हाल में ही युवा कवयित्री सुधा उपाध्याय का कविता संग्रह राधाकृष्ण प्रकाशन से आया है- ‘इसलिए कहूँगी मैं‘. उसी संग्रह से कुछ चुनी हुई कविताएँ- मॉडरेटर.
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मैं हूं, मैं हूं, मैं हूं
चौराहों से एक तरफ निकलती
संकरी गली में
स्थापित कर दी तुमने मेरी प्रतिमा
लोग भारी भारी होकर आते हैं मेरे पास
मुझे छू-छूकर दिलाते हैं विश्वास
कि मैं हूं
मैं हूं
मैं हूं
बस कभी हल्की नहीं होने पाती मैं
ताकती रहती हूं
चौराहे पर पसरी भीड़ को
उपेक्षित गली को
और सबसे ज्यादा
अपने ईर्द गिर्द लगी
लोहे की जालियों को
जहां अब भी ढेर सारा चढ़ावा रखा है
(2) औरत
औरत
तूने कभी सोचा है
जिस परिधि ने तुझको घेर रखा है
उसकी केंद्र बिंदु तो तू ही है
तू कहे अनकहे का हिसाब मत रख
किए न किए कि शिकायत भी मत कर
तू धरा है धारण कर
दरक मत
तू परिधि से नहीं
परिधि तुझसे है
(3) क्यों करती हो वाद-विवाद
क्यों करती हो वाद-विवाद
बैठती हो स्त्री विमर्श लेकर
जबकि लुभाते हैं तुम्हें
पुरुषतंत्र के सारे सौंदर्य उपमान
सौंदर्य प्रसाधन, सौंदर्य सूचक संबोधन
जबकि वे क्षीण करते हैं
तुम्हारे स्त्रीत्व को
हत्यारे हैं भीतरी सुंदरता के
घातक हैं प्रतिशोध के लिए।
फिर क्यों करती हो वाद-विवाद।
(4) बोनजई
तुमने आँगन से खोदकर
मुझे लगा दिया सुंदर गमले में
फिर सजा लिया घर के ड्राइंग रूम में
हर आने जाने वाला बड़ी हसरत से देखता है
और धीरे-धीरे मैं बोनज़ई में तब्दील हो गई
मौसम ने करवट ली
मुझमें लगे फल फूल ने तुम्हें फिर डराया
अबकी तुमने उखाड़ फेंका घूरे पर
आओ देखकर जाओ
यहां मेरी जड़ें और फैल गईं हैं।
(5) विशिष्टों का दु:ख
खुश्क हंसी लीपे पोते
अपनी-अपनी विशिष्टताओं में जीते
लोगों के कहकहे भी होते हैं विशिष्ट
कृत्रिमता की खोल में
जबड़ों और माथे पर कसमसाता तनाव
उन्हें करता है अन्य से दूर
कभी नहीं पता चल पाता
मिल जुलकर अचार मुरब्बों के खाने का स्वाद
कोई नहीं करता उन्हें नम आंखों से विदा
या कलेजे से सटाकर गरम आत्मीयता
विशेष को कभी नहीं मिलता
शेष होने का सुख
(6) भरोसा…उधार
उसने मांगा मुझसे उधार….भरोसा
लगा, लौटाएगा या नहीं
अपने सम्बन्धियों से मैंने मांगा…विश्वास
बदले में मिलता रहा बहाना
अब कुछ-कुछ समझने लगी हूं
किससे कितना और
क्या-क्या है छुपाना।
(7) खानाबदोश औरतें
सावधान ….
इक्कीसवीं सदी की खानाबदोश औरतें
तलाश रहीं हैं घर
सुना है वो अब किसी की नहीं सुनतीं
चीख चीख कर दर्ज करा रही हैं सारे प्रतिरोध
जिनका पहला प्रेम ही बना आखिरी दुःख
उन्नींदी अलमस्ती और
सुना है वो अब किसी की नहीं सुनतीं
चीख चीख कर दर्ज करा रही हैं सारे प्रतिरोध
जिनका पहला प्रेम ही बना आखिरी दुःख
उन्नींदी अलमस्ती और
बहुत सारी नींद की गोलियों के बीच
तलाश विहीन वे साथी जो दोस्त बन सकें
आज नहीं करतीं वे घर के स्वामी का इंतज़ार
सहना चुपचाप रहना कल की बात होगी
जाग गयी हैं खानाबदोश औरतें
अब वे किस्मत को दोष नहीं देतीं
बेटियां जनमते जनमते कठुवा गयी हैं
आज नहीं करतीं वे घर के स्वामी का इंतज़ार
सहना चुपचाप रहना कल की बात होगी
जाग गयी हैं खानाबदोश औरतें
अब वे किस्मत को दोष नहीं देतीं
बेटियां जनमते जनमते कठुवा गयी हैं


