धर्म को पकड़े रहो, धर्मों को छोड़ दो

आज यानी २३ सितम्बर को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जयंती है. लेकिन मन २४ सितम्बर के संभावित अदालती फैसले को लेकर आशंकाओं से घिरा है. ऐसे में धर्मों के भेद-मतभेद, एकता-अनेकता को लेकर दिनकर के विचारों को टटोलने का मन हुआ. उनका एक लेख है कबीर साहब से भेंट जिसमें उन्होंने कबीरदास के माध्यम से धर्मों के उस आदर्श रूप की बात कही है जों कबीर के चिंतन का मूल था. यह उनकी पुस्तक वेणुवन में संकलित है. दिनकर का चिंतन इस मामले में बड़ा साफ़ है. पढ़िए उसी लेख का एक अंश, जिसमें कबीरदास के माध्यम से वे धर्म को लेकर अपनी बात रख रहे हैं. कवि की कल्पना-सी एक आदर्श स्थिति की. साथ में, उनकी एक कविता उपासना भी प्रस्तुत है जो समकालीन सन्दर्भों में शायद कुछ प्रासंगिक लगे- जानकी पुल.  
“तो इतनी देर क्या मैं धर्म छोड़कर किसी अन्य विषय की बातें कर रहा था? ऐसा क्यों समझते हो कि धर्म केवल मंदिर और मस्जिद में बसता है तथा जुलाहे के करघा-घर या मोची के मोचीखाने अथवा राजनीति के दफ्तर में वह नहीं रह सकता? जीवन के दो टुकड़े नहीं हैं कि एक में धर्म का आसन हो और दूसरे में छल प्रपंच के लिए छूट रहे. जीवन का ऐसा विभाजन नहीं चल सकता. यह तो धर्म और अधर्म के बीच समझौते का उदाहरण होगा. धर्म सम्पूर्ण जीवन की पद्धति है. धर्म जीवन का स्वभाव है. ऐसा नहीं हो सकता कि हम कुछ कार्य तो धर्म की मौजूदगी में करें और बाकी कामों के समय उसे भूल जाएँ. धर्म ज्ञान और विश्वास में नहीं, कर्म और आचरण में बसता है. यदि हम ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हैं तो इस विश्वास का सबूत हमारे आचरणों में मिलना ही चाहिए. पूजा और अनुष्ठान की विधियाँ धर्म के बाहरी रूप हैं. मंदिर, मस्जिद, तीर्थ-व्रत और पंडे तथा पुरोहित की प्रथा- ये धर्म के ढकोसले हैं. सच पूछो तो सभ धर्म एक हैं. केवल पूजा विधियों के कारण वे अनेक दिखाई देते हैं. इसलिए कहता हूँ कि पूजा-विधियों को छोड़ दो और सभी धर्मों को एक हो जाने दो. सभी धर्म एक हैं. एक से अधिक वे हो ही नहीं सकते. तुम्हारे नए कवि रवीन्द्रनाथ ने तुमसे ठीक ही कहा था- धर्म को पकडे रहो, धर्मों को छोड़ दो. और धर्म केवल जुमे या मंगलवार को ही नहीं जगता, वह सातों दिन जगा रहता है. उसकी साधना का स्थान मंदिर और मस्जिद ही नहीं, बल्कि वे सारी जगहें हैं जहाँ मनुष्य कोई काम करता है.
साधो सहज समाधि भली.
गुरुप्रताप जा दिन ते उपजी, दिन-दिन अधिक चली.
जहं-जहं डोलूँ सोई परिकरमा, जों-जों करूं सो सेवा,
जब सोवौ तब करो दंडवत, पूजौं आन न देवा.
कहौं सो नाम, सुनौ सो सुमिरन, खाऊं-पिऊं सो पूजा.
गिरह-उजाड़ एक सम लेखौं, भाव न राखौं दूजा”.
एक कविता
उपासना
नाथ तुम्हारी इस नगरी में मची बड़ी हलचल है,
अर्चन-साज सजाते सब, घर-घर में चहल-पहल है.
कुसुमांजलि करों में लेकर सब बढे चले जाते हैं,
आह मगों में एक-दूसरे को दुःख पहुंचाते हैं.
प्रेम-कुंज में यह विरोध की विषम-बेलि फैली है,
उफ़ उपासना की गंगा हो रही आज मैली है.
इधर सोच मैं रहा कि पट खोलूं किस देवालय के?
जीवन-यान उधर भागा जाता है निकट प्रलय के.
अब अनंत गायन के ये ध्वनि-भंग प्रभो! हों बंद,
थिरक उठे यह विश्व प्राप्त कर एक ताल-लय छंद.
एक अनंत मधुर स्वर में तेरा गुण-कीर्तन गावें,
प्रभो! एक मंदिर में चलकर सब मिल शीश झुकावें.

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