• कविताएं
  • प्रियंवद की कहानियाँ यतीश कुमार की कविताएँ

    हिन्दी के सबसे महत्वपूर्ण कथाकारों में एक प्रियंवद के कहानी संग्रह ‘कश्कोल’ को पढ़कर ये कविताएँ लिखी हैं यतीश कुमार ने। यतीश कुमार ने काव्यात्मक समीक्षा की यह विधा शुरू की और उनका कहना है कि किताबें उनको चुनती हैं। इस बार प्रियंवद जी की कहानियों ने उनको चुना। आप भी पढ़िए- मॉडरेटर
    =======================

    1.

    खंभों पर पतंग नहीं
    वक्त की फँसी हुई हिचकियाँ हैं

    मकानों और यादों से
    छनती हुई रोशनी आ रही है

    यादों के रेशे उड़ाते हुए
    नंगी होती जा रही हैं शाखें
    गुजर कर भी मौसम ठहरा हुआ है
    दरअसल, यह समय के ठिठुरने का समय है

    कोहरे के भीतर बूंदे
    कुनमुना कर उग रही हैं
    दरअसल यह कोहरा नहीं
    चमकती सुबह का उठता परदा है

    थोड़ी देर को लगा
    मुट्ठी में आकाश समेटे
    सपना करवट तो नहीं ले रहा

    फिर लगा
    परिंदा भीतर फड़फड़ा रहा है
    या उड़ान भरने की तैयारी में है

    असमंजस में हूँ
    कि प्रदक्षिणा पथ
    समय की चकरघिन्नी है
    या उसको तोड़ने का रास्ता

    2.

    बदलते रंग के साथ
    सब से ज़्यादा करतब
    दिखाती हैं आँखें

    पता ही नहीं चलता
    पनियाली, आसमानी
    कब लाल हो जाती हैं

    आँखें तीर कमान चलाते- चलाते
    कभी- कभी थूक भी देती हैं
    थूकती आँखों में
    सूखता जाता है डबडब आँख का पानी

    हज़ार आँखों की जब
    सिर्फ़ एक आँख होती है
    तब यह समवेत शोर में बदल जाती हैं

    शोर की किरिच नज़र
    गिरती है जिसपर भी
    वह हाँफते हुए जानवर में बदल जाता है

    दरार से झाँकती आँखों में
    अब ख़ुद दरार फैल रही है
    भरती जा रही है वहाँ
    धूल जयघोष की

    उतरते ख़ून को देखते हुए
    फैलती आँखें, खुली रह गईं
    और अब धूल से सनी ज़मीन पर
    गोटियों सी बिखरी हैं आँखें

    उन्मादी जयघोष का शंख
    अब शांति से एकटक
    पसरा सन्नाटा देख रहा है

    अब वहाँ
    शोर से ज़्यादा
    डरावना हो चुका है
    सन्नाटा…

    3.

    यादें अगर पेड़ से छनकर
    आती- जाती धूप की बजाय
    खूँटी पर टँगी शर्ट में बदल जाये
    तो मन भीगे कपड़े-सा भारी हो जाता है

    नींद पर उगते
    जुगनू जैसे ख़्वाब
    जाग का सबब बन जाता हैं

    चूहेदानी के काँटे में फँसी
    रोटी का टुकड़ा बन जाते हैं हम

    और देखते- देखते
    आँखों में चिराग़ देखने वाला आदम
    ख़ुद बम में बदल जाता है

    उसे नहीं पता
    कि दुनिया कितनी भी बड़ी हो
    नफ़रत के दायरे से छोटी ही है

    4.

    भागने और दौड़ने के अंतर को भुलाये
    पूरा शहर, बदहवास दौड़ में है

    भागता हुआ इंसान
    यह भी भूल जाता है
    कि अंत में तो
    रुकना ही लिखा है

    लड़ते हुए हम
    यह भी भूल जाते हैं
    कि असली लड़ाई कौन सी है

    अंतिम साँस को छोड़ते हुए
    उसे ही पीने के लिए अभिशप्त हम
    भूल जाते हैं
    कि उपकथाओं में बदलते जा रहे हैं हम

    हम अब
    शहर की उन गलियों की तरह हैं
    जो मुख्य सड़क से
    पूरी तरह कट गयी हैं

    नहीं समझते
    कि गुच्छे से टूटने का डर
    खतरनाक होता है

    दुनिया इन दिनों बड़ी डरावनी
    और सपने छोटे होते जा रहे हैं …

    डर के इस बवंडर के बीच
    प्रार्थनारत हूँ
    कि कम से कम
    खो जाने और भूल जाने का अंतर बचा सकूँ

    5.

    सिर्फ़ पोखर को नहीं
    डूबते सूरज का इंतज़ार
    मछली के गलफड़े को भी है

    उम्र निकल जाती है
    यही समझने में
    कि हम चक्की का कौन सा पाट हैं
    स्थिर या घूमने वाला

    या फिर
    उभरे हुए टीले पर
    बीतने से पहले की
    ठिठकी हुई शाम हैं हम

    छिलके की तरह अलग होना
    प्रेम की पहली सीख है
    सीख के इस क्रम में
    सीखना हमेशा बाक़ी रह जाता है

    सिगरेट का कश
    राख छोड़ते हुए
    समय को यूँ पी लेता है
    कि उम्र भी बस धुआँ ही तो है

    और कभी-कभी
    दुख को
    इसलिए भी पिया जाता है
    कि वह किसी और की ग्लानि बन जाये

    6.

    आने वाले पल को
    जाने वाले पल के साथ जोड़ना चाहता हूँ
    बिना जाने
    कि आने वाला पल, जाने वाले की जगह नहीं ले सकता

    यह भी जानता हूँ
    कि निःशब्द बहता मन
    हर बार
    आँसू नहीं होता

    दरवाज़ा खोलते हुए
    मन ने कहा
    मन का दरवाज़ा कब खुलेगा

    उसने कहा
    “मैं तुम्हारे लिए हमेशा अच्छा चाहती हूँ”

    मन ने कहा
    “अच्छा चाहने के बजाय
    सिर्फ़ चाहती हो कह देती
    तो फिर से जी लेता ”

    7.

    सुबह के पहले की सुबह को देखना
    प्रार्थनाओं को जगाना है
    और प्रार्थनाओं की नींद में रहना
    इंद्रियों को जगाना

    पाँचों इंद्रियों द्वारा
    एक साथ संचित अनुभव
    लेखनी में सबसे बड़ा सच है
    पर इससे जरूरी है सच को गढ़ देना

    लिख देने से
    सच को पाँव मिल जाता है

    किंवदंती है कि ईश्वर ने पहले कहानी ही सुनाई
    कहानियों ने लोगों के दुःख कम किए
    और अब मैं भी
    ईश्वर की तरह कहानी सुनाना चाहता हूँ

    असल में मैं
    प्रार्थनाओं के भीतर के दुःख को सुनना चाहता हूँ
    ताकि ईश्वर की कान में जाकर फुसफुसा पाऊँ
    और वह मेरी कहानी सुना दे …

    8.

    समय का अंतर
    इतना बड़ा है
    कि लहर
    कभी गीत तो कभी चाबुक लगती है

    सिसकियों में जादू होता है
    वे अक्सर
    बातों को ढक लेती है

    अजीब बात यह है
    कि इंसान के नहीं
    पेड़ के आँसू
    अमृत में बदल जाते हैं

    और यह भी
    कि चाहे लकड़ी हो या जीव
    कटने के बाद
    चीजें साँस छोड़ने लगती हैं

    प्रेम में अक्सर
    संयोग मुखर हो उठता है
    काटना- हटाना- छाँटना भी
    पेड़ के पोषण में बदल जाता है

    पौधों की प्यास धूप में बढ़ जाती है
    विडंबना है
    कि धूप में पानी पीने से
    वे जल भी जाते हैं

    9.

    थोड़े-थोड़े को पूरा-पूरा किया
    तब पूरा
    थोड़ा-थोड़ा हुआ

    मोती बनने की चाह में
    सीप भर समन्दर
    थोड़ा-थोड़ा पीता रहा

    पूरा चाहा
    तो बनता मोती
    समंदर निगल गया

    थोड़ा-थोड़ा देखा जब तक
    पूरी वो पास थी
    पूरे की चाह में
    पूरी वह राख थी

    नहीं समझा
    कि थोड़े ने थहाया
    या फिर
    पूरे ने डुबोया

    थोड़ा-थोड़ा दुःख दूर करने के पैसे लगते हैं
    ऐसा अस्पताल में उस डॉक्टर ने कहा
    वहाँ देखा मैंने
    पूरा दुःख दूर करने के पैसे नहीं लगते

    थोड़े की खोल में
    बुद्ध-सी मुस्कान बची रही
    बुद्ध बनने की चाह में
    खोल और मुस्कान दोनों गुम हुए

    समझाया बुद्ध ने
    कि पूरा कुछ भी नहीं, बल्कि अंत है
    और अंत में पूरा कभी नहीं दिखता

    थोड़ा मुझे हमेशा से प्रिय रहा
    पर पल- पल मरते हुए मैंने
    थोड़े के विरुद्ध पूरी प्रार्थना की
    कि हे ईश्वर मुझे थोड़ा-थोड़ा नहीं पूरा ही मार दो

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    1 mins