
अच्युतानंद मिश्र समकालीन हिंदी कविता की उल्लेखनीय उपस्थिति का नाम है. उनको युवा कविता का सम्मानित भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार मिल चुका है. प्रचार-प्रसार के इस युग में वे चुपचाप सृजनरत हैं. आज उनकी तीन कविताएँ- मॉडरेटर
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दंगे के बाद
वीरान गली का आखिरी सिरा
एक जूता उल्टा रखा हुआ है
दूसरे के फीते अब तक बंधे हैं
हालाँकि उसका पैर गायब है.
सबसे चमकीली धूप में
चमक रही है वीरानी
पत्थरों पर धूल चमक रही है
पत्ते चमक रहे हैं
उम्मीद भरी आँखों की तरह
सुस्त बैठा है एक कुत्ता
जैसे समय के पार चला गया
यह टूटा पहिया घूम रहा था
उसके माथे पर बिंदी की तरह
चिपकी है लेमनचूस की पन्नी
लेकिन अब वह तुड़ा-मुड़ा पड़ा है
रेंग रहा एक कीड़ा उलट गया है.
दबी हुयी पीली घास पर
सूख चुके खून के धब्बों को
इतिहास की मिटटी में मिला दिया जायेगा.
कहीं कोई धुआं नहीं उठ रहा
कोई शोर , कोई चीख नहीं
घटनाएं, स्मृतियां, इतिहास
तमाम पहिये रुक गये हैं.
कोई रेंगती हुयी चीटी भी नहीं
नाली में हहराता पुरातन जल भी
विलुप्त हो गया है
दो ध्वनियों के बीच की ख़ामोशी
फ़ैल गयी है
ब्रह्माण्ड की तरह,
देखने और सोचने के बीच
सारे तंतु कट चुके हैं.
गली के आसमान पर एक चिड़ियाँ उड़कर आई
एक फेरा लगाकर वह और तेज़ उड़ जाती है.
सबकुछ हिलने के नियम के विरुद्ध.
अचानक वह कुत्ता
अपने कंधे झाड़ते हुए चलने को होता है
वह रोता है आखिरी मनुष्य की तरह
घडी में बारह बज रहे हैं
तारीख की करवटों के पार एक लाश
अभी उठकर चल देगी किसी और गली में .
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शाम
अभी एक पत्ती गिरेगी
और शाम हो जायेगी
एक बच्चा गेंद के पीछे दौड़ेगा
कबूतर लौटकर आयेंगे
और सामने की डाल पर बैठ जायेंगे
उस खिड़की से वह स्त्री झाँकेगी
और तहकर रख देगी बचपन को
अभी शाम होगी
और दुनिया के तमाम पुरुष
लौट आयेंगे घरों को
घर की छतें थोड़ी और नुकीली हो जायेंगी
दूर बहती नदी
बहने का स्वांग करेगी
एक मछली आखिरी बार सूरज की तरफ
लालच से देखेगी
और शरमाकर चली जायेगी भीतर
मिट्टी थोड़ी और मुलायम हो जायेगी
पेड़ थोड़ी देर के लिए छिपा लेंगे हरापन
एक तारा चुपके से निकलेगा
ट्यूशन से लौटती हुयी लड़की
ठहर जायेगी गली के मोड़ पर
और रुमाल उठाने लगेगी
एक लड़का फ़िल्मी गीत गुनगुनाते हुए
उधर से गुजरेगा
आखिरी बार आवाज़ लगाएगा वह¬-
‘कबाड़ी वाला’
अभी साइकिल की घंटी बजेगी
और शाम हो जायेगी
बीस बरस
उदास रौशनी के पार
एक जगमगाता शहर था
पानी के पुलों पर
थिरकते सपनों से भरी
चमकीली पुतलियाँ थी
अँधेरी रातों में सितारों भरे
आकाश की याद मौजूद थी.
रोज़ आती थी रेलगाड़ियाँ
उम्मीद की स्टेशन पर रूकती
मिनट दो मिनट
और इच्छाओं के फेरीवाले
आवाज़ देते
शहर पुकारते थे
बीस बरस पार से हमें
बस की खिड़कियों से
दिखता था भविष्य
ऊँची बिल्डिंगों की तरह
एक अदद सपना था कि
टूटता नहीं था
एक अदद रौशनी
बुझती नहीं थी
एक उम्मीद
खत्म नहीं होती थी
किताबों के बीच दबी
बीस बरस पुराने पेड़ों
के सूखे पत्तों की तरह
प्रेमिकाएं, पिछले जन्म की याद
की तरह मुस्कुराती थी
वे मुस्कुराती थी हमारे सपनों में
हम बीस बरस पीछे चले जाते
शहर की उदास सड़कों से
तेज़ बहुत तेज़ रौशनी के
फुहारे छोड़ती गाड़ियाँ गुजर जाती
बीस बरस पुरानी
हरी घास सी याद
भविष्य के दुःस्वपन में
धू-धू कर जल उठती
अतीत एक डूबता द्वीप था
हर ओर यातनाओं का समुद्र लहराता
लहरों से पुकारता था भविष्य
एक चिड़ियाँ उड़ जाती
हाथों में चुभ जाता था
निम्बू का कांटा
जुबान पर फ़ैल जाता था
दुःख के समुद्र का नमक
सिर्फ आकाश था
अनुभव के पार दूर तक
करीने से रखी दुनिया में
हमें अपने हिस्से की तलाश थी
और जुलूस
और आन्दोलन
और घेराबंदी
सपनों की कोरों में
ढुलकते आंसू
सब एक डब्बे में बंद थे
हम नदियों के लिए उदास थे कि
पेड़ों के लिए
हम सड़कों के लिए उदास थे
या मैदानों के लिए
मालूम नहीं की तरह
दुनिया गोल थी
पगडण्डियों से निकलती सड़कें
और सड़कों से निकलते थे राजमार्ग
राजमार्ग से गुजरता था
एक अदद बूढ़ा
उसकी आँखों की पुतलियों में
चमकता था हमारा दुःख
एक रुलाई फूटती थी
और समूचे अतीत को
बहा ले जाती थी
एक हाथ टूटता और
बुहार ले जाता सारा साहस
एक कन्धा झुकता
और समेट लेता सारी उम्मीदें
एक शख्स मरता
और सपने आत्मदाह करने लगते
रात के तीसरे पहर
कोई उल्लू चिहुंक उठता
पल भर के लिए
चुप हो जाते झींगुर
कोई कबूतर पंख फड़फडाता
हडबडाकर हम उठते ,
कहते, गहरी नींद में
गुजारी रात हमने
सपनों से लहूलुहान
जिस्म का रक्त पोंछते
एक समूचे दिन को बिछाने लगते
धुंधली उम्मीद के चमकने तक
हम अपने फेफड़ों में भरपूर सांस भरते
और मुस्कुराते हुए करते
दिन की शुरुआत
बीस बरस बाद
बीस बरस के लिए
अगले बीस बरस तक
XXXXX

