिरने की आवाज़,
इसमें शिकार पर निकलने से पहले जानवर के चित्र पर टपकाया
गया आदिम खू़न टपक रहा है,
तेज़ हवाओं की आवाज़ें हैं इसमें और आग चिटखने की आवाज़.
बहुत साफ और उजली इस इमारत के वैभव से अबाधित
उसके रूदन से यहां जगल उतर आया है.
लंबी हिचकियों के बीच उसे याद आते जायेंगे
मृतक के साथ बीते साल, उसके बोल, उसका गुस्सा-
इन्हें वह गूँथती जायेगी अपनी आवाज़ के धागे पर
मृतक की आखिरी माला के लिये.
यह मृत्यु के बाद का पहला गीत है उस मृतक के लिये-
इसे वह जीवित नहीं सुन सकता.
हम बहरहाल उन लोगों के साथ हैं
जिनकी नींद ख़राब होती है- ऐसी आवाज़ों से.
4.
वक्तव्य
अपने आप में बड़बड़ाते चलने वालों के पास
दूसरों के स्थगित वाक्य हैं.
टल गया जिनका कहा जाना कभी संकोच
कभी हड़बड़ी और अक्सर
समय पर न सू झ पाने के कारण.
आपके ठीक बगल से गुज़रते हुए वे कहते हो सकते हैं
वह वाक्य जो आपसे कहना चाहता था आपका परिचित
और चुप रह गया था पिछले किसी मौसम.
वे यूँ ही याद रखने को दुहरा रहे हों
किसी दूसरे के हिस्से का वाक्य जिसे
आगे किसी जगह पहुँचाना है.
बाज़ दफा जब वे चुपचाप गुज़र जाएँ
आपके पास से सोचते कोई बात-
वे सुन रहे होते हैं कान देकर आपके भीतर गूंजते
आपके अनकहे वाक्य.
5.
वर्षाजल
अगर धरती पर कान लगाकर सुनो
कराहटें सुनाई देंगी.
सम्राटों की हिंस्त्र इच्छाएँ,
साम्राज्ञियों के एकाकी दुःख,
स्त्रियों के रूदन की चौड़ी नदी का हहराता स्वर-
गूंजते हैं धरती के भीतर.
ऊपर जो देखते हो इतिहास के भग्नावशेष
सूख चुके जख़्मो के निशान हैं त्वचा पर.
फिर लौटकर आई है बरसात-
जिंदा घावों को धो रहा है वर्षाजल.
6.
बारिश
घर से निकलते ही होने लगती है वर्षा
थोड़ा बढ़ते ही मिटते जाते कीचड़ में पिछले पदचिन्ह
ढ़ांढ़स के लिये पीछे मुड़कर देखते ही
ओझल हो चुका होता है बचपन का घर.
घन-गर्जन में डूब जाती मां-बाबा को पुकारती आवाज़
पुकारने को मुंह खोलते ही भर जाता है वर्षाजल
मिट रही आयु रेखाएँ त्वचा से
कंठ से बहकर दूर चला गया है मानव स्वर
पैरों से उतरकर कास की जड़ों में चली गई है गति.
अपरिचित गीली ज़मीन पर वृक्ष सा खड़ा रह जाता आदमी
पत्रों पर होती रहती है बारिश.
7.
और छायाएँ
ऊपर यहां इस पहाड़ी मोड़ से-
दिखाई देता है एक पोखर.
आज इसके किनारे बैठी है एक स्त्री
धोती हुई अपने कपड़े और अपनी देह.
मेरे भीतर है यह पोखर जिसके शांत जल में
झांकती वृक्षों की छायाएँ और आकाश,
किनारे बैठी औरत धोती रहती है अपने शोक.
मैं हूँ वह पोखर जो दिखता ऊपर से
मैं ही हूँ वह औरत जो देखती है-जल में हिलती छाया.
मैं ही वह शोक जो धोया जा रहा इस जल में.
यहीं से ऊपर की ओर
देखता  हूँ ऊपर से
जहां से दिखाई देता एक पोखर, एक स्त्री और छायाएँ
8.
दीवारें
कमरा यह बना दीवारों से
यहां वर्जित है आकाश का आना
सुबह को खुली खिड़कियों के अंतराल से ज़्यादा.
कमरे में नहीं होता आकाश तो नहीं होती चिडि़या,
न पतंग या न लड़ाकू विमान.
नहीं होते सितारे, न बरसती ओस न बरखा
एक हवा होती, रंगहीन,
जिसमें
घूमता होता पंखा मीडियम स्पीड पर.
दीवारें रोकती हैं आकाश.
इस गहरी रात में निकलकर बाहर छोटे से इस चांद के नीचे-
मैं ज़ोर से भरता हूँ फेफड़े में आकाश-
थोड़ा उजला हो जाता, आत्मा का साँवला रंग.

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हाल के दिनों में जिन कुछ कवियों की कविताओं ने मुझे प्रभावित किया है महेश वर्मा उनमें एक हैं. हिंदी heartland से दूर अंबिकापुर में रहने वाले इस कवि की कविताओं में ऐसा क्या है? वे इस बड़बोले समय में गुम्मे-सुम्मे कवि हैं, अतिकथन के दौर में मितकथन के. मार-तमाम चीज़ों के बीच अनुपस्थित चीज़ों की जगह तलाशती, छोटे-छोटे सुकून के पल तलाशती उनकी कुछ कविताएँ आज पढते हैं- 
जानकी पुल.
——————
1.
अनुपस्थित
सामने दीवार पर
चौखुट भर जगह है एक तस्वीर की
कोई तस्वीर नहीं है एक जगह है-
तस्वीर के न होने की,
यह न होना भी इतनी पुरानी घटना कि
पिछले बार की पुताई में मिल नहीं पाया था-
इस चौखुटे से पुती हुई बाकी दीवार का रंग.
अलग से और उजला दिखने लगा है इस खाली जगह का खाली रंग
एक जि़द की तरह जब  की गई दोबारा पुताई बस इस चैखुटे भर की .
क्या था इस जगह पर ?
देवता-पितर या शाश्वत झरते झरने का भूदृश्य ?
  कोई प्रमाणपत्र ?
याद करते हुए देखने लगता हूँ खिड़की से बाहर
दूर एक सूखा वृक्ष और उसकी टहनियाँ,
जैसे खाली जगह हरे पत्तों के न होने की.
अपने अनुषंगों के साथ आती जाती रहती उस पर भी वर्षा
और गहराता जाता सूखी टहनियों के बीच का अनुपस्थित हरा रंग.
निशब्द घुस जाता असमय मारा गया दोस्त सोचने की
धुंधली कोठरी में.
भूल की तरह आ जाता जिसका नाम जीवित दोस्तों की महफि़ल में
फिर और साफ दिखने लगती वह जगह दोस्त के न होने की,
इसके बाद दिखने लगता शब्दों का न होना शब्दों के बीच.
अंततः की तरह लौटते हुए अपने कमरे
सामने दीवार पर-कोई तस्वीर नहीं है एक जगह है
तस्वीर के न होने की.
अपने अनुपस्थित की तरह देखता हूँ यह, अपना कमरा.
मेरे अनुपस्थित की तरह देखता है यह मुझको.

2.

पुराना पेड़

वह दुख का ही वृक्ष था
जिसकी शिराओं में बहता था शोक
दिन-भर झूठ रचती थीं पत्तियाँ हंसकर
कि ढका रह आए उनका आंतरिक क्रँदन

एक पाले की रात
जब वे निःशब्द गिरतीं थीं रात पर और
ज़मीन पर
हम अगर जागते होते थे
तो खिड़की से यह देखते रहते थे

देर तक

3.
आदिवासी औरत रोती है
आदिवासी औरत रोती है गुफाकालीन लय में.
इसमें जंगल की आवाज़ें हैं और पहाड़ी झरने के गिरने की आवाज़,
इसमें शिकार पर निकलने से पहले जानवर के चित्र पर टपकाया
गया आदिम खू़न टपक रहा है,
तेज़ हवाओं की आवाज़ें हैं इसमें और आग चिटखने की आवाज़.
बहुत साफ और उजली इस इमारत के वैभव से अबाधित
उसके रूदन से यहां जगल उतर आया है.
लंबी हिचकियों के बीच उसे याद आते जायेंगे
मृतक के साथ बीते साल, उसके बोल, उसका गुस्सा-
इन्हें वह गूँथती जायेगी अपनी आवाज़ के धागे पर
मृतक की आखिरी माला के लिये.
यह मृत्यु के बाद का पहला गीत है उस मृतक के लिये-
इसे वह जीवित नहीं सुन सकता.
हम बहरहाल उन लोगों के साथ हैं
जिनकी नींद ख़राब होती है- ऐसी आवाज़ों से.
4.
वक्तव्य
अपने आप में बड़बड़ाते चलने वालों के पास
दूसरों के स्थगित वाक्य हैं.
टल गया जिनका कहा जाना कभी संकोच
कभी हड़बड़ी और अक्सर
समय पर न सू झ पाने के कारण.
आपके ठीक बगल से गुज़रते हुए वे कहते हो सकते हैं
वह वाक्य जो आपसे कहना चाहता था आपका परिचित
और चुप रह गया था पिछले किसी मौसम.
वे यूँ ही याद रखने को दुहरा रहे हों
किसी दूसरे के हिस्से का वाक्य जिसे
आगे किसी जगह पहुँचाना है.
बाज़ दफा जब वे चुपचाप गुज़र जाएँ
आपके पास से सोचते कोई बात-
वे सुन रहे होते हैं कान देकर आपके भीतर गूंजते
आपके अनकहे वाक्य.
5.
वर्षाजल
अगर धरती पर कान लगाकर सुनो
कराहटें सुनाई देंगी.
सम्राटों की हिंस्त्र इच्छाएँ,
साम्राज्ञियों के एकाकी दुःख,
स्त्रियों के रूदन की चौड़ी नदी का हहराता स्वर-
गूंजते हैं धरती के भीतर.
ऊपर जो देखते हो इतिहास के भग्नावशेष
सूख चुके जख़्मो के निशान हैं त्वचा पर.
फिर लौटकर आई है बरसात-
जिंदा घावों को धो रहा है वर्षाजल.
6.
बारिश
घर से निकलते ही होने लगती है वर्षा
थोड़ा बढ़ते ही मिटते जाते कीचड़ में पिछले पदचिन्ह
ढ़ांढ़स के लिये पीछे मुड़कर देखते ही
ओझल हो चुका होता है बचपन का घर.
घन-गर्जन में डूब जाती मां-बाबा को पुकारती आवाज़
पुकारने को मुंह खोलते ही भर जाता है वर्षाजल
मिट रही आयु रेखाएँ त्वचा से
कंठ से बहकर दूर चला गया है मानव स्वर
पैरों से उतरकर कास की जड़ों में चली गई है गति.
अपरिचित गीली ज़मीन पर वृक्ष सा खड़ा रह जाता आदमी
पत्रों पर होती रहती है बारिश.
7.
और छायाएँ
ऊपर यहां इस पहाड़ी मोड़ से-
दिखाई देता है एक पोखर.
आज इसके किनारे बैठी है एक स्त्री
धोती हुई अपने कपड़े और अपनी देह.
मेरे भीतर है यह पोखर जिसके शांत जल में
झांकती वृक्षों की छायाएँ और आकाश,
किनारे बैठी औरत धोती रहती है अपने शोक.
मैं हूँ वह पोखर जो दिखता ऊपर से
मैं ही हूँ वह औरत जो देखती है-जल में हिलती छाया.
मैं ही वह शोक जो धोया जा रहा इस जल में.
यहीं से ऊपर की ओर
देखता  हूँ ऊपर से
जहां से दिखाई देता एक पोखर, एक स्त्री और छायाएँ
8.
दीवारें
कमरा यह बना दीवारों से
यहां वर्जित है आकाश का आना
सुबह को खुली खिड़कियों के अंतराल से ज़्यादा.
कमरे में नहीं होता आकाश तो नहीं होती चिडि़या,
न पतंग या न लड़ाकू विमान.
नहीं होते सितारे, न बरसती ओस न बरखा
एक हवा होती, रंगहीन,
जिसमें
घूमता होता पंखा मीडियम स्पीड पर.
दीवारें रोकती हैं आकाश.
इस गहरी रात में निकलकर बाहर छोटे से इस चांद के नीचे-
मैं ज़ोर से भरता हूँ फेफड़े में आकाश-
थोड़ा उजला हो जाता, आत्मा का साँवला रंग.

13 thoughts on “किनारे बैठी औरत धोती रहती है अपने शोक

  1. जीवन के सशक्त शब्द-चित्र प्रस्तुत करती हैं कवितायें , जीवन की असंगतियों और तदजन्य विद्रूपताओं की ओर स्पष्ट संकेत करती हुई !

  2. ऊपर यहां इस पहाड़ी मोड़ से-
    दिखाई देता है एक पोखर…किनारे बैठी औरत धोती रहती है अपने शोक

  3. महेश को इधर लगातार पढता रहा हूँ..लेकिन इस बार ये कवितायें मुझे थोड़ी अलग लग रही हैं. पहले की तुलना में इनमें कवि थोड़ा अधिक खुला सा लग रहा है. बातें थोड़ा खुल के आई हैं. उनके पास एक ऎसी गहरी और मानीखेज भाषा है जो कम में अधिक कहने का ज़रूरी काम बखूबी करती है. इन कविताओं में महेश ने उस भाषा का गजब इस्तेमाल किया है.

  4. खाली जगहें , अनुपस्थित दृश्य , अनसुनी रुलाइयां , अनकही कहानियां. यानी ऐसी कुछ चीज़ों को ले कर कविता कहना जिन्हें भूल जाना सुविधाजनक है , याद रखना अपराध. महेश की कवितायें बिना शोर मचाये हमारे बीच की उन अनुपस्थितियों की ओर इशारा भर कर देती हैं , जो देखी भी नहीं जातीं , न जिन की मुकम्मल अनदेखी की जा सकती है .ये ठीक उस जगह की कवितायें हैं जहां हमारे समय की बहुरूपा यंत्रणाएं बिना किसी को बताए बेचैनी से अपने पहलू बदल रही होतीं हैं.

  5. बहुत ही खूबसूरत और मर्मस्पर्शी कवितायें! हर कविता कवी के प्रकृति प्रेम से गुंथी हुई. कविताओं में भी खामोशी ही लिखी है आपने! महेश जी और प्रभात जी दोनों को बधाई.

  6. महेश जी कि कविताये कितनी अपनी सी लगती है. इनकी कविताये पढते हुए कभी नही लगता कि शब्द ला ला कर चिपका दिए गए हो जैसा बहुत से कवि करते है अपनी कविताओ से लोगों का ध्यान अकर्षित करने के लिए . महेश जी तो बस अपने मन कि लिख देते है, वे प्राकृतिक रूप से खास हो जाती है, और पढने वाला उनसे जुड जाता है. बहुत बहुत बधाइयाँ .

  7. हम बहरहाल उन लोगों के साथ हैं
    जिनकी नींद ख़राब होती है- ऐसी आवाज़ों से.
    इस गुम्मे-सुम्मे कवि की कवितायेँ बहुत कुछ उद्घाटित करती हैं , बधाई महेश जी इन शानदार कविताओं के लिए शुक्रिया प्रभात जी इन्हे सबके साथ साँझा करने के लिये
    गुम्मे-सुम्मे

  8. ये कविताएँ हैं या धरती में नुमाया कोई दर्द .. हर कविता अपनेआप में जीवंत एक बोलता चित्र ..जैसे दूर से आती निकटम आवाज़ ..जैसे घने पत्तों पर गिरती बारिश , जैसे बारिश में घुलती धूप, जैसे धूप पर बैठा गुमसुम जीवन ..
    महेश जी को बधाई ! प्रभात शुक्रिया हमेशा बनी रहने वाली इन ध्वनियों के लिए ..

  9. Pingback: great site

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