धर्मपाल की किताब ‘गौ-वध और अंग्रेज’ का एक अंश

गाय को लेकर इस गर्म माहौल में मुझे प्रसिद्ध गांधीवादी चिन्तक धर्मपाल की किताब ‘गौ वध और अंग्रेज’ की याद आई. जिसका प्रकाशन वाणी प्रकाशन द्वारा किया गया था. इस पुस्तक में धर्मपाल जी ने अंग्रेज सरकार के प्रामाणिक दस्तावेजों के आधार पर यह दिखाया था कि किस तरह भारत में गौ वध की शुरुआत अंग्रेजी राज के दौरान हुई थी. किताब में क्वीन विक्टोरिया का एक पत्र भी छपा है जिसमें ब्रिटेन की महारानी ने इस तरह का इशारा भी किया था. इस समय उस किताब को पढ़ा जाना चाहिए. उसी किताब का एक महत्वपूर्ण अंश- मॉडरेटर

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हमें इंग्लैंड की महारानी का आभारी होना चाहिए कि उन्होंने भारतीय  वायसराय को लिखे पत्र में अंग्रेजों द्वारा के जा रही गो-हत्या की ओर इशारा कर व्यापक गोहत्या संबंधी सच्चाई का खुलासा किया. १८८०-९४ के दौरान चले एक बड़े पशु-हत्या बंदी आन्दोलन का ज़िक्र करते हुए महारानी विक्टोरिया आठ दिसम्बर , १८९३ को लिखती हैं: “वैसे तो मुसलमानों द्वारा की जा रही गोहत्या आन्दोलन का कारण है, पर वास्तव में, यह हमारे खिलाफ है, जो कि अपने सैनिकों इत्यादि के लिए मुसलामानों से कहीं अधिक गो-वध करते हैं.’

न केवल ज़्यादातर भारतीय हिन्दू, मुसलमान और ईसाई उस समय इसे साफ़ तौर पर देख रहे थे, बल्कि अँगरेज़ अफसरों का एक बड़ा वर्ग भी इस बात को जानता था और चर्चा भी करता था कि पशु वध बंदी का यह आन्दोलन जिस गो-हत्या के विरोध में है वह वास्तव में भारत में एक लाख से भी अधिक अँगरेज़ सैनिकों एवं अफसरों एवं लाखों अँगरेज़ एवं अन्य ईसाई नागरिकों के भोजन के काम आता है जो ब्रिटिश राजतंत्र की मजबूती बनाये रखने के ख़याल से भारत में काम कर रहे थे. १८८०-९३ के दौरान पंजाब, बिहार, उत्तर प्रदेश और मुसलमान संबंधी ब्रिटिश खुफिया विभाग के दस्तावेजों का एकाग्र अध्ययन यह बताता दीखता है कि वे गोहत्या छोड़ने के पक्ष में हैं, पर अंग्रेजों के इशारे पर ऐसा कर रहे हैं. शायद यह भी कहा जा सकता है कि गो-हत्या पर मुसलमानों का जोर १८८० से बढ़ा जो ब्रिटिश उकसावे का ही परिणाम था. साथ ही अंग्रेजों का इस पर जोर भी रहा कि ‘मुसलामानों की गोवध प्रथा’ जारी रहनी चाहिए और अंग्रेजों की ऐसी समझ बनी कि मुसलमानों को ऐसा करने की दिशा में स्वयं आना चाहिए.

लगभग  २००० वर्षों से यूरोप गोमांस का प्रमुख उपभोक्ता रहा है. इसलिए स्वाभाविक तौर पर यूरोपियों, विशेषकर अंग्रेजों ने अठारहवीं शताब्दी के शुरुआत से यानी भारत में बसने के साथ ही गोहत्या शुरू कर दी थी. शुरुआत में मारी जाने वाली गायों की संख्या अधिक नहीं रही होगी. लेकिन १८वीं सदी के अंत तक बड़े पैमाने पर गो वध होने लगा, यूरोपीय तर्ज पर तीनों ब्रिटिश सेनाओं (बंगाल,मद्रास और बम्बई प्रेसीडेंसी की सेना) के रसद विभागों ने देश के विभिन्न भागों में बड़े-बड़े कसाईखाने बनाये. इन हत्याओं के लिए बड़े पैमाने पर कसाइयों की आवश्यकता थी. मोटे तौर पर १८०० ई. से १९०० ई. तक कसाइयों की संख्या पांच से दस गुनी हो गयी.

हालांकि गो-वध बंदी आन्दोलन १८९३-९४ में परास्त हो गया पर वह समाप्त नहीं बुआ. वह साल-दो-साल के अंतराल पर १९४७ तक यानी भारत की आजादी तक चलता रहा. लेकिन तब तक भारत के सत्ता वर्ग के लोगों का न सिर्फ इस विषय को लेकर उत्साह कम हुआ, बल्कि वे गो-हत्या से होने वाले भौतिक एवं व्यावसायिक लाभों के झांसे में आ गए. आश्चर्यजनक रूप से, १९५० में जब गो-वध के पूर्ण बंदी के तरीकों को विचार-विमर्श चल रहा था, तब भारत सरकार ने विभिन्न राज्यों को वध्स्थालों को बंद न करने का निर्देश दिया क्योंकि वधस्थलों से जो गो-चर्म मिलता था वह ज्यादा बेशकीमती होता था मृत पशु के चर्म से. १९५४ में भारत सरकार ने गो-वध बंदी के तरीकों पर विचार करने के लिए एक समिति का गठन किया तो उस समिति ने यह सुझाव दिया कि भारत में जितना चारा उपलब्ध है उस से केवल ४० प्रतिशत गायों का भरण-पोषण संभव है. समिति ने यह सुझाव दिया कि शेष ६० प्रतिशत गायों को नष्ट कर दिया जाना चाहिए. इसके बाद उच्चतम न्यायालय के विद्वान जजों के निर्णयानुसार दिल में सरकार ने गायों और बछड़ों की (एवं अन्य जानवरों की) अलग-अलग कारणों से बड़ी संख्या में वध के आदेश दे दिए, और हाल के दशकों में तो सरकार ने मांस निर्यात के लिए बड़ी संख्या में आधुनिक कसाईखानों के निर्माण के लिए ऋण एवं अनुदान देने शुरू कर दिए.

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