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  • मेरी चेचिस की तारीख 18 अगस्त है

    आज गुलज़ार साहब 90 साल के हो गये। उनकी कला यात्रा पर यह लेख लिखा है कवि, प्राध्यापक, लोक संस्कृति के अध्येता पीयूष कुमार ने। आप भी पढ़िए- मॉडरेटर

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    ‘वो उम्र कम कर रहा था मेरी, मैं साल अपने बढ़ा रहा था…’ यह लाइन गुलज़ार साहब पर बिल्कुल फिट है। उनकी उम्र के साये जितने लंबे होते जा रहे हैं, वे उतने ही अपने समय में सिमटते जाते हैं। उनकी यह बात पहचानना –  समझना हो तो उनकी भाषा देखिए, उनके कहन की डिक्शनरी देखिए। यह होता है एक अदबी का अपडेटेड होना। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर को वाणी का डिक्टेटर कहा है। मुझे कबीर के बाद गुलज़ार साहब भी अपने कहन के कारण आज के दौर में वाणी के डिक्टेटर लगते हैं। उन्होंने लफ़्ज़ों के साथ जितने सफल प्रयोग किये हैं, वह बेहद अलहदा और अभी किसी और में नहीं दिखाई देता है।

     

    गुलज़ार साहब के लफ्ज़ उनकी आवाज में जिस तरह जाहिर होते हैं, वह भी कमाल है। वे जब अपनी नज़्म पढ़ते हैं या जिस अंदाज में बात कहते हैं, तब गहरी खलिशभरी पकी हुई रवेदार और रेशेदार उनकी आवाज दिल को खुरचती हुई दिखाई पड़ती है। मैं इसलिए उनकी आवाज को ‘दिलखरोंच आवाज’ कहता हूँ। वे मेरे भीतर इतने पैठे हुए हैं कि उनकी बात करता हूँ तो लफ्ज़ खुद ब खुद गुलज़ारियत के रंग ओ बू वाले लिबास में नुमायां होने लगते हैं। यूँ तो उर्दू मुझे ठीक नहीं आती पर इसके दो ही फार्म मुझे बहुत पसंद हैं एक अवध वाली तो दूसरी गुलज़ार वाली। गुलज़ार साहब जिस शैली में लिखते हैं वह आज तक जितनों को भी पढ़ा, उन सबसे अलहदा है। उनकी इस शैली पर बात की, काम की बहुत गुंजाइश है।

     

    उनको पढ़ना मतलब अपने को खो देना। उनके लिखे का इतना असर हो जाता है कि उनकी बात करते उनके कहन का पैरहन, उनका लिबास खुद ब खुद उन्हें पढ़नेवाले के कहन में उतरने लगता है। इसकी एक बानगी देख सकते हैं कि जब पिछले साल 2023 में वे नवासी बरस के हुए, मेरे भीतर के इसी गुलज़ारियत ने अंगड़ाई ली और उनकी ही शैली में एक नज़्म मुझसे लिखा गई। उनकी इस गुलज़ाराना शैली की कॉपी करने के लिए मैं उनसे मुआफी चाहता हूं। इस नज़्म का नाम है, ‘दिलखरोंच लफ़्ज़ों वाला शाइर’ –

     

    वो जो झक सुफेद लिबास में

    सुफेद सी नज्में लिखता है

    औ अपनी दिलखरोंच आवाज में

    पढ़ता है मिसरे ग़ालिब के

     

    वो इक शाइर भी है नगमानिगार भी

    उलटबांसियों सा जाने क्या कहता है

    हां जुलाहा है लफ़्ज़ों का

    जो आसमान में गिरे लम्हों से पिरोता है

    खानाबदोश जज्बातों को

     

    इस शाइर की तहरीर के दौरान

    हमेशा देखता हूँ

    उम्र की चॉक से वक्त के ब्लैक बोर्ड पर

    गहरी लकीरें खींचता एक सरदार

    जिसका नाम है

    सम्पूरन सिंह कालरा !

     

    गुलज़ार साहब ऐसे शायर, गीतकार, साहित्यकार हैं जिन्होंने परंपरागत साहित्यिक रूढ़ियों, नियमों से जुदा अपनी विशिष्ट जगह बनाई है। गुलज़ार ने हिन्दी और उर्दू को एक ही धारा में कर दिखाया है। उनके लफ़्ज़ों की बाजीगरी अद्भुत है। नए उपमानो, बिम्बों और प्रतीकों के साथ लफ़्ज़ों और जज्बातों का ऐसा शिल्प कि कविता हो, शायरी हो, या गीत हो, जीवंत रूप में सामने आते हैं किसी कहानी की तरह, जैसे – “वो ख़त के पुर्जे उड़ा रहा था, हवाओं का रुख़ दिखा रहा था”। गुलज़ार साहब ने गीत और कविता को एक कर दिया है। उनका लिखा पढ़ा भी जा सकता है और गाया भी जा सकता है। वे इतने फैले हुए हैं कि कोई भी सब्जेक्ट उनसे छूटा नहीं है। बड़ों की दुनिया मे तो वे जवां और बुजुर्ग हैं ही, बच्चों की दुनिया में भी गुलज़ार के लफ्ज़ झूले, स्केटिंग और ‘चड्डी पहन के खिलखिलाते फूल’ की तरह मौजूद हैं।

     

    गुलज़ार की भाषा आम आदमी की, बोलचाल की है। शायद इसीलिये उनके अटपटे शब्द प्रयोग भी सहजता से जुबान पर चढ़ जाते हैं। ये गुलज़ार ही हैं जो ‘आँखों से महकती खुशबू’ निकाल सकते हैं… ‘सुरीली अँखियाँ’ भी हो सकती हैं… ‘नैनों में धुंआ’ चल सकता है… पानी का बहुवचन ‘पानियों’ भी इन्ही का बनाया हुआ है। शब्दों के विरोधाभास के तो माहिर खिलाड़ी हैं गुलज़ार। देखें -” दफ़्न कर दो हमें कि सांस मिले…नब्ज़ कुछ देर से जमीं सी है”। इसी तरह दिन ब दिन छीजती जाती दुनिया के दिमागी कोलाहल पर इस से सटीक टिप्पणी नहीं हो सकती – “गोली मार भेजे में… भेजा शोर करता है”

     

    “मोरा गोरा अंग लई ले … ” से फिल्मों की शुरुआत करने वाले गुलज़ार अभी तक अपनी जुदा महक से दुनिया को गुलज़ार कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा गुलज़ार साहब की लाइनें ही कोट की जाती हैं। जानकारों को पता है कि उनका असली नाम सम्पूरन सिंह है। आज गुलज़ार साहब को को सम्पूरन सिंह कितना याद होगा, यह बात मैं अक्सर सोचता हूँ। क्या कभी इन दोनों नामों वाले लोगों ने कभी आपस मे गुफ्तगू की होगी? इसी खयाल में जब वे इकासी बरस के हुए थे, उनकी ही शैली में एक लिखी थी मैंने, ‘यार सम्पूरन…’ –

     

     

    ये जो बरसों से मेरे साथ

    मुसलसल चला आ रहा है

    और जो कुछ कहता भी नहीं

    मेरा जुड़वाँ है

     

    हजार राहें मुड़ के देखी

    पर उसने कभी कोई सदा न दी

    बस चलता चला आता है मेरे पीछे

     

    आज इकासी बरसों बाद

    उसने मुझे पहली बार  पुकारा-

    ‘सम्पूरन सिंह… इतनी तन्हाई है,

    कोई बात तो कर यार…!’

     

    गुलज़ार साहब का होना अदब की दुनिया में कहन की एक नई अदा, नया मेयार, नए प्रतिमानों का होना है। यह नयापन और अनूठापन सिर्फ गुलज़ार साहब के हिस्से है। आज उन्हें उनकी 90 वीं सालगिरह बहुत मुबारक। उनके लफ़्ज़ों की खुशबू हमेशा महकती रहे।

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    संप्रति – असिस्टेंट प्रोफेसर (हिंदी), उच्च शिक्षा विभाग, छत्तीसगढ़ शासन।

    सम्पर्क : मोबाइल – 8839072306

    ईमेल – piyush3874@gmail.com

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