इरशाद खान ‘सिकंदर’ नए शायरों में क्लासिकी मिजाज़ रखते हैं. उनकी शायरी में उर्दू शायरी की परम्परा की झलक दिखाई देती है. जो कुछ नौजवान शायर मेरे दिल के बेहद करीब हैं इरशाद उनमें एक हैं. उसका एक कारण यह है उनकी गजलों का पहला दीवान हिंदी में ही आया है- आंसुओं का तर्जुमा. कल दिन में मुक्तांगन के आयोजन में उनकी शायरी सुनने का मौका भी है. आज मैं अपनी पसंद की कुछ ग़ज़लें पेश कर रहा हूँ- प्रभात रंजन
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1.
यूं डांवाडोल दिल है तेरी याद के बगैर
जैसे किसी की शायरी उस्ताद के बगैर
ताजिंदगी किसी की सुनी अनसुनी करे
सुन ले किसी की बात वो फ़रियाद के बगैर
अश्कों को एहतियात से बरता करो मियाँ
ये क्या कि रो पड़ो किसी रुदाद के बगैर
उसको ये दुःख है अब कि उसे कोई दुःख नहीं
पंछी उदास उदास है सैयाद के बगैर
कुछ लोग फेंक आते हैं कूड़े के ढेर में
कुछ लोग टूट जाते हैं औलाद के बगैर
2.
हुए हैं इतने कड़वे तजरुबे कुछ
मैं डरता हूँ बहुत मीठी छुरी से
ये इल्मो-फन तो सब बैसाखियाँ हैं
बड़ा बनता है कोई सोच ही से
समंदर इस कदर खारा है क्योंकर
मिला होगा ये आँखों की नदी से
इबादत में भी है मतलबपरस्ती
मैं खुश रहता हूँ उसकी बंदगी से
बहुत से काम लेने हैं अभी तो
मियाँ इस चार दिन की जिंदगी से
मैं लिक्खूं और गर सब लोग समझें
मुझे परहेज क्यों हो फ़ारसी से
मिरे हक़ में जियादा सख्त है वो
गिराएगा कोई क्यों ऐसे जी से
3.
हम रौशनी के शहर में साहब अबस गए
फिर यूँ हुआ कि हम पे अँधेरे बरस गए
हमने दुआ बहार की मांगी जुरूर थी
कैसी बहार आई कि पत्ते झुलस गए
पढ़ पढ़ के सोचता हूँ किताबों की शक्ल में
कितने अज़ीम लोग मिरे घर में बस गए
देखा नज़ारा हमने ये ख़्वाबों में ही सही
धरती की इक पुकार पे बादल बरस गए
तजज़िया कीजियेगा जो मजहब का दहर में
हर पल में पाइयेगा कि दो चार दस गए
जिस सम्त भी चले उसी चेहरे की खोजबीन
आखिर को हम भी उसकी गली में ही बस गए
4.
दुनिया तुझे इस वास्ते हासिल न हुआ मैं
अब तक किसी किरदार में दाखिल न हुआ मैं
आसाँ हूँ बहुत, यूं भी तवज्जो से परे हूँ
मुश्किल है यही मेरी कि मुश्किल न हुआ मैं
थे हद से जियादा ही वहाँ आलिमो-फ़ाज़िल
अच्छा है कि उस बज़्म में शामिल न हुआ मैं
इक हसरते दीदार थी पूरी न हो पाई
शायद तिरे मेयार के काबिल न हुआ मैं
मिटटी के तसलसुल से मिरा जिस्म है मिटटी
खुश हूँ इसी इक बात से गाफिल न हुआ मैं
अलफ़ाज़ में नरमी है न आँखों में नमी है
सुनता हूँ कि पत्थर हूँ अभी दिल न हुआ मैं
धरती का सिरा आज तलक हाथ न आया
हूँ मौजे तलातुम कभी साहिल न हुआ मैं

