प्रेम भी बला है और प्रेम के बारे में बोलना भी बला

राजकिशोर इस बार सुनंदा की डायरी के साथ उपस्थित हैं- यह मेरी रचना नहीं, सुनंदा की डायरी है । पिछले साल छुट्टी बिताने के लिए मैं परिवार सहित नैनीताल गया हुआ था। वहाँ के एक गेस्ट हाउस के जिस कमरे में हम ठहरे थे, उसी की कपड़ों की आलमारी के सबसे नीचेवाले खंड में यह डायरी मिली। एक कोने में दुबकी हुई। पता नहीं हमसे पहले ठहरनेवालों को इसका आभास क्यों नहीं हुआ। निहायत खूबसूरत अक्षर। सवाल हरे रंग में थे और जवाब नीले रंग में । डायरी में कहीं कोई तारीख नहीं लिखी थी। पर स्याही की चमक से लग रहा था कि वह ज्यादा पुरानी नहीं थी। पढ़ने लगा, तो रात भर पढ़ता ही रह गया
नक्शे पर नैनीताल को देखा जाए, तो हृदय जैसी आकृति बनती है। पान का पत्ता भी कह सकते हैं। दुनिया भर में अब यही प्रेम के प्रतीक के रूप में स्वीकृत हो चला है। हमारे गेस्ट हाउस हर दूसरे-तीसरे दिन कोई न कोई नया जोड़ा दिखाई दे जाता है। उन पर नजर पड़ती है, तो बहुत कोमल-सी अनुभूति होती है। इनमें नवविवाहित युगल भी होते हैं। मैंने लक्ष्य किया है, अकसर नवविवाहितों में पुरुष की ज्यादा चलती है और प्रेमियों में दोनों की हैसियत लगभग एक जैसी होती है।
आज सुबह बड़ा मजा आया। लड़का कह रहा था – आइ लव यू। लड़की ने हँसते हुए जवाब दिया – बट आइ डोन्ट लव यू। इस पर लड़के ने लड़की को दौड़ा लिया। लड़की भागी, पर इतनी तेजी से नहीं कि पकड़ में न आए। लड़के ने उसकी चोटी पकड़ कर खींचते हुए कहा – बोल आइ लव यू, नहीं तो मैं इतने जोर से खींचूँगा कि रोने लगेगी। लड़की कुछ देर तक अपनी चोटी छुड़ाने की नकली कोशिश करती रही। सफलता नहीं मिली, तो उसने लगभग चिल्लाते हुए कहा – आइ लव यू, लव यू, लव यू, अब तो चोटी छोड़ दे। लड़के ने चोटी छोड़ दी। बोला – बट नाउ आइ डोन्ट लव यू। यू आर नॉट माइ काइंड। यह कह कर वह विपरीत दिशा में दौड़ने लगा। जाहिर है, इतनी तेजी से नहीं कि लड़की उसे पकड़ न सके।
इसके बाद मैंने नजर उधर से हटा ली। एक सीमा तक ही प्रेमियों की क्रीड़ा का आनंद लिया जा सकता है। इस सीमा के बाद वह हस्तक्षेप हो जाता है।
सुबह की सैर का समय था। कुछ बूढ़े जोड़े भी निकले हुए थे। ऐसे ही एक जोड़े की बातचीत सुनने का मौका मिला। पुरुष छड़ी के सहारे चल रहा था। स्त्री का चलना देख कर अनुमान होता था कि उसके बाएँ घुटने में तकलीफ है। पुरुष हँसते हुए बोला – तुम्हारे साथ मेरी जिंदगी खराब हो गई। स्त्री ने उसके कंधे पर धाप-सी मारी और कहा – कहो कि बन गई। मैं न होती, तो तुम्हारा पता नहीं क्या हुआ होता। वृद्ध ने हँसते हुए ही जवाब दिया – मेरा जो होता सो होता। पर तू किसी मिलिटरी वाले की बीवी बन कर हर साल बच्चे जनती होती। वृद्धा की आँखें मानो एक क्षण के लिए अतीत में चली गईं – वह मिलिटरी वाला तुमसे लाख दरजे अच्छा था। वृद्ध – फिर उसके लिए ना क्यों कह दिया? वृद्धा – क्योंकि मेरी किस्मत में तुम्ही गृहस्थी सँभालना बदा था। वृद्ध – लगता है, बहुत अफसोस हो रहा है। वृद्धा – अफसोस किस बात का। होता वही है जो किस्मत में लिखा होता है। फिर लड़की जात की मर्जी ही क्या। किसी न किसी के साथ उसे निभाना ही होता है। तुम्हारे साथ निभा ली। हाँ, तुम्हें अफसोस हो रहा है, तो बोलो। वृद्ध – इतने दिन मेरे साथ रह कर यही समझा है? कोई और होती, तो मेरा कचूमर निकल जाता। और हाँ, नाश्ता कर के सीधे अस्पताल जाना है। सुना है, वहाँ हड्डी का कोई नया डॉक्टर आया है। तुम्हारा घुटना उसे दिखाना है। वृद्धा – कल से कुछ आराम है। वैद जी की दवा कुछ दिन और खा कर देखती हूँ। वृद्ध – तूने मेरी बात कभी मानी है जो आज मानेगी? …
लौट कर नाश्ता करते हुए मैं प्रेम के बारे में सोचने लगी। जब मेरा नाश्ता खतम हो रहा था, सुमित भी आ गया। उसके साथ मैंने दुबारा चाय पी। फिर हम उसके कमरे की ओर बढ़े।
मेरे दिमाग में आज का विषय तय हो गया था।
क्या आज आप प्रेम के बारे में कुछ कहना चाहेंगे?
जी नहीं। मैं मुफ्त की बला आमंत्रित नहीं करना चाहता।
क्या प्रेम बला है?
प्रेम भी बला है और प्रेम के बारे में बोलना भी बला है। आज तक कोई सफल नहीं हुआ।
फिर भी, कोशिश करने में हर्ज क्या है?
अभी तक सभी कोशिश ही तो करते रहे हैं। फिर भी प्रेम को समझा नहीं जा सका है। कोई कहता है, प्रकृति चाहती है कि स्त्री-पुरुष एक-दूसरे से प्रेम करें, ताकि मनुष्य नाम की प्रजाति बची रहे। कोई इसे आत्मिक उत्थान की सीढ़ी बताता है, तो किसी की नजर में यह यौनिकता का ही एक भद्र नाम है। मेरी समझ में कुछ नहीं आता, इसलिए इसके बारे में सोचना ही मैंने छोड़ दिया है। तुम्हारी भी भलाई इसी में है कि प्रेम के चक्कर में मत पड़ो।
एक बार तो पड़ ही चुकी हूँ। अब तो उससे डर ही लगता है। लेकिन जैसा कि मैंने देखा और उससे ज्यदा सुना है, यह वह नदी है जिसमें लोग बार-बार छलाँग लगाना चाहते हैं।
यही तो मुश्किल है। यह वह क्षेत्र है जिसमें लोग अपने ही अनुभवों पर विश्वास करना नहीं चाहते। वे सोचते हैं, शायद अगला अनुभव बेहतर हो।
इसमें बुराई क्या है? जैसे लोग बार-बार घर बदलते हैं, नौकरी बदलते हैं, देश भी बदल लेते हैं, वैसे ही अगर वे बार-बार प्रेम करते हैं, तो यह गलत कैसे है?
मैंने कब कहा कि यह गलत है? मेरा कहना सिर्फ यह है कि इससे मूल निराशा खत्म नहीं होती, बल्कि और पक्की होती जाती है। अंततः एक खतरनाक मनोदशा का जन्म होता है, जो आदमी को मनुष्य-विरोधी बना सकता है। मनुष्य-विरोधी नहीं तो पुरुष को स्त्री-विरोधी और स्त्री को पुरुष-विरोधी तो बना ही डालता है।
आपकी इस धारणा के पीछे आपका अपना कोई कड़वा अनुभव तो नहीं है? मुझे तो ऐसा ही लग रहा है।
हो भी सकता है। मध्य वर्ग के बारे में कहा गया है कि वह अपने ही गज से दुनिया को नापता है। यही बात प्रेम करनेवालों पर भी लगू होती है। लेकिन इससे क्या? सब अपने-अपने अनुभवों के आधार पर सामान्य सिद्धांत बनाने लग जाएँ, तब तो हो चुका। कोई सर्वमान्य सिद्धांत बन ही नहीं सकता। अनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग।
तो मेरा अंदेशा सही है?
हाँ, लेकिन एक दूसरे अर्थ में। मैंने जीवन में एक ही बार प्रेम किया और पाया कि सब कुछ ठीक-ठाक होने के बावजूद यह भी अंततः एक घेरा ही है। घेरे में जितना जीवन है, घेरे के बाहर उससे ज्यादा जीवन है। जब दोनों में संघर्ष होने लगे, तब घेरे के बाहर रहना ही ठीक है। घेरा कैसा भी हो, उसमें साँस घुटने लगती है।
क्यों, आपकी भी साँस घुट रही थी?
हाँ। वजह यह थी कि वह प्रेम को ही सब कुछ समझती थी। हम साथ रहें, खूब बातें करें, अंतत: शादी करें और गृहस्थी बसाएँ। प्रेम में वह इतनी डूबी हुई थी कि इसके बाहर की दुनिया उसे दिखाई ही नहीं पड़ रही थी। वह बहुत बुद्धिमान थी। बहुत अच्छी। मगर जीवन का यह प्रचलित पैटर्न मुझे पसंद नहीं है। मैंने प्रस्ताव रखा कि हमें पति-पत्नी की तरह नहीं, मित्र की तरह रहना चाहिए। वह मुझे बहुत चाहती थी, पर शादी किए बिना उसे चैन नहीं था। शादी के बगैर उसे डर था कि वह मुझे खो देगी। दूसरी ओर, मुझे हमेशा लगता रहा है कि जीवन जीवन की खोज में है, उसे जीने में नहीं। जीते ही वह मटमैला हो जाता है। बहरहाल, हम किसी नतीजे पर पहुँचते, इसके पहले ही वह चली गई।
ओह !
वह एक पुराना अध्याय है। हम उसे परे रख कर कर बात कर सकते हैं।
अभी आपने कहा कि जीवन जीने में नहीं, उसकी खोज में है। तो क्या जीवन को लगातार स्थगित करते जाना चाहिए? यह बात मेरी समझ में नहीं आई।
मेरा आशय यह नहीं है। जीवन को हम चाहें भी तो स्थगित नहीं कर सकते। उसकी अपनी एक गति है, जिसके आगे हम सभी बेबस हैं। इसलिए जीवन को तो जीना ही पड़ता है। पर जरूरी नहीं कि वह अच्छा जीवन भी हो। जैसे किसी लेखक की सर्वश्रेष्ठ रचना वह होती है जो अभी तक लिखी नहीं गई, वैसे ही सर्वश्रेष्ठ जीवन वही होता है जो अभी तक जिया नहीं गया।
मेरा खयाल है, प्रेम के बारे में भी यही कहा जा सकता है।
यकीनन। बहुत सोचने-विचारने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि प्रेम एक भव्य कल्पना है। हम प्रेम करना चाहते हैं, लेकिन कर नहीं पाते।
जीवन में यह अंतर्विरोध कहां से आता है?
यह अंतर्विरोध मनुष्य के स्वभाव में ही है। वह एक ओर आत्मविस्तार करना चाहता है, दूसरी ओर आत्मसंकुचन से उबर नहीं पाता है। ग़ालिब ने क्या खूब कहा है, ईमाँ मुझे रोके है, खींचे है मुझे कुफ्र। इसीलिए मुझे कभी-कभी लगता है, प्रेम एक असंभव कामना है।
मैं इसे इस तरह कहना पसंद करूँगी कि इस असंभव को संभव करने की चेष्टा सबसे बड़ा सुख है और इस चेष्टा में विफल हो जाना सबसे बड़ा सदमा। यह प्रेम की शक्ति है कि हर पीढ़ी यह कोशिश अपने ढंग से करती है । हममें से हरएक प्रेम को संभव करना चाहता है, लेकिन यह मानो रेत का फूल हो, मुट्ठी में टिकता ही नहीं।
प्रत्येक जीवन अपने साथ नई संभावनाएं और नई निराशाएँ ले आता है। हर आदमी अपने ढंग से असंभव को संभव करना चाहता है और शायद ही कोई सफल हो पाता है। यही जिंदगी का मजा है और यही उसकी विडंबना भी।
तो क्या प्रेम एक स्वाभाविक घटना नहीं है? वह क्या है, जो स्त्री-पुरुष को एक-दूसरे की ओर खींचता है और उन्हें बाँधे रखता है?
मेरा खयाल है, स्त्री-पुरुष के बीच प्रेम से ज्यादा स्वाभाविक घटना है, यौन आकर्षण। प्रेम इसी की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है। चूँकि प्रेम के बिना यौन आकर्षण अनैतिक प्रतीत होता है – गँजेड़ी यार किसके, खाए पीए खिसके – इसलिए दोनों साथ-साथ जनम लेते हैं। यौन तृप्ति लक्ष्य है और प्रेम उसका माध्यम। अन्यथा क्या वजह है कि युवा होते ही आदमी की यह तलाश शुरू हो जाती है कि वह किससे प्रेम करे? लड़का लड़की खोजने लगता है और लड़की लड़का। इस प्रक्रिया में तरह-तरह के प्रयोग होते हैं। जरूरी नहीं कि पहला प्रेम ही आखिरी प्रेम साबित हो। जैसे-जैसे समझ और संवेदना बढ़ती है, वैसे-वैसे एक भिन्न प्रकार के प्रेम की आवश्यकता महसूस होती है।
यह तो कोई बात नहीं हुई। क्या हमेशा प्रेम के मूल में यौन आकर्षण ही होता है? मुझे लगता है, यह पुरुष के मामले में ज्यादा सच है। स्त्री की खोज किसी और चीज के लिए होती है।
ठीक-ठीक नहीं जानता। लेकिन अगर ऐसा नहीं है, तो लड़का-लड़की के प्रेम में जो प्रगाढ़ता देखी जाती है, वह लड़का-लड़का या लड़की-लड़की के प्रेम में क्यों दिखाई नहीं पड़ती? विपरीत लिंगी के साथ प्रेम एक अलग ही श्रेणी है, जिसकी तुलना किसी अन्य भाव से नहीं की जा सकती। यह एक अनोखी दुनिया है। इसके अपने नियम-उपनियम हैं।
यह भी तो हो सकता है कि यौनिकता का जो अर्थ पुरुष के लिए होता है, ठीक वही अर्थ स्त्री के लिए नहीं होता।
हो सकता है नहीं, है। स्त्री के लिए इसका अर्थ गहन और व्यापक है, जबकि पुरुष के लिए यौन तनाव से मुक्ति ही मुख्य लक्ष्य होता है। इसीलिए स्त्री के प्रेम में ज्यादा ईमानदारी और गहराई देखी जाती है।
तब तो जब यौन आकर्षण खत्म हो जाता होगा, प्रेम भी हिरन हो जाता होगा !
सॉरी। मैंने यह नहीं कहा कि यौन आकर्षण ही प्रेम है। यौन आकर्षण से प्रेम की शुरुआत होती है। बाद में यौन आकर्षण कमजोर पड़ जाने पर भी प्रेम टिका रहता है। तब तक उसकी स्वतंत्र सत्ता स्थापित हो चुकी होती है। यह लंबे साहचर्य का परिणाम है। बहुधा साहचर्य से भी प्रेम की उत्पत्ति होती है। माता-पिता द्वारा कराए गए विवाह, जिसे अरेंज्ड मैरिज कहा जाता है, के पीछे यही अपेक्षा होती है कि लड़का-लड़की साथ रहने लगेंगे, तो उनके बीच प्रेम पनप ही जाएगा।
और उनके बीच प्रेम नहीं पनप सका तो?
इसीलिए तो मेरा मानना है कि वैवाहिक संबंध में प्रेम करना एक कर्तव्य है। कर्तव्य की जड़ नैतिकता में होती है, जबकि प्रेम वह पत्ता है जो हवा के जरा-सा तेज होते ही डोलने लगता है और कभी भी डाल से टपक सकता है।
आप ठीक कहते हैं। इसका विस्तार किया जाए, तो कहना होगा कि प्रेम चाहे जिससे हो, यह एक काम है – टास्क है। दूसरे शब्दों में, यह सुख की नहीं, आनंद की खोज है। सुख तो जुगनू की तरह है, जो जलता है – बुझता है, आनंद अपना टास्क पूरा करने में है। कर्तव्य को रूप में प्रेम को लिया जाए, तो बहुत-से बखेड़े अपने आप हवा हो जाएँगे।
वाह, कितने उच्च विचार हैं ! पर काश, ऐसा हो पाता। जीवन कविता या फिलॉसफी नहीं है। यह एक खुरदरी सचाई भी है, जिसमें इच्छाएँ साँप की तरह जीभ लपलपाती रहती हैं। प्रसाद जी के शब्दों में, तुच्छ नहीं है अपना सुख भी, श्रद्धे, यह भी कुछ है।
प्रेम में दोनों सिर्फ अपना-अपना सुख खोजने में लगे रहें, तब तो हो चुका। सुखों के द्वंद्व में क्या आत्मा पिस नहीं जाएगी?
सच तो यह है कि जहाँ से बनियागीरी शुरू होती है, वहीं से प्रेम काफूर होने लगता है। यह प्रेम ही है जो स्त्री-पुरुष को बनियागीरी से परे रखता है। यही प्रेम का महात्म्य भी है।
लेकिन आप तो यौन आकर्षण पर जोर दे रहे थे ! यह तो पूरी तरह शरीर का मामला है।
नहीं। पूरी तरह नहीं। मैं एक ऐसे गायक को जानता हूँ जो शक्ल से सुंदर नहीं है, लेकिन जो भी महिला उसके परिचय के दायरे में आती है, वह उसकी ओर खिंचने लगती है। वह जहाँ भी जाता है, महिलाएँ उसकी ओर आकर्षित होने लगती हैं। शायद इसलिए कि वह बेहद ईमानदार, संवेदनशील और दूसरों की परवाह करनेवाला आदमी है। उसके ये सारे गुण उसकी बोली और उसके पूरे व्यक्तित्व से टपकते रहते हैं। कहा जा सकता है कि पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के किसी भी गुण पर रीझ जा सकते हैं। रूप-सौंदर्य का निश्चित महत्व है, पर व्यक्तित्व का आकर्षण उससे कहीं ज्यादा मजबूत और दीर्घ स्थायी होता है। नहीं तो ऐसा क्यों होता कि कोई पचीस साल की लड़की किसी पचहत्तर साल के बूढ़े के प्रेम-पाश में पड़ कर उससे विवाह कर ले !
आप ठीक कहते हैं। मेरे एक मित्र ने अपने से पंद्रह साल बड़ी औरत से शादी की थी। वह सुंदर बिलकुल नहीं थी, पर उसका दिमाग आला दर्जे का था। उसका अध्ययन भी बहुत विस्तृत था। उसके मुँह से हमेशा कोई न कोई नई बात निकलती थी। हाँ. याद आया, वह खिलखिलाती बहुत थी। उस समय उसका चेहरा फूल की तरह खिल उठता था।
यही तो मैं भी कह रहा हूँ। प्रेम शरीर से शुरू होता है और मन की ओर बढ़ता है। पर इसका उलटा भी हो सकता है। प्रेम मन से शुरू हो और शरीर की ओर बढ़े। दोनों की ही अहमियत है। शरीर के बिना या मन के बिना प्रेम हो, यह जरा टेढ़ी खीर है। मेरा अपना विचार यह है कि मन की स्थिति ही केंद्रीय है। शरीर तो उसके पीछे-पीछे भागता रहता है।
लेकिन प्रेम अगर अंततः मन का मामला है, तो मन की तो कोई सीमा नहीं है। मन का क्या है? वह तो एक साथ कई पर भी आ सकता है।
आ ही सकता है। शरीर पर नियंत्रण किया जा सकता है, मन पर नहीं। वह अपना बादशाह खुद है।
तब तो एक ही समय में एक से अधिक व्यक्तियों से भी प्रेम हो सकता है?
क्यों नहीं हो सकता? एक आदमी हमें अच्छा लगता है, तो क्या यह जरूरी है कि उसके अलावा कोई और आदमी अच्छा न लगे? किसी में कोई गुण होता है, किसी में कोई और गुण। सभी अपने-अपने ढंग से हमें लुभा सकते हैं।
तब तो एक व्यक्ति के दर्जनों प्रेमी हो सकते हैं। यानी एक आदमी एक ही साथ दर्जनों व्यक्तियों से प्रेम कर सकता है !
सिद्धांत के स्तर पर इससे इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन दर्जनोंकह कर इसका मजाक मत उड़ाओ। । मेरा आशय सिर्फ इतना है कि अगर कामना से इसका संबंध न जोड़ा जाए, तो प्रेम की सीमा रेखा नहीं बाँधी जा सकती।
सचमुच? यह आप क्या कह रहे हैं?
कोई नई नहीं कह रहा हूँ। यह सहज मानव स्वभाव है। यहाँ संतोष के लिए कोई जगह नहीं है। जब चीजों के मामले में ऐसा हो सकता है, तो व्यक्तियों के मामले में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? यह जरूर है कि ज्यादातर आबादी एकनिष्ठता की मान्यता को बहुत भीतर तक स्वीकार कर चुकी है। इसलिए अपनी प्रेम भावना को एक व्यक्ति तक सीमित रखने में उसे कठिनाई नहीं होती। शायद उनमें यह स्फुलिंग पैदा ही नहीं होता। वे राम की तरह सीमित व्यक्ति होते हैं। लेकिन कृष्ण की तरह असीमित व्यक्ति भी तो हुए हैं। हर समाज में ऐसे व्यक्ति पाए जाते हैं जो किसी एक संबंध से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो पाते। उन्हें बहुगामी कहना ठीक नहीं है। वे जीवन को उसके सभी आयामों में जीना चाहते हैं और इसके लिए उन्हें कई तरह का साथ चाहिए। पर ऐसे व्यक्ति विरल होते हैं। एक बात और, जो हमें अच्छे लगते हैं, उन सभी से यौन संबंध थोड़े ही होता है या हो सकता है? अच्छा लगना प्रेम की तरफ ले जा सकता है, पर दोनों पर्याय नहीं हैं। सुनंदा, एक और बात है।
वह क्या?
प्रेम एक आनंदमय, किन्तु जिम्मेदारी से भरा हुआ काम है। इसमें बहुत समय और बहुत ऊर्जा लगती है। किसके पास इतना समय है कि वह रोज-रोज नई प्रेमिका या प्रेमी खोजता फिरे। फिर हर संबंध की अपनी माँगें होती हैं। उन्हें पूरा करना आसान नहीं होता। इसलिए बहुत-से लोग इससे दूर रहने में ही भलाई समझते हैं। मेरी समझ से, भलाई इसी में है भी। जिनके पास अतिरिक्त ऊर्जा होती है, वे ही एक से अधिक व्यक्तियों से संबंध बना सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि कोई व्यक्ति – स्त्री हो या पुरुष – एक ही समय में एक दर्जन प्रेम संबंध बनाए रख सकता है। यह एक असंभव चीज है। किसी भी हृदय में इतनी जगह नहीं होती कि वहाँ एक या दो से ज्यादा व्यक्ति समा सकें। इतनी जगह कहाँ है दिले-दाग़दार में हाँ, मित्रों की संख्या अपरिमित हो सकती है। यह भी हो सकता है कि कल तक जो मित्र था, वह आज प्रेमी हो जाए। या, कल तक जो प्रेमी था, वह अब मित्र रह जाए। एक प्रसिद्ध लिखिका का कहना है कि प्रेम के मामले में परिवार नियोजन का पुराना नारा सबसे सटीक है – दो या तीन, बस। मेरा फार्मूला यह है – प्रेम एक से, दोस्ती अनेक से।
सुमित, स्त्री-पुरुष संबंध में पेचीदगी बहुत है। प्रेमी दोस्त नहीं बनना चाहता और दोस्त प्रेमी बनने की कोशिश में लगा रहता है।
यह एक बहुत भारी समस्या है। इसीलिए अधिकतर संबंध दूषित होने लगते हैं। प्रत्येक संबंध की कुछ मर्यादाएँ होती हैं। जब ये मर्यादाएँ टूटने लगती हैं, तब प्रेम में तानाशाही का तत्व आ जाता है। जीवन के हर क्षेत्र की तरह प्रेम का भी एक लोकतंत्र होता है। प्रेम में लोकतंत्र नहीं रहा, तो वह आततायी हो जाता है।
लेकिन सुमित, प्रेम तो एक उदात्त भाव है। उसमें तानाशाही का तत्व कैसे आ जाता है?
कठिनाई यह है कि हम जिस पर मोहित होते हैं, उसे पूरी तरह अपना बना लेना चाहते हैं। जो यह कहते हैं कि प्रेम मुक्त करता है, वे झूठ बोलते हैं। दुर्दांत सचाई यह है कि प्रेम मुक्त नहीं करता, बल्कि बाँधता है। यह और बात है कि यह बँधाव जितना गहरा होता है, उतना ही ज्यादा आह्लाद की सृष्टि करता है। लेकिन बँधाव की भी एक सीमा है। प्रेम के अतिरोक में जब दो व्यक्तित्वों के विलय की माँग पैदा होने लगती है, तब संबंध में दरकन आने लगती है। दो व्यक्तित्वों का कोई भी विलय संपूर्ण नहीं हो सकता। इसीलिए सार्त्र का मानना था कि प्रेम एक असंभव चीज है।
प्रेम एक असंभव चीज है?
हाँ, सार्त्र की मान्यता यही थी और इस पर यकीन न करने का कोई कारण दिखाई नहीं पड़ता। प्रेम तब कोई समस्या नहीं पैदा करता, जब एक का व्यक्तित्व दूसरे में पूरी तरह समाहित हो जाए। जैसे नदी समुद्र में खो जाती है। तब किसी प्रकार का द्वंद्व नहीं रह जाता। जहाँ द्वंद्व नहीं, वहां अंतर्द्वंद्व भी नहीं। परंतु सभी पुरुष और सभी स्त्रियाँ समुद्र में अपना विलय कर देनेवाली नदी की तरह नहीं होते। वे ऐसी नदी होते हैं जो अनंत काल तक स्वतंत्र रूप से बहना चाहती है। ऐसी दो नदियाँ जब एक-दूसरे से प्रेम करने लगती हैं, तो लोकतंत्र ही उनके संबंध की रक्षा कर सकता है। पर मनुष्य अभी तक लोकतांत्रिक हो नहीं पाया है। वह दूसरों की तानाशाही से कुढ़ता है और अपनी तानाशाही से प्यार करता है। विलय की माँग इसी से पैदा होती है। प्रेम की शुरुआत में या प्रेम के अतिरेक में यह अच्छा भी लगता है, पर ज्वार उतर जाने के बाद सभी को अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व याद आता है। तब प्रेम का बंधन शिथिल होने लगता है। आपस में दरारें पड़ने लगती हैं। इस दौर में लोकतांत्रिक होना और मुश्किल हो जाता है। जो प्रेम में संभव नहीं हुआ, वह नफरत में कैसे संभव होगा? यह मनुष्यता का बहुत ऊँचा स्तर है, जहाँ कोई किसी की स्वतंत्रता को सीमित करना नहीं चाहता। सामान्यत: तो सम्मोहन का दौर बीतने के बाद हर संबंध में खींचतान शुरू हो जाती है। इसके बाद व्यक्ति अपने बुनियादी अकेलेपन का विषाद झेलने लगता है।
आप शायद ठीक कह रहे हैं। इसके साथ ही, मुझे यह कहने की

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