• कथा-कहानी
  • शहादत की कहानी ‘मुज़फ़्फ़रनगर में ईद’

    आज पढ़िए शहादत की कहानी। शहादत की कहानी समकालीन समाज के ताने-बाने को को बहुत संवेदनशील ढंग से इस कहानी में दिखाते हैं। आप भी पढ़िए- मॉडरेटर

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     मुज़फ्फरनगर में यह हमारी पहली ईद है। हम हाल ही में इस शहर में शिफ्ट हुए हैं। मेरा पूरा रमज़ान देहली बीता था और मैं ईद से एक दिन पहले ही घर पहुंचा हूं। छोटी बहन के साथ अम्मी रसोई में अगले दिए पकाए जाने वाले पकवानों की तैयारी कर रही हैं। उन्होंने रसोई के फर्श पर सभी सामान फैल रखा है। सामान को देखते हुए वह जांच रही है कि कौन-सी चीज़ नहीं है। ड्राई फ्रूट से भरी ट्रे को एक साइड रखते हुए उन्होंने सवैयों में डाली जाने वाले चावलों से भरी प्लेट और सूखी सवैयों से भरे बड़े-से थाल को नीचे से उठाकर ऊपर रखा। फिर उन्होंने फ्रिज खोलकर देखा और बोलीं, ‘मुझे लगता है दूध कम रहेगा। क्या हमें थोड़ा दूध और नहीं मंगा लेना चाहिए?’

         ‘मुझे भी ऐसा ही लग रहा है,’ पास ही खड़ी छोटी बहन ने जवाब दिया, ‘और अभी गोश्त भी नहीं आया। क्या बिरयानी नहीं बनाएंगे?’

                ‘तुम्हारे अब्बू जी नमाज़ पढ़कर मस्जिद से लौटते हुए लाएंगे।’

         ‘और दूध क्या होगा?’

                ‘दूधिया से बात करो। उससे कहो कि वह आज हमें दो लीटर दूध ज्यादा देकर जाए।’

         छोटी बहन अम्मी का नोकिया ग्यारह सौ फोन लेती है और नंबल डायर करती है। वह कुछ देर बात करती है। कॉल कट होती है और वह अम्मी को दूधिया से हुई बात के बारे में बताते हुए कहती है,

         ‘वो कह रहे हैं कि आज दूध नहीं मिल सकता। उनका ख़ुद का परिवार बहुत बड़ा है, इसलिए आज का दूध वह अपने घर में ही इस्तेमाल करेंगे।’

         ‘अब क्या होगा?’ अम्मी कुछ मायूस-सी होते हुए कहती हैं, ‘अपनी बाज़ी को फोन करो। उससे पूछो कि क्या उसके पास कुछ फालतू दूध रखा है?’

         छोटी बहन फिर से नंबर डायल करती है। बात करती है और कॉल कट कर देती है। अम्मी लगातार उसकी तरफ़ देख रही होती है। फोन को रसोई में रखे फ्रिज पर रखते हुए कहती है,

         ‘बाज़ी कह रही हैं कि उन लोगों ने ख़ुद बाज़ार से दूध मंगाया है। अमूल का। हमें भी वही मंगा लेना चाहिए।’

         ‘बाज़ार से…!’ अम्मी कुछ सोचते हुए कहती है, ‘लाएगा कौन?’

                ‘समीर जिम में आया होगा। उसे बोल देती हूं। जिम करके जब घर जाएगा तो हमें दूध देते जाएगा। दूध के पैसे उसे फोन पे कर देती हूं।’

         ‘ठीक है। उससे बात करो और पैसे भेज दो।’

         समीर हमारी बड़ी बहन यानी बाज़ी आर्शिया का बेटा है। हाईस्कूल में पढ़ता है। मगर पढ़ने से ज़्यादा उसे बॉडीबिल्डिंग का शौक़ है। बाज़ी का ससुराल रुड़की-सहारनपुर हाईवे पर शहर से निकलते ही सबसे पहले आने वाले गांव में है। घर बनने के दौरान हम लोग किराये के घर में रहते थे। किराये का वह घर बहुत छोटा और तंग था। इसलिए जब मैं अम्मी-अब्बू से मिलने के लिए आता था तो रात में सोने के लिए बाज़ी के घर ही जाया करता था। यूं तो शहर से उस गांव के लिए रात के पहले पहर तक आसानी से सवारी मिल जाती है। मगर कई बार नहीं भी मिल पाती है। ऐसे वक्त में मैं पैदल ही उनके घर चला जाया करता था। एक बार मैंने घर से निकलते हुए टाइम देखा था और फिर उनके घर पहुंचकर मोबाइल स्क्रीन ऑन की तो मुझे अपने घर से उनके घर तक जाने में पच्चीस मिनट लगे थे। पैदल।

         हमारा नया घर भी शहर के अंदर नहीं है। वह शहर के बाहरी किनारे पर रुड़की चुंगी से थोड़ा आगे ही बना है। हमें अभी तक हमारे मुहल्ले का नाम भी नहीं पता है। उसका शायद अभी तक कोई नाम भी नहीं रखा गया है। वहां अभी लोगों ने आबाद होना शुरू ही किया है। इसलिए मुहल्ला का नाम रखने की किसी को कोई जल्दी नहीं है। मिलने आने वाले रिश्तेदारों को हम अपना पता कुछ यूं बताते हैं-

         ‘आप सरकारी अस्पताल पर पहुंचकर रुकड़ी चुंगी के लिए ई-रिक्शा ले लीजिएगा। उससे थोड़ा ही आगे राधा स्वामी सत्संग व्यास है। उस सत्संग के सामने ही गली में दूसरा मकान हमारा है।’

         इतना करीब होने के कारण बाज़ी आर्शियां के गांव के लोग और लड़के-लड़कियां काम, बाज़ार से खरीदारी और पढ़ाई के लिए शहर ही आते हैं। समीर का स्कूल भी शहर में ही है। वह सुबह स्कूल जाने के लिए शहर आता है और शाम को जिम जाने के लिए भी।

         हम यहां ताज़ा-ताज़ा शिफ़्ट हुए हैं तो हमें शहर के बारे में ज़्यादा नहीं पता है। उसके मुहल्लों, गलियों, बाज़ारों और बाज़ार की दुकानों का भी कोई ख़ास इल्म नहीं है। हालांकि, अब्बू जी ने आने के बाद से यहां बहुत से लोगों से दोस्ती कर ली है। उनके सभी दोस्त आस-पास के कारखानों और दुकानों के मालिक, उनमें काम करने वाले नौकर और अन्य मजदूर लोग हैं, जिनसे उनकी मुलाक़ात मस्जिद में नमाज़ के दौरान होती रहती है। उन्हीं लोगों से बात करके अब्बू जी हमारे घर के आस-पास के इलाके के रास्तों, चौराहों और राशन की दुकानों का पता कर पाए हैं। अब वह आसानी से अपनी साइकिल पर सवार अम्मी को सब्जी, गोश्त, चावल और राशन वगैरह का समान आराम से लाकर देते हैं। मगर अभी तक उन्हें भी मुख्य बाज़ार के राह-रास्त का उतना मालूम नहीं हुआ है कि वह आराम से वहां जाकर खरीदारी कर सके।

         इसलिए अम्मी को जब भी कोई सामान बाज़ार से मंगवाना होता है तो वह छोटी बहन से समीर को फोन करवा देती हैं। समीर शाम को जिससे आने के बाद सामान लाकर अम्मी को देता हुआ अपने घर लौट जाता है। अम्मी उसे अक्सर सामान लाकर देने के बाद ही पैसे देती है। कभी-कभी पहले भी, जब वह बाज़ार में होता है और उसके पास पैसों की कमी हो जाती है तो वह छोटी बहन से कहकर उसे फोन-पे से पैसे ट्रांसफर करवा देती हैं।

        

         आज चांद रात है और गली में ज़्यादा चहल-पहल नहीं है। पुराने शहर के हमारे मुहल्ले में तो जिस दिन ईद का चांद दिखता था, लोग पूरी रात जागते थे। हमारे घर के सामने परचून की, नाई की और मसाले वालों की दुकानें थीं। मस्जिद के सामने वाली गली में कई घर दूधियाओं के भी थे। उन दुकानों पर बाल कटाने वालों, सामान खरीदने वालों और मसलों की लिस्ट थामे ग्राहकों की लंबी-लंबी कतारें लगी रहती थीं। दुकान में रखे स्पीकर में पूरे रमज़ान नाई बॉलीवुड गानों की जगह गज़लें और ‘मुहम्मद के शहर में’ जैसी नात बजाया करता था। मगर चांद रात को पूरी रात वह पंजाबी और हरियाणवी गाने चलाया करता था। उसकी दुकान पर बाल कटाने आने वाले लड़के चलते गाने को बार-बार बीच में रोककर अपनी पसंद का कोई दूसरा गाना चला देते थे। उस गाने को चले दो ही मिनट होते थे कि कोई अन्य लड़का आता और फिर वह अपनी पसंद का गाना चला देता। यह सिलसिला पूरा रात जारी रहता। कभी-कभी तो फ़ज़र की अजान तक भी, जब रात ढलती है और दिन ठंड़ी पुरवाई के साथ दस्तक देना शुरू करता है। मगर वह दिन कोई आम दिन नहीं होता, ईद का दिन होता।

         यहां ऐसा कुछ नहीं है। हमारी गली में केवल दस घर हैं। उनमें भी बच्चे बहुत कम हैं, जो हैं सब बड़े और समझदार हैं। फिर भी कुछ बच्चे जो छोटे हैं, वे बाहर शोर मचा रहे हैं। हालांकि, उनके शोर से ज़्यादा बाइक्स के हॉर्न और उनके आने-जाने का शोर सुनाई दे रहा है। लोग आख़िरी वक्त तक ईद के लिए अपनी तैयारियों में लगे हुए हैं। फिर भी, शायद इसी से ही चांद रात के होने का अहसास तो हो ही रहा है।

         रात को साढ़े दस बजे के करीब समीर दूध देकर चला गया। अमूल के एक-एक लीटर के दो डिब्बे।

         अब्बू जी भी इशा की नमाज़ पढ़कर आ चुके हैं। मैं नमाज़ पढ़ने नहीं गया। पता नहीं क्यूं मेरा दिल नमाज़ में नहीं लगता। ऐसा नहीं है कि मैं बिल्कुल भी नमाज़ नहीं पढ़ता। पढ़ता हूं, मगर अब्बू जी की तरह पाबंदी के साथ नहीं। मैं मस्जिद जाता हूं तो लगता है कि जैसे किसी ने मुझे कैद में बंद कर दिया है। मेरे चारों ओर लोहे के मोटे-मोटे सरिये उग आए हैं और मैं किसी पिंजर में बंद हो गया हूं। मेरा दिल घबराने लगता है। लगता है कि मैं ऐसी जगह हूं, जहां मुझे नहीं होना चाहिए। यह इसलिए नहीं है कि मुझे ख़ुदा से डर नहीं लगता है या मेरा क़यामत के दिन पर यक़ीन नहीं है। बिल्कुल है। मगर नमाज़ पढ़ने में मेरा ज़रा भी दिल नहीं लगता। मैंने यह बात अब्बू जी को बताई थी। उसके बाद से उन्होंने मुझसे नमाज़ पढ़ने के लिए कहना छोड़ दिया। मेरे अब्बू जी मज़हब को ज़बरदस्ती लादने के लिए क़ायल नहीं है।

         मगर कल ईद है और ईद की नमाज़ पढ़ने जाने ज़रूरी है।

         वैसे ईद की नमाज़ पढ़ना फ़र्ज़ नहीं है। जैसे कि दिन में पांच वक्त नमाज़ पढ़ना फ़र्ज़ है और आपको उन्हें हर हाल में पढ़ना ही है। ईद की नमाज़ वाजिब है। यानी आप चाहे तो पढ़ सकते हैं और अगर न चाहे तो छोड़ भी सकते हैं। पढ़ लेंगे तो अल्लाह आपको उसका अज़र देगा और नहीं पढ़ेंगे तो कोई गुनाह भी नहीं होगा। फिर भी कल के दिन सब लोग नए कपड़े पहनकर नमाज़ पढ़ने जाएंगे तो मेरा घर में रहना सही नहीं होगा।

         ईद की नमाज़ का वक्त पता करने के लिए मैं अब्बू जी से पूछता हूं,

         ‘कल ईद की नमाज़ किस टाइम होगी?’

         ‘यहां मस्जिद में तो साढ़े छह बजे होगी।’

         ‘इतनी जल्दी? क्या फज़र की नमाज़ के बाद ही पढ़ा देंगे?’

         अब्बू जी हँसते हैं और कहते हैं,

         ‘हां, बस जल्दी ही फ़ारिग कर देंगे। कोई मसला भी नहीं होगा।’

         ओह! हां, यह शहर तो हमारे पुराने शहर जैसा नहीं है। यहां तो कोई न कोई मसला होता ही रहता है। अभी पिछले दिनों कावड़ यात्रा को लेकर कितना बवाल हुआ था। मामला सुप्रीम कोर्ट तक चला गया था। पूरा शहर छावनी में तब्दील हो गया था। उससे पहले 2013 में यह शहर दंगों का केंद्र भी रहा है।

    सही है, कम से कम मौलाना लोग कुछ तो समझदारी दिखा रहे हैं। मगर यह कितने अफ़सोस की बात है कि हमारे त्यौहार खुशी और उल्लास की जगह अब समस्या और हिंसा पैदा करने वाले आयोजनों में बदलते जा रहे हैं!

         ‘और ईदगाह में?’ मैं उनसे आगे पूछता हूं।

         ‘ईदगाह यहां थोड़े ही है। ईदगाह तो उधर है, शामली अड्डे के पास,’ अम्मी रसोई से निकलकर पास आते हुए बताती है।

         ‘इतनी दूर…! वहां तो जाना भी मुश्किल है।’

         मैं अम्मी को जवाब देता हूं। वह करीब रखी कुर्सी पर बैठ जाती है।

         ‘इसीलिए सब यहीं अपनी-अपनी मस्जिदों में पढ़ेंगे।’

         ‘पर इतनी सुबह उठेगा कौन?’   

         ‘बाजी की तरफ़ चले जाना,’ छोटी बहन सुझाव देती है।

         ‘वहां कितने बजे है?’

                ‘पता नहीं। भाईसाहब से फोन करके पूछो। वह बता देंगे।’

         मैं लोअर की जेब से फोन निकालता हूं और बहनोई साहब को कॉल करता हूं। दूसरी रिंग होते ही वह कॉल ले लेते हैं। पूछने पर बताते हैं कि उनके यहां साढ़े सात बजे ईद की नमाज़ होगी। मगर वहां ईदगाह है कहां? मैं पूछता हूं। वह बताते हैं कि वहीं, अड्डे पर ही है। जहां तुम उतरोगे, बस वहीं मेरा इंतज़ार करना। ठीक है, कहते हुए मैं कॉल कट कर देता हूं।

        

         सुबह में साढ़े छह बजे मैं सोकर उठा। कुछ बिस्तर पर ही लेटा रहा। अम्मी रसोई से निकलकर मेरे पास आई। वह नए कपड़ों में खूबसूरत नज़र आ रही थीं। मैंने उन्हें सलाम किया। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरा और बोलीं,

         ‘नमाज़ पढ़ने नहीं जाओगे?’

                ‘हम्म…!’ नींद की खुमारी में आँखें बंद किए हुए ही मैं जवाब देता हूं।

         ‘सात बजने वाले हैं। तैयार होने में वक्त लगेगा। उठ जाओ। कहीं ऐसा न हो कि नमाज़ निकल जाए।’

         नमाज़ के निकल जाने का सुनकर मेरी नींद एकाएक यूं छू-मंतर हो जाती है, जैसे गरम तवे पर पानी की बूंदे भाप बन जाती हैं। मैं बिस्तर छोड़ देता हूं। पैरों में चप्पल घसीटते हुए दरवाज़ा खोलकर बाहर गली में झांकता हूं। दूर से नए-नए, रंग-बिरंगे कपड़े पहने और सिरों पर गोल टोपी रखे लोग आते हुए दिखाई देते हैं।

         मस्जिद में नमाज़ हो चुकी है। इससे पहले कि लोग मेरे नज़दीक़ आते और ईद की मुबारकबाद देते हुए नमाज़ पढ़ने के बारे में पूछते, उससे पहले ही मैं वापस घर के अंदर चला जाता हूं।

         ‘तुम्हारे अब्बू जी आए?’ अम्मी पूछती है।

         ‘नहीं, नज़र नहीं आए।’

         नहाने के बाद कपड़े बदलते हुए मैंने अब्बू जी की आवाज़ सुनी। कपड़े पहनकर बरामदे में जाकर मैंने उन्हें सलाम किया और ईद की मुबारकबाद दी। हम गले भी मिले। मैं फिर से कमरे में गया और कुर्ते के बटन बंद करने के बाद इत्र लगाने लगा। बालों में कंघा किया और पुरानी देहली से खासतौर से ईद के लिए खरीदी नई चप्पल पहनकर बाहर आया।

         अम्मी मुझे देखकर मुस्कुराई और बोली,

         ‘अच्छे दिख रहे हो।’

         ‘क्या मुसल्ला लेकर जाऊं?’

                ‘हां, ले लो। अनूशी, इसे मेरे मुसल्ला तो लाकर देना।’

         तह किया हुआ मुसल्ला बगल में दबाए में गली से निकलकर बाहर आ जाता हूं।

    पुराने शहर में ईदगाह जाते वक्त हर कोई अपने साथ जायनमाज़ लेकर जाता था। ईदगाह की ज़मीन कच्ची थी और उस पर कोई चटाई या दरी भी नहीं बिछाई जाती थी। इसलिए सभी अपनी-अपनी चटाई और मुसल्ले लेकर आते थे। मुझे लगा कि यहां भी ऐसा ही होगा। इसलिए चलते हुए मैंने भी अपने साथ मुसल्ला लेना ज़रूरी समझा। कहीं ऐसा न हो कि ज़मीन पर नमाज़ पढ़नी पड़े!

    सड़क पूरी तरह खाली सुनसान है। मुझे घर से निकलने पूरे आठ मिनट हो चुके हैं मगर न तो अभी तक कोई ई-रिक्शा नज़र आई है और न ही अन्य वाहन। क्या सब लोग ईद की छुट्टी मना रहे हैं?

    लगता तो ऐसा ही है। मैं खाली सड़क पर सामने से गुज़रते बाइक्स ड्राइवर्स को लिफ्ट के लिए इशारा करता हूं। मगर कोई भी अपनी बाइक नहीं रोकता। काफी देर इंतज़ार करने के बाद भाईसाहब को कॉल करता हूं। उन्हें बताता हूं कि यहां कोई साधन नहीं है आने के लिए। आप समीर को बाईक लेकर भेज दीजिए।

    मगर इससे पहले कि वह मेरी बात का जवाब देते मुझे सामने से आ रही बस नज़र आती है। उनका जवाब सुने बिना मैं उन्हें बस के बारे में बताता हूं और कॉल कट कर देता हूं। चार मिनट में ही बस मुझे उनके गांव के बस अड्डे पर उतार देती है। अड्डे पर उतरकर मैं इधर-उधर ईदगाह की तलाश में देखता हूं तो कुछ दूरी पर उजले सफ़ेद कपड़े पहने और सिर पर टोपी रखे कईं लोग एक जगह खड़े नज़र आते हैं। उनके करीब ही पुलिस की दो जीप खड़ी हैं। कुछ पुलिस वाले बाहर खड़े हैं और कुछ गाड़ी के अंदर बैठे हैं।

    मैं उधर ही चल देता हूं। उनके करीब जाकर खड़ा हो जाता हूं। वहां जाकर देखता हूं कि कुछ लोग पास में ही एक दुकान के पास लगे नल पर वुज़ू कर रहे हैं। मुझे उनके पास खड़े हुए कुछ ही लम्हे गुज़रे थे कि समीर अपने दोस्तों के साथ वहां आ पहुंचता है। उसने भी ईद के नए कपड़े पहने रखे हैं। सफ़ेद कुर्ता पायजमाना। उसके सिर पर टोपी नहीं है। उसके दोस्त के सिर पर है। मैं उनके पास जाता हूं और ईदगाह के बारे में पूछता हूं। समीर सड़क के किनारे एक खाली प्लॉट की तरफ़ इशारा करते हुए कहता हैं,

    ‘यही ईदगाह है?’

    ‘यह?’ हैरानी से मेरा मुँह खुला रह जाता है, ‘मगर इसमें तो कोई इमारत भी नहीं है। नमाज़ कहां पढ़ेंगे?’

    ‘यहां लोग ईदगाह बनाने नहीं देते। गांव वालों ने कई बार कोशिश की, मगर हिंदू त्यागियों के विरोध के कारण बन नहीं सकी। पिछले साल किसी तरह पंचायत के ज़रिये कह-सुनकर बनाने की कोशिश भी की थी, मगर पुलिस वालों ने रात में बुल्डोजर से तुड़वा दिया।’

    इसी बीच एक ट्रैक्टर-टॉली हमारे पास आकर रुकती है। ट्रॉली में मैट्स, चटाई और कुछ और सामान रखा है। ट्रैक्टर के रुकते ही लोग उसके गिर्द जमा हो जाते हैं। वे ट्रॉली में से उन चटाई और मैट्स को निकालते हैं और उस खाली प्लॉट पर बिछाने लगते हैं। इमाम साहब की जायनमाज़ के लिए जगह छोड़कर पीछे की ओर कुल छह सफ़ बनती हैं।

    चटाई बिछ जाने के बाद मैं अपना मुसल्ला लेकर दूसरे नंबर की सफ़ में जा बैठता हूं। पहली लाइन बिल्कुल खाली है। सड़क पर जो लोग खड़े थे, वे भी एक-एक, दो-दो करके बिछाई की सफ़ों पर आकर बैठने लगते हैं। उनमें से कोई भी अपने साथ मुसल्ला नहीं लाया है।

    पौने आठ बजे के करीब इमाम साहब आए। इमाम साहब वही हैं, जो गांव की मस्जिद में नमाज़ पढ़ाते हैं। वह ऊंचे कद के पतले-दुबले शख़्स हैं। उनका चेहरा लंबा, आँखें छोटी और नाक कुछ नुकीली है। दाढ़ी काली और रंग गोरा।

    मैंने उनके पीछे एक-दो बार जुमे की नमाज़ पढ़ी है। जुमे के खुत्बे से पहले जब वह तक़रीर किया करते थे तो मुझे उनकी आवाज़ न जाने क्यों एनिमेटिड हॉरर फ़िल्मों की बूढ़ी चुड़ैलों जैसी सुनाई देती थी। मैंने यह बात बाज़ी को बताई तो वह हँसने लगी। फिर बोली,

    ‘तुम सबको नाम रखते हो। किसी को नाम रखना बुरी बात होती है।’

    अभी भी उन्हें अपने सामने कुर्सी पर बैठा बोलते सुनकर मुझे बाज़ी की बात याद आती है और मैं मुस्कुरा देता हूं।

    उस खाली ईदगाह में लगातार लोग आए जा रहे हैं। इमाम साहब की तक़रीर को अनसुना कर, जो लोगों को रमज़ान के तीस दिन की तरह ही आने वाले साल के दिनों में भी अच्छा इंसान और पाकीज़ा मुसलमान बने रहने की तलकीन कर रहे हैं, सड़क की ओर देखता हूं। वहां आने वाले लोगों की अगल-बगल खड़ी बाइक्स और पीछे कुछ और पुलिस की गाड़ियां खड़ी नज़र आती है। मैं उन्हें गिनने की कोशिश करता हूं। एक… दो… तीन… चार… और पांच… उधर भी एक है शायद। मैं खुद से कहता हूं और फिर इमाम साहब की तक़रीर सुनने लगता हूं।

    पुराने शहर में ईदगाह के गिर्द कभी इतनी पुलिस जमा नहीं होती थी। और वह इस ईदगाह से पचास गुना बड़ी थी। उस ईदगाह में लगभग पूरा शहर नमाज़ पढ़ने आता था। उस दौरान अगर पुलिस होती भी थी तो वह ट्रैफिक को डाइवर्ट करने और नमाज़ियों का ख़्याल रखने के लिए होती थी। यहां तो कोई ट्रैफिक भी नहीं है। नमाज़ी भी इतने ज़्यादा नहीं है। अभी तक सभी सफ़े भी नहीं भरी हैं। बस आगे वाली, जिसमें अभी कुछ लोगों के साथ मेरे बहनोई साहब आकर बैठे हैं, दूसरी नंबर की, जिसमें मैं बैठा हूं और मेरे पीछे वाली सफ़ ही भरी है। मगर आने वाले लोगों की संख्या से लगता है कि जल्दी ही वे सफ़ भी भर जाएंगी।

    ‘अगर ट्रैफिक की समस्या नहीं और लोग भी ज़्यादा नहीं है तो फिर पुलिस की इतनी सारी गाड़ियां यहां क्या कर रही हैं?’

    मैं ख़ुद से सवाल करता हूं और जवाब देने की कोशिश करते हुए संदेह जताता हूं, ‘क्या वो हम पर निग़रानी रख रहे हैं…!’

    इमाम साहब ने लगभग दस मिनट तक तक़रीर की। इस बीच सभी सफ़े भर चुकी हैं। मैं उन सफ़ों में बैठे कतारबद्ध लोगों की संख्या का अंदाज़ा लगाने की कोशिश करता हूं तो एक कतार में लगभग पचास से ज़्यादा लोगों के होने का अनुमान नहीं होता है।

    सड़क की ओर गर्दन घूमता हूं तो एक-एक बाइक पर दो-दो, तीन-तीन लोग बैठे चले आ रहे हैं। कुछ लोग पैदल भी हैं। मगर अधिकतर लोग बाइक्स से आ रहे हैं। उन लोगों के बीच ही मांगने वालीं औरतों, बच्चों और अपाहिज़ लोगों की टोली भी दिखाई देती है, जो उस ख़ाली प्लॉट के मुंहाने पर अपना-अपना कपड़ा बिछाकर बैठ जाते हैं।

    उन मांगने वालों के पीछे सिर्फ़ पुलिस वाले खड़े नज़र आते हैं। या फिर सड़क से एक के बाद एक गुज़र रही गाड़ियों की झलकियां।

    ‘नमाज़ बस शुरू होने वाली है,’ इमाम साहब कहते हैं, ‘आप अपने लोगों को फोन करके बुला लीजिए। फोन कर दीजिए… कह दीजिए कि ईद की नमाज़ बस शुरू होने वाली है… जो अभी तक नहीं आए पाए हैं, वे जल्द से जल्द ईदगाह पहुंच जाए।’

    इस तरह का ऐलान करते हुए इमाम साहब अपनी तक़रीर भी जारी रखते हैं। वह पैंगबर और उनके सर्वप्रथम अनुयायियों की कहानियां सुनाते हैं। लोगों को दीन-ए-इस्लाम के प्रति मॉटिवेट करने के लिए उन्हें उन मुश्किलों वक्तों की याद दिलाते हैं, जब जालिम दुनिया ने मुसलमानों पर केवल इस ज़ुल्म ढाए, कि उनका क़सूर सिर्फ़ इतना था कि वे एक ख़ुदा को मानने वाले थे।

    इमाम साहब कुछ ही देर और बोल पाते हैं कि पीछे वाली सफ़ में बैठा एक शख़्स उठ खड़ा होता है और बोलता है,

    ‘इमाम साहब वक्त बहुत हो चुका है। अब ज़रा नमाज़ पढ़ाये…!’

    इमाम साहब अपनी घड़ी देखते हैं और बोलते हैं,

    ‘हां, वक्त हो चुका है। मालूम होता है कि लोग भी सभी आ चुके हैं। बस अब आप सब लोग ईद की नमाज़ की नीयत सुन लीजिए। जिस तरह नीयत बताई जाए, उसी तरह नीयत बांधेंगे। ईद की नमाज़ की नीयत बांधते हुए कहना है,

    ‘मैं नीयत करता हूं दो रकात नमाज़ ईद-उल-अजहा की, छः ज़ायेद तकबीरों के साथ, वास्ते अल्लाह ताला के, पीछे इस ईमाम के, रुख मेरा काबा शरीफ़ के तरफ अल्लाहु अकबर।’

    इमाम साहब नीयत को दो-तीन बार दोहराते हैं। फिर आगे बताते हुए कहते हैं,

    ‘इसके बाद इमाम साहब सना पढ़ेंगे। उसके बाद अल्लाहु अकबर कहेंगे। इस पर सब लोग कानो तक हाथ ले जाएंगे और छोड़ देंगे। उसके बाद फिर अल्लाहु अकबर की तकबीर पढ़ी जाएगी, इस पर भी लोग हाथ कानों तक ले जाएंगे और छोड़ देंगे। तीसरी बार फिर अल्लाहु अकबर की तकबीर पढ़ी जाएगी, इस बार आप अपने हाथ कानों तक ले जाएंगे और नीयत बांध लेंगे। इसके बाद इमाम अलहम्दु शरीफ़ पढ़ेंगे और उसके बाद कुरान की कोई सूरत। फिर आम नमाज़ की तरह वही रुकुअ और दो सज्दे होंगे और उसके बाद फिर दूसरी रक़ात के लिए खड़े हो जाएंगे।’

    इमाम साहब रुमाल से चेहरा साफ़ करने के लिए एक लम्हे के लिए रुकते हैं और फिर आगे बताने लगते हैं, ‘दूसरी रकात में सीधे खड़े होते ही हाथ बांध लेंगे। इमाम साहब अल्हम्दु की सूरत पढ़ेंगे और उसके बाद कुरान की कोई और सूरत। उसके बाद रुकुअ में जाने से पहले तीन बार अल्लाहु अकबर की तकबीर कही जाएगी। तीनों बार आपको अपने हाथ कानों तक ले जाने हैं और छोड़ देने हैं। इमाम जब चौथी तकबीर कहें तो हाथ कानों तक नहीं ले जाने, बल्कि सीधा रुकुअ में चले जाना है। उसके बाद सज्दे होंगे। अतय्याहत में बैठा जाएगा और उसके बाद सलाम फेर दिया जाएगा। सलाम के बाद दुआ होगी और उसके बाद खुत्बा पढ़ा जाएगा। सभी लोग खुत्बा ज़रूरी सुनें। खुत्बा सुनना सुन्नत है।’

    इसके बाद लोग नमाज़ के लिए खड़े हो जाते हैं और नीयत बांधकर नमाज़ शुरू होती है।

    नमाज़ के बाद दुआ हुई और उसके बाद खुत्बा सुना गया। खुत्बा के बाद लोगों ने आपस में गले मिलकर एक-दूसरे को ईद की मुबारकबाद दी। कुछ लोगों ने हाथ मिलाये। मैंने भी दो-तीन लोगों को हाथ मिलाकर ईद की मुबारकबाद, जिनसे मैं पिछले कुछ दिनों में परिचित हो गया था।

    सड़क पर लोगों की भीड़ थी। सभी लोग अपनी-अपनी बाइक्स स्टार्ट कर रहे थे। कुछ लोग वापस घर जाने के लिए और कुछ कब्रिस्तान में जाने के लिए, जहां वह अपने बुज़ुर्गों की कब्र पर सूरः फातिहा पढ़ेंगे।

    मेरे बहनोई भी अपने बड़े भाई और भतीजों के साथ कब्रिस्तान चले गए। उन्होंने मुझसे भी चलने के लिए कहा, मगर मैंने मना कर दिया। फिर वह बोले कि अपनी बाज़ी से मिले बिना मत जाना। मैंने उन्हें बताया कि बाज़ी से मेरी बात हो चुकी है और मैं अभी उनसे मिलने ही जा रहा हूं।

    सड़क पार कर गांव में जाने वाली सड़क पर बने गेट की ओर बढ़ते हुए अचानक वहां जमा लोगों में अफरा-तफ़री मच गई। वे सभी किशोर लड़के थे, कम-उम्र और ईद की खुशी से चहकते हुए एक-दूसरे से हँसी-मज़ाक कर रहे थे। तभी एक लड़के ने अपनी नई बाइक स्टार्ट की और उसे तेज़ रफ़्तार देते हुए कुछ दूरी चलाया और फिर वापस उसी रफ्तार से लौट आया। उसके साथी उसकी इस कला पर खुश हुए। उन्होंने सीटी बजाई और तालियां पीटीं। वे उसकी बाइक चलाने की तारीफ़ कर रहे थे। फिर पता नहीं कहां से, अचानक एक पुलिस वाला आया और उस बाइक सवार लड़के को ज़ोरदार थप्पड़ मारते हुए बोला,

    ‘मादरचोद… हीरोबाज़ी कर रहा है। सालों को अभी लॉकअप में बंद कर दूंगा।’

    पुलिसवाला एक ज़ोरदार डंडा उसकी बाइक पर मारता है। डंडे की मार से नई बाइक की पीछे की लाइट का शीशा टूट जाता है।

    वह आगे कहता है, ‘पता नी इयां बाबाजी का राज है। म्हारी निगाह हर टैम थारे पे ही रहवे है।’

    इसी बीच डंडा हिलाता हुआ एक और पुलिस वाला उसके करीब आ जाता है।

         अगले ही लम्हे आवारा बादलों की तरह सड़क से भीड़ छंट जाती है। भीड़ के पीछे मुझे मुकेश त्यागी उर्फ़ मुक्की खड़ा नज़र आता है। वह मेरा दोस्त है। हमारे घर पर हुए काम के दौरान वह मज़दूरी करने आया करता था। उसी दौरान मेरी उससे दोस्ती हुई थी। एक दिन मैं दक्षिण कोरियाई लेखिका क्यून सुक शिन के उपन्यास Please Look After Mom का हिंदी अनुवाद ‘माँ का ध्यान रखना’ पढ़ रहा था। तभी अम्मी मिस्त्री और मज़दूरों के लिए चाय ले आईं। मैंने किताब अधूरी चिनी हुई दीवार पर रखी, अम्मी से चाय की केतली और कप लिए और उन्हें मिस्त्री के पास ले गया।

         चाय पीते हुए मुक्की ने किताब उठाई और पढ़ने लगा। उसके बाद हमारी बातचीत होने लगी। उसने बताया कि वह आईआईटियन है। उसने इंग्लिश में एम.ए. भी किया है। मगर उसे उसकी क्वालिफिकेशन के लेवल की कोई नौकरी ही नहीं मिल रही है। इसलिए अपना खर्चा चलाने के लिए वह कभी-कभार गांव के मिस्त्री के साथ मजदूरी पर चला आता है।

         उसके बाद से मैं जब भी घर जाता तो मुक्की से मुलाकात ज़रूर करता। चाहे वह हमारे यहां मजदूरी पर आया होता या न आया होता। जब वह नहीं आता तो मैं उसके गांव, जिसमें मेरी बाज़ी की ससुराल भी थी, मिलने चला जाता। हम दोनों मिलकर देश-दुनिया की ढेरों बात करते हैं। देश की आर्थिक स्थिति को लेकर अखबारों में छपने वाली सुर्खियों पर वह अक्सर कहा करता था,

         ‘हम पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनने वाले ऐसे देश में रह रहे हैं, जो अपने एजुकेटिड नौजवानों को एक अदद नौकरी तक मुहैय्या नहीं करा पा रहा है।’

         उसने मुझे देखकर हाथ हिलाया। जवाब में मुस्कुराते हुए मैं उसके पहुंचा और हाथ मिलाते हुए उसके गले लग गया।

         ‘काफ़ी देर से इंतज़ार कर रहा था। कहां रह गए थे,’ उसने पूछा।

         ‘वहीं, ईदगाह में। इमाम साहब ने नमाज़ कुछ देर से पढ़ाई। मगर उनकी भी क्या गलती, लोग ही वक्त पर नहीं पहुंचे।’

         ‘और वहां कैसी भीड़ थी?’ उसने पुलिस वाले हादसे के बारे में पूछा।

         जवाब में पूरी घटना सुनकर बोला, ‘सरकार का संरक्षण हो तो एक बदमाश भी शरीफ़ आदमी बन जाता है। फिर यह तो पुलिस है। आम पब्लिक से पेश आना तो इन्होंने कभी सीखा ही नहीं।’

         ‘पर यह कितना गलत है,’ घर बना रहे मिस्री के छोटे भाई ने हमारे पास आकर कहा, ‘क्या अब इस मुल्क में त्यौहार की खुशियां भी अपराध बन जाएगा। लोगों को सिर्फ़ अपने त्यौहार मनाने के लिए भी डंडे पड रहे हैं।’

         ‘बिल्कुल अपराध बन चुका है मेरे भाई,’ मुक्की ने कहा, ‘कमाल तो यह है कि ये सब हमारी आँखों के सामने हो रहा है और कोई सुनवाई भी नहीं हो रही। बल्कि सुनवाई करने वाले ही अपराध कर रहे हैं।’

         ‘अब तो बस ख़ुदा ही इस मुल्क को बचाये,’ मैंने कहा।

         मेरा उदास होता चेहरा देखकर उसने कहा, ‘घर चलें।’

         ‘घर… हां, चलते हैं। मगर उससे पहले बाज़ी की तरफ़ जाना हैं। फिर घर। अम्मी भी तुम्हारा पूछ रही थी…’

         ‘अच्छा… मैं भी उन्हें सलाम कर लूंगा। आओ उस तरफ़…’

         ‘तुम बाइक लाये हो?’ मैंने पूछा।

         ‘हां, वो खड़ी…।’

         उस ब्लैक रंग की हीरो होंडा बाइक पर बैठकर हम गांव में चले आए। वहां मेला लगा हुआ था। झूले पर झूल रहे बच्चे शोर मचा रहे थे। चाट वाले की दुकान पर भी काफ़ी भीड़ थी। मैं उसे जानता हूं। वह भी हमारे यहां मजदूरी करने आया करता था। उसके आगे चाऊमीन-बर्गर वाला खड़ा था। उसका नाम रोशन है और वह भी कई दिन मिस्त्री के साथ मजदूरी पर आता रहा था।

         और भी बहुत-सी खाने-पीने, मिठाइयों और खिलौने की दुकान लगी हुई थी। हर दुकान पर खरीदार खड़े हुए थे। और सभी खरीदार बच्चे थे।

         बहुत से लोग अपने घरों के बाहर खड़े थे और वे हर आने वाले को सवैयां खाने की दावत दे रहे थे। उनमें से कुछ ने हमें भी रोकने की कोशिश की मगर बाज़ी के यहां पहुंचने की जल्दी में मैंने उनसे माज़रत की और आगे निकल गए।  

        

        

        

    2 thoughts on “शहादत की कहानी ‘मुज़फ़्फ़रनगर में ईद’

    1. कहानी पढ़ते हुए,तनुज सोलंकी का उपन्यास Diwali in Muzaffarnagar याद आ रहा है।हाल ही में तनुज की कहानी दानिश भी उल्लेखनीय है।
      शहादत की कहानी ,अपरिपक्व, स्थूल विवरण, स्टीरियोटाइप चरित्र चित्रण युक्त, सपाट है। साठ सत्तर के दशक में सरिता पाक्षिक में इस तरह की कहानियां छपती थीं। एक निहायत कमजोर कहानी।

    2. कथ्य विश्लेषण करता है वर्तमान समाज को व व्यंग्य भी। शिल्प सपाट है ।

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