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लेखक का एकांत मृत्यु का एकांत होता है

उदय प्रकाश का उपन्यास ‘पीली छतरी वाली लड़की’ पुराना है, लेकिन सुशीला पुरी ने उसके ऊपर बेहद आत्मीय ढंग से, नए कोण से लिखा है. सोचा साझा किया जाए- जानकी पुल.
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 उदय प्रकाश जैसे विरल,विराट,विपुल,वैविध्य वाले रचनाकार पर कुछ लिख पाने की मेरी सामर्थ्य नहीं। मैं एक अदना सी पाठिका..हाँ, उदय जी की घनघोर पाठिका हूँ…और इसी एकमात्र बूते पर अपनी बात कहने का साहस जुटा रही हूँ..!    
   उदय प्रकाश की उपस्थिति आज के समय में नर्मदा के पारदर्शी जल की तरह निर्मल और सच के उन पवित्र-प्रस्तरों से निर्मित है, जिन्हें नर्मदेश्वर की संज्ञा दी जाती है। उनकी कलम मौजूदा समय की कठिनाइयों, ऊबड़-खाबड़ रेतीले रास्तों, मरुस्थली होती नैतिकताओं को सींचती तो है ही, साथ ही मानवीयता के पक्ष में अहर्निश मुस्कान जुटाती,..संवाद भी करती है। उदय प्रकाश के अनुभव उनकी स्मृतियों में डूबकर जब शब्दों का आकार लेते हैं, तो वे अनुभव अप्रत्याशित रूप से सामूहिक समाज के सहभागी, सहयात्री होते हैं और भविष्य वक्ता की तरह समय की नब्ज़ थामे वे उसका आँखों देखा हाल सुनाते..उसके लिए कुछ जरूरी स्वप्न रचते हैं। उदय प्रकाश के भीतर का विराट अपने समय को संबोधित करते हुये अपनी उत्कर्ष-उत्कटता में यथार्थ से अनूठे साहस के साथ मुठभेड़ करता है । वे अपनी एकांतिक लय में जो देखते,सोचते,जाँचते,और आत्मसात करते हैं वही अपने एकाग्र के साथ रचते हैं..उनकी हर रचना गुणवत्ता की अनुपम उपज होती है । एक स्वस्थ समाज का सपना रचनाकार के आंतरिक एकांत और निःसंगता में ही जन्म लेता है । उदय प्रकाश एकांत के विरल गोताखोर हैं, वे अपनी हर रचना के माध्यम से चेतना की समग्रता के साथ समाज की पीड़ा-त्रासदी से एकलय होते हैं…और यह क्षमता अर्जित कर पाना सरल नहीं…!
     काफ्का ने अपने किसी पत्र में लिखा है कि —लेखक का एकांत किसी सन्यासी का एकांत नहीं, वह मृत्यु का एकांत है।और ऐसे ही एकांत,और यथार्थ के संतुलन से उदय प्रकाश ने जो लिखा है..वह समय के पार जाकर सदियों तक हमारी स्मृतियों का हिस्सा रहेगा। अपनी रचनाओं की लय और चाल बनाए रखने के लिए उनकी कलम ने हमेशा मनुष्यत्व पर भरोसा किया है।  
   यही वजह है कि आज वे सर्वाधिक पढ़े जाने वाले लेखक हैं । वर्तमान समय में..जब सत्तायेँ और ज्यादा शातिर और ज्यादा हिंसक हों, और नाटकीयता की सारी हदों को पार करके हाशिये के मनुष्य को चूसने मे लगी हों…तो ऐसे कठिन समय में उदय प्रकाश बिना किसी बनावटी लिहाज के, अपनी निर्भीक लेखकीय ईमानदारी के साथ जीवन को साहित्य के अपने अनूठे शिल्प में रचते हैं और पल-पल हमें नकाबपोश-विभीषिकाओं से आगाह करते हैं। उनकी रचनात्मक तड़प सुंदरता को समूल पाने की तड़प है…और इसी तड़प को सँजोये वे निःसहाय-निष्कवच पवित्रता में खड़े…अपने एकांत के साथ असीम को स्पर्श करते हैं । उनकी बेचैनी आम आदमी की पीड़ा,त्रासदी, और निरंतर छीजती जाती उसकी अस्मिता के प्रति अपनी समूची संवेदना के साथ हमेशा खड़ी मिलती है । वे सच के रचनाकार हैं… आज मनुष्य के साथ..समय किस तरह खिलवाड़ करता है और किस तरह वह लाचार होकर मर्मांतक समयों में भी अपनी सच्चाई और सरलता के साथ डटा संघर्ष करता है,…इसका महाख्यान है उदय प्रकाश का समस्त लेखन । लेखक उदय प्रकाश और व्यक्ति उदय प्रकाश में तनिक भी दूरी नहीं है । 
    उनकी हर रचना, उनकी ही पिछली रचना से चुनौती लेती है और हर बार उनके भीतर का सर्जक अपनी समूची संरचना में कुछ नया, कुछ अनोखा आविष्कार कर लेता है, हर बार वे एक बिल्कुल नई ताज़ी प्रविधि अपनाते हुये अपने पाठकों को मुरीद कर लेते हैं । उनकी उत्कटता समय के भीषण यथार्थ से जूझते हुये उसकी गहराई से पड़ताल करती..विसंगतियों की खबर लेती है । हर रचना चाहे– टेपचू, तिरिक्ष, मैंगोसिल,दिल्ली की दीवार, छप्पन तोले का करधन, अरेबा-परेबा, डिबिया, मोहनदास, आवरण,पाल गोमरा का स्कूटर, दरियाई घोड़ा, वारेन हेस्टिंग का सांड, और अंत में प्रार्थना, राम संजीवन की प्रेम कथा, पीली छतरी वाली लड़कीहो…या आज के इस कविता-विरोधीसंवेदनहीन-समय में उनकी अविस्मरणीय कवितायें हों,…अपने आप में..अपने समय का ऐसा दस्तावेज़ है उदय प्रकाश का समग्र-लेखन,….जिसे पढ़ते हुये कभी आँख नम होती है, तो कभी सन्नाटे में घिरकर शून्य में ताकती हैं आँखेँ..।  इस आक्रांत समय में…जब सारे मानव-मूल्य विवशताओं के चंगुल में घिरते जा रहे हों..पूंजी और बाजारी-सत्ता ने कविताको हाशिये पर धकेलने की क्षुद्र-विसात बिछा रखी हो… एक भयानक किस्म की मौकापरस्ती, निर्लज्ज भागम-भाग और छद्म स्पर्धा ने आदमी को आदमी से दूर करने के साथ…भयंकर -भितरघात का माहौल रच रखा हो, जीवन से लय और छंद गायब होते जा रहे हों ! ….तो, ऐसे अराजक-समय में भी उदय प्रकाश सारी विधाओं में लिखते हुये भी खुद को मूलतः कविही कहते हैं। (यह उनकी अद्भुत प्रतिबद्धता है ) …जब छद्म दिखावे और भौतिकवाद ने सामाजिक उथल-पुथल मचा रखी हो..सत्तायेँ लगातार निरंकुश और क्रूर होती जा रही हों… भूमंडलीकरण का भूतवर्तमान को निगलने को तत्पर हो, तो,ऐसे बिभीषक समय में उदय प्रकाश की कलम निर्भीकता और नैतिकता के साथ चलने का साहस देती है। 
     वैसे तो उदय प्रकाश के समस्त लेखन का कोई जवाब नहीं… पर आज मैं  पीली छतरी वाली लड़कीको केन्द्र में रखकर अपनी बात कहूँगी । हांलाकि न मैं कोई आलोचक हूँ..और न ही साहित्य-वेत्ता । बस एक साधारण पाठक की दृष्टि से पीली छतरी वाली लड़कीको पढ़ते हुये जो कुछ पाया, उसे आप से बाँट रही हूँ । इस लम्बी कहानी ( को कई बार पढ़ा है..और जितनी बार पढ़ा कुछ नया ही मिला । 
    उदय प्रकाश की जादुई कलम ने इतनी ईमानदारी से एक प्रेम कहानी के बीच घटती दुनिया-जहाँन की विसंगतियों,घटनाओं को रचा है कि… पढ़ते हुये हतप्रभ हो जाना पड़ता है । और यही वजह है कि, उदय प्रकाश जैसे निराले रचनाकार पर कुछ लोग अपनी निरर्थक ईर्ष्या-कुंठा निकालते व अनर्गल आरोप मढ़ते रहते हैं । उनकी जादुई कलम का लोहा मानने के बजाय चंद लोग अपनी अनर्गल भड़ास जादुई यथार्थकहकर निकलते हैं । उदय प्रकाश के लेखन के विरुद्ध फैली खेमेबाजी और असहिष्णुता से अक्सर मन खिन्न हो जाता है । अपनी हिन्दी भाषा में व्याप्त इस संक्रमणको लेकर चिंता भी पैदा होती है कि ऐसी क्षुद्रताओं से हम हिन्दी भाषियों का कितना भला होगा भविष्य में..? जातिवादी मानसिकता में आकंठ डूबा हिन्दी समाज का एक तबकाअपने समकालीन वरिष्ठ साहित्यकारों के प्रति सम्मान का भाव भी भूल बैठा है, जो घातक, आत्महंता और भविष्यहीन तो है ही….उसकी इन हरकतों पर तरस नहीं आता…सिर्फ शर्म आती है ।    
   ‘पीली छतरी वाली लड़कीउपन्यास के भीतर कहानी चलती है एक विश्वबिद्यालय और उसके छात्रावास में, पर वहीं से यह कहानी पूरे देश की सामाजिक राजनीतिक गतिविधियों और भ्रष्टतंत्र पर तीखी नज़र रखते हुये उस कड़वे यथार्थ से रूबरू कराती है जहाँ सत्ताधारी-जातिवादी शक्तियाँ अपने हितों के लिए किसी भी हद तक गिर सकती हैं, वे किसी भी हद तक अपना ईमान बेंच सकती हैं । छात्रावास के एक मणिपुरी छात्र सापाम तोंबा के माध्यम से असम और मणिपुर की अलगाववादी स्थिति को उदय प्रकाश अपनी गहरी संवेदना से रचते हैं । सापाम तोंबा जैसे भोले छात्र का आत्महत्या कर लेना, ऐसी एँद्रिक स्तब्धता भरता है कि जैसे समूची चेतना ही सुन्न हो गई हो..। असम और मणिपुरी अलगाववादी चेहरे सापाम तोंबा के बड़े भाई को आतंकवादी बता कर गोली मार देते हैं, और इधर विश्वविद्यालय में सापाम के साथ वहीं के कुछ छात्र-गुण्डे बुरा बर्ताव करते हैं, अब वह लाचार भोला छात्र विश्वविद्यालय परिसर में स्थिति एक गहरे कुंए में कूदकर अपना जीवन ख़त्म कर लेता है । सापाम की आत्महत्या के बाद उस वीरान कैपस में एक उजाड़ सी निर्जनता भर जाती है, जिसमें पेड़ तक बूतों की तरह खड़े थे शोकमग्न । सापाम के सारे सहपाठी शोकाकुल हैं..राहुल तो फुट-फुटकर रोता है…!  
    मणिपुरी या कश्मीरियों की बेचैन-वेदना उपन्यास में अपनी गहरी पीड़ा और असंतोष को स्वर देती है । उपन्यास शिक्षा-व्यवस्था की नसों में घुली भ्रष्ट राजनीति और स्वार्थ में डूबी जातिवादिता को बेनकाब करता है । हिन्दी-विभाग की दुर्दशा का सजीव चित्रण करते हुये वे लिखते हैं—ये विभाग विश्वविद्यालय के ऐसे शिक्षा केन्द्र हैं जिनके होने के बारे में किसी को भी सही-सही नहीं पता है । वहाँ पढ़ने वाले छात्र वहाँ से निकलकर किस ओर जाएँगे और उनका भविष्य क्या होगा ? कोई ठीक-ठाक नहीं जानता ।‘ ….आज देश में जातिवाद और सांप्रदायिकता इतनी बढ़ गई है कि शांति सब तरफ गायब है । विश्वविद्यालयों के अध्यापकगण खुद जातिवाद और भाई-भतीजावाद को पाल-पोस रहे हैं..घूस जुगाड़ लालच के बल पर बड़ी-बड़ी जगहों पर अशिक्षित लोग स्थायी नौकरियां ले रहे हैं । ब्राह्मणवाद-हिंदुत्वाद-सांप्रदायिकता लोकतान्त्रिक-व्यवस्था में घुन की तरह व्याप्त है, हिन्दी भाषा आधुनिक-लोकतान्त्रिक होकर भी इन्हीं सत्ताधारियोंके चंगुल में छटपटा रही है, …क्या आज मेधा का कोई वास्तविक मूल्य रह गया है..
     ‘पीली छतरी वाली लड़कीउपन्यास बाजार की ब्रांडिंग और मानवीय  अस्मिता और आस्वाद तक को बदल डालने की उसकी साजिशों की तरफ ध्यान दिलाता है । ठंढा मतलब कोका कोलाजैसे विज्ञापन जिस तरह से अपनी तानाशाही और अपना वर्चस्व बना रहे हैं वह बेहद खतरनाक है। बाजारीकरण और भूमंडलीकरण ने अपने अंतहीन विज्ञापनों और लालसाओं के द्वारा मनुष्य के मूल जीवन, मूल अनुभव को छिन्न -भिन्न कर डाला है । पूंजी ने हर चीज को अपने कब्जे में कर रखा है, पूंजीवाद ने समूचे विश्व को भोगवाद के लिए तैयार और तत्पर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, मनुष्य के विवेक को अगवा करके पूंजी के चतुर-चरित्र ने नव उपनिवेशवाद की नींव डाल दी है । नव उपनिवेशवाद हमारी विकाशशील व्यवस्था का अदृश्य संचालक है। इस अदृश्य आग्रही संचालक के लिए उदय प्रकाश अपने प्रतिरोध को अद्भुत आक्रोश और सघन-चिंतन की निराली व्यंजकता के साथ आकार देते हैं ।  पूंजीवाद, बाजारवाद और तानाशाही के सहमेल से जो छवि वे रचते हैं वो — खाऊ, तुंदियल,कामुक,लुच्चा,जालसाज़ और रईस,जिसकी सेवा की खातिर इस व्यवस्था और सत्ता का निर्माण किया गया है।” … इस उपन्यास में यह जो चरित्र सामने आता है वह बेहद क्रूर है, उसे भारतीय किसानों की गरीबी या बदहाली से कुछ भी लेना-देना नहीं है ! …सोयाबीन,सूरजमुखी, और तिलहन जैसी फसलों को चौपट करना हो…या किसानों के ऊपर से सब्सिडी हटा लेना हो, उस तुंदियल लुच्चेको कोई फर्क नही है, वह कहता है — मरने दो साले किसानों बैचो…को…ओके ।‘  भारतीय अर्थ-व्यवस्था के सबसे अहम किरदार किसान‘..लगातार आत्महत्यायेँ कर रहें हैं..व्यवस्था का भयावह अजगर निरंतर उनके सपनों को निगल रहा है । आगे वे लिखते हैं — इस आदमी ने बीसवी सदी के अन्तिम दशकों में पूंजी,सत्ता और तकनीक की समूची ताकत को अपनी मुट्ठियों में भरकर कहा था– स्वतंत्रता ! चीखते हुये..आजादी ! अपनी सारी एषणाओं को जाग जाने दो, अपनी सारी इन्द्रियों को इस पृथ्वी पर खुल्ला चरने और विचरने दो, इस धरती पर जो कुछ भी है, तुम्हारे भोगे जाने के लिए है, न कोई राष्ट्र है, न कोई देश, समूचा भूमंडल तुम्हारा है, न कुछ नैतिक है, न कुछ अनैतिक…इस जगत के समस्त पदार्थ तुम्हारे उपभोग के लिए हैं…वूगी …वूगी ! और याद रखो स्त्री भी एक पदार्थ है ,वूगी…वूगी !”  
    भूमंडलीकरण, बाजारीकरण के इस तुंदियल कामुक लुच्चेने भौतिकता के प्रति आकंठ-मोह..और घुप्प भविष्य-हीनता फैलाई है । इस अंतहीन अंधी-लिप्सा ने जीवन से सृजनात्मकता और सुकून दोनों को लील लिया है । शांति की जगह शोर और हंसी की जगह सामूहिक क्रदन लगातार सुनाई देता है । आधुनिकता और स्वतंत्रता के नाम पर स्त्री-अस्मिता जिस तरह आए दिन तार-तार हो रही है, उसके पीछे पूंजी और बाजार के इसी तुंदियल जालसाज़की भोगवादी-भूमिका है । 
   पूंजी, बाजार और जातिवादी सत्ता से संघर्ष के बीच इस उपन्यास में एक सुंदर प्रेम कहानी का विन्यास गुंथा है…जो अपनी प्रकृति में मासूम, अल्लढ़ और आदिम है । पीला रंगअप्रत्याशित रूप से आत्मा को अपने रंग में रंगता है ! पीला रंग अपने गाढ़ेपन में भी डराता नहीं , एक अनोखी ठंढक देता है,(पर कहीं न कहीं उदास भी करता है ) ….लड़की के पास एक पीली छतरी है…जो जीवन में छांव देती है….उस छतरी पर एक पीली तितली कभी-कभी आकर बैठती है, जो जीवन मे रंग भरती है..उड़ान भरती है। प्रेम अपनी सघनता के साथ मनुष्य के बचे रह पाने की आखिरी उम्मीद के तौर पर….बाजारी घाटे-मुनाफे से दूर जातिवादी क्षुद्रताओं से अंजान मानवीय संबंधों की नींव मजबूत करता है । उपन्यास में राहुल और अंजली का प्रेम जातिगत जकड्बंदी में भी अपनी नैसर्गिक स्वाभाविकता में पनपता है और वे अपने होने को एक-दूसरे में अविरल प्रवाह की तरह महसूस करते व व्यक्त करते हैं ।  प्रेम के चरम क्षणों में राहुल की अस्वाभाविक अभिव्यक्ति जिस तरह का रूपक रचती है,…उससे गुजरते हुये चकित हो जाना पड़ता है..!  दबी-कुचली जातियों की समूची प्रतिहिंसा, शताब्दियों से छोटी जातियों के प्रति हुये अन्याय के प्रतिरोध में, बदले की भावना…जिस तरह एक पवित्र-आदिम-प्रेम के गहन क्षणों में तेंदुए की माफिक आक्रामक और बनैलेपन से दाखिल होती है…… वो एक अलग मार्मिक महाख्यान रचता है। ….प्रेम अपनी प्रकृति में नित-नूतन-नैतिक और अलौकिक होता है..!  किन्तु यहाँ दो अलग जेण्डर के लोगों का मिलना सामान्य अर्थों में स्त्री-पुरुष के प्रेम की ही अभिव्यक्ति न होकर, एक राजनीतिक, सामाजिक रूपक में भी रुपाकार होता है । और यह दूसरा रूपक प्रेम-कथा की निश्चल-सघनता के बीच एक बृहद कैनवास पर अपनी बिल्कुल अलग अभिव्यक्ति देता है। सदियों से हमारे सामाजिक संस्कार में पुरुषवादी वर्चस्व ने शासन करते हुये स्त्री को भोग की वस्तु में बदलने की कुचेष्टा की। ..स्त्री की नैसर्गिकता और उसकी कोमलता के विरुद्ध सत्ता ने, जातिवाद ने हमेशा से साजिशें की है..!  और यहाँ, यही पीड़ा…यही वेदना पाठक को गहरे मर्मांतक-भंवर तक ले जाती है। पुरुषवादी दंभ प्रेम की अनछुई-पवित्र-आदिम अनुभूतियों का अतिक्रमण करते हुये अपने को स्त्री-देह के माध्यम से जस्टीफाई करता है। …सामाजिक भेदभाव व जातिगत संक्रीणताओं ने एक प्रेमी को बंधक बनाकर उसकी देह में, उसकी चेतना में एक वासनामय पुरुष का विस्तार किया, जो प्रेम की नैसर्गिक-खुशी के आत्मीय-सौंदर्य को असमय सोख जाने को आतुर हो उठता है ।  सबसे हृदय-विदारक बात यह है कि इस हिंसाके दौरान भी स्त्री अपनी खामोश-विनीत-स्वाभाविक-निष्ठा में आदिम,

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