मित्र लेखिका की मृत्यु पर शोकगीत

लेखिका ज्योत्स्ना मिलन के लेखन, उनकी मानवीय ऊष्मा को बड़ी शिद्दत से याद कर रहे हैं प्रसिद्ध कवि-लेखक, ‘समास’ पत्रिका के संपादक, विचारक उदयन वाजपेयी. ज्योत्स्ना जी को श्रद्धांजलि- जानकी पुल.
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3 मई 2014 को हिन्दी लेखिका-कवि ज्योत्स्ना मिलन का असमय देहावसान मुझ समेत उनके कई मित्रों और पाठकों को गहरे शोक में डुबा गया है। वे तिहत्तर वर्ष की थीं। पर उस उम्र में भी वे निरन्तर सृजन-सक्रिय और कर्मशील बनी रहीं। उनकी मृत्यु के दो दिन पहले मैं उनसे अस्पताल में मिलने गया था और देर तक उनसे इधर-उधर की गप्पें लगाता रहा था। वे थोड़ी थकी हुई जान पड़ती थी। पर यह थकान बुढ़ापे की नहीं, अचानक सामने आ गयी बीमारी की थी। उन्हें इस बात पर थोड़ा आश्चर्य भी था कि उन्हें अचानक ऐसी बीमारी ने किस रास्ते आ घेरा है। मुझे नहीं लगता कि वे उन लोगों में थीं जो पूरे समय अपने स्वास्थ्य को लेकर चिंतित बने रहते हैं या उसकी चर्चा करते रहते हैं। मैं ऐसे अनेक लेखकों को जानता हूँ जिनका प्रिय शगल अपनी बीमारी के विषय में लम्बी बातचीत करना हुआ होता है। ज्योत्स्ना जी ने शायद ही कभी अपनी किसी बीमारी की चर्चा अपने किसी मित्र से की होगी। यह इसलिये भर नहीं था कि वे कभी बीमार नहीं पड़ती थीं, यह इसलिये था क्योंकि वे अपने विषय में बहुत हद तक बहुत चिंतित नहीं रहा करती थीं। यह केवल वह व्यक्ति कर सकता है जो अपने से अधिक अन्यों की चिन्ता करता हो। जिसके पास अपने विषय में चिन्ता करने का समय ही न बचता हो। ज्योत्स्ना जी के साथ ऐसा इसलिये होता था क्योंकि वे अपना सारा समय या तो अपने व्यापक परिवार की देखरेख और चिन्ता में गुजारती थी या थोड़ा बहुत बचा हुआ समय वे अपने लेखन में लगा दिया करती थीं: उनके पास अपने स्वास्थ्य के विषय में बात करने का और चिंतित रहने का सम्भवतः समय ही नहीं बचता था। वैसे उनके परिवार में दो बेटियाँ, दामाद और उनके पति हैं, पर वे अपने भाईयों और बहनों और उनके बच्चों आदि का भी पूरा ध्यान रखा करती थीं। वह छोटे से कद की महिला अपने ऊपर इतने सारे लोगों की फिक्र का भार लिये जिस हल्केपन से अपने को बरत पाती थी, सोचकर आश्चर्य होता है। और इन सबके साथ पति के लिए उनका मन-पसंद भोजन तैयार करना और फिर बाकी बचे समय में अपने भीतर उमड़ती-घुमड़ती कहानियाँ या कविताएँ लिखने बैठना, अजूबा ही है। मैं उनके घर विशेषतः उन्हीं से मिलने जाया करता था। उनके साथ बैठकर निर्मल वर्मा, कृष्ण बलदेव वैद, चेखव, राजेन्द्र शाह आदि लेखकों के विषय में बातें करने में विशेष रस का अनुभव हुआ करता था। वे हिन्दी की न सिर्फ बेहतर कहानीकार और उपन्यासकार थी बल्कि वे गुजराती साहित्य की श्रेष्ठ अनुवादिका भी थीं। उन्होंने गुजराती के कई महत्वपूर्ण कवियों और गद्य लेखकों की कृतियों का उत्कृष्ट अनुवाद किया।
उदयन वाजपेयी 

उनके उपन्यास हिन्दी में अपना विशेष स्थान रखते हैं। इन उपन्यासों में उन्होंने समय के बिलकुल ही अप्रत्याशित विन्यासों को उद्घाटित और प्रस्तुत किया है और यह कर पाना उस हिन्दी साहित्य में बेहद जोखिम का कार्य है जहाँ आज भी प्रेमचन्द जी की कथाशैली का कुछ ऐसे अनुकरण होता है मानो वे कृतिकार न होकर या कहानीकार न होकर अनुष्ठानकर्ता रहे हों। अधिकतर हिन्दी के गद्यकार लकीर के फकीर रहे हैं। और इसलिये हिन्दी गद्य की हालत वैश्विक गद्य की स्थिति के संदर्भ में दयनीय है। हम आज अपनी भाषा के शायद ही किसी उपन्यासकार का नाम विश्व के श्रेष्ठ उपन्यासकारों के साथ लेने का साहस जुटा पायेंगे। हमारे अधिकांश लेखकों ने यह मान लिया है कि प्रेमचन्द जी ने उपन्यास लेखन का मानों अंतिम प्रारूप उनके सामने प्रस्तुत कर दिया है जिसे केवल दोहराने से उनकी सृजनशीलता की इतिश्री हो जायेगी। इस दृष्टि के जो थोड़े से अपवाद रहे हैं जिन्होंने कुछ ऐसा गद्य लिखने का जोखिम उठाया जो गद्य लेखन के नये आयामों को उद्घाटित करता हो, उनमें ज्योत्स्ना मिलन का नाम उजले अक्षरों में लिखा जायेगा। उनका प्रसिद्ध उपन्यास अ अस्तु का उपन्यास लेखन का एक बिलकुल नया प्रस्ताव सामने रखता है। इस उपन्यास को आप न तो पश्चिम के यथार्थवादी उपन्यासों की कोटि में रख सकते हैं और न ही वहाँ के ऐसे उपन्यासों की कोटि में जिन्हें प्रयोगशील उपन्यास कहने का चलन है। यह उपन्यास बाहरी दुनिया में घटित होने के साथ-साथ उतनी ही प्रामाणिकता से पात्रों की भीतरी दुनिया में घटित होता चलता है। बाहरी दुनिया से भीतरी दुनिया के बीच आवाजाही करते इस उपन्यास को पढ़ते समय यह पता लगाना कई बार मुश्किल हो जाता है कि आप जो पढ़ रहे है वह पात्र के चारों ओर घट रहा है या उसके मन में। मैं उपन्यास लेखन के इस अनूठेपन में ही स्त्री की उपस्थिति का अनुभव करता हूँ। सम्भवतः स्त्री के लिए जगत मन का विस्तार है और मन जगत का। अगर ऐसा न होता तो उसके लिए पोषण करने में अपना जीवन पूरी तरह झोंक पाना शायद मुश्किल होता। इस अर्थ में ज्योत्स्ना मिलन का लेखन, जैसा कि वे खुद भी मानती थी स्त्रीवादी न होकर, स्त्री का लेखन था। इस लेखन में उनके स्त्री होने की उद्घोषणा न होकर उनके स्त्री होने की विनम्र उपस्थिति थी। मानो वे अपने लेखन में खुद को प्रस्तावित करने के स्थान पर, खुद को खोज रही हों। यह अभिव्यक्ति का उतना नहीं जितना खोज का साहित्य है। यहाँ अभिव्यक्ति स्वयं को खोजने के मार्ग में छूटे हुए पदचिन्हों का विन्यास भर है। वह जाने हुए सत्यों का ऊब भरी अभिव्यक्ति नहीं है जैसी कि अधिकतर तथाकथित स्त्रीवादी साहित्य की हुआ करती है। यहाँ ज्योत्स्ना जी अपने स्वरूप और जगत की विस्तार को समझने की चेष्टा करती हुई नजर आती है। जहाँ उनका स्त्री होना एक अतिरिक्त उजास की तरह उनके साहित्य के वितान पर छाया रहता है। ज्योत्स्ना जी ने कई मार्मिक कहानियाँ भी लिखी हैं जो हिन्दी के अमर कहानियों जैसी किसी किताब में संकलित होने योग्य हैं अगर ऐसी कोई किताब बिना किसी मुर्खतापूर्ण वैचारिक आग्रह के लिए प्रकाशन की जा सके। उनकी ऐसी ही एक कहानी है, बा”। यह मालवा के किसी छोटे शहर से एक बड़े शहर में आ गयी बा नामक स्त्री की कहानी है। इसके पहले ही वाक्य से ज्योत्स्ना मिलन अपने पाठक के हृदय को करूणा से चीर देती हैं। इस वाक्य में बा मालवी में कहते हैं कि उन्हें ऐसा लगता है कि वे अपना सारा घर परिवार पीछे छोड़ कहीं भाग जायें। बा का भरापूरा परिवार है पर वे उसमें अपने को बिलकुल अकेला और अलग-थलग पा रही हैं और मानों कुछ साँसें खुली हवा में लेने कहीं दूर निकल जाना चाहती हैं। इस अपेक्षाकृत उम्रदार स्त्री की स्वतंत्रता की खोज मानो आधुनिक मनुष्य की स्वतन्त्रता की खोज की तरह पढ़ी रह सकती है। क्या हम सभी अपने-अपने जीवन में बा की तरह ही फँसे हुए नहीं है और क्या यह सच नहीं कि हम भी कभी-कभी इन सबको छोड़कर कहीं खुले में साँस लेने भाग जाना चाहते हैं? पर बा की तरह हमारी भी यही विडम्बना है कि हम लगातार खुले में जाने की कल्पना में ही साँस ले पाते हैं। पर सचमुच के खुले में नहीं जा पाते। ज्योत्स्ना जी ने इस छोटी सी कहानी के सहारे आधुनिक मनुष्य के फँसाव को रेशा-दर-रेशा जिस सुन्दरता से उद्घाटित किया है वह भारतीय साहित्य में अद्वितीय है। ज्योत्स्ना जी की इस लोक को छोड़कर परलोक सिधार जाने में हिन्दी साहित्य ने एक विलक्षण लेखक को खो दिया है पर मुझ जैसे उनके अनेक मित्रों ने एक ऐसे मित्र को खोया है जिसकी उपस्थिति किसी पंख जैसी हल्की थी और जिसने जीवन भर वह किया जिसे स्वीडिश कवि टोमास ट्रांसट्रोमर के शब्दों में हम कह सकते हैं: ओह कैसा अंधड़ कि तितली को खिंचना पड़ रही है, नौका!

लेखक संपर्क: udayanvajpeyi@gmail.com

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