ऐसे समय में शहीद चंद्रशेखर की याद आती है

आज चंद्रशेखर जी की जयंती है. आज के माहौल में जब अभिव्यक्ति की आजादी के ऊपर खतरा मंडरा रहा है, भय का माहौल बनाया जा रहा है चंद्रशेखर जी की याद आती है. उस चंद्रशेखर की जिसने कैरियर और संघर्ष में संघर्ष का रास्ता चुना, जिसने सुविधा और साहस में साहस का विकल्प चुना. आज उनकी याद करने और संकल्प के साथ खड़े होने का वक्त है. निवेदिता जी ने उनको याद करते हुए यह अविस्मरणीय लेख लिखा है. उस महान व्यक्तित्व को याद करते हुए. 
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पटना। गरमी के मौसम के आखिरी दिनों में और पतझड़ के सारे मौसम में गंगा भरी-भरी ही रहती। क्लास के बाद घड़ी- दो घड़ी सांस लेने हमलोग उसके किनारे बैठ जाते थे। गंगा की कल-कल सुनते हुए आंखें बंद किए पड़े रहते। दरख्तों से घिरा पटना काॅलेज के पीछे का वह हिस्सा हमलोगों का आरामगाह था। चमकीली घूप में भी गंगा को छूकर गुजरने वाली हवा गीली-गीली होती थी। शाम को हवा में खुनकी होती और आकाश खुला होता। जाड़ों में पेड़ों के उपर सफेद घुंध के फाहे तिरते रहते। मेरी आखिरी बस पांच बजे होती। इसलिए चार बजे तक का समय हमारे पास होता। उन दिनों पटना विश्वविद्यालय के पास कई बसें होती थीं। लड़कियों की बस कभी देर नहीं होती न कभी नागा होता। इसकी वजह थी हर लड़की कंडक्टर को चार आने देती थी। हम काफी सस्ते में काॅलेज पहुंच जाते। आज इतने सालों बाद भी पटना काॅलेज वैसे ही खड़ा है। बांहें पसारे पुराने यार की तरह, जिसके चेहरे पर झुर्रियां पड़ी हैं। जैसे उम्र गुजरते हुए प्यार का निशान छोड़ देती है। मेरा मन कर रहा है कि मैं अपने गुजरे जमाने को खींचकर अपने पास बुला लूं। पूछूं कि क्या तुम्हें वे दिन याद हैं? तुम ही तो हो हमारे अनुभवों की सारी जमापूंजी के राजदार। कितने अधूरे हैं हम तुम्हारे बगैर। वह हंसा और स्मृतियों के बंद दरवाजे से बाहर निकल आया।
1980-82 का वह दौर
सब्ज जमीन घास से इस तरह ढंक गयी है गोया यह कोई नर्म बिस्तर हो। दिन के उजाले में ओस की बूंदें जुगनू की तरह चमक रही हैं। सामने एक नौजवान आ रहा था। मैंने उसे रोका। राजनीतिशास्त्र की कक्षा? सामने है! इस गलियारे के बाद। एक पगडंडी उपर की और जाती है । फिर गलियारा, गलियारे से होते हुए राजनीतिशास्त्र की कक्षा। मुझे याद है- कक्षा में जाने के लिए लड़कियां अकसर शिक्षकों का इंतजार करती थीं। सिर्फ समाजशास्त्र के क्लास को छोड़कर। वहां मामला उलटा था। लडकियों की तादाद इतनी थी की लड़के शिक्षक का इंतजार करते थे। राजनीतिशास्त्र में हम तीन लडकियां थीं। मैं, पूनम और कविता। कविता झारखंड से आयी थी। काफी तेज तर्रार। जीन्स पहनती थी। उन दिनों लडकियों का पटना में जीन्स पहनना बड़ी बात थी। वह भी को-एड काॅलेज में। क्लास में हमारा पहला दिन था। हम आगे की बेंच पर जाकर बैठ गए। देखा लड़के मुस्कुरा रहे हैं। बोर्ड पर बड़े-बडे हर्फ में लिखा है-कविता मैं तेरे प्यार में कवि हो गया। प्यार का ये इजहार बड़ा फिल्मी था। कविता शर्म से पानी-पानी हो गयी। मैं उठी और बोर्ड पर लिखा यह जुमला मिटा दिया। लड़के ताली बजाने लगे। मैंने मोर्चा संभाला- कहा कि अगर सच में चाहते हो कि लड़कियां भी तुम लोगों से प्यार करें तो पहले दोस्त बनो। यह फिल्मी तरीका लड़कियों को रास नहीं आयेगा। मैं पांच मिनट तक बोलती रही। जब बैठी तो पूरा क्लास खामोश था। उन्हें यकीन नहीं आ रहा था कि कोई लड़की इस तरह प्रतिक्रिया दे सकती है। इसका नतीजा अच्छा रहा। उनमें से कई मेरे अच्छे दोस्त बने जो दोस्ती आज तक कायम है।
पटना काॅलेज में दाखिला लेने के पहले मेरा परिचय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े छात्र संगठन एआईएसएफ से हो चुका था। वह 80 का दौर था। सोवियत संघ के विघटन का दौर। पूरी दुनिया में मार्क्सवाद को लेकर बहस चल रही थी। ग्लासनोस्त और पेरेस्त्रोइका के फलसफे ने सोवियत संघ की समाजवादी सत्ता को गहरी चुनौती दी थी। रुस को छोड़कर सभी राज्यों ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया था। सोवियत संघ का विघटन दुनिया के इतिहास के लिए एक नयी परिघटना थी। मार्क्सवादियों के लिए नयी चुनौती। जाहिर है, इसका असर हिन्दुस्तान की कम्युनिस्ट पार्टियों पर भी पड़ा। फिर भी मार्क्सवाद नयी पीढ़ी को आकर्षित कर रहा था। पटना काॅलेज में वाम छात्र संगठनों का दबदबा था। मैं पहली बार वहीं शीरीं से मिली। आमतौर पर आनर्स का क्लास आठ बजे से होता था। पर आज क्लास सस्पेंड हो गया। हमलोग गर्ल्स कामन रुम में मस्ती कर रहे थे। अचानक एक पतली-दुबली सांवली लड़की मेरे पास आयी। उसने पूछा तुम निवेदिता हो। मैंने सहमति में सर हिलाया। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा मैं शीरीं। काॅलेज में तुम्हारा स्वागत है! अच्छा लगा मुझे। उसने कहा क्लास के बाद हम तुम्हें लेने आयेंगे। कुछ नए साथियों से तुम्हारा परिचय होगा। क्लास के बाद शीरीं मुझे काॅलेज के सामने एक किताब की दुकान पर ले गयी। पीपुल्स बुक हाउस। आज वहां वाणी प्रकाशन है। किताबों से भरी उस दुकान के भीतर एक और कमरा था। जहां एक छोटी-सी मेज और कुछ कुर्सियां लगी थीं। वहीं मैं अपूर्व समेत कई साथियों से मिली। लंबा कद, गोरा रंग, बड़ी-बड़ी आंखें। शीरीं ने परिचय कराया ये अपूर्व हैं। उन दिनों पीपुल्स बुक हाउस वामपंथी छात्र संगठनों का अड्डा हुआ करता था। क्लास खत्म होते ही हम वहीं पहुँच जाते थे। अगर कोई उस दौर का इतिहास लिखे तो पीपुल्स बुक हाउस कई आंदोलनों और प्रेम संबंघों के बनने-बिगड़ने के इतिहास का साक्षी होगा।
दुनिया में समाजवाद को लेकर जो बहस हो रही थी उसका असर हमारे छात्र संगठनों पर भी था। हमसब के मन में भी ढेर सारे सवाल उठ रहे थे। सोवियत संघ के बारे में कई बातें छन कर बाहर आ रही थीं। कुछ लोगों को इस बात की ख़ुशी थी कि दुनिया के नक्शे से समाजवाद धराशायी हो जायेगा। खूब गर्मागर्म बहस होती। पार्टी के भीतर ऐसे कम लोग थे जो हमारे मन में उठ रहे सवालों का जबाव दे पाते। हमारी सबसे बड़ी चिंता होती कि कैसे छात्रों को आंदोलन से जोड़ा जाय। ऐसे सवालों का किस तरह सामना किया जाय?एक दिन तय हुआ कि हमलोग वालपेपर निकालें। वाल पेपर के लिए निश्चित जगह तय की गयी। यह समझ बनी कि हम समाजवाद से जुड़े सवालों के साथ साथ छात्रों की समस्याओं पर भी खबर देंगे। कालेज की दीवार का एक कोना चुना गया। जिनके अक्षर सुन्दर थे उन्हें लिखने का जिम्मा दिया गया। यह प्रयोग सफल रहा। अब हर रोज छात्रों की दिलचस्पी रहती कि आज क्या नयी बहस है।
आंदोलन के दौरान मेरी और शीरीं की दोस्ती का रंग गहरा होता गया। उससे खूब बातें होती थीं। हम दिन भर साथ-साथ होते। वहीं पास में इप्टा इंडियन पीपुल्स थियेटर से जुड़े कलाकारों का रिहर्सल होता था। कब हम एआईएसएफ में होते कब इप्टा में, पता ही नहीं चलता। हमारे पांवों में तो घिरनी लगी थी। दोस्तों की कतार लंबी होती जा रही थी। विनोद, श्रीकांत, फौजी, रष्मि, दिलीप और शैलेन्द्र । शैलेन्द्र झारखंड से थे। हमेशा हमारी चौकड़ी में शामिल रहते। गहरा सांवला रंग और बड़ी बड़ी आंखें। फैज अहमद फैज उसकी जुबान पर रहते। लंबी से लंबी नज्म उसे याद रहती थी। आज भी उसका तेवर बदला नहीं है। अक्सर हम जब पस्त होते तो उससे कहते कुछ फैज को सुनाओ-वह शुरु हो जाता। उसकी आवाज में आज भी हमलोग फैज को सुनना पसंद करते हैं।
निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन के जहां
चली है रस्म के न कोई सर उठा के चले
जो कोई चाहने वाला तवाफ को निकले
नजर चुरा के चले जिस्म-ओ-जां बचा के चले
गर आज तुझ से जुदा हैं तो कल बहम होंगे
ये रात भर की जुदाई तो कोई बात नहीं
गर आज औज पे हैं ताला-ए रकीब तो क्या
ये चार दिन की खुदाई तो कोई बात नहीं।
आज अगर मुझसे कोई पूछे कि मेरी जिन्दगी का सबसे सुन्दर लम्हा कौन सा था, तो मैं कहूंगी वे दिन जब हम जिन्दगी के मायने सीख रहे थे, जब दुनिया को बदलने का सपना देख रहे थे। जब हमें यकीन था कि हम कामयाब होंगे। आज इतने वर्षों बाद जब मैं पीछे मुड़ कर देखती हूं तो लगता है कि कम्युनिस्ट आंदोलन ने और कुछ दिया हो या न दिया हो, पर जीवनदृष्टि तो दी ही। मानवता के पक्ष में खड़े रहने का साहस तो दिया!
मेरे लिए वह पूरा दौर एक फोटो एलबम की तरह है जहां स्मृतियां बंद हैं। आप जब चाहें उन स्मृतियों की खुशबू में भींग सकते हैं। स्मृतियों के पलकों पर समय की रंग-बिरंगी बुंदकियाँ नाचती हैं, फिर वे धीरे-धीरे हवा की तरह गुजर जाती हैं। जो हमेशा आपका साथ देते हैं वे हैं दोस्त। मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी मेरे दोस्त ही हैं। किसी दोस्त का जीवन से जाना कितना दुख देता है इसे वे ही समझ सकते हैं जिन्होंने दोस्त खोया है। हम सब ने चन्द्रशेखर को खोया। क्या पता था कि वह हमारी अंतिम मुलाकात थी। हर बार हम मिलते और जुदा होते। जुदाई के दिन बीच में झर जाते थे। आज भी लगता है वह कहीं से आ जायेगा और पूछेगा कि क्या घर में कुछ खाने को है? मैं नाराज होती तो कहता अरे तुम बैठो मैं बना लेता हूं । बनाता कभी नहीं। सभी दोस्त उसे या तो फौजी बुलाते थे या चंदू। अक्सर मैं उसे चिढ़ाया करती थी नागार्जुन की कविता पढ़कर। चंदू मैंने एक सपना देखा। वह मुस्कुराता रहता। उसकी हंसी बहुत खूबसूरत थी। बच्चों सी निश्छल। चन्द्रशेखर अन्तर्मुखी था। अपने बारे में बहुत कम बातें करता था। एनडीए छोड़ने के बाद पटना आ गया था। हम लोग उसके दाखिले की कोशिश कर रहे थे। सेशन षुरु हो गया था इसलिए उसका दाखिला होना मुश्किल लग रहा था। चन्द्रशेखर के पिता नहीं थे। मां उसके जीवन का केन्द्र थी। अक्सर खतों में वह मां को ढेर- सारी बातें लिखता जिसमें उसके निजी जीवन की बातें कम होतीं, देश-दुनिया को बदलने की बातें ज्यादा। उसकी छटपटाहट खतों में दिखती। वह लिखता-इस सड़ी-गली व्यवस्था से मैं कभी समझौता नहीं कर सकता। चन्द्रशेखर ने भारतीय कन्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ले ली और छात्रों के मोर्चे पर जमकर काम करने लगा। सांस्कृतिक गतिविधियों में उसकी गहरी दिलचस्पी थी। उनदिनों सबसे ज्यादा अड्डा विनोद के यहां लगता था। विनोद बीमार थे। बीमार को देखने के बहाने हम वहीं जमे रहते। कविताओं का पाठ होता। कहानियां पढ़ी जातीं। चन्द्रशेखर के पसंदीदा शायरों में से थे पाब्लो नेरुदा और पाष। विनोद के घर के अलावा शीरीं और मेरे घर पर लड़कों का खूब अड्डा लगता। मेरा घर अड्डे के लिए सबसे मुफीद जगह था। मेरे पिता कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े थे। उन्होंने हमें ऐसा वातावरण दिया था कि हम खुल कर बातें करते। बातों में अक्सर मां, पापा भी शामिल रहते। ऐसा माहौल कम ही घरों में मिलता है जहां लड़के और लड़कियां खुलकर बातें कर सकें। हम चार बहनें और दो भाई हैं। मैं सबसे बड़ी। मेरी तीनों बहनें कथक सीखा करती थीं। छोटा भाई आशीष तबला बजाया करता था। हमारी शाम संगीतमय हुआ करती थी। बहनें कथक करतीं। संदीप तबला बजाता। संदीप उन दिनों इप्टा की गायन टीम में हुआ करता था। खूब अच्छा तबला बजाता। तबले पर उसकी उंगलियां थिरकतीं तो झूमने का मन करता। दिलीप इप्टा का मुख्य गायक था। उसकी आवाज में बड़ी मिठास थी। वर्षों से उसकी आवाज नहीं सुनी है। नहीं जानती अब भी उसकी आवाज में वही कशिश है या नहीं। यह वह दौर था जब इप्टा में लड़कियों की अच्छी तादाद थी। रष्मि, शंपा, कविता, सोना, मोना, रुपा, शुभा, माया समेत कई लड़कियों की उपस्थिति ने इप्टा को सांगठनिक मजबूती दी थी। रश्मि अच्छी अभिनेत्री थी। अलका की आवाज में खूब खनक थी। अगर उसने संगीत को समय दिया होता तो शायद उसकी गायकी पर दुनिया को नाज होता। इप्टा से जुड़ने के बाद मैंने अपनी तीनों बहनों को जोड़ा। शंपा और कविता समेत कई लड़कियों को हम संगठन से इसलिए जोड़ पाए कि इप्टा और एआईएसएफ ने विश्वविद्यालय में अपनी गहरी पहचान बनायी थी। आज रंगमंच में अच्छी अभिनेत्रियों की कमी खटकती है। इसकी बड़ी वजह है कि महिलाओं को जोड़ने की कभी सार्थक पहल नहीं की गयी, न ही वैसे नाटक किए जा रहे हैं जिनमें अभिनेत्रियों को जगह मिले।
चन्द्रशेखर उन दिनों अक्सर हमारे घर आया करता था। जब सब दोस्त साथ होते तो कई मसलों पर जमकर बहस होती। धर्म, जाति, प्रेम जैसे तमाम मुद़्दे हमारी बहस के केन्द्र में होते। हम लोग उन दिनों गर्दनीबाग में रहते थे। घर से लगा बड़ा सा टेरेस था। अक्सर गर्मियों में हम सब की शाम छत पर गुजरती। सामने खुला मैदान था। शाम हो गयी थी और मेरे सारे दोस्त जमे हुए थे। उन दिनों घर पर नानाजी आए हुए थे। हमलोग गप्प में मशगूल थे। मौसम खुशनुमा था। दरख्तों पर परिंदें रात का बसेरा लेने के पहले जोर-जोर से चहचहा रहे थे। हवा पेड़ों के झुरमुट में सांय-सांय कर रही थी। हम लोग मौसम का मजा ले रहे थे कि नानाजी ने पूछा कि तुम्हारे दोस्त कभी घर नहीं जाते? फिर उन्होंने सबसे कहा कि तुमलोग विद्यार्थी हो, पढ़ने के समय में पढ़ा करो। उस दिन उन्होंने सबका जमकर क्लास लिया। हम रुआंसे हो रहे थे। पता नहीं उन लोगों को कितना बुरा लगा होगा। हमें लगा नानाजी के रहते ये लोग नहीं आयेंगे। पर मजा तब आया जब सब दोस्त फिर आए और नानाजी से दोस्ती कर ली। चन्द्रशेखर की नानाजी से सबसे ज्यादा पटती थी। वह उनकी बातें खूब गौर से सुना करता था। एक दिन उन्होंने उससे पूछा तुम कम्युनिस्ट हो? तुम लोग तो धर्म मानते नहीं! कभी रामायण पढ़ी है? उसने कहा पढ़ी है नानाजी। नाना ने पूछा-रामायण अच्छी लगती है? जी! कौन सा प्रंसग सबसे ज्यादा अच्छा लगता है? सीता-हरण! नानाजी चौंक गए। क्यों? वह हंसा! तुलसी रामायण में उसका बहुत सुन्दर वर्णन है। सुनाउं- राम ने जंगल से गुजरते हुए लक्षमण से कहा-जंगल कितना खूबसूरत है। कौन इसकी खूबसूरती पर फिदा नहीं होगा! जब हिरण हमारी आहट पर भाग खड़े होते हैं तो उनकी हिरनियां उनसे कहती हैं, डरो नहीं… तुम तो जन्म-जन्म के हिरण हो, लेकिन ये दोनों तो एक सुनहरे हिरण की तलाश में आए हैं…भैया देखो, बसंत रुत कितनी खूबसूरत है! कामदेव सीता के खो जाने की वजह से मुझे उदास देखकर जंगल और शहद

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