बीती हुई यादों का सम्मोहन, वर्तमान की वास्तविकता- इसी द्वंद्व के सहारे बुनी हुई इस कहानी को पढ़ना शुरू किया तो पढ़ता ही चला गया। हाल के दिनों में लेखिका लकी राजीव ने अपनी कहानियों से विशेष जगह बनाई है। जैसे यह कहानी। यह उनकी नई कहानी है। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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हर किसी की ज़िंदगी कपड़े की तरह ही होती है…किसी की सिल्क सी सरसराती हुई, किसी की कलफ़ लगी सूती कपड़े जैसी. कड़क, सीधी! मैं अपनी ज़िंदगी पर हाथ फेरूँ तो लगता है एक जूट का थान लपेटा हुआ है मैंने, खुरदुरा, चुभता हुआ, तकलीफ़ देता हुआ, गाढ़े भूरे रंग का जालीदार मोटा कपड़ा और कभी कभी ये ज़्यादा चुभने लगता था- जैसे कि इस वक्त! पता नहीं क्यों आज शाम ये जूट कुछ ज़्यादा ही चुभ रहा था,ज़िंदगी इतनी बोझिल क्यों होती जा रही है …ऑफिस से घर और घर से ऑफिस, इसके बीच में कोई और पड़ाव क्यों नहीं आता?
“दीदी…ये आया था, इसको देते समय डाकिए ने नाम भी लिखवाया मेरा” घरेलू सहायिका निम्मो ने मेरी ओर एक लिफाफा बढ़ाया, “वहीं रख दो, देखती हूँ अभी थोड़ी देर में” मैंने अधखुली आँखों से लिफाफा देखकर टालना चाहा लेकिन मेरे नाम “निधि जैन” का एन देखकर एक पल को साँस अटक गई! नहीं..ये नहीं हो सकता! इस तरह एन लिखने वाला मुझे चिट्ठी नहीं भेज सकता, मन के अलग अलग कोने से बहुत कुछ आकर एकदम बीचोबीच इकट्ठा होने लगा था..हाथ बढ़ाकर लिफाफा लेते समय एक कंपन सी महसूस हुई..ये वही एन था,घुमाकर बनाया गया एन! एक एक सेकंड अपने को खींचकर लंबा हुआ, पंद्रह सेकेंड पंद्रह मिनट बने, तब वो लिफाफा खुला, “निधि, अगर ये लेटर तुम पढ़ रही हो और अगर मुझे अब तक पहचानती हो, तो इस ऐड्रेस पर आ ही जाओगी। पांच जनवरी को महाबलेश्वर पहुँच रहा हूँ, एक ग़लती मुझसे हुई थी, उसके लिए मैंने अब तक माफ़ी नहीं मांगी है। आ जाना प्लीज़,मना मत करना! फोन ट्राई किया था, मिला नहीं,शायद तुम्हारा नंबर बदल गया है। मेरा नंबर वही है पुराना,फिर से भेज रहा हूं, इंतज़ार करूंगा…
मनीष
पढ़ते ही, मेरे आस-पास सब कुछ जैसे धुआं धुआं हो गया था.. कुछ दिखाई नहीं दे रहा था! आँसू एक के बाद लगातार आते हुए एक दूसरे से होड़ में लगे हुए थे…
“क्या हुआ दीदी?” मुझे रोता देख निम्मो चौंक गई थी,
मैंने आँसू पोंछते हुए बताया,
“कुछ नहीं…ऊपर से लाल वाला सूटकेस उतार दो,पैकिंग में हेल्प कर दो। कल सुबह मुझे कहीं जाना है।”
वह रात कितनी काली थी! इतनी काली कि मैं कुछ देख भी नहीं पा रही थी, कुछ सोच भी नहीं पा रही थी..इतना भी नहीं सोच पा रही थी कि मुझे महाबलेश्वर क्यों जाना चाहिए? किसके लिए मैं फटाफट पैकिंग करके अलस्सुबह निकलने को तैयार थी? जो आदमी मुझे “जाहिल हो तुम” कहकर बहुत सालों पहले छिटक चुका था। उस आदमी की एक चिट्ठी पर मैं पागलों की तरह सामान बाँधने में लग गई थी, वो तो शायद अपने परिवार के साथ वहाँ घूमने आया होगा, और मैं निपट अकेली वहाँ जाकर झेंपते हुए बताऊंगी, कि नहीं.. मैंने तो फिर किसी को चुना ही नहीं,शादी की ही नहीं…
कितनी बार मैं यहाँ से महाबलेश्वर गई, मुश्किल से घंटे भर का रास्ता आज कितना दूर लग रहा था.. कितनी ही बातें, कितने सवाल मेरे सामने आकर सिर उठा रहे थे लेकिन मैं केवल एक बुलावे पर दौड़ी चली जा रही थी, सही तो कहा था मनीष ने… मैं हूँ ही जाहिल!
मनीष की और मेरे परिवार के बीच सालों की दोस्ती थी, हम पड़ोसी थे… हम साथ बड़े हुए, वह मुझसे कुछ सालों बड़े थे, लेकिन हमेशा टोक दिया करते, “प्लीज़ निधि, भइया मत कहा करो”
मैंने भी उन्हें इस संबोधित से जोड़कर देखा ही कब था? माँ की घूरती आँखें भले ही मुझसे छुटपन में ये शब्द कहलवा गई हों, लेकिन बड़े होते होते हमारे रिश्ते को एक नया नाम मिल चुका था।
“कल कितना सारा तेल चुपड़ी हुई थी तुम सिर में? मेरे घर तक महक आ रही थी, बाल एकदम चिपके हुए” मनीष ने एक दिन टोक दिया, जब मैं आंटी के पास किसी काम से आई थी,मैंने झेंपते हुए कहा,
“आपको नहीं पसंद? आइंदा नहीं लगाऊँगी।”
मनीष दाएँ-बाएँ देखते हुए आगे बढ़े और मेरी आँखों में झाँकते हुए बोले,
“बाल चिपकाकर और प्यारी लगने लगती हो…मेरे लिए रुकना मुश्किल हो जाता है”
मेरा चेहरा गुलाबी हो गया था या लाल,ये कहना मुश्किल था..बस इतना पता है कि तपने लगा था! बिना कुछ कहे मैं अपने घर वापस चली आई थी, बहुत देर तक वह तपन मेरा चेहरा जलाती रही या कहूँ मेरा चेहरा सहलाती रही! उस दिन के बाद से ये चुहलबाज़ी आम हो गई थी..कभी मनीष मेरा हाथ थाम लेते, कभी सीढ़ियों पर मुझे रोक लेते,
“मुझसे भागती क्यों हो निधि?”
मैं कछुए की तरह अपने खोल में सिमटते हुए मुस्कुरा देती,
“भागती नहीं हूँ..बस”
मनीष मेरे इस रवैये से नाराज़ होने लगे थे, कभी बताते कि उनका दोस्त अपनी गर्लफ्रेंड के साथ तीन दिनों के लिए गोवा घूमकर आया, कभी बताते कि उनका कज़िन अपनी गर्लफ्रेंड के साथ मूवी की कॉर्नर सीट पर बैठता है, ये सब बताते हुए वो एक जुमला ज़रूर जोड़ देते,
“और एक मेरी गर्लफ्रेंड है..हाथ पकड़ लूँ, तो आफ़त आ जाती है।”
मैं हँसती हुई बात को टाल जाती थी, हालांकि मन में एक सपना जन्म ले लेता था। मैं और मनीष गोवा में हाथ थामे घूम रहे हैं, मनीष मुझे लहरों में धकेलकर हँसते हैं और मैं हड़बड़ाकर उनसे चिपक जाती हूँ..लेकिन इस सपने में एक बात और रहती थी, मेरी माँग में सिंदूर चमक रहा होता था और आस-पास के लोग पूछते थे, “न्यूली मैरिड?”
उस दिन मनीष की मम्मी और मेरी मम्मी बाज़ार गई हुई थीं, मनीष का फोन आया,”तुरंत आओ, किचन में कुछ गड़बड़ कर दी है मैंने।”
मैं भागते हुए उनके घर पहुँची, मनीष दरवाज़े पर खड़े मुस्करा रहे थे, “क्या बना रहे थे आप किचन में? कुछ जलाया क्या?”
मनीष ने दरवाज़ा बंद करते हुए मेरा हाथ थाम लिया, “हाँ..दिल जला रहा हूँ अपना”
मैंने हँसते हुए अपना हाथ छुड़ाया लेकिन ,उस दिन मनीष की आँखें कुछ अजीब सी थीं, “निधि! तुम प्यार नहीं करती मुझसे? इस तरह दूर क्यों भागती हो?”
मनीष मेरे एकदम पास खड़े हुए, मेरी आँखों में देख रहे थे, मैंने आँखें नीची करके कहा, “मुझे ये सब सही नहीं लगता।”
मनीष ने मेरा हाथ फिर से थाम लिया, “क्या सब सही नहीं लगता? एक किस ही तो माँग रहा हूँ यार।”
मैंने धीरे से कहा, “हाँ,वो भी, शादी से पहले ठीक नहीं लगता मुझे।”
मेरे इतना कहते ही मनीष ने मनीष ने मेरा हाथ छोड़कर मुझे ढकेल दिया,
“जाहिल हो तुम..एक नंबर की जाहिल हो, गेट लॉस्ट।”
बगल की दीवार पर भिड़ने से मेरी कुहनी में चोट लग गई थी, हल्का सा खून बहा, लेकिन इससे कहीं ज़्यादा चोट मेरे मन को लगी थी! मेरे सामने मुँह फेरे खड़ा इंसान वो था ही नहीं, जिसको मैं कई सालों से चाहती थी… पता नहीं ये कौन अजनबी मेरे सामने खड़ा था जिसको ना मेरी कुहनी से रिसता खून दिख रहा था, न आँसुओं से तर-बतर मेरा चेहरा! कुछ पल वहाँ ठहरने के बाद मैं अपने बिखरे टुकड़े बटोरकर वापस घर लौट आई थी, वे टुकड़े जिनको आपस में दोबारा जोड़ने में मुझे महीनों लग गए थे..तब भी मैं पहले वाली निधि तो बन ही नहीं पाई थी! कारण साफ था, एक टुकड़ा वहीं रह गया था, मनीष के पास…ना वो मिला, ना मेरा अधूरापन गया! दिन महीनों में और महीने सालों में बदले..मेरी नौकरी दूसरे शहर में लग गई थी और मैं अपनी जड़ें वहाँ से खींचकर दूसरे शहर में रोपने की कोशिश करने लगी थी।
जड़ें भी भला खिंचती हैं क्या? मनीष की खबर, मेरी मम्मी बिना पूछे मुझे देती रहतीं, “इतनी सुंदर है उसकी बीवी,क्या बताएँ कितनी सुंदर।”
“मनीष की बिटिया हुई कल..एकदम अपने पापा जैसी है।”
“मनीष की बीवी बड़ी लड़ाका है, मुँह बना रहता उसका हरदम।”
मैं सुनकर हाँ, हूँ करके टालती रहती। पापा के रिटायर होने के बाद वो शहर उनसे भी छूट गया…धीरे धीरे खबरें मिलना कम हुआ, लेकिन ग़म जस का तस रहा, ना उसे कम होना था, ना वो कम हुआ! पता नहीं क्यों कुछ सालों पहले मैंने एक रात “आप कैसे हैं? कुछ बात करनी थी।”
लिखकर, मैसेज भेज दिए थे.. जिनका कोई जवाब नहीं मिला, साफ़ दिख रहा था कि मेरा नंबर ब्लॉक कर दिया गया था। मेरे घायल मन पर एक चोट और पड़ी थी। अगले दिन जाकर मैंने अपना नया सिम ले लिया था, मनीष का नंबर फोन से मिटाया, वो तो मिट गया… लेकिन कितना कुछ था जो मिटा ही नहीं! कितने साल इसी तरह बीत गए, और आज इतने सालों बाद मुझे इस तरह चिट्ठी लिखकर बुलाना कितना अजीब था और मेरा बौराए हुए मिलने भाग जाना..उससे भी ज़्यादा अजीब!
“जगह तो यही है मैडम..” टैक्सी ड्राईवर ने एक रिसॉर्ट के सामने गाड़ी रोकते हुए बताया,उसकी आवाज़ सुनकर मैं आज में वापस आई, “हाँ, सामान उतरवा दीजिए।”
अपना सूटकेस घसीटती हुई मैं रिसेप्शन पर पहुँची तो मुझे मनीष के रूम का रास्ता दिखा दिया गया। कमरा रिजॉर्ट के आखिरी कोने पर था, एकदम सुनसान कोना, आस-पास पेड़ों के झुरमुट, बादलों से घिरा महाबलेश्वर वैसे भी सूरज की रोशनी को नीचे कम ही पहुँचने देता है, ऊपर से हल्की बूंदाबांदी शुरू हो गई थी…
“कौन है?” मेरे खटखटाने पर एक हल्की आवाज़ आई, ये मनीष ही थे। कानों में सूं जैसा कुछ गूंजा!
“मैं..निधि।”
दरवाज़ा कुछ देर बाद खुला, या मुझे ही ऐसा लगा। सफेद कुर्ता पाजामा पहने मनीष मेरे सामने खड़े थे! कनपटी के पास के बाल सफेद हो गए थे, चश्मा लग गया था.. ज़िंदगी में सिगरेट की उपस्थिति उनके होंठ भी बता रहे थे, कमरे के अंदर से आती महक भी..और चेहरा? जैसे किसी बीमारी से उठे हों!
“मैं कल भी वेट कर रहा था, मुझे लगा कि शायद परसों लेटर मिल गया होगा..अंदर आओ।”
मैं हिलकर रह गई थी! इतने सालों बाद भी इतना अधिकार! कैसे पता कि लेटर मिलते ही मैं भागी आऊंगी? और ये “अंदर आओ” का साधिकार निमंत्रण, किसी आज्ञाकारी शिष्या की तरह मैं उनके पीछे-पीछे आ चुकी थी..कमरा फैला हुआ नहीं था, बस साईड टेबल पर सिगरेट के पैकेट और भरी हुई ऐश ट्रे माहौल में घुटन पैदा कर रहे थे।
“खिड़की खोल दूँ?”
उन्होंने खुद ही पूछा, मैंने कमरे में नज़र दौड़ाते हुए हाँ कहा, लग रहा था कोई और आया ही नहीं है वहाँ… मैंने पूछा,
“ऑफिस के काम से आए हैं? अकेले ही आए हैं?”
मनीष ने मेरा सूटकेस अंदर लाते हुए कहा, “तुम भीगी हुई हो निधि, चेंज कर लो पहले।”
अपने लरजते मन को मैंने कसकर डाँट लगाई! कितनी ढीली पड़ गई थी मैं यहाँ आते ही..छि:…क्यों नहीं हड़काकर पूछ ले रही हूँ, “क्यों बुलाया मुझे यहाँ इतनी दूर?”
फिर अपनी ही बेवकूफी पर हँसी आई, अपने मन की दुर्बलता का प्रमाण पत्र तो मैंने यहाँ आकर ही दे दिया था।
“सोचने की आदत गई नहीं? चेंज कर लो जाकर यार, मैं बाहर बैठा हूँ।”
मनीष डाँटते हुए बाहर जाकर बैठ गए थे। मैंने सूटकेस खोलकर एक साड़ी बाहर निकाली! कमरे में मनीष की महक थी, वो अब भी यहाँ मौजूद थे.. मुझे हो क्या रहा था, एक सम्मोहन मुझ पर हावी होने लगा था, घड़ी देखी..एकाध घंटे में बात करके तुरंत वापस लौट जाऊंगी, इससे ज़्यादा ठहरने का कोई तुक नहीं था।
“एक कप चाय मँगवा दीजिए” बाहर आकर मैंने उनके सामने वाली कुर्सी पर बैठते हुए कहा, “यहाँ ठंड है।”
वो बिना जवाब दिए उठे और रूम सर्विस को फोन करके फिर बाहर आकर बैठ गए, “ठंड है.. लेकिन अंदर तुम बैठोगी नहीं,जानता हूँ। ठंडी हवा से लड़ती भी हो, तुम्हें भाती भी वही है… याद है, बालकनी में रात को खड़े होकर ठिठुरती थी, फिर आंटी हड़काती थीं।”
कितनी पुरानी, मेरे बचपन की बात बताते हुए वो हँसने लगे थे, फिर हँसते हँसते खाँसने लगे थे..मेरी आँखें हैरत से फैल गई थीं,इतनी पुरानी बात याद है इनको? मैं सिर नीचा किए कमरे के बाहर की उस फर्श पर निगाह गड़ाई रही..बाहर की बूंदों ने एक सीमा रेखा बना दी थी,एक तरफ़ पूरी तरह गीली फर्श और दूसरी ओर एकदम सूखी हुई..जैसे मेरा मन किसी ने यहाँ खींचकर फैला दिया था..इतना ही सूखा और इतना ही गीला रहता है, एकसाथ!
“घर में कौन-कौन है निधि?” एक नई सिगरेट सुलगाते हुए उनका सवाल आया.. मैंने मुँह फेरते हुए कहा, “इसे बुझा देंगे प्लीज़,खांसी आने लगती है।”
एक सेकेंड के आधे हिस्से में सिगरेट ऐशट्रे में कुचलकर वो अगले आधे सेकेंड कुछ सोचते हुए बोले,
“अभी तक वो सब ठीक नहीं हुआ? तुम हल्दी और कुछ..हाँ, कालीमिर्च खाती थी ना, कहती थी चला जाएगा।”
कितना याद है इनको.. मैंने पूरी हिम्मत बटोरकर सिर उठाया, “कैसी है आपकी वाईफ और बच्चे? एक बेटी है और एक बेटा है ना?”
“नहीं, दो बेटियाँ हैं, ठीक ही है सब।”
बोलते हुए उनकी आवाज़ ख़ाली हो गई थी,दो पलों के सन्नाटे के बाद मैंने बात शुरू की,
“मुझे थोड़ी देर में वापस निकलना है, आप बताएंगे किसलिए इतनी दूर बुलाया।”
मनीष ने सिर हिलाया,” तुम्हारा फोन नंबर बदल गया है क्या? फोन नहीं लगा तो ऐड्रेस मिला, मम्मी के पास था…”
मैंने उनकी बात काटकर पूछा, “मैंने आपको कुछ मैसेज भेजे थे,शायद आपको मिले ही नहीं..मिले थे क्या?”
“जानती हो निधि…सीढ़ियाँ चढ़ते समय साथ में वज़न कम रखना चाहिए, नहीं तो चढ़ना और मुश्किल हो जाता है।”
“ये मेरे सवाल का जवाब नहीं, मैसेज मिले थे या नहीं?”
“तुम्हारी यादें मेरे लिए भारी वज़न की तरह हैं और ये ज़िंदगी तुम्हारे बिना एक पहाड़ की चढ़ाई जैसी। एक भी याद बढ़ाना अफोर्ड नहीं कर सकता, मैसेज मुझे नहीं मिले…तुम्हारा नंबर ब्लॉक कर दिया था!”
मनीष एक साँस में सब बोलकर चुप हो गए थे! वेटर चाय लेकर आ चुका था, बाहर बादल थोड़े और काले होने लगे थे,शाम ने हाथ खींचकर रात को अपने पास बुला लिया था…चाय का पहला घूँट मैंने भरा ही था कि पूरी ताकत से आसमान ने बौछार छोड़ दी, “उठो..अंदर चलो..पानी यहाँ तक आ जाएगा, फिर तुम्हारी खाँसी भी बढ़ जाएगी।”
मनीष हड़बड़ाकर उठे, वेटर भी सामान लेकर कमरे में गया। एक लम्हा मेरी आँखों के आगे से लहराकर गुज़र गया! पहले भी कभी स्कूल से लौटते वक्त मुझे भीगता देखकर मनीष टोक देते थे, “हिरोईन बने भीग रही हो, खाँसती रहना फिर…”
पुरानी यादें जैसे एक के बाद एक पन्ना पलटती हुई सामने आती जा रही थीं, मैं वापस पुराने समय में लौटती जा रही थी। नहीं, नहीं जाना मुझे उस समय में!
“मैं निकलूँगी अभी वापस..आप जल्दी बात खत्म करिए” कमरे के अंदर बेड के किनारे सुकड़कर बैठे हुए मैंने कहा,मनीष चाय कप में डालते हुए एकदम गंभीर थे,
“बात खत्म करूँ? शुरू तो करने दो..बताओ ना फोन नंबर बदल लिया था क्या?”
“हाँ..नया सिम लिया” मैंने चाय का कप थामते हुए कहा, “फ़ोन में नया सिम.. ज़िंदगी में नया रिश्ता.. हसबैंड कैसे हैं निधि? तुम खुश हो ना?”
जी में आया, इसी वक्त ये गर्म कप कालीन पर फेंककर चिल्ला दूँ, बता दूँ कि नए रिश्ते से जुड़ना मेरे लिए सिम बदलने जैसा आसान नहीं है…बस सोचती रही, कर कुछ नहीं पायी, ना कप पटका गया, ना चिल्ला कर कुछ बोला गया, बस धीरे से आवाज़ निकली, “शादी नहीं की मैंने…”
मेरे बोलते ही बाहर ज़ोर की बिजली कड़की थी, तड़ाक! किसी बड़े अभिमानी पेड़ पर गिरकर उसको धराशायी करने के लिए काफ़ी रही होगी… पेड़ गिरा पड़ा होगा ज़मीन पर, मेरे सामने भी एक अभिमानी परास्त खड़ा था, हतप्रभ… पहले मनीष की आँखें हैरत से फैलीं, फिर धीरे धीरे भीगने लगीं!
वो चाय का कप लिए धीरे धीरे चलते हुए मेरी ओर आ रहे थे, मैंने कोशिश की..थोड़ी और कोशिश की.. लेकिन नहीं सँभल पाई, चाय का कप साईड टेबल पर रखकर, दोनों हाथों से मुँह ढाँपकर फफक पड़ी! क्या था इतना मेरे अंदर जमा हुआ, जो इस तरह पिघलकर बह निकला था… वो भी उसके सामने,जो इस तकलीफ़ का कारण था!
“सॉरी” अचानक मैं सँभली, अपने आँसू पोंछे.. घड़ी देखी..अब एक पल भी यहाँ रुकना ठीक नहीं, मैं तेजी से अपने सूटकेस की तरफ़ बढ़ी, मनीष अभी भी उसी पल में रुके हुए थे,
“निधि..मुझे कुछ कहना था”
मेरे हाथ अचानक रुक गए थे…मुड़कर उनको देखा, भीगी आँखें, चेहरे पर अफ़सोस फैला हुआ, और …कुछ और भी!
मनीष बिस्तर पर जाकर बैठ गए थे, सिरहाने सिर टिकाकर आँखें मूंद ली थीं और जैसे ख़ुद से बोलते जा रहे थे,
“मैं तुमसे भागता रहा..तुमसे नाराज़ रहा..तुमसे बात नहीं करना चाहता था, लेकिन ये सच नहीं था! मैं ख़ुद से नाराज़ था…मैं तुमसे भाग ही नहीं सकता यार, तुम मेरे लिए कोई एक रिश्ता नहीं हो, तुम सबमें से थोड़ा थोड़ा मिलकर बनी हो, मैं हर रिश्ते की भरपाई तुमसे करता रहा! निधि, सुन रही हो?”
मैं अपने सूटकेस के बगल में बैठी, अपनी पीठ पर मनीष की नज़रें महसूस करती रही। कुछ देर रुककर वो फिर बोले, “सफाई नहीं दे रहा हूँ,बस बता रहा हूँ..मेरे ऊपर एक सनक हावी थी, पता नहीं कैसे दिन थे वो, मैं तुमको देखता था तो तुम्हारे पास आना चाहता था, इस पास की आस में हम कितने दूर हो गए।”
मैं धीरे धीरे दरकने लगी थी, लगा टूटकर यहीं बिखर जाऊँगी या कुछ और बिखेर दूँगी!
“एक बार मेरी ओर देखो ना..बिना तुम्हें देखे मैं वो बात नहीं कह सकता”
ये कौन सा रिश्ता था जो मुझे कठपुतली की तरह नचा रहा था, मैं उनके साथ इतनी देर से कमरे में अकेली थी और अब उनके एक बार कहने पर, उनके बगल में जाकर खड़ी हो गई थी..बाहर बादलों ने अंधेरा कर रखा था, कमरे में हल्की पीली रोशनी वाला टेबल लैंप ही जल रहा था,तब भी मनीष के चेहरे पर फैला अपराध बोध और आँखों में झिलमिलाते आँसू मुझे साफ़ दिख रहे थे, “निधि,मुझे माफ़ कर सकती हो?”
मनीष की काँपती हुई आवाज़ सुनाई दी…बाहर एक बार फिर बिजली कड़की और मैं एक छोटी बच्ची की तरह उनसे लिपटकर रो पड़ी थी! ये कौन सा पल था,जो हमारे बीच जी रहा था? ये आज किस तरह हम मिल रहे थे? हम कौन थे इस समय? मैं जिससे लिपटी रो रही थी, वो किसी और का पति था.. नहीं, मैं जिससे लिपटी रो रही थी ..ये वो लड़का था,जिससे प्यार करने के बाद मैं किसी से प्यार कर ही नहीं पायी और जो एक लंबे समय तक घुटन में रहकर, मुझसे माफ़ी मांगने आया था। बाहर बारिश का शोर ज़्यादा था या कमरे के भीतर इस दुख का..ये पता नहीं, बस इतना पता था कि वक्त एकबार फिर हमें अलग करने के लिए तैयार बैठा था। इधर मेरा सिर सहलाते हुए मनीष के आँसू नहीं रुक रहे थे और उधर वो घड़ी नहीं रुक रही थी…टिक टिक करते हुए, हमारे बचे-खुचे पल एक एक करके छीनती जा रही थी!
“मुझे जाने दीजिए…” मेरे लिए ये दुख सहन करना अब मुश्किल होता जा रहा था, मनीष ने भरे गले से कहा, “चली जाना… रोक नहीं सकता… बस एक बार मेरा नाम लो।”
आँसू आकर मेरे गले में अटक रहे थे, बमुश्किल मैंने कहा, “मुझे जाने दीजिए मनीष…”
उन्होंने उसी तरह मेरा सिर सहलाते हुए जवाब दिया, “कुहनी वाली चोट ठीक हो गई निधि? मुझे अब भी वहाँ से खून बहते दिखता है।”
बाहर बारिश और तेज़ हो गई थी…बाहर की फर्श अब पूरी तरह भीग चुकी होगी। मेरा मन भी मैंने छूकर देखा, अब तो कोई भी कोना सूखा नहीं बचा होगा। सब कुछ तो भीग गया होगा, है न!
लेकिन नहीं, ऐसा था ही नहीं। ये सब कुछ ऐसा था जैसे प्लास्टिक पर पानी छिड़का जाए और वो बूंदें ठहरने के बजाय, सरक कर नीचे गिर जाएं!
“तुमने मुझे माफ़ कर दिया न?”
मनीष की आवाज़ लगातार सुनाई देती रही, मैं ‘हां’ कह क्यों नहीं पा रही हूं?
मैं कहना ही नहीं चाहती हूँ क्या? मुझे कहना क्या है आख़िर? मैंने उनकी बाँहों के घेरे से ख़ुद को आज़ाद करते हुए बोलने की कोशिश की, “मनीष, एक बार जहाँ चोट लग जाती है, खून बहना भले ही रुक जाए, दर्द कम नहीं होता.. वो भी तब, जब इलाज इतने लंबे समय बाद मिले। इतने सालों बाद आपको लगा कि माफ़ी मांगनी चाहिए? अब तक कहाँ थे आप? अब तक तो बहुत सारा ख़ून बह गया।”
मनीष कुछ और कहने की कोशिश में, लेकिन मैं अपनी बात कहती ही जा रही हूँ, हर बीतते पल के साथ आवाज़ ऊंची होती जा रही है, इतनी ऊंची कि लग रहा है,कोई चीख रहा है…
“दीदी, दीदी..क्या हुआ है आपको? आप नींद में बहुत तेज चिल्ला रही थीं? पानी लो, पानी पियो दीदी।”
निम्मो डरी हुई, मेरी ओर पानी का गिलास बढ़ा रही है। आस-पास देखकर मुझे अच्छा लग रहा है, मैं यही हूँ, अपने घर में! कोने में रखा लाल सूटकेस बता रहा है कि मुझे महाबलेश्वर के लिए निकलना है, मैंने एक गहरी साँस खींचकर कहना शुरू किया है, “सूटकेस ख़ाली करके वापस वहीं रख दो, जहाँ जाना था, अब नहीं जाना है।”
इतना कहने के साथ ही मनीष की भेजी चिट्ठी भी फाड़नी शुरू कर दी है, कुछ अजीब सा महसूस हो रहा है, कुछ अच्छा सा! टेढ़े मेढ़े कागज़ के टुकड़े डस्टबिन में गिरते समय बूंदों जैसे लग रहे हैं, वो बूंदें जो मेरे मन पर गिर रही हैं, मन का सूखा हिस्सा अब जाकर भीग पाया है।

