फौज़िया रेयाज़ की कहानी ‘ख़ुशी की तलाश’

सच बताऊँ तो समकालीन मध्यवर्गीय जीवन की जद्दोजहद हिंदी के लेखक कहाने वाले लेखकों में अब कम दिखाई देती है. सब एक तरह के फॉर्मुले में फँस जाते हैं, अपने ही बनाए दायरे में. फौज़िया रेयाज़ की यह कहानी पढ़ते हुए यह विचार आये. पेशे से रेडियो जौकी हैं, कॉपी राइटर हैं. और देखिये कितनी सहजता से कितनी जटिल कहानी का ताना-बाना बुन लेती हैं- मॉडरेटर.
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दूर से सुनाई देती ट्रेन की छुक-छुक पास आते-आते तेज़ हॉर्न में तब्दील हो रही थी. रात के करीब दो बज रहे थे और आंखों से नींद नदारत थी. फ़र्स्ट-क्लास के उस डिब्बे में गिने चुने लोग ही थे. सफ़र शुरू हुए क़रीब 8 घंटे हो चुके थे, लेकिन ना तो इस तरफ़ कोई चायवाला आया था, ना ही किसी ने ब्रेड-कटलेट की आवाज़ लगाई थी. टीटी के आने पर ख़ुशी ने पूछा था “पैन्ट्री वाले खाने का ऑर्डर लेने कब आएंगे” इस पर टीटी ने ख़ुशी के उस ख्वाब को तोड़ दिया जिसमें वो ट्रेन में मिलने वाली अंडा बिरयानी का लुत्फ़ उठा रही थी “मैडम इस ट्रेन में पैंट्री नहीं है”.

तो अब वो अमरीकी कंपनियों को दुआएं देती हुई साथ लाए ‘पोटैटो चिप्स’ के पकैट खाली कर रही थी. कंपार्ट्मेंट की लाइटें बन्द थीं और वो ट्रेन के इस सफ़र के खत्म होने का इंतज़ार कर रही थी. ऐसा नहीं था कि उसे नए शहर पहुंचने की जल्दी थी. बस उसे ट्रेन के सफ़र रास नहीं आते थे. वो अक्सर सुनती की ट्रेन की छुक-छुक की आवाज़ बीते दिनों में ले जाती है, किसी खास तरह का नॉस्टैल्जिया  पैदा करती है लेकिन ख़ुशी को ट्रेन की आवाज़ से डर लगता. जब भी कोई ट्रेन बगल वाली पटरी से गुज़रती उसके पूरे जिस्म में झुरझुरी दौड़ जाती.

बचपन में भी जब कभी ट्रेन का सफ़र तय करके ननिहाल जाना होता, उसे ट्रेन की आवाज़ डराती. रात में जब सब सो जाते और कोई ट्रेन साथ वाली पटरी से या पुल के ऊपर से गुज़रती ख़ुशी कानों पर हाथ रख लेती और आंखें बन्द कर लेती.

 

अब वो बच्ची नहीं थी, अब उसके डर बेवजह नहीं होने चाहिए, हर बात का एक आधार होना चाहिए, ख़ुशी ने खुद को समझाया और अपने इस डर की वजह को फोन के इन्टरनेट पर उसी वक्त सर्च किया “साइड…साइडोरि…साइड्रोमोफ़ोबिया”  “ओह्ह..मुझे इतनी बड़ी बीमारी है” ख़ुशी अपने इतने लम्बे नाम वाले फ़ोबिया पर मुस्कुरा रही थी.

 

तभी फोन पर टीं-टीं की आवाज़ करते हुए एक साथ दो नए नोटीफ़िकेशन आ धमके. “ह्म्म्म… हमारे घर में एक पेइंग गेस्ट के लिए जगह खाली है, किराया बारह हज़ार, ओन्ली फ़ॉर स्टुडेंट्स… ह्म्म्म…हमारा वन बी.एच.के सी-फ़ेसिंग है, किराया तीस हज़ार, डिपॉज़िट दो लाख, ओन्ली फ़ॉर फ़ैमिली…”

“ओफ़्फ़ो…एक तो इतना महंगा है और ऊपर से कंडीशंस अप्लाई.

 

“शुक्र है, मुझे पहुंचने से पहले ही घर मिल गया…सब कुछ इस टेक्नालाजी की बदोलत, वरना वहां पहुंचने के बाद दो-तीन दिन के अन्दर घर ढूंढना तो नामुमकिन सी बात है” ख़ुशी ने मन ही मन सोचा और चैन की सांस ली.

 

ख़ुशी मिर्ज़ा ने एम.बी.ए किया था और कैम्पस सिलेक्शन में उसे नौकरी मिल गई थी. इस नौकरी के लिए उसे नए शहर जाना था. जहां एक तरफ़ नौकरी मिलने पर प्रोफ़ेसर ने उसकी पीठ थपथपाई थी, वहीं दादी ने अपना सिर पीट लिया था. “बच्ची अकेले कैसे जाएगी…यहीं कुछ काम ढूंढ ले…अभी तो पढ़ाई पूरी हुई है, इतनी जल्दी किसी को नौकरी मिलती है भला….कहीं कम्पनी जाली तो नहीं…बॉस की उम्र क्या है…”

 

ख़ुशी दादी की उलझन और फ़िक्र समझती है लेकिन उसकी वजह से अपने कदमों को पीछे नहीं खींच सकती. सो, सारा सामान बांधा, सूईं-धागे से लेकर गोंद की शीशी…सिर के तेल से लेकर…मुल्तानी मिट्टी…फ़र्स्ट ईयर के नोट्स से लेकर लास्ट ईयर की किताबें…सब कुछ…और निकल पड़ी उस रास्ते पर जिस पर उससे पहले घर की कोई लड़की नहीं चली.

 

***

 

स्टेशन आया तो ख़ुशी अपने लाव-लश्कर के साथ प्लैटफ़ॉम पर उतर गई. उसके पास एक बड़ा सा सूटकेस था जिसपर प्लास्टिक का कवर चढ़ा हुआ था और कंधे पर एक लैपटॉप बैग भी लदा हुआ था. अब वो पिछले आधे घंटे से एक कुर्सी पर बैठी हुई थी और डॉली नाम की उस औरत को फोन मिला रही थी जिसके यहां उसे ठहरना था.

 

डॉली से उसकी बात दस दिन पहले से ही चल रही थी. किराए से लेकर डिपॉज़िट तक की सब बातें फोन पर ही तय हो चुकी थीं, ख़ुशी बता चुकी थी कि वो किस तारीख को, कितने बजे उसके यहां पहुंचेगी. लेकिन अब डॉली मैडम शायद मोबाइल कहीं रख कर भूल गयी हैं.

 

ख़ुशी ने फोन मिलाते-मिलाते साथ रखे बैग पर हाथ टिकाया तो उस पर चढ़ी प्लास्टिक की वजह से कोनी फ़िसल गई. इस बैग के लिए उसने पापा को कितनी मुश्किल से मनाया था. दो दिन पहले जब वो पैकिंग कर रही थी तो पता चला कि उसके बैग की ज़िप खराब हो चुकी है. ऐसे में याद आया कि पापा ने पिछले दिनों ही एक नया बैग खरीदा है और उसे पैक करके स्टोर में रखा हुआ है. वो इतना बड़ा भी है कि उसमें सारा सामान आ जाए. “मम्मी वो बैग मैं ले जाऊं?” ख़ुशी ने मां से पूछा तो उन्होंने पापा की तरफ़ इशारा कर दिया था, जिसका मतलब साफ़ था “बिटिया पापा की संपत्ती के बारे में उन्हीं से पूछो” इस पर ख़ुशी हिम्मत करते हुए पापा के पास धीरे-धीरे चलती हुई गई.

 

पापा सोफ़े पर बैठे थे, उनके ठीक सामने टेबल पर टीवी का रिमोट खुला हुआ रखा था. उसके अन्दर की हरी चिपें नज़र आ रही थीं. दो दिन से जिस रिमोट को ख़ुशी और उसका भाई पीट-पीट कर चला रहे थे, आज पापा ने ऑप्रेशन करके उसे ठीक करने की ठान ली थी.

 

“पापा…वो ब्राउन वाला बैग मैं अपने साथ ले जाऊं?”

“कौन सा बैग?” पापा ने सिर ऊपर करके ऐसे पूछा था जैसे कह रहे हों, दिख नहीं रहा मैं कितना ज़रूरी काम कर रहा हूं

“वो जो स्टोर में रखा है…जिसपर प्लास्टिक चढ़ी है” ख़ुशी ने हिम्मत नहीं हारी

“बैठो…” पापा ने इतना कहा और अपने काम में दोबारा लग गए

 

पापा टेबल पर रखे एक-एक स्क्रू को बड़े ध्यान से उठा रहे थे और रिमोट में फ़िट कर रहे थे. “हम चीज़ों को तोड़ते रहते हैं और पापा उन्हें ठीक करने में लगे रहते हैं” ख़ुशी ने सोचा

 

“ह्म्म…वो बैग तो तुम्हें नहीं मिल पाएगा” पापा ने रिमोट ठीक कर दिया था और अब वो बिना पिटे भी आराम से चैनल बदल रहा था

 

“पापा… मेरे बैग की ज़िप खराब हो गई है…ब्राउन बैग काफ़ी बड़ा भी है उसमें सारा सामान आ जाएगा…प्लीज़” ख़ुशी ने मिन्नत करती आवाज़ में कहा

 

“वो तुम्हारे लिए ही रखा है…पर अभी के लिए नहीं…तुम्हारी शादी में देंगे…बाद में तुम्हें ही इस्तेमाल करना है…सब्र कर लो” पापा ने टीवी बन्द किया और अब सेट-टॉप बॉक्स के पीछे लगी तारों को ठीक करने लगे.

 

शादी की बात सुन कर ख़ुशी ने अपनी उंगलियां मोड़ीं और फिर कहना शुरू किया “पापा…जब मेरे लिए ही है तो अभी ही दे दीजिए, मुझे अभी ज़रूरत है. शादी में बैग तो आप तब देंगे ना जब मैं साथ में बहुत सारा सामान लेकर जाऊंगी?? मुझे शादी में अपने साथ महंगी चूड़ियां या भारी लहंगे नहीं ले जाने.”

 

पापा उसकी बात सुन कर वापस सोफ़े पर आकर बैठ गए और धीरे से मुस्कुराए “ले जाओ बैग…मगर प्लास्टिक मत उतारना, बैग को कोई खरोंच नहीं लगनी चाहिए”

 

“थेंक यू पापा” ख़ुशी के चेहरे पर ख़ुशी बिखर गई थी.

 

फोन की मैसेज बीप ने उसे वापस स्टेशन के प्लैटफ़ॉर्म पर पहुंचाया. मैसेज खोला तो लिखा था

“माफ़ करना ख़ुशी, वो फ़्लैट मेरे हस्बेंड ने किसी और को किराए पर दे दिया…डॉली”

“क्या???” ख़ुशी लगभग चिल्लाते हुए खड़ी हो गई

“ओह्ह…अब क्या करूं?? ख़ुशी के माथे पर पसीने की बूंदे चमक उठीं.

 

रात के करीब दस बज रहे थे और वो एक अजनबी शहर के अजनबी से प्लैटफ़ॉर्म पर अपने बड़े ब्राउन बैग के साथ खड़ी थी. टेक्नोलाजी  ने तो उसे घर दिला दिया था, लेकिन इंसानियत ने रंग दिखाया और आखिरी मोड़ पर हैंग हो गई.

 

***

 

बारिश तेज़ हो गई थी, रेलवे स्टेशन पर मौजूद लोग या तो किसी छज्जे के नीचे खड़े थे या छतरी लेकर इधर से उधर भाग रहे थे. यहां तक कि कई लोगों ने रात के इस वक्त रेनकोट पहना हुआ था. जैसे उन्हें पता हो कि बारिश का कोई भरोसा नहीं, घर से पूरी तैयारी के साथ निकलो.

वैसे ख़ुशी भी पूरी तैयारी के साथ ही निकली थी, अब उसे क्या पता था कि आखरी वक्त पर डॉली नामी उसकी छतरी हवा के झोंके से उड़ कर दूर…बहुत दूर चली जाएगी.

 

रात गहरी होती जा रही थी और बारिश तेज़. ख़ुशी ने अपना सामान उठाया और स्टेशन से बाहर निकल आई “भैया आसपास के किसी होटल में ले चलो” उसने एक ऑटोवाले के पास जाकर कहा.

 

कुछ ही देर में वो एक होटल के रिसेप्शन पर खड़ी थी. रूम की चाबी उसके हाथ में थी लेकिन आगे बढ़ते हुए उसके पैर कांप रहे थे. ख़ुशी की आंखों के सामने फ़िल्म ‘जब वी मेट’ का होटल डीसेंट घूम रहा था. मैनेजर शायद उसकी घबराहट हो भांप गया था इसीलिए बताने लगा “मैडम आपके सामने वाले रूम में फ़ैमिली रुकी है, यहां नीचे वाले फ़्लोर पर एक बिज़नस मीटिंग हो रही है, यहां पीछे एक स्कूल है, मेरी बेटी उसी में पढ़ती है”

 

ख़ुशी अपने कमरे में पहुंची तो सबसे पहले दीवारों का ठीक से जायज़ा लिया. उसने अखबारों में पढ़ा था कि कई ऐसे होटल होते हैं जिनके कमरों में खुफ़िया कैमरे लगे होते हैं. यूट्यूब के किसी वीडियो में  अपने नाम के साथ एम.एम.एस शब्द के जुड़े होने की कल्पना ने उसके जिस्म में झुरझुरी दौड़ा दी थी.

 

“या रब इस बार बचा ले, नेक्स्ट-टाइम इस तरह घर से…(वो कहते-कहते रुकी) नहीं नेक्स्ट-टाइम भी घर से तो मैं निकलूंगी ही….लेकिन तू बस बचा ले”

 

वैसे तो होटल ठीक-ठाक ही था और क्यूंकि महंगा भी था तो भरोसे की उम्मीद जगने लगी थी. एक टिपिकल कन्ज़्यूमर की तरह ‘मंहगा है तो बेहतर है’ की तर्ज पर उसने खुद को तसल्ली देनी चाही.

 

डिनर का ऑर्डर देने के बाद वो एक नए सिरे से घर की तलाश में लग गई थी. इन्टरनेट पर मौजूद सभी रीयल एस्टेट की वेबसाइटों को खंगाल डाला. सोने से पहले ख़ुशी के पास कल देखने के लिए करीब बारह प्रोपर्टीज़ इकट्ठी हो गई थीं.

 

दो दिन का सफ़र तय करने के बाद बिस्तर पर ये ख़ुशी की पहली नींद थी. सोने से पहले उसने सोचा था कि आज रात ख्वाब में सिर्फ़ घर और बंगले ही नज़र आने वाले हैं लेकिन थकान ख्वाबों पर भारी थी. एक बार जो आंखें बन्द कीं तो बिना किसी रुकावट या खेद के सुबह ही खुलीं.

 

आज का दिन ख़ुशी के लिए बहुत एहमियत रखता था, अजनबी शहर की पहली सुबह…  अजनबी लोगों के बीच आशियाने की तलाश.

 

***

 

“मैडम, बहुत बढ़िया घर है!! आपके लिए बिल्कुल परफ़ेक्ट…देखिए यहां से एकदम मस्त हवा आती है, और टाइम का भी कोई लोचा नहीं है…जब मर्ज़ी आओ, जब मर्ज़ी जाओ” ब्रोकर ख़ुशी को घर दिखा रहा था. एक बेहद छोटा सा कमरा. जिसमें सिर्फ़ कहने के लिए खिड़की थी, खिड़की के ठीक सामने ही एक दूसरी बिल्डिंग खड़ी थी…

 

“इससे हवा आ जाए वही बड़ी बात है, मस्त हवा तो भूल ही जाओ” ख़ुशी ने मन ही मन सोचा

“कोई दूसरा फ़्लैट है?” उसने ब्रोकर से पूछा

“हां..है ना…बहुत हैं”

 

कुछ ही देर में वो एक दूसरे फ़्लैट में खड़े थे. उसके बाद तीसरे, फिर चौथे…एक-एक करके उसने 6 फ़्लैट दिखा डाले और ख़ुशी एक के लिए भी हां नहीं कर सकी. किसी का कमरा बेहद छोटा था, तो किसी में सिर्फ़ आधे घंटे ही पानी आता था, किसी की दीवारों में ज़बर्दस्त सीलन थी, तो किसी की कॉलोनी ऐसी की अकेली लड़की का रहना दूभर हो जाए. मगर ब्रोकर साहब की नज़र में हरेक flat ऐसा था कि ताजमहल भी शर्मा जाए.

 

पर मरती क्या ना करती…घर तो चाहिए ही था, पहले ही हर दिन होटल के कमरे पर दो हज़ार रुपए खर्च हो रहे थे. यही हाल रहा तो उसकी एम.बी.ए की पढ़ाई में जितने पैसे खर्च नहीं हुए उससे ज़्यादा तो होटल के किराए में लग जाएंगे.

 

कई रियल एस्टेट के ऑफ़िसों से गुज़रने के बाद आखिरकार एक ब्रोकर आंटी की मदद से फ़्लैट फ़ाइनल कर ही लिया.  

 

अगले दिन ख़ुशी अपने वोटर आईडी की ज़ेरॉक्स-कॉपी के साथ ब्रोकर आंटी के ऑफ़िस नुमा ड्राइंगरूम में खड़ी थी. आंटी अग्रीमेंट के पेपर तैयार करवा रही थीं और ख़ुशी उस कमरे में मौजूद आशियाने की तलाश वाले दूसरे पंछियों को देख रही थी. उसी की तरह एक लड़की थी जो काफ़ी देर से आंटी के असिस्टेंट नुमा बेटे से किसी बात पर बहस कर रही थी. एकदम से लड़की की आवाज़ तेज़ हो गई.

 

“तो क्या एक लड़की अकेले रहकर काम नहीं कर सकती? मैं नौकरी कर रही हूं, मेहनत करती हूं तब पैसे आते हैं. आपके बेटे घर से निकलें तो तरक्की कर रहे हैं और कोई लड़की घर से निकले तो अय्याशी कर रही है???” हर एक शब्द के साथ उसकी आवाज़ तेज़ होती जा रही थी.

 

“पूनम जी आप शांत हो जाईए, मैं आपको दूसरा घर दिखा देता हूं, उस सोसाइटी को जाने दीजिए” असिस्टेंट नुमा बेटे ने समझाने की कोशिश की.

 

“अरे, आपको पता भी है उन्होंने मुझसे क्या-क्या पूछा, सोसाइटी मीटिंग के नाम पर पूरी मंडली लगाकर बैठे थे और एक-एक करके वाहियात सवाल कर रहे थे…रात को लड़के लोग तो नहीं आएंगे? तुम घर कितने बजे आओगी? कपड़े कैसे पहनोगी? दुपट्टा ठीक से ओढ़कर घर से निकलना…मैं कहती हूं जब मैं पूरा किराया देने को तैयार हूं, आपको एक लाख डिपोज़िटभी दे रही हूं. तो मुझे किराए पर घर देकर एहसान तो किया नहीं जा रहा…”

 

“अरे तुम परेशान मत हो, तुम्हारी सोसाइटी में सिंगल वर्किंग वूमेन अलाउड हैं, तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा” आंटी ने सामने वाली कुर्सी पर बैठते हुए ख़ुशी को धीरे से कहा.

उसने गर्दन हिलाई और अपने कागज़ आगे बढ़ाए. वो एग्रीमेंट पर उसका ऑफ़िस एड्रेस लिखने लगीं.

 

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