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ऐसे दिक-काल में

हाल में ही युवा लेखक-पत्रकार अनिल यादव का यात्रा-वृत्तान्त आया है ‘यह भी कोई देश है महाराज’. उत्तर-पूर्व भारत के अनदेखे-अनजाने इलाकों को लेकर लिखे गये इस यात्रा-वृत्त में वहां का समाज, वहां की संस्कृति अपनी पूरी जीवन्तता के साथ मौजूद है. यहां पुस्तक का एक अंश जो  अरुणाचल प्रदेश के तवांग के रास्ते का है- जानकी पुल.
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जिरो घाटी में जिस साल कुरू हसांग का जन्म हुआ, तब तक अपातानी आदिवासी पहिए जैसी किसी चीज के बारे में नहीं जानते थे। हालांकि वे अरूणाचल के आदिवासियों में स्थायी खेती और सिंचाई प्रणाली विकसित करने के चलते सबसे आधुनिक माने जाते हैं। अब भी नब्बे प्रतिशत से अधिक जमींनों पर जंगल जलाकर झूम खेती ही की जा रही है। 1963 में उसका भुवनेश्वर के सैनिक स्कूल में दाखिला हुआ तो पिता ने पारंपरिक रीति से डिम्ब (अंडे) की बलि देकर गांव की सीमा से अनंत, अज्ञात दुनिया में विदा किया था। पांच साल के भीतर एयर फोर्स में कमीशन पाकर वह पायलट हुआ और लड़ाकू विमान मिग उड़ाने लगा। अरूणाचल राज्य बनने के बाद राजनीति में किस्मत आजमाने के लिए 1978 में फ्लाइट लेफ्टिनेन्ट के ओहदे से रिटायरमेंट लेकर वह गांव लौट आया था। अधेड़ कुरू हसांग कई चुनाव हारने के बाद उस वक्त अरूणाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव थे और हपोली कस्बे में उनकी पत्नी एक मेडिकल स्टोर चलाती थीं।
नोक्टे, खाम्पटी, सिंगफो, निशि, टागिन समेत कई आदिवासी जातियों के अपने ऐसे अपवाद सरीखे नायक हैं जिन्होंने संयोगों के कारण इसी जीवन में कई जीवन देखे हैं। उन्होंने इतनी दूरी तय की है जितनी बाकी मानव सभ्यता ने कई हजार सालों में की होगी। अरूणाचल में साठ से अधिक आदिवासी जातियां हैं और करीब पचास से अधिक ज्ञात भाषाएं हैं। हर पुराने सरकारी अफसर के पास ऐसे कई किस्से होते हैं जिनकी शुरूआत इस भाव से होती है कि जब वे आए थे तो नंगेपन की सनसनी के अभ्यस्त होने के कारण आदिवासियों की ओर देखते नहीं थे और जब देखना शुरू किया तो क्या हुआ…। यहां का पुरातन लिखित इतिहास भी बस तीन सौ साल पुराना है।
खुद अरूणाचल ने भी ऐसी ही रफ्तार से लोकतंत्र में छलांग लगाई है। आजादी के पहले इस इलाके का सरकारी नाम आदिवासी इलाका था। अंग्रेजों के सर्वे टीमें यदा कदा सैन्य टुकड़ियों को साथ सड़क और रेल बनाने की संभावना जांचने जाती थीं ताकि पूर्वी देशों के साथ ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापार बढ़ाया जा सके। 1954 में सीमांत के कामेन्ग, सियांग, सुबंसरी, लोहित, तिराप और तुएनसांग डिविजनों को मिलाकर नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेन्सी (नेफा) का गठन किया गया जो लंबे समय तक विदेश मंत्रालय के अधीन रहा। 1972 के बाद तुएनसांग नागालैंड में चला गया और बाकी बचा हिस्सा अरूणाचल प्रदेश हो गया। 1962 की लड़ाई में चीन से हार के बाद केंद्र सरकार ने सड़क और संचार के नेटवर्क पर अधाधुंध पैसा झोंका है जो बोलता है। 78000 वर्ग किलोमीटर में कुल नौ लाख लोग बसते हैं लेकिन टेलीफोन के खंभे हर जंगल में हैं। रसद सामग्री के साथ नेताओं, अफसरों और सैनिकों को ले जाने के लिए सिलीगुड़ी और डिब्रूगढ़ से सेना के कई जहाज नियमित उड़ते हैं जिन पर प्रतिदिन औसत चार करोड़ रूपए का खर्च आता है। राज्य में सौ के आसपास हेलीपैड हैं। हेलीकाप्टरों के धुंध में भटक जाने के कारण हुई दुर्घटनाओं में सर्वाधिक मंत्री, मुख्यमंत्री और पायलट यहीं मारे गए हैं।
मैं हपोली जाकर कुरू हसांग और उनकी पत्नी से मिलना चाहता था। फौज से पहली छुट्टी के दौरान अपने गांव की उनकी स्मृतियों पर लंबा इंटरव्यू करना चाहता था लेकिन भटक कर तवांग पहुंच गया। उस दिन भालुकपांग में एक महायानी बौद्ध भिक्षु के भीतर बचा रह गया कवि जाग गया था। उसने बस इतना कहा थाजब तक बाकी दुनिया में पौ फटती है तवांग धूप में दो घंटे खेल चुका होता है।…मेरे पास तो बनारस के दोस्तों के दिए कुछ लामाओं के नाम भी थे जो कभी सारनाथ धर्म पढ़ने गए थे, अब अरूणाचल के मठों में रहते थे। सो एक बहुत लंबी, सर्पिल सड़क पर चल पड़ा जिस पर बादलों का नजरबंद था और बर्फ का रेगिस्तान था। आसमान में उतनी तरह के नीले रंग देख पाना फिर कभी संभव नहीं हुआ।
बोमडिला पहुंचने से पहले मुझे अंदाजा नहीं था कि टाटा सुमो पहले और दूसरे गियर में ड्राइवर की आशंकाएं किसी वफादार घोड़े की तरह समझती होगी। दुर्गम पहाड़ में ड्राइवर होने के लिए खास तरह के कान चाहिए होते हैं जो इंजन के शोर के बीच उसकी फुसफुसाहटों, कराहों और सिसकियों को सुन सकें। अलग किस्म की संवेदना की जरूरत होती है ताकि एक्सीलरेटर और ब्रेक गाड़ी से उखड़ कर शरीर में फिट हो जाएं और हर कंपन एक स्पष्ट विचार में बदल जाए। आगे-पीछे अंकित सस्ती समझी जाने वाली शायरी में अक्सर गाड़ी खुद एक प्रेमिका पात्र की तरह अकारण नहीं आती, उसकी बुनियाद में आदमी और मशीन का जीवंत संबंध और साथ जीने-मरने का वादा होता है। नेचि फू पास पर 6000 फीट की ऊंचाई से उतरते हुए कई बार मैने टाटा सुमो को कटी पतंग की तरह खाई में लहराते देखा जिसे हेलीकाप्टर समझ कर नीचे घाटी के बच्चे हाथ हिला रहे थे। हर बार ड्राइवर को गौर से देख लेता था, कहीं मेरे भीतर का डर उसे प्रभावित तो नहीं कर रहा है लेकिन वह तो गहरे ध्यान में था। ऐसे दिक, काल में जहां सवारियों का अस्तित्व समाप्त हो चुका था।
साढ़े आठ हजार फीट की ऊंचाई पर बसे बोमडिला से अनंत रूपों में तिरते बादलों का खिलवाड़ शुरू होता है। अचानक आया कुहरा दुनिया को ओझल कर देता है, जरा देर में झक्क धवल हिमालय ठीक सामने दिखने लगता है। यह पश्चिम कामेन्ग का जिला मुख्यालय है जहां मोम्पा, शेद्रुकपेन, अका, मिजी और बगुन आदिवासी हैं। कुत्ते कुख्यात हैं जो रात में शून्य से नीचे की ठंड में आदमी को फाड़कर खा भी सकते हैं। जैव विविधता ऐसी है कि यहां की एक सरपतनुमा वनस्पति का एक ट्रक गुवाहाटी पहुंचा देने पर एक नए ट्रक की चेसिस मिल जाती है। यह टैक्सस बकाटा है जिससे कलकत्ते में कैंसररोधी रसायन टैक्साल निकाल कर यूरोप भेजा जाता है। बाजार में एक बूढ़े ने किसी अदृश्य स्मारक का परिचय कराने के भाव से कहालड़ाई में चीनी यहां तक आए थे।
सोने की जगह दिरांग घाटी में स्लेट की छत वाले एक ढाबे में मिली। उतरती रात को उन्मादी हवा सीटियां बजा रही थी लेकिन तापमान तेजी से गिरने के कारण उसके सामने खड़े रह पाना मुश्किल था। स्लीपिंग बैग के ऊपर दो रजाइयों के बावजूद ठंड हड्डियों में घुसी जा रही थी। ढाबे की मालकिन ने मुझे भट्टी के पास बैठने तो दिया लेकिन सोने से पहले अपने भयानक कुत्ते को ताकीद भी कर गई थी, देखना कोई भी बाहर न निकलने पाए। चांदनी में बर्फीला हिमालय देखने की लालसा से जैसे ही जरा सा कदम उठाता कुत्ता दांत पीसकर किसी सम्राट की तरह गुर्राता थाजरा देर का नयनसुख या जिन्दगी, पहले सोच लो तुम्हें चाहिए क्या! मन मसोस कर अपनी जगह वापस बैठना ही पड़ता था।
सुबह मैं लामा नवांग लामसांग को खोजने आठवीं शताब्दी में प्रसिद्ध बौद्ध आचार्य पद्मसंभव द्वारा एक पुराने किले दिरांग जोंग में स्थापित गोम्पा (मठ) में गया। यह इलाका भारत कम तिब्बत ज्यादा है जहां पद्मसंभव को लोपोन रिमपोछे के नाम से जाना जाता है। छोटे से मठ के गर्भगृह में लामा बच्चे पुरानी पोथियों में से कुछ पढ़ रहे थे। एक बूढ़े लामा ने बताया कि वे बाहर गए हैं, दिरांग में नहीं हैं। कुछ सोचने के बाद उसने टिन का एक पिचका बक्सा खोलकर उसमें रखा एक बहुत पुराना पत्थर निकाल कर मेरी हथेली पर रखायह एक दानव का हृदय है जिसे यहां मारा गया था। उसके बाद मोन जनजाति बौद्ध हो गई।
उसका हृदय पत्थर का कैसे हो गया?”
पत्थर का नहीं और कैसा होगा…दानव था।
बौद्ध धर्म की विजय के उस प्रतीक पर अविश्वास करने का अब कोई कारण नहीं बचा था।
दिरांग से सेला पास की ओर चढ़ते हुए बनस्पतियां गायब होने लगती हैं, अंत में ग्रेनाइट की काली चट्टानों पर बर्फ और कहीं कहीं गद्दे जैसी घास बचती है। धुंध में चींटी चाल चलते सेना के ट्रक कराहते हैं, चरते हुए याक दिखते हैं और आक्सीजन की किल्लत के कारण सांस लेने में उलझन होती है। चौदह हजार फीट की ऊंचाई पर सेला दुनिया का दूसरा सबसे ऊंचा दर्रा है जहां गाड़ियां पहुंचती हैं। उस ऊंचाई से बार्डर रोड आर्गनाइजेशन के पराक्रम से बनी घुमावदार सड़कें लापरवाही से तिकल्ला कर फेंका गया पतंग का मंझा लगती हैं। सेला के गेट के तुरंत बाद बाएं हाथ पर किनारे पर जम चुकी एक झील थी, बीच में जरा से बचे नीले जल में ब्रह्मांड की परछाईं झिलमिला रही थी। कुछ नए रंगरूट वहां बर्फ गोले फेंकते हुए फोटो खींच रहे थे। गेट के पास पत्थर की झोपड़ी में एक चाय की दुकान थी जिसकी छोटी सी खिड़की से बादलों की परतों में छिपी घाटियां झिलमिला रही थीं। एक परिवार था जो फौजियों और पर्यटकों को चाय बेचकर गुजारा कर रहा था। चाय बनाने वाले ने फौजियों की ओर मुंह की भाप छोड़ते हुए बड़प्पन से कहाकिसी जगह पहुंचने में जितनी तकलीफ होगी वह उतनी ही सुंदर होती जाएगी…लेकिन कितने दिन।
उस वीरान पहाड़ी रेगिस्तान में सबसे सुंदर चीज सफेद झंडे थे जो बर्फीली हवा में फड़फड़ा रहे थे। इस इलाके में रिवाज है कोई मन्नत मानता है तो एक सफेद झंडा गाड़ देता है। इस यकीन में जीता होगा कि प्रार्थना हवा में उड़ती हुई एक दिन सही ठिकाने पर पहुंच जाएगी।
ढलान शुरू होते ही ड्राइवर फिर ध्यानमग्न हो गया। थोड़ी देर पहले बारिश हुई थी। चट्टानों के किनारों पर टपकता पानी बीच में ही जम गया था जिससे विचित्र आकृतियां बन गई थीं। उनमें बर्फ के खंजर सबसे ज्यादा थे। हरियाली जसवंत गढ़ के पास लौटनी शुरू हुई और जंग में एक पुराने मोम्पा घर में चूल्हे पर गरम पानी की केतली के बगल में रम की बोतल रखी हुई थी। आपने कितने पेग पी यह गिनने के लिए एक बिल्ली स्टूल पर बैठी थी। हवा से सहन में टंगी घंटियां बज रही थीं। मालकिन बाहर बैठी थी जिसे यकीन था कि जानलेवा सर्दी लोगों को ईमानदार बना देती होगी। उतरती शाम में तवांग गोम्पा की सुनहरी छतें मोड़ों से दिखने लगीं थी, कलक्टर से कह कर सर्किट हाउस में एक ठाठदार सुइट बुक कराया जा चुका था।
रह रह कर उखड़ती सांसों के बीच शुद्धतम हवा पीता हुआ, सारनाथ से आए किसी लामा का पता लगाने मैं दोपहर में गोम्पा पहुंचा। गेट पर घूमता धर्मचक्र बेहद सर्द था। किशोर भिक्षु प्रार्थना हाल के बाहर मैदान में दलिया खा रहे थे। उनके ऊपर फड़फड़ाता ध्वज हवा के वेग से साठ फीट ऊंचे खंभे को कंपा रहा था। उनकी पीठ की ओर महायान संप्रदाय के इस जगप्रसिद्ध मठ का म्यूजियम था जिसमें हाथी का एक अतिविशाल दांत, पुरातन वाद्य यंत्र, भिक्षुओं की वस्तुएं और नक्काशी किए हुए सोने, चांदी से मढ़ी मानव खोपड़ियां रखी थीं। एक लाइब्रेरी थी जिसमें सात सौ साल से अधिक पुरानी पांडुलिपियां रेशम में लपेट कर रखी गई थीं। प्रार्थना हाल तीन सौ साल पहले तिब्बत से लाई गई बुद्ध की बीस फीट से अधिक ऊंची प्रतिमा से परावर्तित प्रकाश से आलोकित था। दीवारों पर तांत्रिक अनुष्ठानों के चित्र बने हुए थे।
इतनी विशाल प्रतिमा यहां तक कैसे पहुचीं, पहले इसकी कई किवंदंतियां थीं। आधी सदी से पहले एक तेज भूकंप में इसके दरक जाने के बाद कई नई कहानियां जुड़ गईं। 1997 में यहां परम पावन दलाई लामा आए, उनके आदेश से नेपाल से कुशल मूर्तिकार मरम्मत के लिए बुलाए गए। तब प्रतिमा के भीतर से मिले दस्तावेजों से पता चला, बुद्ध का हर अंग अलग-अलग दक्षिण तिब्बत में गेलुग्प संप्रदाय के उपासकों गढ़वाया था जिन्हें घोड़ों पर ढोकर लाया गया।
म्यूजिम के इंचार्ज लामा से मैने पूछा, यहां इतनी खोपड़ियां क्यों रखी हुई हैं। उन्होंने एक चित्र में पेन्डेन लमू (काली) की पहचान कराते हुए कहाउनमें तांत्रिक लामा कभी पूजा के दौरान मदिरा चढ़ाते थेलेकिन अब पेप्सी या कोक अर्पित किया जाता है।
वह कहां मिलता है?”
बाजार में जनरल स्टोर से!”, लामा ने मुझे आश्चर्य से देखते हुए कहा।
ल्हासा (तिब्बत) के बाद तवांग दुनिया में दूसरे नंबर का सर्वाधिक प्राचीन महायान मठ है जिसे सत्रहवीं शताब्दी में मेरे लामा लोट्रे ग्यात्सी ने अपने घोड़े की सलाह पर स्थापित किया था। तिब्बती में तवांग का अर्थ घोड़े द्वारा चुना गया स्थान होता है। तांत्रिक पीठ के रूप में दुनिया भर में इसकी मान्यता है, सत्रह मठ इसके प्रशासनिक नियंत्रण में हैं। बहुत दिन नहीं बीते जब जमींन का टैक्स वसूलने तिब्बत के संग्राहक तवांग के गांवों में आया करते थे। अरूणाचल राज्य बनने के समय चीन ने इसी आधार पर कई क्षेत्रों को भारत का हिस्सा बताने पर औपचारिक विरोध दर्ज कराया था। बाजार में तिब्बती चिकित्सा पद्धति के दो दवाखाने भी हैं।
शाम को बाजार में बाइक पर सवार एक चीवरधारी लामा ने बताया, इस बार बौद्ध महोत्सव में गाने के लिए जसपिन्दर नरूला को बुलाया जा रहा है। उदित नारायण गाकर जा चुका है। कोयला की शूटिंग के समय शाहरूख और माधुरी दीक्षित भी आ चुके हैं। उससे मैने पूछा, पूजा में देसी दारू की जगह मल्टीनेशनल पेप्सी क्यों चढ़ाया जाने लगा तो उसने आंख मार कर मौज में जवाब दियाबुद्धिज्म भी तो मल्टीनेशनल धर्म है, हर्ज क्या है!”
लामा के फर्राटे से निकल जाने के बाद अचानक समझ में आया कि ग्यारह हजार फुट की ऊंचाई पर इस लगभग निर्जन इलाके के बौद्ध मठों की जिन्दगी कितनी बदल चुकी है। दो महीने पहले स्त्रियों के मठ (ग्यांयांग अनि गोम्पा) में बीएसएनएल के सिम वाले मोबाइल फोन पहुंचे हैं। दूसरे मठों के मित्रों की खैर खबर लेने के लिए भेजे गए उनके एसएमएस कई कई दिन घाटियों की धुंध में झूलते रहते हैं। दूसरा बड़ा परिवर्तन मठों में केबिल कनेक्शन वाले टीवी का पहुंचना है। जिन पुरातन इमारतों का सन्नाटा सदियों तक आदमी की जांघ की हड्डी से बने वाद्ययंत्रों से टूटता था उनमें रहने वाले लामा अब सीरियलों और फिल्मों पर खूब बात करते हैं। उन दिनों बाइक के एक विज्ञापन का जिंगल हुड़ीबाबा बाकी किशोरों की तरह लामाओं में भी हिट था। टीवी अपने साथ वर्षों तक चलने वाला लंबा शास्त्रार्थ लेकर आया था। पुराने भिक्षुओं का कहना था, औरत की अर्धनग्न देह और फिल्मों की हिंसा ब्रह्मचारियों को भ्रष्ट करेगी। युवाओं का कहना था, जबरदस्ती होगी तो चोरी, छिपे कहीं और देखेंगे जिससे झूठ, अपराधबोध जैसी विकृतियां आएंगी। अंततः टीवी जीता और साधना के नीरस जीवन में रंगीन दुनिया दाखिल हो गई।
अगले दिन मठ में नए भिक्षुओं को पढ़ाने वाले अध्यापक लामा थोन्डू मुझे अपनी कोठरी में ले गए। उन्होंने खुद चाय बनाकर पिलाई। साधक की दिनचर्या के बीच उन्होंने बताया, परम पावन दलाई लामा जब यहां आए तो थोड़े से युवा लामाओं ने उनसे पूछा था- भगवान बुद्ध ने जब मदिरा का निषेध कर दिया था तो उसका पूजा में प्रयोग क्यों किया जा रहा है। यह व्यवस्था उनकी दी हुई है कि तंत्र में मदिरा के स्थान पर चायपत्ती के घोल, फलों के रस का इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन आसानी से उपलब्ध होने के कारण चलन पेप्सी का हो गया। कई पुराने तांत्रिक अब भी मदिरा का इस्तेमाल करते हैं लेकिन इसे हतोत्साहित करने की कोशिश की जा रही है।
टीवी आने से जरा पहले मठ में बहस चली थी, लामाओं को राजनीति में जाना चाहिए या नहीं। इस मठ से जुड़े बुद्ध के अवतार समझे जाने वाले टीजी रिनपोछे लुमला विधानसभा सीट से चुनाव लड़े, मुकुट मिथि और गेंगांग अपांग दोनों की सरकारों में दल बदल कर मंत्री भी बने थे। पुरानों का कहना था राजनीति साधु को भ्रष्ट बनाएगी, नयों का आग्रह था कि जनसेवा का व्यावहारिक मौका चूकना नहीं चाहिए। राममंदिर आंदोलन के बाद भाजपा के टिकट पर संसद में पहुंचने वाले हिन्दी पट्टी के बाबा यहां रोल मॉडल के तौर पर पेश किए जाने लगे। इस मठ में तीन सौ ज्यादा वोटर हैं चुनावों के दौरान सभी दलों के प्रत्याशी प्रचार करने आते हैं। बाइक और मोबाइल संपन्न पृष्ठभूमि वाले अधिकांश लामाओं के पास पहुंच रहे हैं। चकाचौंध से खिंचकर मठ छोड़ने वाले लामाओं की तादाद बढ़ रही थी लेकिन मठाधीश चिन्तित नहीं थे। मोम्पा जनजाति में जिसके तीन बेटे हों, उसे बीच वाले को मठ को समर्पित करना पड़ता है। इसलिए आने वालों की भी कमीं नहीं थी।  

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